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खनन का अधिकार चाहिए

Source: 
जनसत्ता, 15 दिसंबर 2013
कर्णपुरा घाटी के मूल निवासी डॉ. मिथिलेश कुमार डांगी 2007 में हजारीबाग के विनोवा भावे विश्वविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के व्याख्याता की अच्छी खासी नौकरी छोड़कर कर्णपुरा बचाओ संघर्ष में पूरी तरह कूद पड़े। वे आने वाले विनाश को देख रहे थे जिसे घाटी के आम लोगों को बताने के लिए उन्होंने घाटी की पारिस्थितिकी, अर्थव्यवस्था और समाज व्यवस्था का काफी गहन अध्ययन किया और आंकड़ों और निष्कर्षों को गांव-गांव पहुंचाया। इस समय आप झारखंड प्रदेश आजादी बचाओ आंदोलन के संयोजक हैं। प्रस्तुत है आजादी बचाओ आंदोलन के झारखंड प्रदेश संयोजक मिथिलेश कुमार डांगी से मनोज त्यागी की बातचीत।

कर्णपुरा की भौगोलिक और आर्थिक स्थिति के बारे में कुछ बताइए।
वर्तमान कर्णपुरा झारखंड के रामगढ़ हजारीबाग चतरा और लातेहार जिला के 237 गांवों से बना एक घाटीनुमा भू-भाग है जिसमें हजारीबाग के बड़कागांव और केरेडारी प्रखंड और चतरा जिला के टंडवा प्रखंड के सभी गांव शामिल हैं। शेष जिलों के कुछ गांव इसमें आते हैं कर्णपुरा अंग्रेजों के शासनकाल में एक परगना था। कर्णपुरा राज की स्थापना 1368 में राजा बाघदेव सिंह ने की थी। इसके सभी गांव तराई क्षेत्र में बसे हैं। यह लगभग 1600 वर्ग किलोमीटर फैला हुआ है। इस क्षेत्र के सभी गांव के किनारे कोई न कोई बारहमासी नदी बहती है। कहीं-कहीं पर तो पानी के स्रोत फटते हैं। यहां की जमीन के नीचे कोयले की 40 से 80 मीटर मोटी परत मौजूद है। ओएनजीसी की ड्रिलिंग में पता चला है कि यहां कोयले के नीचे गैस भंडार भी है। तीन-चार फुट जमीन के नीचे ही कोयला है जिसे स्थानीय लोग अपनी जरूरत के लिए सैकड़ों वर्षो से निकालते रहे हैं।

यहां की धरती बहुफसली और उपजाऊ है। यहां का कृषि उपज झारखंड में अव्वल स्थान रखता है। यहां करीब 80 से 90 फीसद लोग खेती पर निर्भर हैं। छोटे उद्योग धंधे कम हैं। कोयला निकाल कर बेचना भी अच्छा खासा धंधा है।

कर्णपुरा के लोग पिछले 7-8 साल से आंदोलन क्यों कर रहे हैं?

तालाबों का कोई विकल्प नहीं : उमाकांत उमराव

Author: 
राजु कुमार
. जल संरक्षण को अपने जीवन का ध्येय बना चुके मध्य प्रदेश कैडर के आइ.ए.एस. उमाकांत उमराव ने जल संरक्षण का मॉडल खड़ा कर देवास जिले को सूखे से निजात दिलाने में सफलता हासिल की। उनके इस कार्य को मॉडल मानते हुए यू.एन. ने सम्मानित भी किया है। उमाकांत उमराव प्रदेश के विभिन्न जिलों में कलेक्टर रहने के बाद संचालक, राजीव गांधी वाटरशेड मिशन के पद पर भी कार्य कर जल संरक्षण को लेकर कई महत्वपूर्ण कार्य किए। जल संरक्षण के प्रति उनके खास जुड़ाव को लेकर राजु कुमार ने बातचीत की थी, जो संक्षिप्त रूप में "गवर्नेंस वॉच" में प्रकाशित हुई थी। कुछ संशोधन के बाद पूरी बातचीत प्रस्तुत है -

आपके जीवन में जल संरक्षण पर काम करने का विचार कब आया?

आंदोलन का पुनर्गठन जरूरी

Author: 
प्रसून लतांत
Source: 
जनसत्ता (रविवारी), 01 दिसंबर 2013
बिहार भूदान यज्ञ समिति के अध्यक्ष कुमार शुभमूर्ति से प्रसून लतांत की बातचीत।

भूदान को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर क्या करने की जरूरत है?
भूदान आंदोलन सच्चे अर्थों में राष्ट्व्यापी और राष्ट्रीय आंदोलन था। इसलिए आज जब इस आंदोलन के सारे राष्ट्रीय नेता मृत्यु (जो किसी शहादत से कम नहीं) को प्राप्त हो गए हैं तो भूदान आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर दोबारा गठित करने की जरूरत है। हम यह न भूलें कि भूदान आंदोलन ने जमीन जैसे विस्फोटक मुद्दे को हाथ में लिया था और हिंसा की जलती आग के बीच इसका जन्म हुआ था। यह आंदोलन न केवल अपने आप में पूर्ण रूप से अहिंसक था बल्कि इसने जमीन के लिए फैल रही हिंसा की आग को भी बुझा दिया था।

भूमि सुधार में भूदान के काम को सरल और युक्तिसंगत बनाने के लिए आप क्या-क्या प्रावधान जोड़ने पर जोर दे रहे हैं?

यही कि भूदान की जमीन और भूमिहीनों के नाम की जमीन अर्जित न की जाए। अगर अनिवार्य हो तो कानूनी प्रावधानों के तहत मुआवजा (जमीन की दोगुनी या चौगुनी कीमत) तो दिया ही जाए और इसके अलावा उनके लिए मुकम्मल पुनर्वास नहीं पुर्णावास की पैकेज नीति बनाई जाए, जिसमें आवागमन, प्रकाश, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोज़गार मिलने की सुविधा को अनिवार्य माना जाए। जमीन को निजी मिल्कियत से बाहर निकालना जरूरी है। भूमि पर सामुदायिक मिल्कियत होगी तो उसका सामुदायिक हित में उपयोग करना और अर्जन करना भी आसान होगा।

विनोबा के ग्रामदान की आज उपयोगिता क्या है?
आचार्य विनोबा ने ग्रामशक्ति को सामने रख कर ग्राम संगठन की एक सरल रचना ग्रामदान के नाम से रखी थी। इसके लिए विभिन्न प्रांतों के सरकारों ने ग्रामदान एक्ट बनाया था, जो आज भी लागू है, लेकिन इसे कारगर बनाने की तरकीब नहीं सूझ पाई। आज के नए संदर्भ में जमीन की, या गांव की बात करनी हो तो ग्रामदान और ग्रामदान एक्ट को सामने रख कर जरूर गंभीर विचार किया जाना चाहिए।

भूमि सुधार के लिए तत्काल जरूरी काम क्या है?

पुनर्वास की परिभाषा साफ नहीं

Author: 
राज वाल्मीकि
Source: 
जनसत्ता (रविवारी), 13 अक्टूबर 2013
सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेजवाड़ा विल्सन से राज वाल्मीकि की बातचीत

अमानवीय प्रथा हाल ही में मानव मल ढोने वाले रोज़गार का निषेध एवं उनके पुनर्वास विधेयक 2012 को संसद ने पारित किया है। इस पर आपकी क्या राय है?
इसे विधेयक को पास कराने के लिए सफाई कर्मचारी आंदोलन और हमारी ही तरह सोच रखने वाले अन्य सामाजिक संगठनों और व्यक्तियों ने कई सालों तक संघर्ष किया। सरकार पर दबाव बना। वह मजबूर हुई। इसी का परिणाम है कि पिछले अधिनियम 1993 के बीस साल बाद यह विधेयक पारित हुआ। पर हम इस कानून से खुश नहीं हैं। दरअसल ये सभी मैला ढोने वालों की मांग थी कि हमें नया कानून चाहिए। उन्हें इज्जतदार पेशे में पुनर्वास चाहिए।

इस कानून में क्या खामियां हैं?
इस कानून से मैला प्रथा का उन्मूलन नहीं होगा, इसके कई रूप हैं जैसे शुष्क शौचालयों की सफाई, ओपेन ड्रेन, सेप्टिक टैंक, रेलवे ट्रैक, सीवर इन सबके उन्मूलन के बारे में कोई तरीका नहीं दिया है। उनके उन्मूलन के बारे में इस कानून में कुछ नहीं है।

सरकार की पुनर्वास नीति पर आपकी क्या राय है?
इसमें मैला ढोने वालों के पुनर्वास की परिभाषा साफ नहीं है। पुनर्वास किसका, जो आज काम कर रहे हैं या पांच साल पहले कर रहे थे या बीस साल पहले काम कर रहे थे? अभी सरकार जो सर्वे कर रही है वह सिर्फ शहरों तक सीमित है। गांव के बारे में कुछ नहीं हो रहा। गांव में मैला ढोने वालों का क्या होगा? रेलवे पटरी पर मैला साफ करने वालों का क्या होगा? कैंटोनमेंट में जो लोग मैला ढो रहे हैं उनका क्या होगा। सरकार की पुनर्वास की कोई रूपरेखा नहीं है। रेलवे की तकनीक कब बदलेगी? क्या इसके लिए सरकार बजट आबंटन करेगी?

‘पानी को चलना सिखा दो...’

Author: 
डॉ. राजेंद्र सिंह
Source: 
नवनीत हिंदी डाइजेस्ट, जून 2013
मैग्सेसे पुरस्कार विजेता जलपुरुष डॉ.राजेंद्र सिंह से अशोक अंजुम की उनके जल विषयक आंदोलन के विषय में हुई बातचीत के कुछ अंश-

पहले तो आप अपने जन्म, परिवार आदि के बारे में बताएं और फिर जल को लेकर जो आपने इतना बड़ा आंदोलन छेड़ा उसके बारे में जानना चाहूंगा।
मेरा जन्म गंगा और यमुना के बीच दिल्ली के पास स्थित डोला नामक गांव में 6 अगस्त 1959 को हुआ। पढ़ाई भी सब यहीं रहकर की। गांव में माता-पिता हैं। हम पांच भाई, दो बहनें हैं। मेरा एक बेटा और एक बेटी है। बेटे ने डी.सी.एम. के मैनेजर पद से अभी दो दिन पहले त्यागपत्र दिया है। मैंने उससे कहा है कि कम-से-कम एक साल मेरे साथ आकर पानी का काम करो,वह मन बना रहा है। बेटी असम से समाज-कार्य में कोर्स कर रही है। (कुछ सोचते हुए) मैं 1980 में भारत सरकार की सेवा में जयपुर चला गया। जहां चार साल तक नौकरी करने के बाद एक दिन मन में यह विचार आया कि हम सरकार की बहुत बड़ी मशीन में मामूली-से पुर्जे हैं। क्या यूं ही जीवन कट जाएगा? तब 1984 में अलवर के पास थाना गाजी तहसील के गोपालपुरा गांव में दवाई और पढ़ाई का काम शुरू किया। एक दिन वहां के एक बूढ़े किसान मांगू काका (नाम याद आते ही जैसे आंखों में श्रद्धा भाव उभर आता है) ने कहा- रजेंदर, दवाई और पढ़ाई बाजार की चीज है, तुम ऐसा काम करो जो पैसे से न होता हो और वह है पानी का काम। तब मैंने मांगू काका से कहा- पर मैंने तो पानी की पढ़ाई नहीं की। वे बोले- यही तो अच्छी बात है कि तुमने पढ़ी नहीं, मैं सिखा दूंगा। मैंने तपाक से प्रश्न किया- तुम मुझे सिखा दोगे तो फिर तुम क्यों नहीं करते? काका यह सुनकर कुछ उदासी भरे स्वर में बोले जिस दिन से वोट पड़ने लगे गांव बट गया। अब तो यह काम कोई बाहर से आकर ही कर सकता है।

तब क्या उम्र रही होगी आपकी?

परिचय : स्वामीश्री ज्ञानस्वरूप सानंद

जी डी अग्रवालसन्यास ग्रहण करने के बाद स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के नए नामकरण वाले प्रो. जी डी अग्रवाल एक ख्यातिनाम शख्सियत हैं। आई आई टी, कानपुर के सिविल इंजीनियरिंग और पर्यावरण विभाग में एक ज्ञानी और निष्ठावान अध्यापक के रूप में, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में प्रथम सचिव के रूप में और राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय के सलाहकार के रूप में उनकी सेवाएं सर्वविदित हैं। चित्रकूट के एक छोटे से कमरे में एक स्टोव, एक बिस्तर और एक अटैची में दो-चार जोड़ी कपड़ों की सादगी और स्वावलंबन को संजोकर ज्ञान बांटने वाले ग्रामोदय विश्वविद्यालय में मानद प्रोफेसर के रूप में भी प्रो. अग्रवाल ने सराहना कम नहीं पाई।

एक सन्यासी और एक गंगापुत्र के रूप में प्रो. अग्रवाल ने जिस दृढ़ संकल्प का परिचय दिया, उसके नतीजे से भी हम वाक़िफ़ हैं: परिणामस्वरूप सरकार उत्तरकाशी के ऊपर तीन बांध परियोजनाओं को रद्द करने को विवश हुई और भगीरथी उद्गम क्षेत्र को पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील घोषित करना पड़ा। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि सतही और भूगर्भ जल विज्ञान के क्षेत्र में प्रो. अग्रवाल देश के सर्वोच्च विज्ञानियों में से एक हैं। प्रो. अग्रवाल के इस ज्ञान के बल पर अलवर समेत इस देश के कई इलाकों ने ‘डार्क जोन’ को वापस ‘व्हाइट जोन’ में बदलने में सफलता पाई है। यह बात भी बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रो. जी डी अग्रवाल के लिए गंगा की निर्मलता और अविरलता विज्ञान का विषय नहीं, बल्कि आस्था का विषय है।

नाबार्ड : गांव बढ़े तो देश बढ़े

Source: 
तहलका, अगस्त 2013
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के अध्यक्ष डॉ. प्रकाश बक्षी से ग्रामीण भारत की बैंकिंग आवश्यकताएं, वित्तीय समावेशन हेतु उनके संगठन द्वारा उठाए गए कदमों और रूपे (RuPay) किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से किसानों को ऋण वितरण आदि के संबंध में बातचीत के कुछ अंश..

ग्रामीण भारत की बैंकिंग आवश्यकताएं एक तरह से अनुपम हैं। कृपया यह बताएं कि बैंकों के लिए किस प्रकार की सेवाएं एवं स्कीम सफल होंगी और क्या उनके दृष्टिकोण में परिवर्तन होगा?
ग्रामीण भारत की बैंकिंग आवश्यकताएं इस दृष्टि से अनुपम हैं कि ऋण आवश्यकताएं छोटी होती हैं और बार-बार लेन-देन करना होता है। इस कारण बैंकों की लेन-देन लागत बढ़ जाती है जिससे बैंक ग्रामीण क्षेत्रों में जाने से झिझकते हैं। इससे ग्रामीण ग्राहकों को भी कठिनाई होती है। नाबार्ड द्वारा प्रचलित किए गए स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) ने इस समस्या का प्रभावी समाधान खोज निकाला है। यह बचत और ऋण संवितरण के लिए एक अत्यंत प्रभावशाली विकल्प बन गया है। देश में लगभग 80 लाख एसएचजी हैं, जिसमें 8 करोड़ से अधिक महिलाएं हैं जो इस योजना की लोकप्रियता को दर्शाता है। संयुक्त देयता समूह (जेएलजी), कॉमन हित समूह (सीआईजी), उत्पादक संगठन (पीओ) स्वयं सहायता समूह के अन्य रूप है जो ग्रामीण भारत में उभरकर संगठन (पीओ) स्वयं सहायता समूह के अन्य रूप है जो ग्रामीण भारत में उभरकर आ रहे हैं। यह भी बैंकों के बदलते हुए दृष्टिकोण का प्रतीक है।

बैंकों को वित्तीय समावेशन कार्यक्रम को अपने व्यापार बढ़ाने का एक साधन मानकर चलना पड़ेगा। वास्तविकता भी यही है। दूर-दूर गांव तक बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराते हुए बैंक अपनी बचत एवं ऋणों को बढ़ाकर अपना व्यापार बढ़ा सकते हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार बढ़ेगा एवं अर्थव्यवस्था का विकास होगा। इसके अलावा बीमा, माइक्रो पेंशन और धन प्रेषण को बैंकिंग सेवाओं का हिस्सा बनाकर ग्रामीण क्षेत्रों में ले जाने की आवश्यकता है। देश के समाविष्ट आर्थिक विकास के लिए पूर्ण वित्तीय समावेशन अत्यंत आवश्यक है।

आखिरी नहीं यह विध्वंस

“कहते हैं कभी तहजीबे बसती थीं नदियों के किनारे,
आज नदियां तहजीब का पहला शिकार हैं।’’


बड़े बांधों को दुष्प्रभावों के खिलाफ चेतावनी मिलते भी हमें कई दशक हो गए। बावजूद इन चेतावनियों के हम चेत कहां रहे हैं? अमेरिका और आसपास अब तक 500 से अधिक बड़े बांध तोड़े जा चुके हैं। दुनिया नदियों को फिर से जिंदा करने पर लगी है और हम हैं कि बांध पर बांध बनाकर उन्हे मुर्दा बनाने की जिद्द कर रहे हैं। विस्कोसिन ने बाराबू नदी को पुनः जिंदा किया है। कैलिफोर्निया अपनी नदियों के पुनर्जीवन के लिए आठ बिलियन डॉलर की योजना बनाकर काम कर रहा है। परिस्थितिकीय दुष्प्रभावों को देखते ही रूस ने अपनी नदी जोड़ परियोजनाओं पर ताला लगाने में ज्यादा वक्त नहीं लगाया। इन पंक्तियों को लिखते वक्त शायर के जेहन में शायद यह अक्स उभरा ही नहीं कि कभी नदियां भी पलटकर तहजीब का शिकार कर सकती हैं। हालांकि हम उत्तराखंड में हुए विनाश को महज नदियों द्वारा सभ्यता के शिकार करने की घटना कहकर भी आकलित नहीं कर सकते। तबाही का सच अभी भी पूरी तरह बाहर नहीं आया है। लेकिन हमला चैतरफा था; यह सच जरूर सामने आ गया है। मलवा, मौत, मातम, मन्नत और मदद में बीता पूरा सप्ताह। निश्चित ही तस्वीर बेहद डरावनी है। दुखद भी! लेकिन लाहौल, स्पीति, किन्नौर से लेकर कन्याकुमारी तक और जैसलमेर से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक पिछले एक दशक में जो कुछ घटा है, उसे देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि यह विध्वंस पहला है या आखिरी है। अतीत में भी मातम के ऐसे कई मौके भारत देख चुका है। अतः अब इसे महज उत्तराखंड अकेले का मसला कहकर शेष भारत नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। संकट अब पूरी सभ्यता पर है।

मजबूत पंचायत से पूरा होगा विकेंद्रीकरण का सपना : मणिशंकर

Author: 
संतोष कुमार सिंह
Source: 
पंचायतनामा डॉट कॉम
पूर्व केंद्रीय पंचायती राज मंत्री मणिशंकर अय्यर पंचायतों को मजबूत करने की दिशा में हमेशा से सक्रिय रहे हैं। यही कारण है कि पंचायती राज मंत्रालय ने उनकी अध्यक्षता में पंचायती राज व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए एक एक्सपर्ट कमेटी बनायी। इस कमेटी ने हाल ही में राष्ट्रीय पंचायती राज व्यवस्था के स्थापना दिवस पर अपनी रिपोर्ट जारी की है। पेश है इस रिपोर्ट के आलोक में पंचायतनामा के लिए मणिशंकर अय्यर से संतोष कुमार सिंह की हुई विशेष बातचीत..

अभी हाल ही में आपकी अध्यक्षता में बनायी गयी एक्सपर्ट कमेटी ने टूआर्डस होलिस्टिक पंचायती राज नाम से एक रिपोर्ट तैयार की है जिसे खुद प्रधानमंत्री व केंद्रीय पंचायती राज मंत्री द्वारा जारी किया गया। किन पहलुओं को आपकी रिपोर्ट में प्रमुखता से लिया गया है?


देखिये, पंचायती राज व्यवस्था के 20 वर्षों बाद यह अच्छा मौका है कि हम ठहरकर इस तथ्य पर विचार करें कि हम कितनी दूरी तय कर पाये हैं और कहां तक जाना है। इस लिहाज से हमने 700 पन्नों की इस रिपोर्ट में पंचायती राज के विभिन्न आयामों को परखने का प्रयास किया है। हमें सौंपी गयी जिम्मेवारी के अनुरूप 20 वर्ष बाद पंचायतों की स्थिति, डिवोल्यूशन बाई सेंट्रल गवर्नमेंट, डिवोल्यूशन बाई स्टेट गवर्नमेंट, जिला योजना, पंचायत प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण, पंचायत में महिलाओं की स्थिति, कमजोर तबकों के लिए पंचायती राज, अल्पसंख्यकों और नि:शक्तों की स्थिति को परखने की कोशिश की है। साथ ही साथ ग्रामीण भारत में अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, स्वास्थ्य, परिवार कल्याण, पोषण, खाद्य सुरक्षा आदि विषयों को भी विस्तार से लिया गया है। इन सब बिंदुओं पर जमीनी स्तर के अनुभवों को समेटते हुए तथ्यों के संकलन और व्यवस्था को बेहतर बनाने के सुझाव दिये गये हैं।