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भूजल विषाक्तता और फिल्टर (Groundwater toxicity and Filter)

Author: 
डॉ. ओम प्रभात अग्रवाल
Source: 
आविष्कार, जनवरी 2016

आर्सेनिक एक भयंकर विष है जिसकी जल में अनुमत मात्रा भारतीय मानक के अनुसार 0.05 मिलिग्राम प्रति लीटर मानी गई है यद्यपि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह और भी कम, 0.01 मिलिग्राम होनी चाहिए। सामान्यतः आर्सेनिक अपने जाने-माने यौगिक संखिया के रूप में ही उपस्थित होता है। अत्यन्त सूक्ष्म मात्रा में लगातार ग्रहण किये जाने पर यह मुख्यतः बालों और नाखूनों में एकत्र होने लगता है। बाल झड़ने लगते हैं और हाथ पैरों में पीड़ा रहने लग जाती है। वैसे इसका एकत्रीकरण हड्डियों तथा यकृत में भी होता है।

देश में पर्यावरण की स्थिति और चुनौतियाँ

Author: 
मनोज कुमार झा

हमने भारत की लगभग सभी नदियों को प्रदूषित कर चुके हैं। अब हालात धीरे-धीरे और भी गम्भीर होते जाएँगे। हमारी नदियों से ही धरती के पेट का पानी का भरण होता है। जिस दिन हानिकारक जीवाणु धरती के पेट के पानी को प्रदूषित कर दिया उस दिन मानव सभ्यता का अन्त प्रारम्भ हो जाएगा। दुनिया भर के प्रदूषित नदियों का पानी समुद्र में मिल रहा है। हमारा आकूत कचरा समुद्र में जमा हो रहा है। समुद्री जीव धीरे-धीरे नष्ट होते जा रहे हैं। प्रकृति की सबसे अनुपम कृति यानि मानव जिसके हाथ प्रकृति ने पृथ्वी को सौंप कर निश्चिंत होना चाहती थी। वह इससे अधिक कुछ कर भी नहीं सकती थी। लेकिन इसी मानव ने प्रकृति के सारी बनावट के आगे संकट पैदा कर दिया है। इस संकट से उबरने के लिये प्रकृति दिन-रात तत्परता से लगी है लेकिन कुछ भी सूत्र उसके हाथ आने से पहले मानव नए-नए संकट पैदा कर रहा है।

आज आधुनिकता के केन्द्र में मनुष्य है। मनुष्य को सिर्फ धन व प्रतिष्ठा अर्जित करना ही मुख्य चिन्ता रही है। धन व प्रतिष्ठा ने दो देशों के बीच से लेकर दो परिवारों के बीच तक अपना पाँव पसार कर प्रकृति को सर्वनाश की पराकाष्ठा तक पहुँचाने में लगी है। अब तो विकसित देश विकाशील देशों की ओर बड़े ध्यान के टकटकी लगाए देख रही है कि कहीं जो कुछ अपने विकास के लिये उसने किया है वही वह तो नहीं करने जा रहा।

थोड़े ही शब्दों में कहें तो पर्यावरण संकट पृथ्वी को भस्म कर सकती है। केवल भारत ही नहीं विश्व के सभी देश को अपनी विकास की आधुनिक परिभाषा को बदलनी होगी। सभी देशों को अपनी सोच बदलनी होगी। दुनिया भर के कार्य और व्यापार के तौर-तरीके बदलने होंगे।

स्पर्श के लायक भी नहीं रहा यमुना का पानी

Author: 
प्रमोद भार्गव

वर्तमान स्थितियों में प्रदूषण सम्बन्धी तमाम रिपोर्टों के बावजूद यमुना दिल्ली में 25 किलोमीटर और आगरा में 10 किमी लम्बे नालों में तब्दील हो चुकी है। अकेली दिल्ली में अनेक चेतावनियों के बावजूद प्रतिदिन 3296 मिलियन गैलन लीटर गन्दा पानी और औद्योगिक अवशेष विभिन्न नालों से यमुना में उड़ेले जा रहे हैं। करीब 5600 किमी लम्बी सीवर लाइनों से मल-मूत्र बहाया जा रहा है। हालांकि 17 स्थलों पर 30 सीवर ट्रीटमेंट प्लांट क्रियाशील हैं, लेकिन उनकी गन्दे मल को स्वच्छ जल में परिवर्तित करने की दक्षता सन्दिग्ध है। इसे देश और नदियों का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि हमारी जीवनदायी नदियों का पानी अछूत होता जा रहा है। यमुना नदी के पानी की जो ताजा रिपोर्ट आई है, उसके अनुसार नदी जल में अमोनिया की मात्रा इस हद तक बढ़ गई है कि उसे छूना भी स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।

यह रिपोर्ट जल संस्थान आगरा ने दी है। इस पानी में अमोनिया की मात्रा खतरे के स्तर को पार कर चुकी है। इस कारण फरवरी 2016 को दिल्ली के वजीरावाद और चंदावल जल शोधन संयंत्रों को दो दिनों के लिये बन्द भी कर दिया गया था। दरअसल दिल्ली क्षेत्र में यमुना में अमोनिया की मात्रा 1.12 पार्टिकल्स पर मिलियन (पीपीएम) तक पहुँच गई थी, जबकि पानी में अमोनिया की मात्रा शून्य होनी चाहिए।

काली नदी का काला पानी


देश की अन्य प्रदूषण युक्त नदियों के फिर से स्वच्छ होने की उम्मीद जगी थी। लेकिन साल बीत जाने के बाद भी प्रदूषण साफ करने की कोई योजना सफल नहीं हुई। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर काली नदी को कब संजीवनी मिलेगी। केन्द्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, इस नदी के पानी में अत्यधिक मात्रा में सीसा, मैगनीज और लोहा जैसे तत्व घुले हुए हैं। इसमें प्रतिबन्धित कीटनाशक भी काफी मात्रा में घुल चुका है। यही वजह है कि इस नदी के पानी में अब ऑक्सीजन पूरी तरह से खत्म हो गया है।

एसिडयुक्त पानी पीने को मजबूर

हैण्डपम्प से निकलता दूषित जलहैण्डपम्प से निकलता दूषित जलवे लोग केमिकल व एसिडयुक्त पानी पीने को मजबूर हैं। पीला या काला और बदबूदार पानी जिससे हाथ धोने की भी इच्छा न हो, ऐसा पानी उन्हें पीना पड़ रहा है। यही पानी नालों से होते हुए क्षिप्रा की सहायक नदी नागधम्मन को प्रदूषित करता है और इसका दूषित पानी क्षिप्रा में भी पहुँचता है। इतना ही नहीं यहाँ के माहौल में साँस लेना भी दूभर होता जा रहा है। आसपास की हवा में प्रदूषण से तीव्र दुर्गन्ध आती रहती है। इन लोगों ने इसकी शिकायत जिला अधिकारियों से भी की है लेकिन अब भी हालात में कोई सुधार नहीं हुआ है।

मध्य प्रदेश के देवास शहर में औद्योगिक इलाके के पास रहने वाली करीब आधा दर्जन बस्तियों में यह समस्या है। यहाँ पाँच हजार से ज्यादा लोग बीते कई महीनों से इस त्रासदी का सामना कर रहे हैं। लगातार शिकायतें करने के बाद भी अब तक इनकी परेशानियों का कोई हल नहीं निकला है। इन्दौर रोड औद्योगिक क्षेत्र के पास की बस्तियों बावड़िया, सन सिटी, बीराखेड़ी, बिंजाना, इन्दिरा नगर सहित आसपास के कुछ इलाकों के लोगों के पास पीने के पानी का अन्यत्र कोई वैकल्पिक संसाधन भी नहीं है। लिहाजा इन्हें मजबूरी में ही सही, दूषित पानी ही पीने को मजबूर होना पड़ रहा है।

नदी की जमीन पर बसा अवैध मोहल्ला


नदी जिस दिन अपनी जमीन खाली कराने को आगे आ जाएगी, वह दिन यहाँ बसे 1700 से अधिक परिवारों के लिये भारी होगा। इसलिये इस बात पर वहाँ रहने वालों को भी विचार करना चाहिए। लेकिन साथ-साथ इस सवाल का जवाब जिला प्रशासन को भी देना होगा कि जब यह जमीन टांगरी नदी की थी फिर उस समय अवैध निर्माण पर रोक क्यों नहीं लगाई गई, जब नदी के किनारे काॅलोनियों का निर्माण हो रहा था। कुछ महीने पहले की बात है। बरसात के मौसम में टांगरी नदी के आस-पास बसे डेढ़ हजार परिवारों की जान साँसत में फँसी थी। जब बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। वहाँ बसे लोग सरकार पर आरोप लगा रहे थे कि बार-बार उन्हें उजड़ना पड़ता है और सरकार उनकी तरफ ध्यान नहीं देती। टांगरी नदी हरियाणा अन्तर्गत अम्बाला छावनी से होकर गुजरती है।

यह नदी अम्बाला छावनी के दूसरे छोर पर बसे घसितपुर तक जाती है। यहाँ लोग लगभग बीस सालों से बसे है। यहाँ अवैध काॅलोनिया नदी की जमीन पर बस गई हैं। जिन घरों में पहाड़ से आने वाला पानी बरसात के दिनों में अन्दर तक चला जाता है। इन महीनों में छतों पर भी कई बार यहाँ रहने वालों को खाना बनाना पड़ता है क्योंकि पानी घर के अन्दर तक घुसा रहता है।

एक तरफ यहाँ रहने वाले अपनी गलियों की सड़क दिखा रहे हैं, जमीन के रजिस्ट्रेशन के कागज दिखा रहे हैं और बिजली का कनेक्शन भी और पूछ रहे हैं कि जब यह सब हमें मिला है फिर हमारी काॅलोनी अवैध कैसे है? दूसरी तरफ जिला प्रशासन इन घरों को अवैध मानता है और उनके पास भी सरकारी दस्तावेज हैं लेकिन अवैध काॅलोनियों में रहने वालों के सवाल के जवाब नहीं।

भारी पड़ सकती है प्रदूषण के प्रति कोताही


वायु प्रदूषणवायु प्रदूषणजल, वायु, जमीन पर लगातार प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है। इससे भी गम्भीर बात यह है कि हम सब इसके खतरों के प्रति सजग नहीं हैं। सब कुछ जानते हुए भी हम लापरवाह बने हुए हैं। इस लापरवाही के भीषण परिणाम हमारे सामने है। यदि हम समय पर नहीं सम्भले तो यह कोताही और भी घातक साबित हो सकती है। 23 नवम्बर को सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली में पटाखे बिक्री पर प्रतिबन्ध लगाकर एक बार फिर लोगों का ध्यान दिल्ली के बढ़ते वायु प्रदूषण स्तर की और खींचने का कार्य किया है।

असल में तो यह कार्य प्रशासन और कार्य पालिका को करना चाहिए था। वोट राजनीति के चलते थोड़े कड़वे किन्तु जरूरी निर्णय लेने से सरकारें कन्नी काटती रहती हैं। ऐसे में न्यायालय को प्रशासनिक भूमिका में आना पड़ता है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था में सीएनजी का प्रयोग सुनिश्चित करते समय भी न्यायालय की सख्ती की वजह से ही यह सम्भव हो सका था। उससे दिल्ली की वायु गुणवत्ता में निश्चय ही सुधार हुआ था। किन्तु अब फिर दिल्ली में वायु गुणवत्ता का स्तर खतरनाक स्तर तक गिर गया है।

30 अक्टूबर से 2 नवम्बर के बीच वायु गुणवत्ता इंडेक्स 201 से 297 के बीच रहा। यह बहुत खतरनाक स्तर है। यह समस्या केवल दिल्ली तक ही सीमित नहीं है, पूरे देश की स्थिति ही खराब होती जा रही है। बढ़ती वाहनों की संख्या, फॉसिल ईंधनों से ऊर्जा उत्पादन, ठोस कचरा खुले में जलाया जाना, फसलों के अवशेष खासकर पराली का जलाया जाना वायु प्रदूषण के मुख्य कारण हैं।

भोपाल को न सेहतमन्द पर्यावरण मिला न न्याय


रासायनिक विनाश के लिये अब तक जापान के दो बड़े शहरों हिरोशिमा और नागासाकी को ही याद किया जाता रहा था लेकिन अब इसमें भोपाल का नाम भी जुड़ गया था। हजारों लाशों के मुहाने पर बैठे भोपाल शहर के बाशिन्दों को उम्मीद थी कि त्रासदी के बाद इन मौत के सबक को सरकारें बड़ी गम्भीरता से लेंगी और अब कहीं कोई भोपाल त्रासदी जैसी घटनाएँ नहीं हो पाएँगी। लेकिन तब 9 लाख की आबादी के इस शहर में 6 लाख गैस प्रभावित दर्ज होने के बाद भी आज तक उन्हें कहीं से कोई न्याय नहीं मिला है। 03 दिसम्बर की सुबह भोपाल शहर में हुई गैस त्रासदी के 32 साल पूरे हो जाएँगे। इतना लम्बा वक्त गुजर जाने के बाद भी यहाँ के लोगों को न तो न्याय मिल पाया है और न ही उनकी सेहत के लिये अनुकूल पर्यावरण। यहाँ तक कि साफ पानी और हवा के लिये भी ये लोग बार-बार गुहार लगाकर अब थक चुके हैं। गैस प्रभावित मानते हैं कि कभी कोई गम्भीर जतन नहीं किया गया, उन्हें तब से अब तक सिर्फ-और-सिर्फ छला ही गया है।

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की सुन्दरता इसकी झीलों से है, दूर-दूर तक साफ-स्वच्छ पानी से लबालब झीलों और उसके आसपास चौड़ी सडकों पर शहर को भागते-दौड़ते देखना अच्छा लगता है। झीलों के पानी में अपनी खूबसूरती निहारता यह शहर अलसुबह से देर रात तक धड़कता रहता है। लेकिन इसी शहर के बीचोंबीच बरसों से बन्द पड़ा किसी कंकाल की तरह जंग लगी मशीनों के साथ लंगर डाले जहाज की तरह खड़ा है यूनियन कार्बाइड का कारखाना।

गैस रिसी हवा में पर जमीनी पानी अब भी जहरीला

भोपाल गैस त्रासदी के 32 वर्ष पूरे होने पर विशेष


यूनियन कार्बाइड का कचरा नौनिहालों को अपने कब्जे में ले रहा हैयूनियन कार्बाइड का कचरा नौनिहालों को अपने कब्जे में ले रहा है32 साल का वक्त कोई छोटा नहीं होता, लेकिन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के लिये इन 32 सालों में कुछ नहीं बदला। हजारों लोगों की मौतें, कई लोगों को बाकी बची पूरी जिन्दगी अपाहिज और अन्धा बना देने और उसकी अगली पीढ़ी को भी उस जहरीली गैस की भेंट चढ़ जाने की भयावह त्रासदी के बाद भी हमने उससे अब तक कोई सबक नहीं लिया है। यहाँ की 22 बस्तियों के करीब दस हजार से ज्यादा लोग अब भी साफ पानी तक को मोहताज है।

02-03 दिसम्बर 1984 की काली रात यहाँ मौत का तांडव हुआ था। इस खूबसूरत शहर के बीचोंबीच कीटनाशक बनाने वाले मल्टीनेशनल कारखाने यूनियन कार्बाइड से निकली जानलेवा मिथाइल आइसोसाइनाइट गैस के रिसाव होने से 3000 से ज्यादा लोगों की जाने गईं थीं।