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बांधों से पर्यावरण को नुकसान : मोहन थपलियाल

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भुवन पाठक
भुवन पाठक द्वारा मोहन थपलियाल जी का लिया गया साक्षात्कार का कुछ अंश।

भाई साहब आप अपना परिचय दीजिए?
मैं तपोवन का पूर्व ग्राम प्रधान था उसके बाद में जिला पंचायत का सदस्य रहा।

मैं आपको ही ढूंड रहा था, आपसे इस परियोजना के संबंध में कुछ प्रश्न करने हैं। इस परियोजना के बारे में लोगों तथा आपकी क्या सोच है?
अभी, इस परियोजना के संबंध में लोगों को केवल लाभ ही लाभ दिखाई दे रहा है। उन्हें लगता है कि उन्हें लाभ मिलेगा, नौकरी मिलेगी और जमीन का डेढ़ लाख रुपया नाली मिलेगा आदि। अगर वास्तव में लोगों को यह सब मिल जाए तो जनता बहुत अधिक खुश होगी लेकिन ऐसा होगा नहीं, ये केवल एक अफवाह मात्र है।

जब बाद में जाकर उन्हें इसकी वास्तविकता का पता चलेगा तब वो आंदोलन पर उतरेंगे।

सरकार कह रही है कि वो परियोजनाओं के द्वारा विकास कर रही है, लेकिन आप उनकी परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं, क्या आप विकास पसंद नहीं हैं?
हम भी देश का विकास ही चाहते हैं लेकिन हम ऐसा विकास नहीं चाहते जो लोगों की लाश पर हो या उन्हें बेघर करके हो। हमने मांग की थी कि अगर वो हमारे तय की गई कीमत के अनुसार मूल्य नहीं दे सकते तो हमारी जमीनों के बदले जमीनें दे दें। और मकान बनाने के लिए पैसा दे दें। इसके लिए मैं खुद मुख्यमंत्री जी से मिला था, उनका कहना था कि हम सोचेंगे और जमीन की ठीक कीमत देंगे।

एन.टी.पी.सी. के अधिकारियों ने भी यही कहा कि हम कास्तकारों तथा अन्य लोगों से बात करके कीमत देंगे लेकिन अब वो बातचीत से हटकर सीधे ही अधिग्रहण की कार्यवाही कर रहे हैं।

क्या इस परियोजना से पर्यावरण या सुरक्षा पर पड़ने वाले कुप्रभावों के बारे में एन.टी.पी.सी. ने आम आदमी को जानकारी दी है?
आम आमदी को तो इसकी जानकारी नहीं दी गई है। लेकिन 4 तारीख को जिलाधिकारी की अध्यक्षता में एक बैठक हुई जिसमें सारधाम विकास के उपाध्यक्ष तथा राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त क्षेत्र के विधायक तथा डी.एम. की बैठक थी उसमें हम लोग भी मौजूद थे।

छोटे जल संरचनाओं को सहेजना जरूरी : रमेश डिमरी

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भुवन पाठक
जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष रमेश डिमरी से भुवन पाठक द्वारा की गई बातचीत पर आधारित साक्षात्कार।

रमेश जी आप अपने राजनैतिक पृष्ठभूमि के बारे में हमें कुछ बताएं।
एम.ई.एस. में ठेकेदारी करने के बाद मुझे ठेकेदारी ही पसंद नहीं आई क्योंकि वहां लगभग सभी लोग लूट-खसोट करने पर ही लगे रहते हैं फिर चाहे वो सरकारी संस्थान हो या प्राइवेट इस सब को देखते हुए मैंने ठेकेदारी ही छोड़ दी और 1991 से दुकान चला रहा हूं। यहां आने के बाद मैं कांग्रेस से जुड़ा रहा। उस समय मैं, शशिभूषण जी से जुड़ा था वो कांग्रेस पार्टी में थे तथा एम.एल.ए. के चुनाव लड़ रहे थे लेकिन उनके चुनाव प्रचार के दौरान ही मुझे पता चल गया था कि इनका कुछ नहीं हो सकता। उसके बाद मैंने कांग्रेस छोड़ दी और बी.जे.पी. में आ गया, वहां मैं, मुन्ना सिंह चौहान के साथ जुड़ गया। वे उत्तराखंड न्यासी पार्टी से जुड़े हुए थे लेकिन बाद में उनका बी.जे.पी. के साथ विलय हुआ और हम भी उनके साथ ही बी.जे.पी. में आ गए और तबसे हम बी.जे.पी. के ही साथ हैं।

उसके बाद मैं पहली बार व्यापार संघ से चुनाव लड़ा और अपने यार-दोस्तों की मदद से जीत गया। बस मेरी राजनीति की इतनी ही पृष्ठभूमि है।

जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति बनााते समय आपके मन में क्या आया जो आपने इसका गठन किया।
हमने देखा कि सरकार इतनी बड़ी परियोजना बना रहा है जिसमें तपोवन, चमतो, पनघट, गोचर, पनसारी, हौली तथा शैलंग जैसे कई गावों अर्थात लगभग पूरे जोशीमठ को छूते हुए शैलंग तक की लगभग सभी भूमि जा रही थी लेकिन फिर भी लोग उसका विरोध नहीं कर रहे थे क्योंकि वहां सरकार ने मीडिया के द्वारा ये बातें फैला दी कि वहां के लोगों को डेढ़ लाख रुपए नाली से लेकर दो लाख रुपए नाली तक दिया जाएगा।

बांध से उत्तराखंड के गांवों पर खतरा

Author: 
भुवन पाठक
ओमप्रकाश डोभाल से भुवन पाठक द्वारा ली गई साक्षात्कार पर आधारित लेख।

डोभाल जी आप अपना पूरा नाम और क्या करते हैं इसके बारे में थोड़ा बताएंगे?
मैं, एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हूं और हमारा एक संगठन भी है जिसका अध्यक्ष मैं ही हूं। हम लोग सामाजिक कार्यों के तहत लोगों को कम्प्यूटर शिक्षा भी देते हैं।

क्या करना चाहते हैं?
मै, एक अच्छी संघर्ष समिति बनाना चाहता हूं क्योंकि आज राजनीति की स्थिति बिगड़ती जा रही है। आज किसी को चुनाव भी लड़ना होता है तो वह दस महिलाओं को साथ लेकर तपोवन बंद कराने की बात करता है क्योंकि उसे तो खुद प्रकाश में आना होता है इसलिए चाहे वो परियोजना के बारे में कुछ भी न जानता हो फिर भी उसे बंद कराने की बात करता है। वो चाहता है कि मेरा जो भी राजनीतिक रूप बने उसमें लोग यही जानें कि हां! भई इसने तो संघर्ष समिति बनाई थी और काम किया था।

इसी तरह जे.पी. के लिए भी एक संघर्ष समिति बनी थी लेकिन उसका परिणाम कुछ भी नहीं निकला। जिन लोगों की गाड़ियां वहां लगी हैं वो लोग उसका विरोध कर रहे हैं, जिन लोगों को वहां मकान दिए गए हैं वो लोग भी उसका विरोध कर रहे हैं।

उत्तराखंड में उद्योगीकरण का बढ़ावा

Author: 
भुवन पाठक
जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष अरुण कुमार शाह से भुवन पाठक द्वारा की गई बातचीत पर आधारित साक्षात्कार।

आप अपना थोड़ा सा परिचय देते हुए अपनी राजनीतिक भूमिका के बारे में बताएं?
मैं छात्र जीवन से ही राजनीति से जुड़ा हुआ हूँ। मैं उत्तराखंड क्रांति दल की स्टूडेंट शाखा से चुनाव लड़ा और विजयी रहा। 1984 में मैं, चमोली जिले में सी.पी.आई. का ए.आई.एफ. प्रभारी था। 1991 तक आते-आते हम उत्तराखंड क्रांति दल में पूर्ण रूप से शमिल हो गए।

उसके बाद मैं, आंदोलनों में शिरकत करता रहा। मैंने इलाहाबाद जाकर उत्तराखंड छात्र सोसायटी बनाई जिसमें, हमने वहां पढ़ने वाले 600 बच्चों को अपने साथ मिलाया। 1994 के दौरान मेरे मित्रों ने मुझे बताया कि, स्व. बडोनी और पान सिंह जी जैसे बड़े-बड़े आंदोलनकारी पौड़ी में धरने पर बैठ हुए हैं और हमें वहां आंदोलन करवाना है। मैं उस समय सीधे पौड़ी में बडोनी जी के पास गया और उनके साथ काम किया। तब से लगातार हम आंदोलन में रहे हैं। उसके बाद हमने पृथक राज्य के लिए आंदोलन किया और आज उत्तराखंड भी बना दिया।

आज भले ही उत्तराखंड की स्थिति ऐसी न हो जैसी हम चाहते थे लेकिन वर्तमान में जो भी योजनाएं चल रही है उनसे उत्तराखंड की स्थिति में जरूर सुधार होगा हां, ये जरूर है कि उत्तराखंड में कुछ ऐसे स्थान हैं जहां इन योजनाओं को अमल में लाना थोड़ा कठिन है विशेषकर इस पहाड़ में तो अधिकतर स्थानों पर जंगल ही जंगल हैं जहां कोई फैक्ट्री लगाना कठिन है लेकिन यहां से बिजली पैदा की जा सकती हैं और जड़ी-बूटियां प्राप्त की जा सकती हैं।

जंगल काटना और जड़ी-बूटियां पैदा करना फ़ैक्टरी से लगाने से अलग बात है तो, उसी प्रवृत्ति में यहां दो बहुत बड़ी योजनाएं चल रही है। वैसे हमारे पास छोटी योजनाएं भी हैं उनमें नाका की एक योजना भी शामिल है।

वो योजना बन गई है क्या?

खनन से जल, जंगल, जमीन की जैवविविधता पर प्रतिकूल असर : विजय जड़धारी

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आप, अपना थोड़ा सा परिचय दीजिए।
मैं, हिंगोल घाटी के जड़धार गांव में रहा हूं और उत्तराखंड में पर्यावरण जागरुकता को लेकर चले विभिन्न आंदोलनों जैसे चिपको, खनन विरोधी आंदोलन, टिहरी बांध विरोधी आंदोलन और अब बीज बचाओ आंदोलन मैं शामिल रहा।

आपने बीज बचाओ, टिहरी बांध विरोधी और चिपको जैसे कई आंदोलनों में भाग लिया। आज आप इन सभी आंदोलनों के कारण उत्तराखंड या यहां के समाज पर पड़े प्रभावों के बारे में क्या सोचते हैं?
इन आंदोलनों का प्रभाव तो कई क्षेत्रों में दिखता है। जैसे चिपको आंदोलन को ही देख लीजिए, उस आंदोलन के दौरान जब भी जंगल का कटान होता था तो वहां के लोग सीधे जंगल में जाकर पेड़ों से चिपक जाते थे और पेट काटने से रोकते थे। आज जंगल के लिए वन नीति बदल गई है। 1981 से न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे हिमालय क्षेत्र में एक हजार मीटर ऊंचाई से अधिक के पेड़ों के व्यापारिक कटान पर रोक लग गई है। व्यापारिक कटान तो बंद हो गए हैं बस अब कुछ छोटे-मोटे कटान और तस्करी हो रही है। लेकिन इस सब के बावजूद भी और वन अधिनियम 1980 के कारण भी काफी कुछ वन बचे हुए हैं।

लड़ाई सीधी तो नहीं है लेकिन कई क्षेत्रों में लोगों ने अपने-अपने गांव में अपने-अपने जंगल पाले हुए है। अब सरकार या गैर सरकारी संगठनों की ओर से वृक्षारोपण के बहुत सारे कार्यक्रम चले, लेकिन मुझे लगता है कि उनमें से नाममात्र के ही सफल हो पाए हैं।

इनमें से जितने भी कार्यक्रम चले, चाहे वो जलागम कार्यक्रम हो, विश्व बैंक या ई.ई.सी. का कार्यक्रम हो, इन सभी कार्यक्रमों के सकारात्मक परिणाम देखने को नहीं मिलते हैं अर्थात कहीं पर भी लोगों के लगाए हुए जंगल दिखाई नहीं देते हैं लेकिन वहीं, लोगों के अपने बनाए हुए जंगल कई जगहों पर हैं जिनमें उन्होंने संसाधनों और बाहरी मदद के बिना भी अपने जंगल तैयार किए हैं। मैंने, अधिकांश गांवों में देखा कि चाहे गांव के अंदर या बाहर कोई भी पेड़ उगाया गया हो लेकिन उसे काटने की बजाए बचाने का प्रयास किया गया है।

पर्यावरण के छेड़छाड़ से हमें भारी नुकसान होगा : सुंदर लाल बहुगुणा

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. हमारी भारतीय संस्कृति अरण्य संस्कृति थी। हमारे शिक्षा के केन्द्र, अर्थात आश्रम अरण्य में थे। गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अरण्यों को पुर्नजीवित करने के लिए शांति निकेतन की स्थापना की। कमरों के अंदर पढ़ने का चलन तो अंग्रेजों ने पैदा किया था क्योंकि उनका देश ठंडा था और घरों से बाहर बैठकर पढ़ाई नहीं हो सकती थी। इसलिए उन्होंने ये सारा जाल बुना। उनके आने से पहले तक तो भारत में सब कुछ खुले आसमान के नीचे होता था। क्योंकि खुले आकाश के नीचे और प्रकृति के सानिध्य में मनुष्य के विचारों को स्फूर्ति मिलती है, नए-नए विचार आते हैं।

वह कमरे के अंदर उन्हीं विचारों को बार-बार दोहराता रहता है जो उसके अंदर जमा होते हैं। क्योंकि कमरे की इतनी कम परिधि होती है जिसमें वह कमरे के चारों और ही चक्कर काटता रहता है। यदि भारत को अपना वर्चस्व कायम रखना है तो उसे अपने अतीत की ओर देखना चाहिए अर्थात उसे पुनः वही जीवन पद्धति अपनानी चाहिए जो उसे अरण्य संस्कृति से प्राप्त हुई थी। जिसमें चिन्तन करने और नए विचारों को प्राप्त करने के लिए, खुले आसमान के नीचे, पेड़ों के नीचे और नदी के किनारे बैठकर अध्ययन किया जाता था।

आपने देखा ही होगा कि कोई भी ऋषि नदी के किनारे या पहाड़ की उस चोटी पर बैठकर ध्यान लगाता है जहां से प्राकृतिक सुंदरता अर्थात जीवंत प्रकृति के दर्शन होते है। इस प्रकार प्रकृति से हमें स्थाई मूल्यों की प्राप्ति होती है। आज हमें दो-तीन चीजों की आवश्यकता है पहली तो अपने आज को अपने अतीत से जोड़ने की, जिस प्रकार कोई भी वृक्ष अपनी जड़ों के साथ जुड़ा होता है और अगर उसे जड़ से अलग कर दिया जाए तो वह सूख जाता है उसी तरह किसी भी समाज की जड़ उसका अतीत होता है और अगर उसको उसके अतीत से काट दिया जाए तो वह भी तरक्की नहीं कर पाता है।

उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन के लिए लोगों का संघर्ष मौजूद रहेगा : रघु तिवारी

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आप अपना थोड़ा सा परिचय दीजिए।
मेरा जन्म अल्मोड़ा में रानीखेत जिले के गंगोली गांव में हुआ। जहां तक शिक्षा का सवाल है, वो तो मैंने समाज से प्राप्त की और वो अब भी जारी है। स्कूल काॅलेज के बारे में कहूं तो मैंने राजनीति विज्ञान से एम.ए. करने के बाद एल.एल.बीकिया। अपनी पढ़ाई के साथ-साथ मैं, सामाजिक आंदोलनों से भी जुड़ा रहा। आज भी मैं, देश में घूम-घूमकर शिक्षा प्राप्त कर रहा हूं।

आपने संघर्षवाहिनी में रहकर बहुत काम किया, उसके बारे में संक्षेप में बताइए?
हम लोगों ने संघर्षवाहिनी के साथ काफी समय तक काम किया। लेकिन जैसे-जैसे वाहिनी का विकास हुआ वैसे-वैसे मेरे राजनीतिक और सामाजिक जीवन का भी विकास हुआ। मैंने 14 अगस्त 1976 में ही सामाजिक जीवन में प्रवेश किया, उस समय मेरी उम्र बहुत ही कम थी। उस समय तक संघर्षवाहिनी नहीं थी लेकिन पर्वतीय मोर्चे के रूप में ग्रामोत्थान संगठन का निर्माण हो चुका था और उस समय पर्वतीय मोर्चा वृक्षारोपण जैसे रचनात्मक कामों में लगा हुआ था। तब अल्मोड़ा जिले में दिन-रात राजनैतिक-सामाजिक चर्चायें होती रहती थीं, उसके साथ हम पर्वतीय मोर्चे से भी जुड़े रहे। आगे चलकर मोर्चे का स्वरूप बदला और व्यापक होकर उत्तराखंड संघर्षवाहिनी बना।

हम उसके साथ जुड़कर आंदोलनों में शामिल रहे फिर चाहे वो बागेश्वर के बगड़ में रहने का मामला हो या जन अभियान चलाने का मामला हो। मुझे आज भी आपातकाल के खिलाफ चलने वाला आंदोलन याद है। उस समय हम लोग हाईस्कूल में जाते रहते थे। जब वाहिनी ने भी विभिन्न आंदोलनों का नेतृत्व शुरू किया, उस समय भी हम एक कार्यकर्ता के तौर पर उसमें बराबर काम करते रहते थे।

1980, में हम, छात्रसंघ में शामिल हो गए। मैं रानीखेत से उत्तराखंड छात्र संगठन का प्रतिनिधि था। उस समय हम स्टार पेपर मिल के विरोध में हुए आंदोलन में शामिल थे, उस समय स्टार पेपर मिल का एग्रीमेंट रद्द करने का मामला चल रहा था। छात्र संगठन के माध्यम से हमने रानीखेत में जगह-जगह ट्रक जाम का कार्यक्रम किया।

सुनील भाई का जाना

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सामयिक वार्ता, मई 2014
सुनील और राजनारायण ने आदिवासियों के साथ मिलकर 1985 में किसान आदिवासी संगठन का गठन किया। और यहीं से शुरू हो गया आदिवासियों के हक और इज्जत की लंबी लड़ाई का सिलसिला। गांव-गांव में बैठकें होने लगीं। पर बीच में एक धक्का लगा। 1990 में राजनारायण की एक सड़क हादसे में मौत हो गई। सुनील भाई ने हिम्मत नहीं हारी, अकेले ही टिके रहे। धीरे-धीरे फागराम, गुलिया बाई और विस्तोरी जैसे नए कार्यकर्ता तैयार हुए और संगठन फिर बढ़ने लगा। सुनील भाई नहीं रहे, यह विश्वास करना मुश्किल हो रहा है। जब 16 अप्रैल को उनकी तबीयत बिगड़ी और स्मिता जी और मैं उन्हें इटारसी ले जा रहे थे, तब मैंने उनकी टेबल पर उसी सुबह वार्ता के लिए लिखा अधूरा संपादकीय छोड़ दिया था, यह सोचकर कि वे इटारसी से लौटकर उसे पूरा करेंगे। अब वह अधूरा ही रहेगा।

सुनील भाई को इटारसी में डाॅक्टर को दिखाया तो बताया गया उन्हें पक्षाघात (लकवा) की शिकायत है, जल्द भोपाल ले जाना होगा। इटारसी और भोपाल का रास्ता लंबा है और सड़कें बदहाल, गड्ढे और धूल से भरी हुई। रास्ते में उन्हें तीन उल्टियां हुईं और अंतिम उल्टी में खून आया था।

भोपाल में सुनील भाई के छोटे भाई सोमेश जो खुद डाॅक्टर हैं, पहले से मौजूद थे। अस्पताल पहुंचते ही जांच के लिए ले जाया गया, जहां पता चला कि ब्रेन हेमरेज हुआ है और तत्काल आॅपरेशन करना पड़ेगा। आॅपरेशन हुआ भी पर हालत में सुधार नहीं हुआ। भोपाल से दिल्ली के एम्स में ले जाया गया, जहां उनकी हालत जस की तस बनी रही। आखिरकार 21 अप्रैल को सुनील भाई ने अंतिम सांस ले ली।

पर्यावरण संरक्षण के लिए स्वयं जागरूक होना होगा : कुंवर प्रसून

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सैडेड द्वारा कुंवर प्रसून से हुए बातचीत पर आधारित साक्षात्कार।

आप अपना थोड़ा परिचय दीजिए?
मैं, सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ पत्रकारिता से भी जुड़ा हूं।

अपने आंदोलनों के बारे में कुछ बताइए।
प्रारंभ में मैं, शराब बंदी, चिपको और खनन विरोधी आंदोलन से जुड़ा रहा। आजकल मैं बीज बचाओ आंदोलन चला रहा हूं।

उत्तराखंड में जितने भी आंदोलन हुए हैं उन्होंने या तो लोकतंत्र को कमजोर किया है या उसको सहारा दिया है। इसी तरह जल, जंगल तथा जमीन के संदर्भ में इन आंदोलनों ने क्या भूमिका अदा की है?
आंदोलनों से लोगों की चेतना के साथ-साथ लोकतंत्र का विकास होता है। आंदोलनों के कारण लोग जागरूक होते हैं इसलिए आंदोलन तो होते रहने चाहिए। जिस जमीन पर, या जो लोग आंदोलन नहीं करते हैं वो या तो सुसुप्त होते हैं या शोषित होते हैं जबकि इसके विपरीत आंदोलन तो लोगों को आगे बढ़ाते हैं, लोकतंत्र को मजबूत करते हैं।

जिस प्रकार आप जल, जंगल तथा जमीन से संबंधित आंदोलनों की बात कर रहे हैं तो अभी तक यहां जल के विषय में कोई खास आंदोलन तो नहीं हुआ है लेकिन बांध बनाने के लिए जो नदियों को बांधा जा रहा है उसके विरोध में तो कई आंदोलन हुए हैं। वहीं जमीन के संबंध में अभी तक कोई विशेष आंदोलन नहीं हुआ है। जो लोग भूमिहीन थे वे आज भी भूमिहीन हैं और जो भूमिपति थे वे भूमिपति ही हैं।