वे पहले से हमें कपटी मान बैठे थे

Author: 
सुनीता नारायण
Source: 
डाउन टू अर्थ, दिसम्बर 2017

अगस्त 2003 में भारत एक बेहद असामान्य लड़ाई का गवाह बना। यह लड़ाई एक गैर लाभकारी संगठन और विश्व की ताकतवर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बीच थी। उस वक्त जब सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट ने कोला ड्रिंक्स में कीटनाशक मिलने का अध्ययन जारी किया तब कोका कोला और पेप्सी जैसी कम्पनियों ने अपनी प्रतिद्वंद्विता भुलाकर हाथ मिला लिया। लेकिन लोगों के स्वास्थ्य की जीत हुई। सुनीता नारायण की किताब ‘कॉन्फ्लिक्ट्स ऑफ इंट्रेस्ट’ विस्तार से यह अनकही कहानी बताती है और यह भी कि लड़ाई कैसे जीती गई। किताब के विशेष उद्धरण

गैर लाभकारी संगठन और विश्व की ताकतवर बहुराष्ट्रीय कंपनी हम पूरी रात सोए नहीं थे। मुझे याद है कि मेरे साथी और मैंने कुछ हफ्तों तक रात को ठीक से आराम नहीं किया था। हम संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) में अपना बयान दर्ज कराने की तैयारी कर रहे थे। सरकार ने समिति यह जाँच करने के लिये बनाई थी कि कोला में कीटनाशक के अवशेष मिलने की हमारी पड़ताल सही थी या नहीं। हमारी परीक्षा चल रही थी। अग्निपरीक्षा। अगली सुबह हमें सांसदों की समिति के समक्ष अपने अध्ययन से सम्बन्धित पक्ष रखना था कि यह हमने क्या और क्यों किया। हमें पता चला कि यह ऐसी चौथी जेपीसी है। पहली समिति ने बोफोर्स तोप घोटाला, दूसरी ने हर्षद मेहता स्टॉक मार्केट घोटाला, तीसरी ने केतन पारेख शेयर मार्केट घोटाले की जाँच की थी। और अब अगस्त 2003 में सभी दलों के सदस्यों वाली और वरिष्ठ राजनेता शरद पवार की अध्यक्षता में चौथी जेपीसी गठित की गई थी।

जल प्रदूषण दूर करने में मददगार हो सकता है प्लास्टिक कचरा (Plastic waste can be used for decontamination of water)

Author: 
डॉ. वैशाली लावेकर
Source: 
इंडिया साइंस वायर, 14 दिसंबर, 2017

प्लास्टिक कचरे के बढ़ते बोझ को कम करने के लिये पुनर्चक्रण करके उसका दोबारा उपयोग करना ही सबसे बेहतर तरीका माना जाता है। इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए भारतीय वैज्ञानिकों ने पानी को शुद्ध करने के लिये प्लास्टिक कचरे के उपयोग का एक नया तरीका खोज निकाला है।

प्लास्टिक कचरा लखनऊ स्थित भारतीय विष-विज्ञान अनुसंधान संस्थान के शोधकर्ताओं ने प्लास्टिक कचरे से चुंबकीय रूप से संवेदनशील ऐसी अवशोषक सामग्री तैयार की है, जिसका उपयोग पानी से सेफालेक्सिन नामक जैव प्रतिरोधक से होने वाले प्रदूषण को हटाने में हो सकता है।

वैज्ञानिकों ने पॉलियेथलीन टेरेफ्थैलेट (पीईटी) के कचरे को ऐसी उपयोगी सामग्री में बदलने की प्रभावी रणनीति तैयार की है, जो पानी में जैव-प्रतिरोधक तत्वों के बढ़ते स्तर को नियंत्रित करने में मददगार साबित हो सकती है। इस तकनीक से प्लास्टिक अपशिष्ट का निपटारा होने के साथ-साथ जल प्रदूषण को भी दूर किया जा सकेगा।

अध्ययनकर्ताओं में शामिल डॉ. प्रेमांजलि राय ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “आस-पास के क्षेत्रों से पीईटी रिफ्यूज एकत्रित कर नियंत्रित परिस्थितियों में उन्हें कार्बनीकरण एवं चुंबकीय रुपांतरण के जरिये चुंबकीय रूप से संवेदनशील कार्बन नैनो-मेटेरियल में परिवर्तित किया गया है।”

पीने के पानी में फ्लोराइड की ज्यादा मात्रा से होता है हड्डियों का रोग

Author: 
आवृति अग्रवाल
Source: 
दैनिक भास्कर, 23 नवम्बर, 2017

जर्नल केमिकल कम्युनिकेशन में प्रकाशित नए शोध में एक सरल रंग बदलते परीक्षण का पता चला है, जो जल्दी और चुनिंदा रूप से फ्लोराइड की उच्च मात्रा का पता लगाता है। लुइस ने कहा- अधिकांश पानी की गुणवत्ता निगरानी प्रणालियों को प्रयोग करने के लिये एक प्रयोगशाला और बिजली आपूर्ति और एक प्रशिक्षित ऑपरेटर की आवश्यकता होती है। हमने जो विकसित किया है, वह एक अणु है, जो कुछ मिनटों में रंग बदलता है और जो आपको बता सकता है कि फ्लोराइड का स्तर बहुत अधिक है।

ग्रामीण आबादी के लिये अनूठा वाटर प्यूरीफायर (Innovative Water Purifier for Rural Population)

Author: 
उमाशंकर मिश्र
Source: 
इंडिया साइंस वायर, नई दिल्ली, 08 नवम्बर, 2017


भारतीय शोधकर्ताओं ने एक ऐसा सोलर वाटर प्यूरीफायर बनाया है, जो ग्रामीण इलाकों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने में मददगार हो सकता है। महाराष्ट्र के फलटण में स्थित निम्बकर कृषि अनुसंधान संस्थान (एनएआरआई) के शोधकर्ताओं ने सौर ऊर्जा पर आधारित एक नया सोलर वाटर प्यूरीफायर (एसडब्ल्यूपी) विकसित किया है। इसकी खासियत यह है कि सौर ऊर्जा से संचालित होने के बावजूद इस तकनीक में सोलर पैनल या फिर बैटरी का उपयोग नहीं किया गया है।

.

पानी को साफ करने की यह रणनीति दो चरणों पर आधारित है। पहले चरण में किसी जलस्रोत से प्राप्त पानी को कई परतों में तह किए गए साफ सूती कपड़े से छान लिया जाता है। ऐसा करने से पानी से पार्टीकुलेट मैटर अलग हो जाते हैं। दूसरे चरण में तीन लीटर क्षमता वाली काँच की चार ट्यूबों का उपयोग किया जाता है, जो एक चैनल में लगे पात्र से जुड़ी रहती हैं। पात्र की मदद से काँच की ट्यूबों में पानी भरकर खुले स्थान में रख दिया जाता है। लगातार सूर्य की रोशनी के सम्पर्क में रहने से पानी गर्म हो जाता है और काँच की नलियों में संचित होने के कारण ऊष्मा बाहर नहीं निकल पाती। इस कारण ट्यूबों में भरे पानी का तापमान लम्बे समय तक स्थिर बना रहता है। एक बार पानी गर्म हो जाए तो उसे देर तक गर्म बनाए रखा जा सकता है और उसमें मौजूद बैक्टीरिया निष्क्रिय हो जाते हैं। इस तरह एक सामान्य सोलर वाटर प्यूरीफायर से प्रतिदिन करीब 15 लीटर सुरक्षित पेयजल मिल जाता है।

बाढ़ भी बिगाड़ देती है भूजल की सेहत

Source: 
दैनिक जागरण, 07 नवम्बर, 2017

बाढ़ से प्रदूषित भूजलबाढ़ से प्रदूषित भूजलएक नए अध्ययन में सामने आया है कि प्रदूषण की शिकार नदियों में आने वाली बाढ़ के कारण भूजल के भी प्रदूषित होने का खतरा बढ़ जाता है और यह हमारे इस्तेमाल के लिये असुरक्षित हो जाता है। दिसम्बर 2015 में जब चेन्नई बाढ़ की आपदा का सामना कर रही थी तब अन्ना विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की एक टीम अड्यार नदी के किनारे भूजल के सैम्पल एकत्र कर रही थी ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस इलाके में जमीन के अन्दर का पानी मानव इस्तेमाल के लिये फिट है।

पाँच महीनों के दौरान लिये गए सैम्पल


शोधकर्ताओं ने दिसम्बर 2015 से अप्रैल 2016 के बीच 17 ठिकानों से भूजल के नमूने एकत्र किये। यही बाढ़ और उसके बाद का समय था। वैज्ञानिकों ने नमूनों का परीक्षण नमक, भारी धातु सान्द्रता के साथ-साथ एंटी बायोटिक तत्वों की उपलब्धता का स्तर जानने के लिये किया। अन्ना यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट आॅफ जियोलाजी के प्रोफेसर लक्ष्मणन इलांगो ने कहा, हम जानना चाहते थे कि चेन्नई शहर में जमीन के पानी की गुणवत्ता का स्तर उतना ही है या नहीं जितना कि बाढ़ या उसके बाद के समय के लिये भारतीय मानक ब्यूरो ने निर्धारित किया है।

गोमती के जल, तलछटों और जलीय पादपों में भारी धातुओं का स्तर चिंताजनक (Heavy metal pollution in Gomti)

Source: 
इंडिया साइंस वायर, 01 नवम्बर, 2017

लखनऊ में गोमती नदी प्रदूषण के कारण काफी समय से सुर्खियों में बनी हुई है। अब वैज्ञानिकों ने अपने शोध से गोमती के जल में हानिकारक भारी धातुओं के होने की पुष्टि की है। पहली बार गोमती में आर्सेनिक की उपस्थिति का भी पता चला है।

गोमती नदी भारी धातुओं का मतलब ऐसी धातुओं से होता है जिनका घनत्व 5 से अधिक होता है और जिनकी अत्यधिक सूक्ष्म मात्रा का भी पर्यावरण पर खासा असर पड़ता है। इनका निर्धारित सान्द्रण सीमा से अधिक पाया जाना वनस्पतियों, जीवों एवं मानव स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है। साथ ही ये जल और मृदा के धात्विक प्रदूषण का भी कारण बनती हैं। भारी धातुओं में कैडमियम, क्रोमियम, कोबाल्ट, मरकरी, मैगनीज, मोलिब्डिनम, निकिल, लेड, टिन तथा जिंक शामिल हैं।

बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के पर्यावरण विज्ञान विभाग, झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय, राँची के पर्यावरण विज्ञान केंद्र तथा भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के वैज्ञानिकों ने सम्मिलित रूप से गोमती के पारिस्थितिक तंत्र में भारी धातुओं की सांद्रता का एकीकृत मूल्यांकन किया है। अभी तक गोमती के जल तथा उसकी तलहटी में बैठे तलछटों और प्राकृतिक रूप से मिलने वाले जलीय पादपों पर कोई व्यापक अध्ययन नहीं किया गया था। इस शोध के परिणाम हाल ही में वैज्ञानिक पत्रिका करेंट साइंस में प्रकाशित हुए हैं।

खाने से पहले की छोटी-छोटी लेकिन मोटी बातें

Author: 
मनीष अग्रहरि
Source: 
विज्ञान प्रगति, अक्टूबर 2017

इन दिनों फलों, सब्जियों, पशु उत्पादों और डेयरी समेत अन्य खाद्य उत्पादों को रोगों व कीटों से बचाने के लिये भारी मात्रा में पेस्टीसाइड का उपयोग किया जाता है अथवा उनको पकाने, बढ़ाने, चमकाने वाले बहुसंख्यक हानिकारक रसायनों का उपयोग किया जाता है। इन रसायनों का रेजीडुअल इफेक्ट (अवशेष प्रभाव) काफी लम्बे समय तक कायम रहता है। यदि खाद्य उत्पादों को सावधानी से उपयोग न किया गया तो स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचना तय है।

जहर से कम नहीं है प्लास्टिक कचरा (Poison of plastic waste)


हमारे यहाँ यह समस्या खासकर इसलिये और भयावह शक्ल अख्तियार कर चुकी है क्योंकि देश में जारी स्वच्छता अभियान के बावजूद प्लास्टिक युक्त कचरे से क्या गाँव, क्या कस्बा, क्या नगर-महानगर, यहाँ तक कि इससे देश की राजधानी तक अछूती नहीं है। इस मामले में देश की राजधानी की हालत और बदतर है। असलियत में यहाँ जगह-जगह प्लस्टिक बैग बिखरे पड़े रहते हैं। यहाँ इसलिये इस खतरे को किसी भी कीमत पर दरगुजर नहीं किया जा सकता।

लखनऊ के बीकेटी से निकली रेठ नदी का पानी जानलेवा (Reth River's Water Became Black)

Author: 
आशीष तिवारी

बाराबंकी के पास कुछ इस कदर गन्दी हो चुकी है रेठ नदीबाराबंकी के पास कुछ इस कदर गन्दी हो चुकी है रेठ नदीलखनऊ के बक्शी का तालाब से निकली रेठ नदी का पानी जलजीव व मनुष्य के लिये घातक है। इस बात का खुलासा नदी के पानी के कुछ दिन पहले लिये गए नमूने की जाँच रिपोर्ट में हुआ है। यह नमूना कुर्सी थाना के अगासड़ में संचालित हो रहे यांत्रिक स्लाटर हाउस अमरून फूड प्रोडक्ट प्राइवेट लिमिटेड से करीब तीन सौ मीटर की दूरी पर लिया गया था। यह नदी जिले से गुजरे वाली गोमती नदी में समाहित हो जाती है। हैरानी की बात तो यह है कि जिला प्रशासन ने नदी के पानी के शुद्धिकरण व उसकी वजहों तक जाकर रोकने के बजाय पूरी रिपोर्ट शासन को भेजकर चुप्पी साध ली है। अब इसको लेकर लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। क्योंकि यह एक ऐसी नदी है जो बाराबंकी की पहचान के तौर पर जानी जाती है।

इलाके के लोगों का कहना है कि चूँकि इस नदी की लम्बाई ज्यादा नहीं है ऐसे में अगर प्रशासन चाहे तो इस नदी को बचाने के लिये बेहतर प्रयास कर सकती है। लेकिन न तो प्रशासन की ओर से कुछ हो रहा है और न ही स्थानीय नेताओं की ओर से। जल संरक्षण को लेकर काम करने वालों ने जरूर नदी के प्रदूषित हो रहे पानी और खो रही नदी के अस्तित्व पर आगे आने की बात कहीं लेकिन अभी तक उसका कोई खास असर नहीं दिखा।

क्या कहा गया है रिपोर्ट में