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जलपोत विखण्डन सुविधाओं में पर्यावरणीय नियंत्रण की श्रेष्ठ प्रक्रियाएँ

Source: 
बेसेल संधि शृंखला/एसबीसी नम्बर 2003/2

जलपोत को विखण्डन हेतु तैयार करने की प्रक्रिया


सीसा विषाक्त होता है और यह बैटरियों, पेंट तथा मोटर, जनित्र, नलियाँ, केबल और अन्य वस्तुओं में हो सकता है। मानव स्वास्थ्य पर सीसे के कुप्रभावों की जानकारी काफी समय से अच्छी तरह जानी-पहचानी है। छोटे बच्चों पर सीसे का विषाक्त प्रभाव सर्वाधिक रूप से पड़ता है। लम्बे समय तक थोड़ी-थोड़ी मात्रा में सीसे के सम्पर्क में आते रहने से पढ़ने-लिखने में स्थायी कुप्रभाव प्रकट हो सकता है तथा बौद्धिक विकास अवरुद्ध हो सकती है और तंत्रिका विकास और शारीरिक विकास धीमी पड़ सकती है। जलपोत के ढाँचे और उसके घटक एवं अंगों के निष्कर्षण, जिससे पुनश्चक्रण, पुनरुपयोग और निपटारे के लिये सामग्रियाँ प्राप्त होती हैं, से निम्नलिखित कारणों से पर्यावरण में निकासियाँ हो सकती हैं:

- पोत को तोड़ने लगने के पूर्व उसे तैयार करने की प्रक्रियाओं की अपर्याप्तता
- तोड़ते वक्त पोत पर विद्यमान सामानों का संग्रह/हटाया/सुरक्षित न किया जाना
- सामानों के संग्रह, परिवहन और भण्डारण/निपटारे की प्रक्रियाओं की अपर्याप्तताएँ

कार्यविधियों और प्रक्रियाओं का स्वरूप ही ऐसा है कि उनसे जल, वायु और जमीन में उत्सर्जनों की सम्भावना रहती है। इसकी रोकथाम के लिये यह आवश्यक है निपटारे के लिये जहाज को डीकमीशन करने की प्रक्रिया के हर चरण पर विचार किया जाये ताकि हर स्तर पर सुधारात्मक कार्रवाइयों को अंजाम दिया जा सके।

डीकमिशनिंग और विखण्डन से जुड़े विशिष्ट उपायों के सुझावों से सम्बन्धित जिम्मेदारियों (देखें नीचे) को पर्यावरणीय प्रबन्ध योजना (अध्याय 6 भी देखें) में स्पष्ट रूप से पहचानना चाहिए।

जी एम फसलों का खतरनाक खेल


जब एक ही फसल की दो किस्मों को परागण के स्तर पर मिलाया जाता है तो उसी फसल की नई किस्म विकसित हो जाती है जिसमें दोनों किस्मों के गुण आ जाते हैं। जैसे मक्का की दो किस्मों या गेहूँ की दो किस्मों को मिला देना। इसे संकरण या हाईब्रीडिंग कहते है। इससे उपज बढ़ाने, रोग प्रतिरोध पैदा करने या किसी विशेष गुण का लाभ उठाने का उद्देश्य पूरा किया जाता है। यह प्रक्रिया नस्ल सुधार के परम्परागत तरीके जैसा ही है। किन्तु जी एम संशोधन एक बिलकुल भिन्न प्रक्रिया है। जीन के स्तर पर संशोधित फसलों का खाद्य शृंखला में शामिल किया जाना और उनके परीक्षण को लेकर दुनिया भर में विवाद कोई नया नहीं है। यह प्रौद्योगिकी आरम्भ से ही विवादित रही है। इसीलिये दुनिया के बहुत से देशों ने अभी तक जीन संशोधित फसलों को खाद्य शृंखला में शामिल करने की अनुमति नहीं दी है। यूरोपीय देश और जापान इनमें प्रमुख हैं। भारत में बी टी कपास, जीन संशोधित फसल है जिसे बड़े पैमाने पर प्रचारित किया गया है।

हालांकि इसे खाद्य फसल नहीं माना गया है फिर भी अप्रत्यक्ष रूप से खली और तेल के माध्यम से यह खाद्य शृंखला में शामिल हो रहा है। इसके बाद बी टी बैंगन को प्रचारित करने के प्रयास हुए किन्तु जन विरोध और वैज्ञानिक तर्क की स्पष्टता के अभाव में इसके परीक्षण को 2010 में रोक दिया गया। अब फिर से जीन संशोधित सरसों के क्षेत्र परीक्षण की अनुमति देने की तैयारी हो रही है। जी ई ए सी इसकी अनुमति देने वाली संस्था है।

पानी के टाइगर को बचाने की जुगत अब जरूरी


महाशीरमहाशीर‘पानी के टाइगर’ नाम से पहचाने जाने वाली राज्य मत्स्य महाशीर के संरक्षण के लिये विविध प्रयासों की आवश्यकता है। मध्य प्रदेश में इन दिनों नर्मदा सेवा मिशन के तहत नदी संरक्षण के उपाय किये गए हैं। ऐसे में समाज और सरकार ने महाशीर के संरक्षण के प्रयास भी और तेज कर देना चाहिए।

प्रदेश की राज्य मछली महाशीर पर 14 साल से शोध और अध्ययन में जुटी वैज्ञानिक डॉ. श्रीपर्णा सक्सेना ने अभी हाल ही में इस विषय पर एक ताजा अध्ययन किया है। यह अध्ययन स्वयंसेवी संगठन नर्मदा संरक्षण पहल ने एक रिपोर्ट के रूप में प्रकाशित किया है। डॉ. सक्सेना वनांचलों में महाशीर संरक्षण परियोजना की मुख्य शोध समन्वयक भी हैं। आपने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि महाशीर प्रजाति के संरक्षण की कार्रवाई महाशीर के प्राकृतिक रहवास को बचाए बिना नहीं की जा सकती। महाशीर के रहवास में हुए विखण्डन, प्रदूषण, अनियंत्रित आखेट जैसे अनेक मानव निर्मित कारणों से महाशीर के प्राकृतिक रहवास सिमटे जा रहे हैं।

किसी समय मध्य प्रदेश की नदियों की शान समझी जाने वाली यह प्रजाति अब संकट में है। महाशीर का संरक्षण करने के लिये प्राकृतिक रहवासों का संरक्षण करने के साथ-साथ इनका तालाबों में पालन तथा कृत्रिम प्रजनन कराते हुए अंगुलिकाओं को प्राकृतिक जलधाराओं में छोड़ा जा सकता है। इस प्रकार रहवास का संरक्षण और प्रजाति की संख्या में आ रही कमी को दूर करने के प्रयास एक साथ करते हुए महाशीर को बचाया जा सकता है। अनियंत्रित और अवैधानिक तरीकों से मत्स्य आखेट पर रोक लगाना और प्राकृतिक प्रजनन स्थलों की सरकारी अमले द्वारा कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए प्रजनन योग्य बड़ी मछलियों का शिकार रोकना भी महाशीर के संरक्षण में उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

पेट्रोकेमिकल प्रदूषित भूजल क्षेत्र के लिये जैविक उपचार (Bio-Remedies for Petrochemical contaminated aquifers)

Author: 
पंकज कुमार गुप्ता, बृजेश कुमार यादव
Source: 
जल विज्ञान विभाग, आईआईटी रुड़की

परिचय:


चित्र 1: भूमिगत टैंक में संग्रहित पेट्रोकेमिकल के रिसाव से होने वाले मृदा-भूजल प्रदूषण हम अपने दैनिक जीवन में लगभग हर रोज पेट्रोल-पंपों को आसपास देखते हैं। इन पेट्रोल-पंपों पर भिन्न-भिन्न प्रकार के पेट्रोकेमिकल पदार्थ जैसे पेट्रोल, डीजल, केरोसिन इत्यादि उपलब्ध होते हैं। इन पेट्रोकेमिकल पदार्थों को भूमिगत टैंक में संग्रहित (स्टोर) किया जाता है। देख-रेख के अभाव, भूकम्पीय कम्पन, और अन्य कई कारणों से समय के साथ इन टैंको से पेट्रोलियम पदार्थ का रिसाव होने लगता है। जैसे ही इन पेट्रोलियम पदार्थों का प्रवेश मिट्टी में होता है, ये एक प्रदूषक के रूप में अपनी यात्रा भूजल की ओर प्रारम्भ कर देते हैं और अन्ततः भूजल-प्रदूषण के कारण बनते जाते हैं।

पेट्रोलियम रिसाव के कारण होने वाली मिट्टी और भूजल प्रदूषण एक देशव्यापी समस्या है। इस लेख पत्र का उद्देश्य उन पेट्रोलियम पदार्थों के कारण होने वाले मृदा-भूजल प्रदूषण और साथ-ही-साथ उनके उपचार उपायों को प्रस्तुत करना है।

पेट्रोकेमिकल प्रदूषण के मुख्य स्रोत:

आर्सेनिक प्रदूषण से बचा सकती है जागरुकता और सही तकनीक

Source: 
इंडिया साइंस वायर, 17 जुलाई, 2017

अध्‍ययन के मुताबिक मौजूदा एजेंसियों को मजबूत बनाने से भी आर्सेनिक के कारण होने वाले नुकसान के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाई जा सकती है और उनको आर्सेनिक-मुक्त पानी पीने के लिये ज्यादा से ज्यादा प्रेरित किया जा सकता है। वास्को-द-गामा (गोवा), 17 जुलाई, 2017 (इंडिया साइंस वायर): देश के कई हिस्‍से आर्सेनिक प्रदूषण के खतरे से जूझ रहे हैं और इस समस्‍या से निपटने के लिये वैज्ञानिक तकनीक एवं अन्‍य उपाय भी उपलब्‍ध हैं। इसके बावजूद यह समस्‍या जस की तस बनी हुई है। एक ताजा अध्‍ययन में इस स्थिति के लिये जिम्‍मेदार कारणों का पता लगाया गया है।

इस अध्‍ययन में उन कारकों का पता लगाया गया है, जिनके चलते लोग आर्सेनिक से बचाव के लिये विभिन्‍न तकनीकों के चयन के प्रति अलग-अलग धारणा रखते हैं। आर्सेनिक से प्रदूषित जल के खतरों से बचने के लिये ज्‍यादातर लोग नलकूप, ट्यूबवेल और वर्षा जल संचयन के बजाय आर्सेनिक फिल्‍टर और पाइपों के जरिये की जाने वाली जलापूर्ति पर ज्‍यादा भरोसा करते हैं।

इसके अलावा आर्सेनिक-मुक्त पानी उपलब्ध कराने में जुटी विभिन्न एजेंसियों के प्रति लोगों का विश्‍वास भी एक बहुत बड़ा कारण है। यही कारण है कि लोग आर्सेनिक फिल्टरों पर ज्यादा भरोसा करते हैं। जबकि पाइपों से जल आपूर्ति और नलकूप व ट्यूबवेल परियोजनाएँ कई बार व्यावहारिक तौर पर सफल नहीं हो पातीं। इसलिए लोगों का इन पर विश्वास पूरी तरह नहीं बन पाता। वहीं, वर्षाजल संचयन प्रणाली पूरी तरह से लोगों की जागरूकता एवं इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है और ग्रामीण इलाकों में जागरूकता की कमी के कारण इसे बहुत अधिक सफलता नहीं मिल पाती है।

​नैनी झील के कम होते जलस्तर के संरक्षण और बहाली की कोशिशों का लेखा-जोखा (भाग 4)

Author: 
डॉ. राजेंद्र डोभाल

झील के संरक्षण और बहाली के लिये कार्य


खत्म होने के कगार पर नैनी झील झीलों के संरक्षण के लिये विभिन्न पर्यावरणीय संगठन विकास के क्षेत्र में लगे हुए हैं। Highland Aquatic Resource Conservation and Sustainable Development (High ARCS) परियोजना के अन्तर्गत Integrated Action Plan, Uttarakhand की एक रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय झील क्षेत्र विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण (एनएलआरएसएडीए) उत्तराखंड (भीमताल), सिंचाई विभाग, नैनीताल नगर पालिका परिषद (एनएनपीपी), उत्तराखंड जल संस्थान (यूजेएस), उत्तरांचल पेय जल निगम (यूपीजेएन), विभाग मत्स्य पालन, उत्तराखंड, शीत जल मत्स्य पालन अनुसंधान निदेशालय, भिमताल, जीबी पंत संस्थान हिमालयी पर्यावरण विकास, जी.बी. कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी (एनआईएच), महसीर कंजर्वेंसी फोरम, किसान बैंक, बेंजेन्द्र सहाय समिति, पावर कारपोरेशन, वन विभाग, वन अनुसंधान केंद्र, इंडो डच बागवानी, सिडलिक फ्लोरिस्ट पार्क, कुमामंड मंडल विकास निगम ( केएमवीएन) और गढ़वाल मंडल विकास निगम (जीएमवीएन), वैधानिक उत्तरांचल पर्यटन बोर्ड इत्यादि नैनीताल में सक्रिय महत्त्वपूर्ण संस्थान हैं।

स्वास्थ्य और पर्यावरण की चुनौतियाँ (Health and Environmental Challenges)

Source: 
आई सी एम आर पत्रिका, नवम्बर, 2012

भारत के 20 राज्यों के लगभग 6 करोड़ लोग फ्लोराइड सन्दूषण के कारण दन्त फ्लोरोसिस, कंकाली फ्लोरोसिस जैसी गम्भीर स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित हैं। घुटनों के लड़ने और उनके मुड़ने के कारण विकलांगता के साथ-साथ आर्थिक कठिनाई जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती है। पेयजल में फ्लोराइड की मात्रा की अधिकता से अस्थि विकास के लिये जरूरी कैल्शियम का अवशोषण बन्द हो जाता है और इसी कारण अस्थि में विरूपता उत्पन्न हो जाती है। प्रायः रोग की उत्पत्ति पर्यावरण, रोगजनक कारक और होस्ट (परपोषी) से जुड़े कारकों की पारस्परिक क्रियाओं के परिणामस्वरूप होती है। पर्यावरण को व्यक्ति के परिवेश के भौतिक, रासायनिक और जैविक कारकों के साथ-साथ सभी सम्बद्ध व्यवहारों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। पर्यावरण में उपस्थिति इन कारकों के प्रभाव से मानव स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। चूँकि, इनमें से अधिकांश कारक मानव निर्मित हैं, अतः पर्यावरण को बचाना न केवल मानव हित में है बल्कि स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी यह एक उत्तम निवेश है।

जलीय पर्यावरण में धात्विक तत्व लेड (||) का खतरनाक स्तर (Dangerous level of element Lead (||) in aquatic environment)

Author: 
डॉ. आचिन्त्य, डॉ. सुरेश कुमार
Source: 
भाभा परमाणु अनुसन्धान केन्द्र के सौजन्य से प्रकाशित

औसत मनुष्य जीवन का दैनिक लेड सन्तुलनशहर के जलीय पर्यावरण को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। यथा, शुद्ध जल जो उपभोक्ता को उनके दैनिक कार्यों हेतु दिया जाता है। दूसरा प्रयुक्त जल, जिसका निस्सारण उपभोक्ता उपभोग के उपरान्त नालियों के रास्ते करते हैं और तीसरा औद्योगिक इकाइयों से निस्सारित जल। इन सभी जलस्रोतों से उत्सर्जित जल अन्तत: शहर के प्रकृतिक जल निकायों से जाकर मिलते हैं। अत: इन स्रोतों में उपस्थित सम्भावित प्रदूषणकारी अवयवों का अध्ययन एवं निराकरण सामयिक है। जैसा कि विदित है, प्रयुक्त जल के प्रदूषण स्तर को जानने के लिये निलम्बित ठोस कण, बी.ओ.डी. (बायलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड) घुलित ऑक्सीजन, पी.एच., भारी धातु आदि अवयवों का निर्धारण किया जाता है। वैसे तो सभी प्रदूषणकारी अवयवों का अपना दुष्प्रभाव है, पर शहरों के जलीय स्रोतों में हाल के दिनों में भारी धातुओं का पाया जाना चिन्ता का विषय है।

हमारे शोध –

पुस्तक भूमिका : जल और प्रदूषण

Source: 
‘जल प्रदूषण’ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 2011

पर्यावरणीय प्रदूषण आज के युग की सबसे बड़ी चुनौती है। बढ़ते औद्योगीकरण के कारण हमारी जीवन शैली में आए परिवर्तनों से पर्यावरण पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। विगत लगभग 150 वर्षों में विश्व भर में हो रहे अनियंत्रित, अनियमित एवं अंधाधुंध विकास के दुष्परिणाम जल और वायु प्रदूषण के रूप में हमारे सामने हैं।

वायु प्रदूषण एक समय था, जब उद्योगों की ऊँची चिमनियों से निकलने वाला धुँआ औद्योगिक क्रांति का प्रतीक समझा जाता था और इसकी उपस्थिति (उद्योग की स्थिति बताकर) जनमानस को राष्ट्र और अर्थव्यवस्था के विकसित होने का अहसास कराती थी। इसी प्रकार कारखानों से निकलने वाला रंगीन या गंदा-मटमैला पानी इस बात का संकेत होता था कि कारखाने में उत्पादन चालू है। वस्तुत: उस समय किसी को भी इस बात का अहसास नहीं था कि इस तरह हो रहा जल या वायु प्रदूषण समय के साथ एक गंभीर समस्या में परिवर्तित हो जाएगा।