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गांवों के संस्थागत ढांचे का विकास पंचायत की सहभागिता से : कुशवाहा

Author: 
उपेंद्र कुशवाहा
Source: 
पंचायतनामा, 04-10 अगस्त 2014, पटना
भारत की आत्मा गांवों में बसती हो या नहीं, पर उसका पिछड़ापन वहीं निवास करता है और इसी पिछड़ेपन को दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने मॉडल विलेज बनाने की बात कही है। मोदी सरकार के पहले बजट में ग्रामीण विकास के लिए घोषित योजनाओं और सरकार की नीतियों पर केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा से पंचायतनामा के लिए संतोष कुमार सिंह ने विशेष बातचीत की। प्रस्तुत है प्रमुख अंश :

विशेषज्ञों द्वारा बजट की आलोचना भी इसी आधार पर हो रही है कि सरकार ने मनरेगा और ग्रामीण विकास की अन्य योजना के मद में आवंटन में वृद्धि नहीं की, जबकि सरकार का दावा है कि ग्रामीण विकास उनकी प्राथमिकता है?
प्रधानमंत्री ने कई अवसरों पर कहा है और राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी यह बात दोहराई गई कि गांवों में शहरों जैसी सुविधाएं मुहैया कराना सरकार का लक्ष्य है। ऐसे में सरकार ग्रामीण विकास विभाग द्वारा चलाई जा रही योजनाओं को और मजबूती देने की जरूरत पर बल दे रही है।

जहां तक कटौती का सवाल है, तो बजट के पहले कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थी कि मनरेगा बंद होगा, बाकी योजनाओं में कटौती होगी, लेकिन ये आशंकाएं निर्मूल साबित हुई हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में 14,000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए। इसी तरह मनरेगा में 33,000 हजार करोड़ रुपए का आवंटन हुआ। साफ है कि हमारी सरकार का पूरा फोकस गांव के विकास पर है। इंदिरा आवास योजना के लाभार्थियों को दी जाने वाले राशि में बढ़ोतरी का प्रस्ताव है। गांवों में पेयजलापूर्ति व शौचालय निर्माण की योजना है।

वर्तमान सरकार ने कहा है कि देश में मॉडल विलेज विकसित किया जाएगा। आखिर मॉडल विलेज की अवधारणा क्या है?

कर्म ने मोड़ दिया जिंदगी का रुख

Source: 
पंचायतनामा, 28 जुलाई - 3 अगस्त, 2014, पटना
जैबुनेशाप्रेरणा लेकर इंसान अपनी तकदीर संवार सकता है। इस बात को जैबुनेशा से बेहतर कोई नहीं बयां कर सकता है। टीवी से प्रेरणा लेकर फर्श-से-अर्श तक पहुंचने की कहानी बिल्कुल फिल्मी लगती है, लेकिन है बिल्कुल सच। एक छोटी से पहल और आगे बढ़ने की जिद से जैबुनेशा ने वह मुकाम हासिल किया है, जिसे देख, सुन कर क्षेत्र के लोग उनके जुनून को सलाम करते हैं।

उनकी मेहनत की कायल महिलाएं जैबुनेशा के दिखाए राह पर चल कर अपने साथ इलाके की भी तकदीर बदल रही हैं। गोपालगंज जिले के कुचायकोट प्रखंड अंतर्गत बनकट पंचायत में आने वाले बरनइया गोखुल गांव की निवासी जैबुनेशा ने इस बात को साबित कर दिया है कि जिद से जहान को बदला जा सकता है।

छोटी-सी प्रेरणा बड़ी शुरुआत


अपने काम के बारे में बताते हुए जैबुनेशा कहती हैं, एक बार किसी काम से वह दिल्ली गई थी। वहां टीवी चल रहा था। उसमें केरल के किसी गांव में महिलाओं के द्वारा संचालित होने वाले स्वयं सहायता समूह के बारे में बताया जा रहा था। जिसे देखने के बाद इन्होंने अपने क्षेत्र में भी ऐसी महिलाओं के साथ स्वयं सहायता समूह बनाने की बात सोची।

वापस आने के बाद उन्होंने गांव के ही कुछ महिलाओं को इसके तरह की योजना के बारे में बताया। यह सन् 1999 की बात है। तब पूरे इलाके में महिला स्वयं सहायता समूह क्या होता है? इसके बारे में कोई कुछ भी नहीं जानता था।

धीरे - धीरे आई समझ

पर्यावरण संरक्षण के माध्यम से मिली आजीविका

Author: 
प्रशांत जयवर्द्धन
Source: 
पंचायतनामा सप्ताहिक पत्रिका, 2 जून 2014
प्रमोद महतो रांची के ओरमांझी के कुल्ही गांव में निजी विद्यालय चलाने और खेतीबाड़ी का काम करते हैं। गांव में चलाये जा रहे समेकित जलछाजन प्रबंधन कार्यक्रम के सचिव के रूप में कार्य करते हुए वे वर्षा जल संरक्षण के साथ सामुदायिक सब्जी पौधशाला चलाने का काम करते हैं। ये अपने गांव के किसानों को उन्नत किस्म के पौधे उचित दाम पर उपलब्ध कराते हैं। भारतीय बागवानी अनुसंधान परिषद, पलांडू द्वारा विकसित बैगन की स्वर्ण श्यामली और स्वर्ण नवीन किस्मों की खेती करके उन्होंने गांव में प्रगतिशील किसान की पहचान बनायी है। इसके अलावा टमाटर की स्वर्ण श्यामली और स्वर्ण प्रतिभा किस्म की खेती करके अपने लिए 500 ग्राम बीज भी उत्पादन किया है।

प्रमोद ने महाराष्ट्र के हिंद स्वराज ट्रस्ट से जल संरक्षण का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद अपने गांव में जल संरक्षण का कार्य करना शुरू किया। अपनी पांच एकड़ जमीन पर कृषि कार्य शुरू किया और गांव में सामाजिक कार्यों के जरिये जन जागरूकता लाने में लग गये। जलछाजन को बढ़ावा देने के लिए चलायी जा रही परियोजना की शुरुआत जब इनके गांव में हुई तो इसका सचिव इन्हें बनाया गया। आज कुल्ही जलछाजन में अपनी पहचान रखता है। केजीवीके के सहयोग से यहां जलछाजन में किये जा रहे कार्यों को देखने के लिए भारत सरकार के प्रतिनिधि, विभिन्न प्रबंधन संस्थानों के छात्र और सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि आ चुके हैं।

जल संरक्षण के महत्व को समझने के बाद इन्होंने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के द्वारा चलाये जा रहे जलछाजन पाठ्यक्रम में अपना नामांकन कराया है। इस विषय में वे और जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। प्रमोद का कहना है ‘ केजीवीके के संपर्क में आकर काफी कुछ सिखने को मिला। यहां चलाये जाने वाले नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के साथ जुड़ कर मेरे साथ मेरे गांव वाले भी लाभ उठा रहे हैं.’ अपने गांव में प्रगतिशील किसान के तौर पर जाने जाने वाले प्रमोद ने श्रीविधि धान की सफलतापूर्वक खेती करते हुए किसानों को इसके प्रशिक्षण और जनजागरूकता दिलाने के कार्य में अपना योगदान दिया है ।

पर्यावरण संरक्षण में पंचायती राज का हो सकता है अहम योगदान

Author: 
एके मिश्र
Source: 
पंचायतनामा सप्ताहिक पत्रिका, 2 जून 2014
भारतीय संविधान के 73वें संशोधन के उपरांत ग्यारहवीं अनुसूची के अंतर्गत पंचायती राज सहकारिता विषय निम्न प्रकार है :
कल्याणकारी (प्राकृतिक) खाद द्वारा कृषि विकास
जल संग्रहण विकास
सामाजिक वानिकी
लघु वन उत्पाद
जल निकायों का निकर्षण एवं साफ–सफाई
व्यर्थ जल संग्रहण एवं निष्कासन
सामुदायिक बायोगैस प्लांटों की स्थापना
र्इंधन व चारा विकास
गैर परंपरागत ऊर्जा संसाधनों के स्रोतों का विकास
तकनीकी वृद्धि एवं पंचायत विकास
वन विकास कार्यक्रम
वनरोपण एवं पारिस्थितिकी विकास

कल्याणकारी खाद द्वारा कृषि विकास


कृषि विकास और ग्रामीण विकास दोनों ही एक-दूसरे के प्रशंसनीय पूरक हैं। इसलिए पंचायत विकास और ग्रामीण विकास के लिए कृषि क्षेत्र का विकास अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध शोषण करने में जिस तकनीकी ज्ञान का उपयोग हो रहा है, उससे उत्पादन तो बढ़ रहा है, लेकिन मिट्टी का ह्रास हो रहा है। कीटनाशकों का प्रयोग मानव स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष रूप से अपना दुष्प्रभाव छोड़ता है।

प्याऊ से लंगर तक की प्रेरणादायक कहानी

Author: 
राजकुमार भारद्वाज
लोहारी जाट्टू के फौजी कर्मवीर की फौज बुझाती है हर रोज हजारों की प्यास
प्यासों को पानी पिलाने के लिए फौज से हर साल आते थे दो माह की छुट्टी लेकर


तारीख 6 जून, 2013।
समय : दिन के 2 बजे।
तापमान: 46 डिग्री।
स्थान : हिसार से वाया हांसी, बवानी खेड़ा भिवानी तक जाने वाली हरियाणा रोडवेज की खटारा लोकल बस।


. कई दिन से एक मित्र के घर एसी का सुख भोगने के बाद बस में जब निकला तो लगा कि भयंकर लू के थपेड़े भिवानी तक बुखार से लाल कर देंगे। हांसी तक ही रोने जैसे स्थिति थी। हिसार बस अड्डे से भरी पानी की बोतल हांसी से पहले ही खत्म हो गई थी। हांसी में बस दो मिनट के लिए ही रुकी सो न पानी पी पाया और न ही बोतल भर पाया।

शीशा बंद करता तो भी कोई फायदा नहीं था। कारण कि आगे की सीट पर बैठे हल की मूठ पकड़कर धरती के सीने पर अपने भाग्य की लकीरें खींचने वाले फटेहाल से ठेठ हरियाणवी तीन किसान गरमी से बेपरवाह थे। शीशा बंद करने के लिए एक बार बोला भी तो बामला के 65 साल के धर्मवीर ग्रेवाल बोले, अरै भाई किसी गरमी, बावले तमन्है गरमी ए कोन्या देखी। ऊपर तै आग बरस्या करती, अर हम 50 डिग्री में हल चलाया करते। बीरबानी सिकर दोपाहरे म्ह ज्वारा ल्याया करती। (रे भाई कैसी गरमी, बावले आपने गरमी देखी ही नहीं, आसमान से आग बरसती थी और हम 50 डिग्री तापमान में ठेठ दोपहर में हल चलाते थे। पत्नी हमारा और पशुओ का खाना लेकर आती थी।)

वनों पर स्थानीय लोगों का अधिकार हो

Author: 
भुवन पाठक
भुवन पाठक द्वारा एस.पी.सत्ती का लिया गया साक्षात्कार।

आप अपना परिचय दीजिए।
मेरा नाम एस.पी. सती है। मैं, वर्तमान में गढ़वाल विश्वविद्यालय में भू-विज्ञान पढ़ाता हूं और जब, 1994 से राज्य आंदोलन की शुरूआत, तभी से मैं, उसमें संयुक्त छात्र संघर्ष समिति में केन्द्रीय संयोजक राज्य स्तर के तौर पर रहा और तमाम बड़े-बड़े कार्यक्रमों में भाग लिया।

सर, उत्तराखंड राज्य आंदोलन कई अपेक्षाओं को लेकर लड़ा गया था। राज्य बने हुए तीन-चार साल हो चुके हैं, क्या इसकी अपेक्षाएं पूरी हो पाई हैं? आप लोगों के मन में उत्तराखंड के विषय में क्या अपेक्षाएं थी?
उत्तराखंड राज्य नेताओं के लिए माना गया था, और पृथक राज्य बनने के बाद पिछले तीन-चार सालों में उनकी अपेक्षाएं पूरी हुई भी हैं। लेकिन बाकी क्षेत्रों में यह पृथक राज्य स्थानीय जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा है। यह कुछ मामलों में सफल हुआ भी हो लेकिन अधिकतर मामलों में इस पृथक उत्तराखंड राज्य ने जनता को ठगा ही है।

अगर हम इस आंदोलन के असफलता के विषय में बात करें तो इसके लिए दो-तीन कारण महत्वपूर्ण हैं, पहला, किसी भी आंदोलन को चलाने से पहले ही एक मजबूत संगठन हो तो वह धीरे-धीरे विकसित होता है लेकिन यदि कोई संगठन किसी आंदोलन के होने के बाद बने तो न तो उसका कोई रास्ता रहता है और न ही कोई दर्शन रहता है वो तो केवल आंदोलन को थामने की एक कोशिश भर रहती है और बिना संगठन के चलने वाले आंदोलन में तो ऐसा ही होता है जैसे कि हमेशा भयंकर बारिश में अचानक बाढ़ आ जाती है। ऐसी स्थिति में नदी के तटबंध उस बाढ़ को संभालने की स्थिति में नहीं रहते हैं। तो इस प्रकार जहां इतनी तबाही होती है वहां सकारात्मक चीज नहीं हो सकती है।

बांधों से पर्यावरण को नुकसान : मोहन थपलियाल

Author: 
भुवन पाठक
भुवन पाठक द्वारा मोहन थपलियाल जी का लिया गया साक्षात्कार का कुछ अंश।

भाई साहब आप अपना परिचय दीजिए?
मैं तपोवन का पूर्व ग्राम प्रधान था उसके बाद में जिला पंचायत का सदस्य रहा।

मैं आपको ही ढूंड रहा था, आपसे इस परियोजना के संबंध में कुछ प्रश्न करने हैं। इस परियोजना के बारे में लोगों तथा आपकी क्या सोच है?
अभी, इस परियोजना के संबंध में लोगों को केवल लाभ ही लाभ दिखाई दे रहा है। उन्हें लगता है कि उन्हें लाभ मिलेगा, नौकरी मिलेगी और जमीन का डेढ़ लाख रुपया नाली मिलेगा आदि। अगर वास्तव में लोगों को यह सब मिल जाए तो जनता बहुत अधिक खुश होगी लेकिन ऐसा होगा नहीं, ये केवल एक अफवाह मात्र है।

जब बाद में जाकर उन्हें इसकी वास्तविकता का पता चलेगा तब वो आंदोलन पर उतरेंगे।

सरकार कह रही है कि वो परियोजनाओं के द्वारा विकास कर रही है, लेकिन आप उनकी परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं, क्या आप विकास पसंद नहीं हैं?
हम भी देश का विकास ही चाहते हैं लेकिन हम ऐसा विकास नहीं चाहते जो लोगों की लाश पर हो या उन्हें बेघर करके हो। हमने मांग की थी कि अगर वो हमारे तय की गई कीमत के अनुसार मूल्य नहीं दे सकते तो हमारी जमीनों के बदले जमीनें दे दें। और मकान बनाने के लिए पैसा दे दें। इसके लिए मैं खुद मुख्यमंत्री जी से मिला था, उनका कहना था कि हम सोचेंगे और जमीन की ठीक कीमत देंगे।

एन.टी.पी.सी. के अधिकारियों ने भी यही कहा कि हम कास्तकारों तथा अन्य लोगों से बात करके कीमत देंगे लेकिन अब वो बातचीत से हटकर सीधे ही अधिग्रहण की कार्यवाही कर रहे हैं।

क्या इस परियोजना से पर्यावरण या सुरक्षा पर पड़ने वाले कुप्रभावों के बारे में एन.टी.पी.सी. ने आम आदमी को जानकारी दी है?
आम आमदी को तो इसकी जानकारी नहीं दी गई है। लेकिन 4 तारीख को जिलाधिकारी की अध्यक्षता में एक बैठक हुई जिसमें सारधाम विकास के उपाध्यक्ष तथा राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त क्षेत्र के विधायक तथा डी.एम. की बैठक थी उसमें हम लोग भी मौजूद थे।

छोटे जल संरचनाओं को सहेजना जरूरी : रमेश डिमरी

Author: 
भुवन पाठक
जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष रमेश डिमरी से भुवन पाठक द्वारा की गई बातचीत पर आधारित साक्षात्कार।

रमेश जी आप अपने राजनैतिक पृष्ठभूमि के बारे में हमें कुछ बताएं।
एम.ई.एस. में ठेकेदारी करने के बाद मुझे ठेकेदारी ही पसंद नहीं आई क्योंकि वहां लगभग सभी लोग लूट-खसोट करने पर ही लगे रहते हैं फिर चाहे वो सरकारी संस्थान हो या प्राइवेट इस सब को देखते हुए मैंने ठेकेदारी ही छोड़ दी और 1991 से दुकान चला रहा हूं। यहां आने के बाद मैं कांग्रेस से जुड़ा रहा। उस समय मैं, शशिभूषण जी से जुड़ा था वो कांग्रेस पार्टी में थे तथा एम.एल.ए. के चुनाव लड़ रहे थे लेकिन उनके चुनाव प्रचार के दौरान ही मुझे पता चल गया था कि इनका कुछ नहीं हो सकता। उसके बाद मैंने कांग्रेस छोड़ दी और बी.जे.पी. में आ गया, वहां मैं, मुन्ना सिंह चौहान के साथ जुड़ गया। वे उत्तराखंड न्यासी पार्टी से जुड़े हुए थे लेकिन बाद में उनका बी.जे.पी. के साथ विलय हुआ और हम भी उनके साथ ही बी.जे.पी. में आ गए और तबसे हम बी.जे.पी. के ही साथ हैं।

उसके बाद मैं पहली बार व्यापार संघ से चुनाव लड़ा और अपने यार-दोस्तों की मदद से जीत गया। बस मेरी राजनीति की इतनी ही पृष्ठभूमि है।

जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति बनााते समय आपके मन में क्या आया जो आपने इसका गठन किया।
हमने देखा कि सरकार इतनी बड़ी परियोजना बना रहा है जिसमें तपोवन, चमतो, पनघट, गोचर, पनसारी, हौली तथा शैलंग जैसे कई गावों अर्थात लगभग पूरे जोशीमठ को छूते हुए शैलंग तक की लगभग सभी भूमि जा रही थी लेकिन फिर भी लोग उसका विरोध नहीं कर रहे थे क्योंकि वहां सरकार ने मीडिया के द्वारा ये बातें फैला दी कि वहां के लोगों को डेढ़ लाख रुपए नाली से लेकर दो लाख रुपए नाली तक दिया जाएगा।

बांध से उत्तराखंड के गांवों पर खतरा

Author: 
भुवन पाठक
ओमप्रकाश डोभाल से भुवन पाठक द्वारा ली गई साक्षात्कार पर आधारित लेख।

डोभाल जी आप अपना पूरा नाम और क्या करते हैं इसके बारे में थोड़ा बताएंगे?
मैं, एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हूं और हमारा एक संगठन भी है जिसका अध्यक्ष मैं ही हूं। हम लोग सामाजिक कार्यों के तहत लोगों को कम्प्यूटर शिक्षा भी देते हैं।

क्या करना चाहते हैं?
मै, एक अच्छी संघर्ष समिति बनाना चाहता हूं क्योंकि आज राजनीति की स्थिति बिगड़ती जा रही है। आज किसी को चुनाव भी लड़ना होता है तो वह दस महिलाओं को साथ लेकर तपोवन बंद कराने की बात करता है क्योंकि उसे तो खुद प्रकाश में आना होता है इसलिए चाहे वो परियोजना के बारे में कुछ भी न जानता हो फिर भी उसे बंद कराने की बात करता है। वो चाहता है कि मेरा जो भी राजनीतिक रूप बने उसमें लोग यही जानें कि हां! भई इसने तो संघर्ष समिति बनाई थी और काम किया था।

इसी तरह जे.पी. के लिए भी एक संघर्ष समिति बनी थी लेकिन उसका परिणाम कुछ भी नहीं निकला। जिन लोगों की गाड़ियां वहां लगी हैं वो लोग उसका विरोध कर रहे हैं, जिन लोगों को वहां मकान दिए गए हैं वो लोग भी उसका विरोध कर रहे हैं।