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निजी कंपनियों के दबाव में बिकाऊ हुए प्राकृतिक संसाधन

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सैडेड
सैडेड द्वारा कामेश्वर बहुगुणा की ली गई साक्षात्कार पर आधारित बातचीत।

आप अपना परिचय दीजिए?
मेरा जन्म चम्बा के पास साबुली गांव में हुआ। हमारे परिवार के अधिकतर लोग पौड़ी गढ़वाल के किंगसार गांव में रहे, मेरे दादाजी भी वहां रहते थे इसलिए मैंने बचपन के कुछ वर्ष उन्हीें के साथ बिताए। हमारा पुरोहितों का परिवार होने के कारण हमारे घर में पुरोहित के काम के साथ पूजा पाठ और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन मनन भी होता था। हमारे दादाजी खूब अध्ययन-मनन करते थे इसलिए हमें उस सब का थोड़ा बहुत परिचय हुआ।

उन दिनों हम बच्चे थे जब ब्रिटिश गढ़वाल में कांग्रेस का आंदोलन चला करता था हम लोग कांग्रेस के नारे सुना करते थे। हम लोग कापियों के पन्ने फाड़कर झंडा बनाकर घुमाया करते थे। उन दिनों हमारे गांव में रामलीला होती थी स्वभाव से मेरा कंठ बहुत अच्छा था इसलिए मैं बहुत बढ़िया गाता था। महिलाएं मेरे मुंह से रामायण का पाठ सुनकर बहुत आनंद विभोर हो जाया करती थी। मैं रामलीला भी खेलता था और अक्सर वहां राम और लक्ष्मण का पाठ किया करता था एक बार संयोग से हमको रंग पोतकर और पूंछ लगाकर हनुमान बना दिया।

जब हमारी दादी को इस बात का पता चला तो वह हम पर बहुत बिगड़ी कि ब्राह्मण के बेटे को बंदर बना दिया और उसके साथ वह यह भी कहने लगी कि सत्यानाश हो इस गांधी का जिसने इस देश में ब्राह्मण और अब्राह्मण का भेद ही मिटा दिया। संयोग से मैंने गांधी का नाम पहली बार सुना था उसे सुनते ही मेरे मन में ये सवाल आया कि हनुमान और गांधी में क्या संबंध है?

मेरी दादी मुझे आधे ही पाठ में उठाकर ले आई और कहने लगी कि राम और लक्ष्मण का पाठ तो ठीक है लेकिन हनुमान बनाना बहुत गलत बात है। वो नीच योनि का था और हम तो ब्राह्मण हैं। वे कहने लगी कि कांग्रेस में ये जो गांधी नाम का नेता है वो सबसे यही कहता फिरता है कि सभी जातियों में कोई भेद नहीं होता, कोई ऊंच-नीच नहीं होती।

जंगल के दावेदार

Author: 
भुवन पाठक
पी.सी. तिवारी से भुवन पाठक द्वारा लिए गए साक्षात्कार का कुछ अंश।

पी.सी. दा मैं सैडेड के साथ जुड़ा हूं और उनकी ओर से ही मैं, आपसे बात कर रहा हूं। हम दो-तीन साथी मिलकर एक कार्यक्रम चलाते है जिसमें पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में लोकतंत्र स्थापित करने के विषय में संवाद स्थापित किया जाता है। आप पिछले तीन दशकों से उत्तराखंड समेत लगभग संपूर्ण देश में राजनैतिक और सामाजिक कामों में सक्रिय रहे हैं इसलिए मैं, चाहता हूं कि आप अपना पूरा परिचय देते हुए अपने छात्र जीवन से आज तक के कार्यक्रमों के बारे में हमें बताएं?
मेरा कोई खास परिचय नहीं है। मेरा जन्म अल्मोड़ा जिले के एक छोटे से गांव घुंगोली में हुआ। यह गांव बछवाड़ा ग्रामसभा का हिस्सा है। उसके बाद पढ़ने के लिए पिताजी के साथ कभी यहां और कभी कहां घूमते हीे रहे। बाद में मैं, द्वाराहाट में पढ़ने गया, मैंने, अपनी इंटर की पढ़ाई बरेली से की, उसके बाद मैंने कुमांऊ विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और वहीं से छात्र राजनीति के माध्यम से मैंने सामाजिक जीवन की शुरूआत की।

हमने ग्रामीण छात्रों को एकजुट किया और एक संगठन बनाया। इसके माध्यम से हमने जंगल, शराब, पहाड़ तथा महिलाओं के मुद्दों को उठाया और इस विषय को लोगों में जागरूकता फैलाई। इन आंदोलनों के दौरान हमें कई अच्छे अनुभव प्राप्त हुए और हमारे मन में यह विचार पैदा हुआ कि हम लोग साधनों के बिना भी जनता के साथ रह सकते है, जी सकते हैं, उनको प्रेरित कर सकते हैं, उनके अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं। इसी दौर में हमने नंद प्रयाग की यात्रा में भाग लिया जिसमें हमने यह तय किया कि अब हम अपनी चिट्ठी-पत्रियों में उत्तर प्रदेश शब्द की बजाए उत्तराखंड शब्द का प्रयोग करेंगे।

ये किस समय की बात है?

एक बार फिर देशवासियों को कुर्बानी देनी होगी : हरीश मैसूरी

Author: 
भुवन पाठक
भुवन पाठक द्वारा हरीश मैसूरी का लिया गया साक्षात्कार पर आधारित लेख।

हरीश जी आप अपना पूरी परिचय दीजिए?
मै गोपेश्वर में रहता हूं। वर्तमान में उत्तरांचल के चमोली जिले में न्यूज रिपोर्टिंग का काम करता हूं। इसके अलावा मैं, जल, जंगल, जमीन, महिलाओं तथा शराब से जुड़े जन आंदोलनों में भी भाग लेता रहता हूं जिससे मुझे कई व्यवहारिक अनुभव प्राप्त हुए हैं।

मैसूरी जी, उत्तराखंड के जन आंदोलनों से जुड़े रहने के कारण आपने वहां के ऐसे कई आंदोलन देखे जिसमें वहां के नागरिकों ने अपने अधिकारों के लिए तथा अपनी जीवनचर्या को सुधारने के लिए संघर्ष किया, उनमें जल, जंगल, जमीन के आंदोलन हों या मसूरी का चिपको आंदोलन हो या फिर उत्तराखंड के पृथक राज्य का आंदोलन ही क्यों न हो उसमें वहां के सभी लोगों ने बढ-चढ़कर भाग लिया। आप इन सब आंदोलनों के बारे में थोड़ा-थोड़ा बताइए कि इनके पीछे लोगों की मान्यता क्या थी तथा इन आंदोलनों के क्या परिणाम निकले आदि।
अगर हम आंदोलनों की बात करें तो उत्तराखंड में आंदोलनों का एक लंबा-चौड़ा इतिहास रहा है यहां लगभग हर क्षेत्र के लिए आंदोलन हुए हैं। उत्तराखंड में आज जितने भी स्कूल हैं, उनमें से लगभग 90 प्रतिशत स्कूल आंदोलनों के द्वारा ही स्थापित हुए हैं। उत्तराखंड पुरातन काल से ही शिक्षा का केन्द्र रहा है यहां वैदिक काल से लेकर भारतीय दर्शन तक जितने भी ग्रंथ लिखे गए हैं उन सबकी रचना यहीं की गई है।

जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय लोगों का अधिकार होना चाहिए : भवानी शंकर थपलियाल

Author: 
भुवन पाठक
भवानी शंकर थपलियाल का भुवन पाठक द्वारा लिया गया साक्षात्कार।

आप अपना परिचय दीजिए।
मैं, गढ़वाल के श्रीनगर में रहता हूं और पिछले 12-14 साल से सामाजिक क्षेत्र में कार्यरत हूं। मैं कई प्रकाशनों तथा कई स्वयंसेवी संगठनों में साथियों के सहयोग से कार्य कर रहा हूं।

हाल ही में आपने अपनी कुछ अपेक्षाओं के कारण पृथक उत्तराखंड राज्य के लिए आंदोलन किया जिसके कारण पृथक उत्तराखंड राज्य की स्थापना तो हो गई लेकिन, क्या पृथक उत्तराखंड राज्य बनने से आपकी सभी अपेक्षाएं पूरी हो गई हैं? इसके बारे में आपकी क्या राय है।
यदि आप उत्तराखंड राज्य आंदोलन के मूल में जाएं तो आपको पता चलेगा कि यह आंदोलन आरक्षण के विरोध में खड़ा हुआ था जो बाद में पृथक राज्य का आंदोलन बन गया। पृथक राज्य बनने से पहले यहां के लोगों को बेरोजगारी की समस्या का सामना करना पड़ता था क्योंकि लखनऊ दूर होने के कारण उत्तर प्रदेश में होने वाले विकास का लाभ उन्हें नहीं मिल पाता था।

वहां के लोगों को लगा कि यहां का पहाड़ी इलाका एक अलग ही परिवेश का है जिसको समझे बिना लखनऊ में बैठकर पहाड़ के लिए योजनाएं बना दी जाती हैं जिनका पहाड़ को कुछ भी लाभ नहीं मिल पाता है। यदि राजधानी उनके नजदीक हो जाए तो उन्हें सभी योजनाओं के लाभ मिल सकेंगे और वहां के लोग प्रभावशाली तरीके से अपनी बातों को रख भी पाएंगे इसीलिए इन सब लक्ष्यों को ध्यान में रखकर यह आंदोलन लड़ा गया।

लेकिन सरकार बनने के बाद वर्तमान सरकार का रवैया भी लखनऊ जैसा ही रहा। इसमें कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हो पाया है। पृथक राज्य बनने के बाद जिन स्थितियों में सुधार आना था वो अब भी जस की तस बनी हुई हैं।

हमने सोचा था कि पृथक राज्य बनने के बाद उत्तराखंड की जमीन पर हमारा अधिकार हो जाएगा और यहां हमारे ही कानून चलेंगे। हम चाहते थे कि यहां के भूमि सुधार के संबंध में काम करना चाहिए और सरकार को चकबंदी लागू करनी चाहिए। जिससे वहां के लोगों के पास रोजगार के साधन उपलब्ध हो जाएं।

सुनिश्चित करें कि आपका आरओ प्युरिफायर विश्व स्तरीय हो

Source: 
दैनिक भास्कर, 26 अप्रैल 2014
भारत के बाजार में वाटर प्युरिफायर्स, फिल्टर्स कई तरह के प्रचलन में है। जल गुणवत्ता की कमी की वजह से प्युरिफायर्स घरों में एक जरूरी चीज बनते जा रहे हैं। प्युरिफायर्स का प्रमाणीकरण अब एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। आरओ प्युरिफायर के प्रमाणन के संदर्भ में केंट आरओ सिस्टम लिमिटेड के चेयरमैन श्री महेश गुप्ता की बातचीत।

आरओ प्युरिफायर्स के लिए प्रमाणपत्र क्यों जरूरी हैं?
पिछले कुछ वर्षों से हर घर में आरओ प्युरिफायर एक सख्त जरूरत बन गया है।

इसके पीछे कारण है हमारे पानी के स्रोतों जैसे कि ग्राउंडवॉटर, नदियां, जलग्रहण क्षेत्र, जलाशय प्रणालियां और यहां तक कि नल के पानी में भी तेजी से बढ़ती हुई घुली अशुद्धियों जैसे कि जंग, सॉल्ट्स, हेवी मेटल्स, केमिकल्स इत्यादि।

आज आरओ वॉटर प्युरिफायर मार्केट में विभिन्न तकनीकों पर आधारित, हर दर्जे के अगिनत ब्रांड्स मौजूद हैं। लेकिन समस्या की बात यह है कि उपभोक्ताओं के पास ऐसा कोई मापदंड नहीं, जिससे वो जान सकें कि कौन सा ब्रांड या टेक्नोलॉजी सबसे उत्तम है। ऐसी स्थिति में उनके लिए यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि वह अपने घर के लिए कौन सा प्युरिफायर चुनें।

यही नहीं, आजकल अनगिनत विज्ञापनों द्वारा किए जाने वाले दावे भी उपभोक्ताओं की दुविधा बढ़ा रहे हैं। ऐसी स्थिति में ब्रांड्स के बीच होने वाली इस होड़ में यह अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है कि किसी भी प्रकार के झूठे दावे, खासकर एक वॉटर प्युरिफायर के मामले में काफी खतरनाक सिद्ध हो सकते हैं।

चण्डीप्रसाद भट्ट: रचनात्मकता का सम्मान

Author: 
रमेश पहाड़ी
Source: 
सर्वोदय प्रेस सर्विस, अप्रैल 2014
1964 में उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ दशोली ग्राम स्वराज्य संघ की स्थापना कर स्थानीय संसाधनों, जिसमें मानव संसाधन भी शामिल था, के सदुपयोग की कार्ययोजना पर काम शुरू किया। यही संस्था आगे चलकर सामाजिक सरोकारों के लिए सामाजिक गतिमानता का एक सशक्त केंद्र बनी। बाद के वर्षों में इसके माध्यम से अनेक अभियान और आंदोलनों के साथ-साथ अनेक अध्ययन यात्राएं और व्यावहारिक प्रयोग किए गए। मैग्सेसे व पद्मभूषण से सम्मानित चण्डीप्रसाद भट्ट एक अद्भुत गांधीवादी कार्यकर्ता हैं। पर्यावरण को लेकर वैश्विक जागरूता बढ़ाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनकी रचनात्मकता जीवन के सभी क्षेत्रों एवं समाज के सभी वर्गों में व्याप्त है। शराबबंदी और सामाजिक समानता उनके जीवन के ध्येय रहे हैं। अपने इन्हीं गुणों के कारण वे सहज ही अंतरराष्ट्रीय गांधी शांति पुरस्कार के पात्र बन गए हैं।

‘दिल्ली को अब सुधरना ही होगा’

Author: 
आशीष मिश्र
Source: 
इंडिया टुडे 19 मार्च 2014
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सरकार बनने के बाद से अपने मंचों और अखबारों में लेखों के जरिए नदियों की सफाई का आह्वान करने वाले लोक निर्माण, सिंचाई मंत्री शिवपाल सिंह यादव के तेवर यमुना के प्रदूषण पर काफी तल्ख हैं। लखनऊ में सचिवालय स्थित अपने कार्यालय में उन्होंने प्रमुख संवाददाता आशीष मिश्र से विस्तार से बातचीत की।

यमुना में बढ़ते प्रदूषण के लिए कौन जिम्मेदार है?
पूरी तरह से दिल्ली सरकार। यमुना में गिरने वाले दिल्ली के 16 नाले इतना सीवेज और औद्योगिक गंदगी लेकर आते हैं जिससे इसकी बीओडी 21 तक पहुंच जाती है। यूपी से 400 क्यूसेक साफ पानी के बदले गंदा पानी देना न्याय नहीं है। दिल्ली को अब सुधरना ही होगा।

दिल्ली का पानी बंद करने की चेतावनी पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव को भ्रष्ट नेताओं की सूची में शामिल करने का बदला तो नहीं?
केजरीवाल ने क्या किया, यह मुझे नहीं पता लेकिन पिछले वर्ष कुंभ में भी मैंने यमुना में प्रदूषण का मुद्दा उठाया था। इसके बाद मथुरा में भी संतों को यमुना साफ करने का भरोसा दिया था। इस मुद्दे पर दिल्ली सरकार से कई बार वार्ता की लेकिन जब कोई नतीजा नहीं निकला तो सख्त रवैया अपनाना ही पड़ा।

यमुना तो यूपी में भी काफी गंदी हो रही है?

यमुना के किनारे स्थित कई औद्योगिक इकाइयों ने अभी तक ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लगाया है। इनसे ही गंदगी फैल रही है। इन्हें दोबारा नोटिस जारी की जा रही है। यमुना में कचरा डालना बंद नहीं किया तो मुकदमा दर्ज कर जेल भी भेजा जाएगा।

आपका विभाग भी यमुना में गिरने वाले नालों और बैराज की सफाई नहीं कर पा रहा?
हर जगह ऐसा नहीं है। सिंचाई विभाग के प्रमुख सचिव को आदेश दिया है कि यूपी के सभी 12 जोन के चीफ इंजीनियर की अध्यक्षता में एक टीम बना दें जो नालों और बैराज की सफाई पर खास ध्यान दें।

यमुना की सफाई से जुड़े विभागों में आपसी तालमेल न होने से हालात बिगड़े हैं?

दक्षिण में गिरता जल स्तर बजा रहा है खतरे की घंटी

Author: 
अतुल कुमार सिंह
. इस बार के लोकसभा चुनाव में तमाम मुद्दे उछल रहे हैं लेकिन पानी का मुद्दा किसी कोने से उठता नहीं नजर आ रहा। जबकि पानी को लेकर पिछले दिनों काफी विवाद खड़ा हो चुका है। चाहे वह आसाराम द्वारा अपने भक्तों से होली खेलने में लाखों लीटर पानी की बर्बादी हो या सूखे से ग्रस्त मराठावाड़ा और विदर्भ में लोगों द्वारा ट्रेनों से पानी चोरी चुपके निकालना, हर बार यह देश में चर्चा का विषय बना है। इसका मुख्य कारण जमीन के अंदर पानी की कमी है। पिछले कुछ दशकों में देश में भूजल के स्तर में चिंताजनक गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट गंभीर संकेत देती है। मद्रास विश्वविद्यालय में एप्लायड जियोलॉजी के पूर्व प्रोफेसर और वर्तमान में सेंटर फॉर एनवायरमेंटल साइंसेज के निदेशक डॉ. एन.आर. बल्लुकराया दक्षिण भारत के भूजल पर गहराई से अध्ययन करते रहते हैं। प्रस्तुत है यहां उनसे इस मुद्दे पर अतुल कुमार सिंह की बातचीत :

भूगर्भ के जलस्तर में भारी गिरावट पर चिंता जताई जा रही है। लेकिन क्या यह समस्या देश भर एक जैसी है।
पूरे देश में भूजल स्तर में कमी आ रही है, यह तो सच है लेकिन इसके चरित्र अलग-अलग तरह के हैं। उत्तर भारत के दिल्ली, पंजाब, हरियाणा राज्यों के भू-स्तर में गिरावट का आलम यह है कि कई जगहों पर नीचे जल है ही नहीं तो कई स्थानों पर यह 1000 फीट से भी नीचे चला गया है। पूर्वी क्षेत्र में भी भूजल स्तर पर गिरावट आई है। वहीं दक्षिण भारत में स्थिति थोड़ी भिन्न है। यहां की जमीन चट्टानी है तथा कई तरह की बनावट है। मसलन, तमिलनाडु और दक्षिण केरल में तलछट से बनी चट्टानी जमीन है। इस जमीन में भूजल अधिक जमा होता है। लेकिन यह क्षेत्र मुश्किल से पूरे दक्षिण का 20 फीसदी ही है। बाकी के 80 फीसदी इलाके में कठोर चट्टान हैं। इसमें अधिक पानी जमा नहीं हो पाता है।

परियोजनाओं पर तुरंत प्रतिबंध

Author: 
अश्वनी वर्मा
Source: 
जनसत्ता (रविवारी), 12 जनवरी 2014
पनबिजली विशेषज्ञ और पर्यावरणविद् आरएल जस्टा से अश्वनी वर्मा की बातचीत

अंधाधुंध परियोजनाओं से क्या नुकसान हो सकते हैं?
किन्नौर जिला भूकम्प की नजर से अतिसंवेदनशील जोन पांच में आता है। यहां के पहाड़ खुरदरे और रेतीले हैं। सुरंगों के निर्माण में अंधाधुंध विस्फोटकों से पहाड़ खोखले हो रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग का असर यहां प्रत्यक्ष देखने को मिल रहा है। इससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं। असामयिक बारिश और बर्फबारी हो रही है। जहां बहुत कम बारिश होती थी वहां बारिश बहुत हो रही है। नदियों और सहायक नदियों में पानी घट रहा है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए किन्नौर जिले में प्रस्तावित बिजली परियोजनाओं पर तुरंत प्रतिबंध लगा देना चाहिए।

परियोजनाओं के बारे में कुछ बताएं?
हिमाचल में पहले अठारह हजार मेगावाट बिजली परियोजना लगाने की क्षमता की बात होती थी। फिर कहा गया कि इक्कीस हजार मेगावाट तक बिजली दोहन की क्षमता है। कुछ लालची लोगों ने इस क्षमता को तेईस हजार और आजकल सत्ताईस हजार मेगावाट की क्षमता का प्रचार करना शुरू कर दिया, जो कि पर्यावरण की दृष्टि से घातक होगा। ये परियोजनाएं ग्लेशियर और स्नोलाइन के पास तक पहुंच कर उन्हें नष्ट करेंगी और ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा देंगी।

कुछ परियोजनाएं तो वन्य जीवों को भी नुकसान पहुंचाएंगी। एक परियोजना से दूसरी परियोजना के बीच की निश्चित दूरी कम हो जाएगा। शत प्रतिशत विद्युत दोहन करने के बजाए नार्वे और स्वीडन की तर्ज पर कुल विद्युत दोहन क्षमता का बीस प्रतिशत पर्यावरण को बचाए रखने के लिए सदैव सुरक्षित रखना होगा।