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भूजल प्रदूषण (Groundwater pollution in Hindi)

Source: 
‘जल प्रदूषण’ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 2011

सतह पर उपस्थित जलस्रोतों के अतिरिक्त भूजल स्रोत भी जल प्रदाय के बड़े स्रोत होते हैं। भूमि सतह के भीतर तरह-तरह की चट्टानें पाई जाती हैं। भूमि सतह के भीतर जल धाराएँ एवं जलकुंड भी पाए जाते हैं। भूमि की सतह के भीतर पाए जाने वाले जलस्रोतों पर भूजल चट्टानों वाले जलस्रोतों पर भूजल चट्टानों का प्रभाव पड़ता है। ये प्रभाव चट्टानों की प्रकृति के अनुसार होता है। चट्टानों में उपस्थित तत्वों में से घुलनशील तत्व पानी में घुलकर उसकी गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।

मानवीय गतिविधियों के कारण जल प्रदूषण (Water pollution due to human activities)

Source: 
‘जल प्रदूषण’ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 2011

जल प्रदूषण की चर्चा करते ही हमारे सामने बड़े-बड़े उद्योगों से निकलने वाले दूषित जल के दृश्य आ जाते हैं। हम जल प्रदूषण का अर्थ औद्योगिक जल प्रदूषण से ही लेते हैं। लेकिन उद्योगों के अतिरिक्त जल प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण मानवीय गतिविधियाँ हैं। यहाँ हम कुछ ऐसी मानवीय गतिविधियों की चर्चा करें जिनसे जल प्रदूषण होता है।

फैक्टरी से निकलकर भूजल को प्रदूषित कर रहा है गन्दा पानी

1. घरेलू दूषित जल :-


हमारे देश की जनसंख्या 1 अरब से ज्यादा है तथा महानगरों को छोड़कर अन्य विभिन्न शहरों में घरेलू दूषित जल या सीवरेज के समुचित उपचार की व्यवस्था नहीं है। जिन शहरों में सीवरेज उपचार की व्यवस्था है, उनमें भी सारे शहर से उत्पन्न होने वाले सीवरेज के उपचार हेतु पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। फलस्वरूप बड़ी मात्रा में सीवरेज या दूषित जल अनुपचारित रह जाता है और ये अनुपचारित दूषित जल नालों के माध्यम से सीधे ही नदियों में जा मिलता है।

औद्योगिक गतिविधियों के कारण जल प्रदूषण (Water pollution due to industrial activities)

Source: 
‘जल प्रदूषण’ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 2011

जल प्रदूषण का प्रमुख कारण औद्योगिक निस्राव है। सभी औद्योगिक इकाइयों में कम या अधिक मात्रा में जल की खपत होती है। इसी अनुपात में दूषित जल उत्पन्न होता है। दूषित जल की प्रकृति औद्योगिक प्रक्रिया में जल, कच्चे माल के उपयोग, उत्पाद एवं उत्पादन प्रक्रिया पर निर्भर करती है। उद्योगों से निकलने वाले दूषित जल में मुख्य रूप से 2 प्रकार के प्रदूषक होते हैं :-

जल प्रदूषण 1. कार्बनिक प्रकृति के प्रदूषक
2. अकार्बनिक प्रकृति के प्रदूषक

1. कार्बनिक प्रकृति के प्रदूषक :-


सभी प्रकार के कृषि आधारित (एग्रोबेस्ड) उद्योग, डिस्टलरीज, राइस मिल, पोहा मिल, खाद्य प्रसंस्करण (फूड प्रोसेसिंग) उद्योग, पेपर मिल आदि में प्रक्रिया के अंतर्गत बड़ी मात्रा में जल की खपत होती है। इनसे उत्पन्न होने वाले दूषित जल की मात्रा भी काफी अधिक होती है। इस दूषित जल में बड़ी मात्रा में कार्बनिक पदार्थ होते हैं। किसी जलस्रोत में ऐसा प्रदूषित पानी मिलकर उसकी गुणवत्ता पर तत्काल विपरीत प्रभाव डालता है। जलस्रोत में प्रदूषण भार बढ़ने से उसके सामान्य पैरामीटर्स में वृद्धि होती है। इस प्रकार प्रभावित होने वाले प्रमुख पैरामीटर्स हैं :-

1. टोटल सॉलिड्स :-

खतरनाक हो सकती है चर्म-शोधन कारखानों के अपशिष्‍ट जल से सिंचाई

Author: 
उमाशंकर मिश्र

अध्‍ययनकर्ताओं के मुताबिक इस समस्‍या से निजात पाने के लिये अपशिष्‍ट जल का उपचार करने वाले संयंत्रों की नियमित निगरानी जरूरी है। यह सुनिश्चित करना होगा कि पर्यावरण में इन अपशिष्‍टों को निस्‍तारित करने से पहले नियमों का पूरी तरह से पालन किया जाए। इसके साथ-साथ लोगों को जागरूक करना भी जरूरी है, ताकि अपशिष्‍ट जल का उपयोग सिंचाई में करने से रोका जा सके। नई दिल्‍ली, 19 मई (इंडिया साइंस वायर) : पानी की कमी के चलते अ‍पशिष्‍ट जल का उपयोग दुनिया भर में सिंचाई के लिये होता है। लेकिन ऐसा करना मिट्टी और भूमिगत जल की सेहत के लिये ठीक नहीं है। कानपुर में चमड़े का शोधन करने वाली इकाइ‍यों से निकले अपशिष्‍ट जल से सिंचित कृषि क्षेत्रों की मिट्टी एवं भूजल के नमूनों का अध्‍ययन करने के बाद शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुँचे हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार चर्म-शोधन इकाइयों से निकले अपशिष्‍ट जल से लंबे समय तक सिंचाई करने से हानिकारक धात्विक तत्‍व मिट्टी और भूमिगत जल में जमा हो जाते हैं। भोपाल स्थित मृदा विज्ञान संस्‍थान के शोधकर्ताओं के अनुसार लंबे समय तक चर्म-शोधन इकाइयों से निकले अपशिष्ट जल का उपयोग सिंचाई के लिये करने से कानपुर के कई इलाकों की मिट्टी में हानिकारक धातुओं की मात्रा बढ़ गई है, जिसमें क्रोमियम की मात्रा सबसे अधिक पाई गई है।

जल प्रदूषण (Water Pollution in Hindi)

Author: 
डॉ. एके चतुर्वेदी
Source: 
जल चेतना, जनवरी 2016

ऑक्सीजन के उपरान्त जल जीवन के लिये अति आवश्यक है। मनुष्य के शरीर के भार का 70 प्रतिशत जल होता है। विश्व में पृथ्वी के चारों ओर जल है, 71 प्रतिशत भाग में जल है और 29 प्रतिशत में सतह है। सतह के कुछ भाग पर ही आबादी है। अधिकतर भाग पर पहाड़, जंगल, नदियाँ, झरने व तालाब हैं। जितना भी जल है उसका केवल 3 प्रतिशत जल पीने योग्य है। ताजा पीने योग्य जल ग्लेशियर (हिमखण्ड), पोलर आइस से प्राप्त होता है। इसी प्रकार भूजल गहरी चट्टान बनने के कारण एकत्रित होता रहता है।

जल प्रदूषण जल की उत्पत्ति के लिये विश्व में हाइड्रोलॉजिकल चक्र है। विश्व में पृथ्वी की आर्द्रता और समुद्र जल सूर्य की गर्मी से वाष्पीकृत होकर वायुमण्डल में चले जाते हैं। वहाँ धूल के कणों से मिलकर बादल का निर्माण करते हैं। जब बादलों में आर्द्रता अधिक हो जाती है, तो वह वर्षा या बर्फ के रूप में पृथ्वी पर आ जाती है। वर्षा जल, झरनों, झीलों, नदियों द्वारा पृथ्वी में आर्द्रता पुनः उत्पन्न होती है। इस प्रकार हाइड्रोलॉजिकल चक्र पूर्ण होता है और विश्व में जल की पूर्ति होती रहती है।

बड़े शहरों में घेंघा के बढ़ते खतरे

Author: 
स्वतंत्र मिश्र
Source: 
जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण (2013) पुस्तक से साभार

हिमालय की लगभग 2,400 किलोमीटर की तराई वाली पट्टी में लोगों में घेंघा की शिकायतें पाई जाती थीं। इसके अलावा कुछ जल जमाव वाले क्षेत्रों में इसकी पहचान की गई थी, परन्तु अन्य जगहों में आयोडीन की जरूरत वहाँ के प्राकृतिक स्रोतों कुओं के जल, भूजल, हरी साग-सब्जियों आदि से पूरी हो जाती है। फिर सरकार उन क्षेत्रों में भी आयोडीन नमक क्यों जबरन खिलाना चाहती है?

प्रदूषित पानी आज भी एक भीषण समस्या


दूषित पानी से पनप रही हैं बीमारियाँदूषित पानी से पनप रही हैं बीमारियाँआज समूची दुनिया प्रदूषित पानी की समस्या से जूझ रही है। हालात इतने विषम और भयावह हैं कि प्रदूषित पानी पीने से आज इंसान भयानक बीमारियों की चपेट में आकर अनचाहे मौत का शिकार हो रहा है। असलियत यह है कि पूरी दुनिया में जितनी मौतें सड़क दुर्घटना, एचआईवी या किसी और बीमारी से नहीं होतीं, उससे कई गुणा अधिक मौतें प्रदूषित पानी पीने से उपजी बीमारियों के कारण होती हैं।

यदि संयुक्त राष्ट्र की मानें तो समूची दुनिया में हर साल आठ लाख लोगों की मौत केवल प्रदूषित पानी पीने से होती है। संयुक्त राष्ट्र की बीते दिनों जारी एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एशिया, लैटिन अमरीका और अफ्रीका में हर साल तकरीब 35 लाख लोगों की मौतें दूषित पानी के सम्पर्क में आने से होने वाली बीमारियों के चलते होती हैं। गरीब देशों में यह समस्या और गम्भीर है।

पेयजल और ग्रामीण स्वच्छता को प्राथमिकता

Author: 
धीप्रज्ञ द्विवेदी
Source: 
कुरुक्षेत्र, मार्च 2017

आर्सेनिक की अधिकता वाले पानी को पेयजल में इस्तेमाल किये जाने से त्वचा, खून और फेफड़े के कैंसर तथा बच्चों में कार्डियो वैस्कुलर सिस्टम प्रभावित होता है। फ्लोराइड की अधिकता से दाँत और हड्डियों की बीमारी होती है। इसे ध्यान में रखते हुए सरकार की कोशिश है कि लोगों को शुद्ध पानी उपलब्ध कराया जाये ताकि वे विभिन्न बीमारियों से प्रभावित न हो। ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल उपलब्ध कराने के लिये एक रणनीतिक योजना 2011-22 तैयार की गई थी जिसके अन्तर्गत सभी ग्रामीण घरों में एक मीटर के जरिए पर्याप्त मात्रा में नल-जल की आपूर्ति करने का लक्ष्य रखा गया है। ग्रामीण भारत स्वच्छता कवरेज अक्टूबर 2014 के 42 प्रतिशत से बढ़कर वर्तमान में 60 प्रतिशत तक पहुँच चुका है। देश भर में स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत 3.47 करोड़ से अधिक घरेलू शौचालय बनाए जा चुके हैं। वित्तवर्ष 2017-18 में खुले में शौचमुक्त क्षेत्रों में पाइप युक्त शुद्ध जलापूर्ति को प्राथमिकता दी जाएगी।

स्वच्छ भारत मिशन के लिये वित्तवर्ष 2016-17 में रु. 11,300 करोड़ का प्रावधान किया गया था लेकिन इसमें लगभग 12800 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। वर्ष 2017-18 में इसमें रु. 16248 करोड़ का प्रावधान किया गया है।

राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम हेतु वित्तवर्ष 2016-17 में रु. 6000 करोड़ (संशोधित) का प्रावधान रखा गया है जिसे 2017-18 में बढ़ाकर रु. 6050 करोड़ कर दिया गया है। राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल के उपमिशन के हिस्से के रूप में अगले 4 वर्षों के लिये आर्सेनिक एवं फ्लोराइड प्रभावित 28000 से अधिक बस्तियों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने का प्रस्ताव किया गया है।

जहरीली होती हवा और अस्वीकारोक्ति के स्वर

Author: 
कुमार सिद्धार्थ
Source: 
सर्वोदय प्रेस सर्विस, मार्च 2017

वायु प्रदूषण का स्तर जानलेवा होता जा रहा है, जो सभी के स्वास्थ्य के लिये खतरनाक साबित हो रहा है। इसी वजह से दिल सम्बन्धी और साँस सम्बन्धी बीमारियों का खतरा बढ़ने से रोगग्रस्तता और मृत्युदर पर असर पड़ रहा है। प्रदूषण की वजह से दुनिया में हर बरस तकरीबन एक करोड़ छब्बीस लाख लोग मर रहे हैं। वायु प्रदूषण की भयावहता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज देश के हर शहर एक बड़े गैस चेम्बर के रूप में परिवर्तित हो रहे हैं, जिसमें बड़ी संख्या में लोग वायु प्रदूषण की वजह से काल के मुँह में समा रहे हैं। पाँच राज्यों के चुनाव-परिणामों की गहमागहमी के बीच पिछले पखवाड़े ‘स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2017’ नामक रिपोर्ट अखबारों की सुर्खियों में नहीं आ पाई। विश्व पटल पर प्रस्तुत की गई इस महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट से भारत में प्रदूषण से आम जनता की सेहत पर पड़ने वाले प्रभावों और होने वाली मौतों की भयावहता की तस्वीर सामने आई है।

इस रिपोर्ट को हेल्थ इफेक्ट इंस्टीट्यूट और यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन स्थित इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवेल्यूशन ने संयुक्त तौर पर तैयार किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आँकड़ों पर आधारित इस रिपोर्ट में 195 देशों के 1990 से 2015 तक के विस्तृत आँकड़े हैं। इनके आधार पर वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या को निकाला जाता है।