सुलगता खतरा

Author: 
शुभोजित गोस्वामी
Source: 
डाउन टू अर्थ, मार्च 2018

नाइजीरिया चारकोल की माँग पूरी करने के लिये अपने उष्णकटिबन्धीय वन तेजी से खोता जा रहा है। इस सस्ते ईंधन ने देश की जैव विविधता के सामने संकट खड़ा कर दिया

प्लास्टिक बोतलों की रिसाइकिलिंग से बचेगा पर्यावरण

Author: 
नमिता

यदि पर्यावरण बचाने की कोशिश रंग लाती है तो यह अभियान सफल होने में देर नहीं लगाएगा। जानकारों का कहना है कि वैसे राज्य के प्रत्येक बस अड्डो में ‘बायो-क्रश रिवर्स वेंडिंग मशीन’ लगनी चाहिए। कहा कि प्रत्येक जिलों के विकास भवनों में यदि बायो-क्रश रिवर्स वेंडिंग मशीन लगती है तो पानी में मिलने वाली बिमारियों से 50 प्रतिशत की कमी होगी।

कीटनाशक - प्रोत्साहन बेहतर या नियमन


कीटनाशक का छिड़काव करता किसानकीटनाशक का छिड़काव करता किसानकीटनाशकों को लेकर एक फैसला, पंजाब के कृषि एवं कल्याण विभाग ने बीती 30 जनवरी को लिया; दूसरा फैसला, 06 फरवरी को उत्तर प्रदेश की कैबिनेट ने। उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने कीट रोग नियंत्रण योजना को मंजूरी देते हुए जैविक कीटनाशकों और बीज शोधक रसायनों के उपयोग के खर्च का 75 प्रतिशत तथा लघु-सीमांत किसानों को कृषि रक्षा रसायनों, कृषि रक्षा यंत्रों तथा दाल, तिलहन व अनाजों के घरेलू भण्डार में काम आने वाली बखारों (ड्रमों) पर खर्च का 50 प्रतिशत अनुदान घोषित किया।

आगरा के पानी में खराबी, विकलांग होते गाँव

Source: 
अमर उजाला, 05 फरवरी, 2018

पानी जिंदगी बचाता है, मगर जब ये खराब हो जाए तो जिंदगी को बैसाखी पर भी ला देता है। आगरा के बरौली अहीर ब्लॉक की पचगाईं ग्राम पंचायत इसका उदाहरण है। यहाँ के भूमिगत पानी में इतना फ्लोराइड है कि इसको उपयोग में लाने से लोग शारीरिक विकार का शिकार हो रहे हैं। इस ग्राम पंचायत का शायद ही ऐसा कोई घर होगा, जिसमें हड्डी और जोड़ों से सम्बन्धित समस्या से ग्रसित सदस्य न हो। वैसे तो भूमिगत पानी में फ्लोराइड की समस्या से आस-पास के लगभग 130 गाँव प्रभावित है लेकिन पचगाईं ग्राम पंचायत का भूमिगत पानी पूरी तरह से खराब हो गया है। जल निगम भी इस पर अपनी मुहर लगा चुका है। अब ग्रामीण गंगाजल की मांग कर रहे हैं।

खराब पानी पीने से शरीरिक‌ विकार से ग्रस्त महिला - फोटो : अमर उजाला इस ग्राम पंचायत के पट्टी पचगाईं गाँव में रहने वाली 60 वर्षीय बादामी जब ब्याह कर इस गाँव में आई थी, तब पूरी तरह से स्वस्थ थी। मगर, भूमिगत पानी के लगातार उपयोग से उम्र के साथ उसके पैरों की हड्डियाँ टेढ़ी पड़ती गईं। अब वह चल फिर नहीं सकतीं। यही हाल इंद्रवती के 12 वर्षीय बेटे रोहित का है। वह बताती हैं कि 6-7 साल पहले तक उनका बच्चा पूरी तरह से स्वस्थ था। मगर, धीर-धीरे उसके हाथ-पैर टेढ़े पड़ने लगे। डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने उसकी इस हालत की वजह पानी में अधिक फ्लोराइड बताया। 22 वर्षीय प्रेम शंकर का भी ऐसा ही कुछ हाल है।

यूरिया जीवन से जहर तक का सफर

Author: 
अक्षित संगोमला, अनिल अश्विनी शर्मा
Source: 
डाउन टू अर्थ, जनवरी 2018
क्या यूरिया के दिन लद गए हैं? यह सवाल इसलिये क्योंकि जिस यूरिया ने कई गुणा पैदावार बढ़ाकर किसानों को गदगद किया, वही अब उन्हें खून के आँसू रुला रहा है। अब उपज कम हो रही है और जमीन के बंजर होने की शिकायतें भी बढ़ती जा रही हैं, इसलिये किसान यूरिया से तौबा करने लगे हैं। एक हालिया अध्ययन में पहली बार भारत में नाइट्रोजन की स्थिति का मूल्यांकन किया गया है जो बताता है कि यूरिया के अत्यधिक इस्तेमाल ने नाइट्रोजन चक्र को बुरी तरह प्रभावित किया है। यह पर्यावरण और सेहत को भी नुकसान पहुँचा रहा है। अक्षित संगोमला और अनिल अश्विनी शर्मा ने यूरिया के तमाम पहलुओं की पड़ताल की…

1- 120 से अधिक वैज्ञानिकों ने करीब 5 वर्षों की मेहनत के बाद भारत में नाइट्रोजन की स्थिति का मूल्यांकन “इण्डियन नाइट्रोजन असेसमेंट” में किया है।
2- 6,610 किग्रा. यूरिया का औसत इस्तेमाल एक भारतीय किसान पिछले पाँच दशकों में कर चुका है क्योंकि यह सस्ता पड़ता है।
3- 67 प्रतिशत यूरिया मिट्टी जल और पर्यावरण में पहुँच जाता है। करीब 33 प्रतिशत यूरिया का इस्तेमाल ही फसल कर पाती है।
4- 03 लाख टन नाइट्रस ऑक्साइड भारत के खेत छोड़ते हैं जो पर्यावरण में पहुँचकर वैश्विक तापमान में इजाफा करता है।
“इस बार तो हमने अपने एक एकड़ के खेत में चार-चार बार यूरिया डाला। आप मानिए कि 200 किलो से अधिक का यूरिया खेतों में डाल दिया, लेकिन उपज पिछले साल से भी कम ही मिल पाई। अब यह यूरिया हमारे लिये जी का जंजाल बन गया है। खेतों में डालो तो मुसीबत है और न डालने का तो अब सवाल ही नहीं पैदा होता है।” बिहार के बेगूसराय जिले के बखरी गाँव के 82 साल के किसान नंदन पोद्धार की इस उलझन का इलाज फिलहाल किसी के पास नहीं है। यूरिया उनके खेतों का वह जीवन बन गया है जिसकी फसल जहर के रूप में कट रही है।

दिल्ली के पानी में घुल रहा जहर (Toxic water in Delhi)


संजय झीलसंजय झीलदेश की राजधानी दिल्ली पिछले दिनों देश-दुनिया की मीडिया में सुर्खियों में थी। किसी अच्छे काम के लिये नहीं, बल्कि प्रदूषण के स्तर में बेतहाशा इजाफा होने के कारण।

दिल्ली की आबोहवा में प्रदूषण इतना बढ़ गया था कि लोगों का घरों से निकलना मुश्किल हो गया था। लोगों को मास्क लगाकर बाहर निकलने के लिये मजबूर होना पड़ा। हालत इतनी बिगड़ गई थी कि श्रीलंका के खिलाड़ियों को भी मुँह में मास्क लगा कर क्रिकेट खेलना पड़ा था। टीम इण्डिया के तो कई खिलाड़ियों ने मैदान में ही उल्टियाँ कर दी थीं।

लिहाजा, आबोहवा में प्रदूषण ने मीडिया व विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा। कोर्ट से लेकर सरकार तक ने एहतियाती कदम उठाने की पहल शुरू कर दी, लेकिन पानी में बढ़ रहे प्रदूषण की ओर किसी ने जरा भी ध्यान नहीं दिया है।

हाल में किये गए एक शोध से यह निष्कर्ष निकला है कि जलाशयों में लेड, कैडमियम, निकेल, कॉपर व जिंक जैसे जहरीले तत्वों की मात्रा में इजाफा हो रहा है। हालांकि शोध इस बात के लिये नहीं था कि पानी जहरीले तत्वों की मात्रा कितनी है, लेकिन शोध के परिणाम से पता चला है कि जलाशयों ने ऐसे तत्वों की मात्रा में बढ़ोत्तरी हो रही है।

दरअसल, शोध का उद्देश्य यह पता लगाना था कि जलाशयों में मौजूद जीवाणुओं (बैक्टीरिया) में जिंक, कॉपर आदि को कितना परिमाण तक बर्दाश्त करने की क्षमता है। इस शोध में पता चला कि जलाशयों में रहने वाले जीवाणुओं में कॉपर आदि को हजम करने की क्षमता काफी बढ़ गई है। इसका मतलब है कि जिन जलाशयों से जीवाणुओं का सैम्पल लिया गया, उन जलाशयों में ये तत्त्व मौजूद हैं और ये जीवाणु उन तत्त्वों को ग्रहण कर रहे हैं और अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा रहे हैं।

एलर्जी की पकड़

Author: 
स्निग्धा दास
Source: 
डाउन टू अर्थ, जनवरी 2018

भारत में लगभग 170 खाद्य पदार्थ एलर्जी कारण बनते हैं। ढाई से चार करोड़ इस एलर्जी से जूझ रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि अब तक केवल नवजात शिशुओं को दूध की जगह दी जाने वाली खाद्य सामग्री पर ही एलर्जी सम्बन्धी जानकारी छपी होती है।

अब तक खाने की एलर्जी को रोकने की कोई दवा और इलाज मौजूद नहीं है। इसे रोकने का बस एक ही तरीका है और वह यह कि उन चीजों की पहचान की जाये जिससे एलर्जी होती है तथा खाने की हर चीज की सूची बनाई जाये ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि व्यक्ति जो भी खा रहा है वह पूरी तरह सुरक्षित है। कुछ लोग खाने की एलर्जी और भोजन से सम्बन्धित अन्य विकारों जैसे खाना न पचा पाना, खाने का खराब हो जाना और पेट सम्बन्धी बीमारी में अन्तर को समझ नहीं पाते और भ्रमित हो जाते हैं। संदीप गोस्वामी (बदला हुआ नाम) को बागदा चिंगरी (झींगा मछली) बहुत पसन्द थी। एक बार यह पसन्द उन्हें मौत के मुँह तक ले गई। सर्दी के दोपहर में वह माँ के हाथ की बनी चिंगरी माछेर मलाई करी का बेसब्री से इन्तजार कर रहे थे। रसोई से आती खुश्बू से इन्तजार कठिन होता जा रहा था। संदीप बताते हैं कि एक घंटे बाद ऐसा महसूस होने लगा जैसे कोई गला दबा रहा हो। उनके माता-पिता तुरन्त उन्हें अस्पताल ले गए जहाँ सही वक्त पर इलाज मिलने से उनकी जान बच सकी।

यह खाने की एलर्जी से होने वाली समस्या है जिसे एनफलेक्सिस कहते हैं, जो जानलेवा हो सकती है। डॉक्टर ने समझाया कि करी खाने के बाद हुई यह समस्या गोस्वामी की अपनी प्रतिरोधक क्षमता के कारण हुई है जो झींगे में बड़ी मात्रा में मौजूद प्रोटीन को पचा नहीं पाई। डॉक्टर ने उन्हें ऐसे खाद्य पदार्थों से दूर रहने की सलाह दी।

देश में 24 करोड़ लोग आर्सेनिक से प्रभावित

Source: 
राजस्थान पत्रिका, 25 दिसम्बर, 2017

सबसे ज्यादा 7 करोड़ आबादी प्रभावित है यूपी की

नई दिल्ली। भारत के 21 राज्यों के 153 जिलों में रहने वाले करीब 24 करोड़ लोग (यानी देश की कुल आबादी की करीब 19 फीसदी आबादी) खतरनाक आर्सेनिक स्तर वाला पानी पीते हैं। प्रतिशत के हिसाब से देखा जाए तो सबसे ज्यादा असम की 65 प्रतिशत आबादी आर्सेनिक दूषित पानी पीती है जबकि पश्चिम बंगाल और बिहार में ये आँकड़े 44 और 60 फीसदी हैं। ये आँकड़ा एक सवाल के जवाब में जल संसाधन मंत्रालय ने लोकसभा को बताया है। आँकड़ों के मुताबिक, आबादी के लिहाज से सबसे अधिक प्रभावित राज्य उत्तर प्रदेश है, जहाँ सात करोड़ आबादी ये जहरीला पानी पीने को मजबूर है।

आर्सेनिक युक्त हैण्डपम्प पर कोई निशान नहीं लगा है

त्वचा कैंसर हो सकता है


विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने चेतावनी दी है कि लम्बे समय तक आर्सेनिक युक्त पानी पीने से आर्सेनिकोसिस हो सकता है। इसके अलावा त्वचा का कैंसर, गाल ब्लैडर, किडनी या फेफड़े से सम्बन्धित बीमारियाँ हो सकती हैं। डायबिटीज व हाइपरटेंशन भी हो सकता है।

 

रिस्पना के बहाने भगीरथ बनने की पेशकश


रिस्पना नदी का उद्गम स्थलरिस्पना नदी का उद्गम स्थलदुनिया में गोमुख से बहने वाली गंगा-भागीरथ नदी का इतिहास है कि वे राजा भगीरथ के तप के कारण स्वर्ग से धरती पर उतरी है। इसके बाद लंदन की टेम्स नदी का इतिहास इस मायने में जुड़ जाता है कि जो नदी एकदम मैली, सूखी हुई मरणासन्न में थी, वहाँ के लोगों और सरकारों ने पुनर्जीवित ही नहीं किया बल्कि आज टेम्स नदी, दुनिया में नदी संरक्षण को लेकर एक मिशाल बनी हुई है।

हालांकि यही हालात मौजूदा वक्त सभी नदियों की है। परन्तु उत्तराखण्ड की अस्थायी राजधानी देहरादून में बहने वाली रिस्पना नदी की हालत बद से बदस्तूर हो चुकी है। टेम्स नदी जैसी स्थिति में रिस्पना नदी कब आये ऐसा कहना अभी जल्दीबाजी ही होगा। मगर देहरादून की रिस्पना नदी के संरक्षण को लेकर मौजूदा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की कुलबुलाहट अब दिखने लग रही है कि रिस्पना नदी को पुनर्जीवित ही नहीं करेंगे बल्कि वे इस नदी के पुराने सौन्दर्य को लौटाने का भरसक प्रयास करेंगे।

उल्लेखनीय हो कि सरकार या मुख्यमंत्री वे सिर्फ किसी विशेष उपलब्धि के लिये ही याद किये जाते हैं। ऐसी उपलब्धि को उत्तराखण्ड के मौजूदा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत रिस्पना नदी को लेकर अपने साथ जोड़ना चाहते हैं। सम्भवतः इसलिये सरकार और उसके मुख्यमंत्री अक्सर बड़े ‘संकल्प’ लेते हैं, घोषणाएँ करते हैं। लेकिन इतिहास वही बनाते हैं जो संकल्प सिद्ध करते हैं।