Latest

प्लास्टिक उपयोग की सनक (Plastic-Use Mania)

Author: 
राकेश कलशियान
Source: 
डाउन टू अर्थ, सितम्बर 2017

वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक के गम्भीर खतरे बताए हैं फिर भी हम इस पर निर्भर होते जा रहे हैं। क्या इस खतरनाक लगाव से बचने का कोई उपाय है?

हम प्लास्टिक की एक कृत्रिम दुनिया में रह रहे हैं। हम इसे उस वक्त गलत मानते हैं जब खुले सीवरों, भरावक्षेत्र, नदी या समुद्र के तटों पर इसका ढेर देखते हैं। इसका एक दर्दनाक पहलू भी है। यह पहलू तस्वीरों और वीडियो के माध्यम उस वक्त दिखाई देता है जब हम किसी गरीब को खतरनाक परिस्थितियों में प्लास्टिक का कूड़ा बीनते देखते हैं। सबसे चिन्ता की बात यह है कि इसके सेहत के लिये खतरनाक और नुकसानदेह नतीजों को देखते हुए भी हम इसे बर्दाश्त कर रहे हैं। संरक्षण भी दे रहे हैं। स्टेला मैककार्टनी इंग्लिश फैशन डिजाइनर हैं जो पशु अधिकारों के समर्थन के लिये जानी जाती हैं। वह फर या चमड़े से बचने की सलाह देती हैं। जून में उन्होंने फैशन उत्पादों की एक ऐसी शृंखला शुरू की है जिसमें समुद्र से निकाले गए प्लास्टिक के कचरे का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि नुकसान पहुँचानी वाली वस्तु को विलासिता से युक्त किया जा रहा है। क्या ऐसा नहीं किया जा सकता?

जलकुंभी पानी से क्रोमियम निकालेगी (Hyacinth can help remove toxic chromium from polluted water )

Author: 
Monika Kundu Srivastava
Source: 
India Science Wire, 4 September 2017

पानी से क्रोमियम हटाएगी जलकुंभी



. देश के भूजल में बढ़ता प्रदूषण न सिर्फ चिंता का विषय है बल्कि यह बड़ी समस्या बन गया है। क्रोमियम व अन्य हानिकारक तत्वों युक्त पानी के सेवन से हजारों लोग बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। भारत और इथोपियों के वैज्ञानिकों ने जलकुंभी की मदद से गंदे पानी से क्रोमियम-6 जैसे हानिकारक भारी तत्वों को अलग करने की नई विधि विकसित की है। वैज्ञानिकों का दावा है कि प्रदूषित जल को साफ करने का यह तरीका मौजूदा तरीकों से बेहद सस्ता और सुरक्षित है।

वैज्ञानिकों ने अध्ययन के दौरान जलकुंभी को पाउडर के रूप में पानी में मिलाया और उसे प्रदूषित जल (क्रोमियम-6 जैसे हानिकारक तत्व वाले) में डाला। तकरीबन दो मिनट के बाद पाउडर वाले पानी को अलग कर दिया। इसके बाद प्रदूषित पानी में क्रोमियम-6 की स्थिति को जाँचा। शोध दल की मुखिया और दिल्ली की इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय की डॉक्टर नीतू रानी के मुताबिक, पानी में क्रोमियम-6 की मात्रा में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई।

उन्होंने कहा, जलकुंभी ने पानी से हानिकारक तत्वों को अलग करने की अपनी क्षमता का प्रयोग किया और जहरीले तत्वों को अपने में समाहित कर लिया। पाउडर वाले पानी को बाहर निकाल लेने पर प्रदूषित पानी में क्रोमियम की मात्रा स्वत: ही कम हो गई। उन्होंने कहा, प्रति लीटर प्रदूषित पानी में 0.04 ग्राम जलकुंभी के पाउडर को मिला दें और उसे तीस मिनट तक रखा रहने दें तो जल से क्रोमियम-6 के हानिकारक तत्वों को हटाया जा सकता है।

पानी जाँच की कीमत 1000 रुपए, जाँच करवाना मुश्किल, दूषित जल पीना मजबूरी

Source: 
राजस्थान पत्रिका, 03 सितम्बर 2017

. जयपुर। प्रदेश में अशुद्ध और दूषित पानी की आपूर्ति से जहाँ आमजन की सेहत खतरे में है। वहीं दूसरी ओर आलम यह है कि जनता चाह कर भी अपने इस्तेमाल वाले पानी के नमूनों की जाँच आसानी से नहीं करवा सकती। प्रदेश में चिकित्सा एवं जन स्वास्थ्य अभियाँत्रिकी विभाग की ओर से लिये गये करीब सवा लाख जाँच नमूनों में से 19 हजार नमूनों के फेल मिलने के बाद राजस्थान पत्रिका ने जाँच करवाने की सुविधा की जानकारी ली तो अधिकांश स्थानों पर आमजन के लिये सरल व सुगम जाँच सुविधा नहीं मिली।

कुछ जिलों में सरकारी दरों पर जिला मुख्यालय पर जाँच की सुविधा है। इसमें जलदाय विभाग की ओर से दिये गये नमूने फ्री में जाँचे जाते हैं। इसके अलावा किसी और के द्वारा नमूना देने पर रसायनों और बैक्टीरिया की जाँच में एक हजार रुपए तक लग जाते हैं। राजधानी में कुछ प्रयोगशालाओं में इस तरह की जाँच सुविधा है। जाँच रिपोर्ट मिलने में सामान्यतया करीब 24 घंटे से सात दिन की समय लगता है।

बढ़ रहा मरीजों का आंकड़ा


2-3 हजार मरीज रोजाना जयपुर में जल-जनित बीमारियों के आते हैं। 50 डिस्पेंसरियाँ और 10 बड़े सरकारी अस्पताल हैं जयपुर जिले में, जिनका प्रतिदिन आउटडोर करीब 20 हजार मरीजों का है। 60,000 मरीज हर महीने जयपुर जिले में जलजनित बीमारियों के होते हैं। 60 फीसद बीमारियों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर दूषित पानी ही कारण होता है।

जाँच की प्रक्रिया


प्राइवेट नमूना लेने पर नमूना लेने वाले और लैब टैक्नीशियन के हस्ताक्षर लिये जाते हैं। करीब सात दिन में रिपोर्ट आ जाती है।

स्वास्थ्य विभाग ने जारी किया था अलर्ट

देहरादून का पानी हुआ जहरीला


. वैसे तो बरसात में पानी गंदला ही आता है, किन्तु सरकार का दावा रहता है कि वे लोगों को शुद्ध पेयजल मुहैया कराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी। ऐसा शायद राजनीतिक बयानबाजी हो सकती है। मगर जल संस्थान और स्पैक्स संस्था पानी की शुद्धता को लेकर आमने-सामने जरूर है। कुछ जगहों पर जरूर सरकारी स्तर से शुद्ध पेयजल की कसरत पूरी होती होगी तो कुछ जगहों पर कागजी खाना-पूर्ती करके शुद्ध पेयजल की इतिश्री कर दी जाती होगी। यह कोई आरोप नहीं है बल्कि लोक समाज में पानी की समस्या को लेकर कटुसत्य है। पर बात जब राजधानी की हो तो यह हजम नहीं होती, की जहाँ का शुद्ध पेयजल अब 32 गुना अशुद्ध हो चुका है। यह तब हुआ जब देहरादून में राजधानी का कामकाज आरम्भ हुआ है। इधर जल संस्थान स्पैक्स संस्था के सैंपलों को अखबारी बयानबाजी कह रहा है तो वहीं स्पैक्स संस्था राजधानी देहरादून के पानी को पीने योग्य नहीं बजाय जहरीला बता रही है। पानी गंदला है, यह तो सर्वमान्य है, बीमारियाँ भी तेजी से बढ़ रही है, यह भी जगजाहिर है। पर शुद्ध पानी कहाँ मिलेगा, बीमारियाँ कब कम होगी, ये सवाल आज भी बरकरार है।

नॉन-इलेक्ट्रिक वाटर फिल्टर - सभी ब्रांडों में शुद्धता की गारंटी नहीं (Non-electric water filter - Not guaranteed accuracy in all brands)

Author: 
कंस्यूमर वॉयस रिपोर्टर
Source: 
कंस्यूमर वॉयस, मई 2014

किसी वाटर फिल्टर से मतलब है कि वह बैक्टीरिया, क्लोराइड, भारी तत्व (जैसे, पारा, ताँबा और सीसा), कीटनाशक पदार्थ और इससे जुड़े सुरक्षा सम्बन्धी सभी मुद्दों समेत पेयजल में पाये जाने वाले अधिकांश सामान्य अशुद्धियों को दूर कर दे। यहाँ पर किसी उपयुक्त वाटर फिल्टर के चयन के महत्त्व और उससे जुड़े सुरक्षा सम्बन्धी विभिन्न मामलों को बढ़ा-चढ़ाकर कहने का कोई कारण नहीं है। आरम्भ में कम लागत, तुलनात्मक रूप से अच्छा प्रदर्शन और रख-रखाव सम्बन्धी कुल सुविधाओं ने सुनिश्चित किया है कि स्टोरेज टाइप नॉन-इलेक्ट्रिक रसायन आधारित वाटर फिल्टर आउटपुट लागत, रिफिल/कार्टरिज की कीमत और वार्षिक रख-रखाव सहायता जैसे मामलों में एक लोकप्रिय विकल्प है। ‘कंस्यूमर वॉयस’ के लिये यह समय आज के घरों में इन अहम चीजों की लागत और उपयोगिता का मूल्यांकन करना था।

आर्सेनिक से प्रतिरक्षा क्षमता कम होने का भारतीय वैज्ञानिकों ने पता लगाया (Indian scientists find how arsenic reduces immunity)

Author: 
मोनिका कुन्दू श्रीवास्तव
Source: 
दैनिक जागरण, 18 अगस्त, 2017

. भारतीय वैज्ञानिकों के एक समूह ने यह पता लगाया है कि आर्सेनिक के संपर्क में आने से प्रतिरक्षा क्षमता किस तरह कम हो जाती है।

थाइमस ग्रंथि के विकास रोकने में आर्सेनिक की भूमिका जगजाहिर है। थाइमस ग्रंथि ही टी लिम्फोसाइट्स या टी कोशिकाओं के जरिए प्रतिरक्षा को विकसित करने में सहायता करती है। लखनऊ स्थित ‘इंडियन इंस्टीट्यूट अॉफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (आइआइटीआर)’ के वैज्ञानिकों द्वारा किये गये एक नये अध्ययन ने इसके पीछे के तंत्र को समझाया है। इसे यह पता चल सकेगा कि आर्सेनिक के संपर्क में आने वाले लोग तपेदिक (टीबी) जैसे संक्रमण के लिये अतिसंवेदनशील क्यों हो जाते हैं।

शोधकर्ताओं ने आर्सेनिक के संपर्क के प्रभाव की जाँच की और बताया कि किस तरह टी कोशिकाओं को विशेष कोशिकाओं (सीडी 4+ और सीडी 8+) और नियामक टी-कोशिकाओं की भूमिका में बदल दिया गया। सीडी 4+ कोशिका सहायक टी कोशिकाओं पर पाई जाती है। ये वायरल संक्रमण से लड़ने के लिये शरीर को निर्देशित करती हैं, जबकि सीडी 8 लड़ाकू टी कोशिकाओं पर पाई जाती हैं जो संक्रमित कोशिकाओं को मारकर शरीर की रक्षा करती हैं।

जल प्रदूषण के कारण और निवारण (Water Pollution : Causes and Remedies in Hindi)

Author: 
डॉ. अखिलेश्वर कुमार द्विवेदी
Source: 
भगीरथ - जनवरी-मार्च, 2009, केन्द्रीय जल आयोग, भारत

. हमारी धरती पर अथाह जलराशि विद्यमान है। ‘‘केलर’’ महोदय के अनुसार हमारी धरती पर विद्यमान सम्पूर्ण जलराशि 1386 मिलियन घन किलोमीटर है। यदि ग्लोब को समतल मानकर सम्पूर्ण जलराशि को इस पर फैला दिया जाय, तो यह 2718 मीटर गहरी जल की परत से ढक जायेगा। महासागरों में कुल जलराशि का 96.5 प्रतिशत (1338 मिलियन घन कि.मी.) एवं महाद्वीपों में मात्र 3.5 प्रतिशत (48 मिलियन घन कि.मी.) जल उपलब्ध है।

उपलब्ध जल संसाधनों का उपयोग मुख्य रूप से घरेलू कार्यों, नगरीय, औद्योगिक क्षेत्रों, ताप विद्युत उत्पादन, जल विद्युत उत्पादन, सिंचाई, पशुधन तथा अणु संयंत्रों आदि में किया जाता है। भारत में औसत रूप से 1900 करोड़ घन मीटर जल उपयोग के लिये उपलब्ध है। इस उपलब्ध जल का लगभग 86 प्रतिशत सतही नदियों, झीलों, सरोवरों एवं तालाबों का है। भूमिगत जल का पर्याप्त भाग सिंचाई एवं पीने तथा अन्य कार्यों के लिये किया जाता है।

आदि काल से ही मानव द्वारा जल का प्रदूषण किया जाता रहा है। किन्तु वर्तमान समय में तीव्र जनसंख्या वृद्धि व औद्योगीकरण के कारण विद्यमान जल को प्रदूषित करने की गति और तीव्र हो गयी है। मानव के विभिन्न क्रिया-कलापों के कारण जब जल के रासायनिक, भौतिक एवं जैविक गुणों में ह्रास होता है, तो इस प्रकार के जल को प्रदूषित जल कहा जाता है। अतः स्पष्ट है कि जब जल की भौतिक, रासायनिक अथवा जैविक संरचना में इस प्रकार का परिवर्तन हो जाता है कि वह जल किसी प्राणी की जीवित दशाओं के लिये हानिकारक एवं अवांछित हो जाता है तो वह जल ‘प्रदूषित जल’ कहलाता है।

इस प्रकार जल प्रदूषण तीन प्रकार का होता है-


1. भौतिक जल प्रदूषण - भौतिक जल प्रदूषण से जल की गन्ध, स्वाद एवं ऊष्मीय गुणों में परिवर्तन हो जाता है।

जल प्रदूषण के कारण और निवारण (Essay on Water Pollution: Causes and Prevention in Hindi)

Author: 
डॉ. शिव प्रसाद
Source: 
भगीरथ - जनवरी-मार्च 2011, केन्द्रीय जल आयोग, भारत

. पुरातन काल की अधिकांश सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारों पर हुआ जो इस बात को इंगित करता है कि जल, जीवन की सभी जरूरतों को पूरा करने के लिये आवश्यक ही नहीं, वरन महत्त्वपूर्ण संसाधन रहा है। विगत दशकों में तीव्र नगरीकरण एवं आबादी में निरंतर हो रही बढ़ोत्तरी, पेयजल आपूर्ति की मांग तथा सिंचाई जल मांग में वृद्धि के साथ ही औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार इत्यादि ने जल-संसाधनों पर काफी दबाव बढ़ा दिया है। एक ओर जल की बढ़ती मांग की आपूर्ति हेतु सतही एवं भूमिगत जल के अनियंत्रित दोहन से भूजल स्तर में गिरावट होती जा रही है तो दूसरी ओर प्रदूषकों की बढ़ती मात्रा से जल की गुणवत्ता एवं उपयोगिता में कमी आती जा रही है। अनियमित वर्षा, सूखा एवं बाढ़ जैसी आपदाओं ने भूमिगत जल पुनर्भरण को काफी प्रभावित किया है। आज विकास की अंधी दौड़ में औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार एवं तीव्र नगरीकरण ने देश की 14 प्रमुख नदियों विशेषतः गंगा, यमुना, गोदावरी, कावेरी, नर्मदा एवं कृष्णा को प्रदूषित कर बर्बाद कर दिया है।

स्वच्छ जल की गुणवत्ता


जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। पृथ्वी पर विद्यमान संसाधनों में जल सबसे महत्त्वपूर्ण है। जल का सबसे शुद्धतम रूप प्राकृतिक जल है, हालाँकि यह पूर्णतः शुद्ध रूप में नहीं पाया जाता। कुछ अशुद्धियाँ जल में प्राकृतिक रूप से पायी जाती हैं। वर्षाजल प्रारंभ में तो बिल्कुल शुद्ध रहता है लेकिन भूमि के प्रवाह के साथ ही इसमें जैव एवं अजैव खनिज द्रव्य घुलमिल जाते हैं। इस प्रकार प्राकृतिक जल में उपस्थित खनिज एवं अन्य पोषक तत्व, मानव सहित समस्त जीवधारियों के लिये स्वास्थ्य की दृष्टि से आवश्यक ही नहीं वरन काफी महत्त्वपूर्ण भी हैं। गुणवत्ता की दृष्टि से पेयजल में निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए।

जलपोत विखण्डन सुविधाओं में पर्यावरणीय नियंत्रण की श्रेष्ठ प्रक्रियाएँ

Source: 
बेसेल संधि शृंखला/एसबीसी नम्बर 2003/2

जलपोत को विखण्डन हेतु तैयार करने की प्रक्रिया


सीसा विषाक्त होता है और यह बैटरियों, पेंट तथा मोटर, जनित्र, नलियाँ, केबल और अन्य वस्तुओं में हो सकता है। मानव स्वास्थ्य पर सीसे के कुप्रभावों की जानकारी काफी समय से अच्छी तरह जानी-पहचानी है। छोटे बच्चों पर सीसे का विषाक्त प्रभाव सर्वाधिक रूप से पड़ता है। लम्बे समय तक थोड़ी-थोड़ी मात्रा में सीसे के सम्पर्क में आते रहने से पढ़ने-लिखने में स्थायी कुप्रभाव प्रकट हो सकता है तथा बौद्धिक विकास अवरुद्ध हो सकती है और तंत्रिका विकास और शारीरिक विकास धीमी पड़ सकती है। जलपोत के ढाँचे और उसके घटक एवं अंगों के निष्कर्षण, जिससे पुनश्चक्रण, पुनरुपयोग और निपटारे के लिये सामग्रियाँ प्राप्त होती हैं, से निम्नलिखित कारणों से पर्यावरण में निकासियाँ हो सकती हैं:

- पोत को तोड़ने लगने के पूर्व उसे तैयार करने की प्रक्रियाओं की अपर्याप्तता
- तोड़ते वक्त पोत पर विद्यमान सामानों का संग्रह/हटाया/सुरक्षित न किया जाना
- सामानों के संग्रह, परिवहन और भण्डारण/निपटारे की प्रक्रियाओं की अपर्याप्तताएँ

कार्यविधियों और प्रक्रियाओं का स्वरूप ही ऐसा है कि उनसे जल, वायु और जमीन में उत्सर्जनों की सम्भावना रहती है। इसकी रोकथाम के लिये यह आवश्यक है निपटारे के लिये जहाज को डीकमीशन करने की प्रक्रिया के हर चरण पर विचार किया जाये ताकि हर स्तर पर सुधारात्मक कार्रवाइयों को अंजाम दिया जा सके।

डीकमिशनिंग और विखण्डन से जुड़े विशिष्ट उपायों के सुझावों से सम्बन्धित जिम्मेदारियों (देखें नीचे) को पर्यावरणीय प्रबन्ध योजना (अध्याय 6 भी देखें) में स्पष्ट रूप से पहचानना चाहिए।