रास्ते का पत्थर - किस्मत ने हमें बना दिया

Author: 
धीरज मिश्रा
Source: 
प्रयुक्ति, 01 अक्टूबर, 2017

1414 में मुगल शासक गयासुद्दीन तुगलक यहाँ रहा करते थे। आज इस धरोहर की एक दीवार विदेशी पर्यटक के लिये पर्यटन स्थल बन चुकी है। वहीं इसके पीछे पहाड़ियों पर बसा है तुगलकाबाद गाँव, जिसने दिल्ली की राजनीति में तीन विधायक व एक सांसद दिये हैं। रामवीर सिंह बिधूड़ी से लेकर रामसिंह बिधूड़ी व मौजूदा विधायक सही राम इसी गाँव से हैं। गाँव से तीन बड़े राजनेता होने के बावजूद ग्रामीणों को पीने का पानी नहीं मिलना गम्भीर सवाल खड़े कर रहा है। सांसद ग्राम योजना के तहत दक्षिणी दिल्ली से सांसद रमेश बिधूड़ी ने भाटी गाँव गोद लिया, लेकिन सांसद को अपने गाँव में पानी की समस्या दिखाई नहीं देती। आम आदमी पार्टी से विधायक सही राम, जिनकी पार्टी लोगों को फ्री में पानी पिलाने का वादा कर रही थी, लेकिन विधायक के क्षेत्र में आने वाले गाँव में लोगों को फ्री में पानी तो दूर पीने लायक भी नहीं मिलता है।

जल संसाधन संरक्षण एवं विकास

Author: 
कुबेर सिंह गुरुपंच
Source: 
पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (मध्य प्रदेश) 492010, शोध-प्रबंध 1999

जल एक बहुमूल्य संसाधन है। यह कहीं विकास का तो कहीं विनाश का कारक बनता है। जनसंख्या वृद्धि एवं भावी आवश्यकता को देखते हुए जल के एक-एक बूँद की उपयोगिता बढ़ गयी है। अत: जनसंख्या दबाव तथा आवश्यकतानुसार जल संसाधन का उचित उपयोग करने का योजनानुसार लक्ष्य रखा गया है। जल संरक्षण एवं विकास वर्षा की बूँद का पृथ्वी पर गिरने के साथ ही करना चाहिए। इस हेतु नदी मार्गों पर बांधों एवं जलाशयों का निर्माण करना होगा ताकि भविष्य में हमें पीने को शुद्ध पेयजल, सिंचाई, मत्स्यपालन एवं औद्योगिक कार्यों हेतु जल उपलब्ध हो सके। इसके साथ ही बाढ़ों से मुक्ति मिल सके एवं कम वर्षा, नीचे जल स्तर, सूखा ग्रस्त एवं अकालग्रस्त क्षेत्रों में नहरों आदि में जल की पूर्ति हो सके।

जल संसाधन की वर्तमान समस्याएँ :


जल का प्रधान एवं महत्त्वपूर्ण स्रोत मानसूनी वर्षा है। ऊपरी महानदी बेसिन में मानसूनी से वर्षा होती है। इस कारण वर्षा की अनियमितता, अनिश्चितता एवं असमान वितरण पाई जाती है। इस असमानता को दूर करने के लिये बेसिन में जल संसाधन संरक्षण की आवश्यकता है।

जल संरक्षण :


जल एक प्राकृतिक उपहार है, जिसका विवेकपूर्ण उपयोग किया जाना चाहिए। ऊपरी महानदी बेसिन में जल का मुख्य स्रोत सतही एवं भूमिगत जल है। सतही जल में नदियाँ, नहरें एवं जलाशय है जबकि भूमिगत जल में कुआँ एवं नलकूप प्रमुख है। इन जल संग्राहकों से जल संग्रह कर 96.99 प्रतिशत भाग में सिंचाई किया जाता है एवं शेष 3.01 प्रतिशत जल का उपयोग औद्योगिक एवं अन्य कार्यों हेतु होता है।

पोल्ट्री फार्मिंग में एंटीबायोटिक - खतरे ही खतरे (Antibiotic in poultry farming is dangerous)

Author: 
प्रियंका त्रिपाठी, रैना हासन, श्रेया वर्मा, अमित खुराना, मौना नागराजू, राजेश्वरी सिन्हा
Source: 
डाउन टू अर्थ, सितम्बर 2017

सीएसई के शोध में न सिर्फ पोल्ट्री फार्म के अपशिष्ट में एबीआर बैक्टीरिया की भारी मात्रा पाई गई बल्कि फार्म की मिट्टी एवं उसके आस-पास की कृषि भूमि में भी ऐसा ही देखने को मिला। ई. कोलाई के 62 नमूने मल्टी ड्रग रजिस्टेंट थे। हर छठा ई कोलाई नमूना परीक्षण के लिये प्रयोग में लाये गए 13 में से 12 एंटीबायोटिक प्रतिरोधी था। यहाँ तक कि दो ई कोलाई के नमूनों में 13 एंटीबायोटिक के विरुद्ध प्रतिरोधी क्षमता थी। ठीक इसी प्रकार, के निमोनिये के 92 प्रतिशत नमूने मल्टी ड्रग रजिस्टेंट पाये गए। हरियाणा के कावी गाँव के किसान चांद सिंह कहते हैं कि वह नियमित रूप से मुर्गियों को एनरोसिन और कोलिस्टिन नामक एंटीबायोटिक्स देते हैं। कावी से करीब 150 किलोमीटर दूर सांपका गाँव के एक अन्य किसान रामचंदर भी बताते हैं कि वह सिप्रोफ्लोक्सिसिन और एनरोफ्लोक्सिसिन एंटीबायोटिक का इस्तेमाल करते हैं। बिना रोकटोक एंटीबायोटिक के इस्तेमाल से एंटीबायोटिक रजिस्टेंट (एबीआर) बैक्टीरिया का उभार हो रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह बैक्टीरिया एंटीबायोटिक के इस्तेमाल पर मरता नहीं है यानी बीमारी का इलाज नहीं हो पाता। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) का ताजा अध्ययन बताता है कि पोल्ट्री फार्मों में उच्च स्तरीय एबीआर पाई गई है।

प्लास्टिक उपयोग की सनक (Plastic-Use Mania)

Author: 
राकेश कलशियान
Source: 
डाउन टू अर्थ, सितम्बर 2017

वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक के गम्भीर खतरे बताए हैं फिर भी हम इस पर निर्भर होते जा रहे हैं। क्या इस खतरनाक लगाव से बचने का कोई उपाय है?

हम प्लास्टिक की एक कृत्रिम दुनिया में रह रहे हैं। हम इसे उस वक्त गलत मानते हैं जब खुले सीवरों, भरावक्षेत्र, नदी या समुद्र के तटों पर इसका ढेर देखते हैं। इसका एक दर्दनाक पहलू भी है। यह पहलू तस्वीरों और वीडियो के माध्यम उस वक्त दिखाई देता है जब हम किसी गरीब को खतरनाक परिस्थितियों में प्लास्टिक का कूड़ा बीनते देखते हैं। सबसे चिन्ता की बात यह है कि इसके सेहत के लिये खतरनाक और नुकसानदेह नतीजों को देखते हुए भी हम इसे बर्दाश्त कर रहे हैं। संरक्षण भी दे रहे हैं। स्टेला मैककार्टनी इंग्लिश फैशन डिजाइनर हैं जो पशु अधिकारों के समर्थन के लिये जानी जाती हैं। वह फर या चमड़े से बचने की सलाह देती हैं। जून में उन्होंने फैशन उत्पादों की एक ऐसी शृंखला शुरू की है जिसमें समुद्र से निकाले गए प्लास्टिक के कचरे का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि नुकसान पहुँचानी वाली वस्तु को विलासिता से युक्त किया जा रहा है। क्या ऐसा नहीं किया जा सकता?

जलकुंभी पानी से क्रोमियम निकालेगी (Hyacinth can help remove toxic chromium from polluted water )

Author: 
Monika Kundu Srivastava
Source: 
India Science Wire, 4 September 2017

पानी से क्रोमियम हटाएगी जलकुंभी



. देश के भूजल में बढ़ता प्रदूषण न सिर्फ चिंता का विषय है बल्कि यह बड़ी समस्या बन गया है। क्रोमियम व अन्य हानिकारक तत्वों युक्त पानी के सेवन से हजारों लोग बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। भारत और इथोपियों के वैज्ञानिकों ने जलकुंभी की मदद से गंदे पानी से क्रोमियम-6 जैसे हानिकारक भारी तत्वों को अलग करने की नई विधि विकसित की है। वैज्ञानिकों का दावा है कि प्रदूषित जल को साफ करने का यह तरीका मौजूदा तरीकों से बेहद सस्ता और सुरक्षित है।

वैज्ञानिकों ने अध्ययन के दौरान जलकुंभी को पाउडर के रूप में पानी में मिलाया और उसे प्रदूषित जल (क्रोमियम-6 जैसे हानिकारक तत्व वाले) में डाला। तकरीबन दो मिनट के बाद पाउडर वाले पानी को अलग कर दिया। इसके बाद प्रदूषित पानी में क्रोमियम-6 की स्थिति को जाँचा। शोध दल की मुखिया और दिल्ली की इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय की डॉक्टर नीतू रानी के मुताबिक, पानी में क्रोमियम-6 की मात्रा में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई।

उन्होंने कहा, जलकुंभी ने पानी से हानिकारक तत्वों को अलग करने की अपनी क्षमता का प्रयोग किया और जहरीले तत्वों को अपने में समाहित कर लिया। पाउडर वाले पानी को बाहर निकाल लेने पर प्रदूषित पानी में क्रोमियम की मात्रा स्वत: ही कम हो गई। उन्होंने कहा, प्रति लीटर प्रदूषित पानी में 0.04 ग्राम जलकुंभी के पाउडर को मिला दें और उसे तीस मिनट तक रखा रहने दें तो जल से क्रोमियम-6 के हानिकारक तत्वों को हटाया जा सकता है।

पानी जाँच की कीमत 1000 रुपए, जाँच करवाना मुश्किल, दूषित जल पीना मजबूरी

Source: 
राजस्थान पत्रिका, 03 सितम्बर 2017

. जयपुर। प्रदेश में अशुद्ध और दूषित पानी की आपूर्ति से जहाँ आमजन की सेहत खतरे में है। वहीं दूसरी ओर आलम यह है कि जनता चाह कर भी अपने इस्तेमाल वाले पानी के नमूनों की जाँच आसानी से नहीं करवा सकती। प्रदेश में चिकित्सा एवं जन स्वास्थ्य अभियाँत्रिकी विभाग की ओर से लिये गये करीब सवा लाख जाँच नमूनों में से 19 हजार नमूनों के फेल मिलने के बाद राजस्थान पत्रिका ने जाँच करवाने की सुविधा की जानकारी ली तो अधिकांश स्थानों पर आमजन के लिये सरल व सुगम जाँच सुविधा नहीं मिली।

कुछ जिलों में सरकारी दरों पर जिला मुख्यालय पर जाँच की सुविधा है। इसमें जलदाय विभाग की ओर से दिये गये नमूने फ्री में जाँचे जाते हैं। इसके अलावा किसी और के द्वारा नमूना देने पर रसायनों और बैक्टीरिया की जाँच में एक हजार रुपए तक लग जाते हैं। राजधानी में कुछ प्रयोगशालाओं में इस तरह की जाँच सुविधा है। जाँच रिपोर्ट मिलने में सामान्यतया करीब 24 घंटे से सात दिन की समय लगता है।

बढ़ रहा मरीजों का आंकड़ा


2-3 हजार मरीज रोजाना जयपुर में जल-जनित बीमारियों के आते हैं। 50 डिस्पेंसरियाँ और 10 बड़े सरकारी अस्पताल हैं जयपुर जिले में, जिनका प्रतिदिन आउटडोर करीब 20 हजार मरीजों का है। 60,000 मरीज हर महीने जयपुर जिले में जलजनित बीमारियों के होते हैं। 60 फीसद बीमारियों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर दूषित पानी ही कारण होता है।

जाँच की प्रक्रिया


प्राइवेट नमूना लेने पर नमूना लेने वाले और लैब टैक्नीशियन के हस्ताक्षर लिये जाते हैं। करीब सात दिन में रिपोर्ट आ जाती है।

स्वास्थ्य विभाग ने जारी किया था अलर्ट

देहरादून का पानी हुआ जहरीला


. वैसे तो बरसात में पानी गंदला ही आता है, किन्तु सरकार का दावा रहता है कि वे लोगों को शुद्ध पेयजल मुहैया कराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी। ऐसा शायद राजनीतिक बयानबाजी हो सकती है। मगर जल संस्थान और स्पैक्स संस्था पानी की शुद्धता को लेकर आमने-सामने जरूर है। कुछ जगहों पर जरूर सरकारी स्तर से शुद्ध पेयजल की कसरत पूरी होती होगी तो कुछ जगहों पर कागजी खाना-पूर्ती करके शुद्ध पेयजल की इतिश्री कर दी जाती होगी। यह कोई आरोप नहीं है बल्कि लोक समाज में पानी की समस्या को लेकर कटुसत्य है। पर बात जब राजधानी की हो तो यह हजम नहीं होती, की जहाँ का शुद्ध पेयजल अब 32 गुना अशुद्ध हो चुका है। यह तब हुआ जब देहरादून में राजधानी का कामकाज आरम्भ हुआ है। इधर जल संस्थान स्पैक्स संस्था के सैंपलों को अखबारी बयानबाजी कह रहा है तो वहीं स्पैक्स संस्था राजधानी देहरादून के पानी को पीने योग्य नहीं बजाय जहरीला बता रही है। पानी गंदला है, यह तो सर्वमान्य है, बीमारियाँ भी तेजी से बढ़ रही है, यह भी जगजाहिर है। पर शुद्ध पानी कहाँ मिलेगा, बीमारियाँ कब कम होगी, ये सवाल आज भी बरकरार है।

नॉन-इलेक्ट्रिक वाटर फिल्टर - सभी ब्रांडों में शुद्धता की गारंटी नहीं (Non-electric water filter - Not guaranteed accuracy in all brands)

Author: 
कंस्यूमर वॉयस रिपोर्टर
Source: 
कंस्यूमर वॉयस, मई 2014

किसी वाटर फिल्टर से मतलब है कि वह बैक्टीरिया, क्लोराइड, भारी तत्व (जैसे, पारा, ताँबा और सीसा), कीटनाशक पदार्थ और इससे जुड़े सुरक्षा सम्बन्धी सभी मुद्दों समेत पेयजल में पाये जाने वाले अधिकांश सामान्य अशुद्धियों को दूर कर दे। यहाँ पर किसी उपयुक्त वाटर फिल्टर के चयन के महत्त्व और उससे जुड़े सुरक्षा सम्बन्धी विभिन्न मामलों को बढ़ा-चढ़ाकर कहने का कोई कारण नहीं है। आरम्भ में कम लागत, तुलनात्मक रूप से अच्छा प्रदर्शन और रख-रखाव सम्बन्धी कुल सुविधाओं ने सुनिश्चित किया है कि स्टोरेज टाइप नॉन-इलेक्ट्रिक रसायन आधारित वाटर फिल्टर आउटपुट लागत, रिफिल/कार्टरिज की कीमत और वार्षिक रख-रखाव सहायता जैसे मामलों में एक लोकप्रिय विकल्प है। ‘कंस्यूमर वॉयस’ के लिये यह समय आज के घरों में इन अहम चीजों की लागत और उपयोगिता का मूल्यांकन करना था।

आर्सेनिक से प्रतिरक्षा क्षमता कम होने का भारतीय वैज्ञानिकों ने पता लगाया (Indian scientists find how arsenic reduces immunity)

Author: 
मोनिका कुन्दू श्रीवास्तव
Source: 
दैनिक जागरण, 18 अगस्त, 2017

. भारतीय वैज्ञानिकों के एक समूह ने यह पता लगाया है कि आर्सेनिक के संपर्क में आने से प्रतिरक्षा क्षमता किस तरह कम हो जाती है।

थाइमस ग्रंथि के विकास रोकने में आर्सेनिक की भूमिका जगजाहिर है। थाइमस ग्रंथि ही टी लिम्फोसाइट्स या टी कोशिकाओं के जरिए प्रतिरक्षा को विकसित करने में सहायता करती है। लखनऊ स्थित ‘इंडियन इंस्टीट्यूट अॉफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (आइआइटीआर)’ के वैज्ञानिकों द्वारा किये गये एक नये अध्ययन ने इसके पीछे के तंत्र को समझाया है। इसे यह पता चल सकेगा कि आर्सेनिक के संपर्क में आने वाले लोग तपेदिक (टीबी) जैसे संक्रमण के लिये अतिसंवेदनशील क्यों हो जाते हैं।

शोधकर्ताओं ने आर्सेनिक के संपर्क के प्रभाव की जाँच की और बताया कि किस तरह टी कोशिकाओं को विशेष कोशिकाओं (सीडी 4+ और सीडी 8+) और नियामक टी-कोशिकाओं की भूमिका में बदल दिया गया। सीडी 4+ कोशिका सहायक टी कोशिकाओं पर पाई जाती है। ये वायरल संक्रमण से लड़ने के लिये शरीर को निर्देशित करती हैं, जबकि सीडी 8 लड़ाकू टी कोशिकाओं पर पाई जाती हैं जो संक्रमित कोशिकाओं को मारकर शरीर की रक्षा करती हैं।