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भारत के कुछ राज्यों के भूजल में उच्च आर्सेनिक की मौजूदगी

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wrm.nic.in
असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों में आर्सेनिक प्रदूषण काफी बड़े स्तर तक प्रभावित कर रहा है।
अटैचमेंट में देखें कि किस राज्य के किस ब्लॉक में यह प्रदूषण कहां तक फैला है।

उत्तर प्रदेश, असम और छत्तीसगढ़ राज्यों के मामले में आर्सेनिक प्रदूषण की पहचान केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड और राज्य भूमि जल विभागों के निष्कर्ष के आधार पर की गई है ।

स्रोत: केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड और आर्सेनिक कार्य दल (मार्च 2008)

दिल्ली के पोखरे नहीं रहे मछलियों के रहने लायक

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बिजनेस भास्कर
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के जलाशय इतने प्रदूषित हो चुके हैं कि ये जलचर जीवों के जीवन जीने लायक नहीं रह गए हैं। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार 96 जलाशयों में से तकरीबन 70 फीसदी में जलचर जीवों का बच पाना मुश्किल है। डीपीसीसी द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार यह पाया गया कि 42 जलाशय सूख गए थे। अन्य 24 जलाशयों में सीवेज के कारण से जाम हो गया था और उसमें मछली सहित अन्य जलचर जीवों के जीवित रहने लायक स्थिति नहीं थी।
इस खबर के स्रोत का लिंक: 

http://www.businessbhaskar.com/

हम पी रहे है मीठा जहर

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राजीव कुमार, चरखा फीचर्स

गंगा के मैदानी इलाकों में बसा गंगाजल को अमृत मानने बाला समाज जल में व्याप्त इन हानिकारक तत्वों को लेकर बेहद हताश और चिंतित है। गंगा बेसिन के भूगर्भ में 60 से 200 मीटर तक आर्सेनिक की मात्रा थोडी कम है और 220 मीटर के बाद आर्सेनिक की मात्रा सबसे कम पायी जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार गंगा के किनारे बसे पटना के हल्दीछपरा गांव में आर्सेनिक की मात्रा 1.8 एमजी/एल है। वैशाली के बिदुपूर में विशेषज्ञों ने पानी की जांच की तो नदी से पांच किमी के दायरे के गांवों में पेयजल में आर्सेनिक की मात्रा देखकर वे दंग रह गये। हैंडपंप से प्राप्त जल में आर्सेनिक की मात्रा 7.5 एमजी/एल थी ।

तटवर्तीय मैदानी इलाकों में बसे लोगों के लिए गंगा जीवनरेखा रही है। गंगा ने इलाकों की मिट्टी को सींचकर उपजाऊ बनाया। इन इलाकों में कृषक बस्तियां बसीं। धान की खेती आरंभ हुई। गंगा घाटी और छोटानागपुर पठार के पूर्वी किनारे पर धान उत्पादक गांव बसे। बिहार के 85 प्रतिशत हिस्सों को गंगा दो (1.उत्तरी एवं 2. दक्षिणी) हिस्सों में बांटती है। बिहार के चौसा,(बक्सर) में प्रवेश करने वाली गंगा 12 जिलों के 52 प्रखंडों के गांवो से होकर चार सौ किमी की दूरी तय करती है। गंगा के दोनों किनारों पर बसे गांवों के लोग पेयजल एवं कृषि कार्यों में भूमिगत जल का उपयोग करते है।


गंगा बेसिन में 60 मीटर गहराई तक जल आर्सेनिक से पूरी तरह प्रदूषित हो चुका है। गांव के लोग इसी जल को खेती के काम में भी लाते है जिससे उनके शरीर में भोजन के द्वारा आर्सेनिक की मात्रा शरीर में प्रवेश कर जाती है।

भटिण्डा के पानी में यूरेनियम, रेडियम और रेडॉन

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चन्दर प्रकाश / खेती विरासत
उच्च रेडियोएक्टीविटी के परिणामउच्च रेडियोएक्टीविटी के परिणामपंजाब के मालवा इलाके के भटिण्डा जिले और इसके आसपास का इलाका "कॉटन बेल्ट" के रूप में जाना जाता है, तथा राज्य के उर्वरक और कीटनाशकों की कुल खपत का 80% प्रतिशत इसी क्षेत्र में जाता है। पिछले कुछ वर्षों से इस इलाके में कैंसर से होने वाली मौतों तथा अत्यधिक कृषि ॠण के कारण किसानों की आत्महत्या के मामले सामने आते रहे हैं। इस इलाके के लगभग 93% किसान औसतन प्रत्येक 2.85 लाख रुपये के कर्ज़ तले दबे हुए हैं। पहले किये गये अध्ययनों से अनुमान लगाया गया था कि क्षेत्र में बढ़ते कैंसर की वजह बेत

जहरीला हुआ उन्नाव का भूजल

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Jansatta, 12 August 2009
उन्नाव जिले में भूगर्भीय जल स्तर का जायजा लेने आई टीम को जिले की 954 ग्राम पंचायतो में से 618 पंचायतों का स्तर अनुपयोगी लगा। रिपोर्ट में बताया गया है कि सफीपुर विकास खंड के 101, गंजमुरादाबाद के 8, फतेहपुर चैरासी के 24, बांगरमऊ के 39, हसनगंज के 76, मियागंज के 131, औरास के 116, सिकंदरपुर सरोसी के 64, नवाबगंज के 149, बिछिया के 45, सिकंदरपुर कर्ण के 29, हिलौली के 123, असोहा के 48, पुरवा के 116, सुमेरपुर के 112 एवं बीघापुर विकासखंड के 65 मजरो का भूगर्भीय जल पूरी तरह प्रभावित हो चुका है। उत्तर प्रदेश में गंगा नदी के तट पर बसा हुआ एक जिला उन्नाव का भूमिगत जल अब पीने योग्य नहीं रहा। गंगा के तट पर स्थित मैदानी इलाका होने के कारण यहां की जमीन काफी उपजाऊ मानी जाती है। सन 2001 की जनगणना के अनुसार कुल 22,00,397 की आबादी वाले जिले में चमड़ा उद्योग सबसे बड़ा एवं स्थापित उद्योग है। कुल 4,558 वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले जिले में चमड़ा उद्योग के बढ़ते संजाल से भूगर्भीय जल सतह के साथ साथ कृषि भूमि व जन स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है। इसके बावजूद भी प्रशासन इनकी असंयमित कार्यप्रणाली पर नियंत्रण करने के बजाय इन्हें ही बढ़ावा दे रहा है। यह बात जिले के विभिन्न क्षेत्रों से मृदा परीक्षणों के परिणाम से उजागर हुई है। यह परीक्षण भारत सरकार की सहकारी संस्था इफको (इंडियन फारमर्स फर्टिलाजर्स कोआपरेटिव लिमिटेड) की प्रयोगशाला में किया गया है। जिले के विभिन्न क्षेत्रों से आए 180 नमूनों से यह निष्कर्ष सामने आए हैं कि जिले की भूमि की ऊपरी सतह में क्षरीयता के साथ-साथ आर्सेनिक कार्बन व क्रोमियम जैसे घातक तत्व जरूरत से ज्यादा है।

अम्बाला का पानी

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bhaskar.com
अम्बाला. पानी मानव जीवन को प्रकृति का बड़ा उपहार है। प्रकृति के इस उपहार का जिले के कुछ एरिया में स्वरूप बिगड़ रहा है। इसका बिगड़ता स्वरूप दांतों की समस्याओं, हड्डियों की कमजोरी से लेकर कई समस्याओं का कारण बन सकता है। हाल में रिसर्च वर्क के दौरान केमिस्ट्री लेक्चर्स द्वारा अम्बाला व आसपास के पानी सैंपल जांचे गए, जो पानी इस्तेमाल को लेकर चौकन्ना होने का संकेत दे रहे हैं।

भूजल पर अब क्रोमियम का भी कहर

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7 August09/ mahanagartimes.net
दिल्ली और वाराणसी में भी घुसपैठ कर चुका है क्रोमियम
नई दिल्ली। गंगा और यमुना के तटीय क्षेत्रों के भूजल में आर्सेनिक व फ्लोराइड के बाद अब क्रोमियम ने भी घुसपैठ कर दी है। पश्चिम बंगाल के बाद अब दिल्ली व वाराणसी में पेयजल में तय मात्रा से ज्यादा क्रोमियम मिलने लगा है। क्रोमियम युक्त पानी के प्रयोग से पेट की गड़बड़ी से लेकर कैंसर तक का खतरा है। आर्सेनिक व फ्लोराइड के ज्यादा इस्तेमाल से विभिन्न बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए अब क्रोमियम ने खतरे की घंटी बजा दी है। तय मानदंड से ज्यादा क्रोमियम मिला है

मेवात के गांवों का पानी हुआ जहरीला

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भास्कर न्यूज June 22, 2009
नूंह. मेवात के लोगों की प्यास बुझाने और उन्हें शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के सभी सरकारी प्रयास बेमानी साबित हो रहे हैं। सरकारी आंकड़े ही इस बात के गवाह हैं कि भीषण जल संकट से जूझ रहे मेवात को इससे निजात मिलने की संभावनाएं दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही है। आलम यह है कि मेवात के पांच खंडों के 423 गांवों में से सिर्फ 57 गांव ही ऐसे हैं, जहां अच्छी गुणवत्ता का पीने योग्य भू-जल उपलब्ध है।

गंगाजल अमृत नहीं अब आर्सेनिक

मदन जैड़ा/ हिन्दुस्तान
नई दिल्ली, 15 जनवरी।
गंगा का पानी कभी सबसे स्वच्छ होता था इसलिए वेदों-पुराणों तक में कहा गया है-गंगा तेरा पानी अमृत। मान्यता थी कि इसे पीकर या इसमें डुबकी लगाकर बीमारियां दूर हो जाती हैं। लेकिन अब स्थिति उलट है। गंगा के इर्द-गिर्द बढ़ते शहरीकरण, उद्योग धंधों से निकलने वाले कचरे, प्रदूषणकारी तत्वों के बढ़ने के कारण गंगाजल में आर्सेनिक का जहर घुल गया है।