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जलीय पर्यावरण में धात्विक तत्व लेड (||) का खतरनाक स्तर (Dangerous level of element Lead (||) in aquatic environment)

Author: 
डॉ. आचिन्त्य, डॉ. सुरेश कुमार
Source: 
भाभा परमाणु अनुसन्धान केन्द्र के सौजन्य से प्रकाशित

औसत मनुष्य जीवन का दैनिक लेड सन्तुलनशहर के जलीय पर्यावरण को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। यथा, शुद्ध जल जो उपभोक्ता को उनके दैनिक कार्यों हेतु दिया जाता है। दूसरा प्रयुक्त जल, जिसका निस्सारण उपभोक्ता उपभोग के उपरान्त नालियों के रास्ते करते हैं और तीसरा औद्योगिक इकाइयों से निस्सारित जल। इन सभी जलस्रोतों से उत्सर्जित जल अन्तत: शहर के प्रकृतिक जल निकायों से जाकर मिलते हैं। अत: इन स्रोतों में उपस्थित सम्भावित प्रदूषणकारी अवयवों का अध्ययन एवं निराकरण सामयिक है। जैसा कि विदित है, प्रयुक्त जल के प्रदूषण स्तर को जानने के लिये निलम्बित ठोस कण, बी.ओ.डी. (बायलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड) घुलित ऑक्सीजन, पी.एच., भारी धातु आदि अवयवों का निर्धारण किया जाता है। वैसे तो सभी प्रदूषणकारी अवयवों का अपना दुष्प्रभाव है, पर शहरों के जलीय स्रोतों में हाल के दिनों में भारी धातुओं का पाया जाना चिन्ता का विषय है।

हमारे शोध –

पुस्तक भूमिका : जल और प्रदूषण

Source: 
‘जल प्रदूषण’ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 2011

पर्यावरणीय प्रदूषण आज के युग की सबसे बड़ी चुनौती है। बढ़ते औद्योगीकरण के कारण हमारी जीवन शैली में आए परिवर्तनों से पर्यावरण पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। विगत लगभग 150 वर्षों में विश्व भर में हो रहे अनियंत्रित, अनियमित एवं अंधाधुंध विकास के दुष्परिणाम जल और वायु प्रदूषण के रूप में हमारे सामने हैं।

वायु प्रदूषण एक समय था, जब उद्योगों की ऊँची चिमनियों से निकलने वाला धुँआ औद्योगिक क्रांति का प्रतीक समझा जाता था और इसकी उपस्थिति (उद्योग की स्थिति बताकर) जनमानस को राष्ट्र और अर्थव्यवस्था के विकसित होने का अहसास कराती थी। इसी प्रकार कारखानों से निकलने वाला रंगीन या गंदा-मटमैला पानी इस बात का संकेत होता था कि कारखाने में उत्पादन चालू है। वस्तुत: उस समय किसी को भी इस बात का अहसास नहीं था कि इस तरह हो रहा जल या वायु प्रदूषण समय के साथ एक गंभीर समस्या में परिवर्तित हो जाएगा।

दूषित जल उपचार संयंत्र (Waste Water-Treatment plant in Hindi)

Source: 
‘जल प्रदूषण’ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 2011

औद्योगिक इकाइयों एवं घरेलू उपयोग में आने वाले जल की बड़ी मात्रा दूषित जल के रूप में निस्सारित होती है। ये दूषित जल किसी भी जलस्रोत में मिलने पर उसे प्रदूषित कर देते हैं। जिसके कारण जलस्रोत का जल, पीने अथवा अन्य मानवीय उपयोग के योग्य नहीं रह जाता है। अनेक बार जलस्रोत में प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ जाता है कि मवेशी अथवा कृषि कार्य हेतु भी उसका उपयोग किया जाना सम्भव नहीं होता। अतः इस दूषित जल के किसी जलस्रोत में मिलने से पूर्व उसका समुचित उपचार आवश्यक है ताकि जलस्रोतों पर उसका दुष्प्रभाव कम से कम पड़े। जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1974 यथा संशोधित के अनुसार दूषित जल का निर्धारित मानदण्डों के अनुरूप उपचार किया जाना आवश्यक है।

विभिन्न औद्योगिक इकाइयों द्वारा दूषित जल की प्रकृति के अनुसार दूषित जल उपचार संयंत्र बनाये जाते हैं। सामान्य तौर पर दूषित जल उपचार संयंत्र में इक्विलीब्रियम टैंक, उदासीनीकरण टैंक, सेटलिंग टैंक, भौतिक/रासायनिक उपचार टैंक, फिल्ट्रेशन टैंक, सोलर इवैपोरेशन टैंक/लैगून आदि शामिल होते हैं। विशिष्ट प्रकार के औद्योगिक दूषित जल जैसे- अत्यधिक कार्बनिक पदार्थयुक्त दूषित जल उदाहरणार्थ डिस्टलरी, पेपर मिल आदि से निकलने वाले दूषित जल के उपचार हेतु बहुस्तरीय दूषित जल उपचार संयंत्र का निर्माण किया जाता है। जिसमें प्राथमिक उपचार, द्वितीयक उपचार एवं तृतीयक उपचार आदि शामिल हैं।

1. प्राथमिक उपचार :-


प्राथमिक उपचार के दौरान कुछ भौतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से जल में उपस्थित अशुद्धि को दूर किया जाता है। ये प्रक्रियाएँ निम्नानुसार हैं :-

अ. छनन :-
प्राथमिक उपचार में यांत्रिक प्रक्रिया के दौरान दूषित जल को एक स्क्रीन या जाली से प्रवाहित किया जाता है, जिससे कुछ बड़े आकार के निलम्बित पदार्थ जैसे- बड़े आकार के रेशे, पत्थर एवं अन्य निलम्बित कण पृथक हो जाते हैं।

इस तरह छनन की प्रक्रिया से लगभग 60 प्रतिशत निलम्बित कण पृथक हो जाते हैं।

भूजल प्रदूषण (Groundwater pollution in Hindi)

Source: 
‘जल प्रदूषण’ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 2011

सतह पर उपस्थित जलस्रोतों के अतिरिक्त भूजल स्रोत भी जल प्रदाय के बड़े स्रोत होते हैं। भूमि सतह के भीतर तरह-तरह की चट्टानें पाई जाती हैं। भूमि सतह के भीतर जल धाराएँ एवं जलकुंड भी पाए जाते हैं। भूमि की सतह के भीतर पाए जाने वाले जलस्रोतों पर भूजल चट्टानों वाले जलस्रोतों पर भूजल चट्टानों का प्रभाव पड़ता है। ये प्रभाव चट्टानों की प्रकृति के अनुसार होता है। चट्टानों में उपस्थित तत्वों में से घुलनशील तत्व पानी में घुलकर उसकी गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।

मानवीय गतिविधियों के कारण जल प्रदूषण (Water pollution due to human activities)

Source: 
‘जल प्रदूषण’ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 2011

जल प्रदूषण की चर्चा करते ही हमारे सामने बड़े-बड़े उद्योगों से निकलने वाले दूषित जल के दृश्य आ जाते हैं। हम जल प्रदूषण का अर्थ औद्योगिक जल प्रदूषण से ही लेते हैं। लेकिन उद्योगों के अतिरिक्त जल प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण मानवीय गतिविधियाँ हैं। यहाँ हम कुछ ऐसी मानवीय गतिविधियों की चर्चा करें जिनसे जल प्रदूषण होता है।

फैक्टरी से निकलकर भूजल को प्रदूषित कर रहा है गन्दा पानी

1. घरेलू दूषित जल :-


हमारे देश की जनसंख्या 1 अरब से ज्यादा है तथा महानगरों को छोड़कर अन्य विभिन्न शहरों में घरेलू दूषित जल या सीवरेज के समुचित उपचार की व्यवस्था नहीं है। जिन शहरों में सीवरेज उपचार की व्यवस्था है, उनमें भी सारे शहर से उत्पन्न होने वाले सीवरेज के उपचार हेतु पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। फलस्वरूप बड़ी मात्रा में सीवरेज या दूषित जल अनुपचारित रह जाता है और ये अनुपचारित दूषित जल नालों के माध्यम से सीधे ही नदियों में जा मिलता है।

औद्योगिक गतिविधियों के कारण जल प्रदूषण (Water pollution due to industrial activities)

Source: 
‘जल प्रदूषण’ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 2011

जल प्रदूषण का प्रमुख कारण औद्योगिक निस्राव है। सभी औद्योगिक इकाइयों में कम या अधिक मात्रा में जल की खपत होती है। इसी अनुपात में दूषित जल उत्पन्न होता है। दूषित जल की प्रकृति औद्योगिक प्रक्रिया में जल, कच्चे माल के उपयोग, उत्पाद एवं उत्पादन प्रक्रिया पर निर्भर करती है। उद्योगों से निकलने वाले दूषित जल में मुख्य रूप से 2 प्रकार के प्रदूषक होते हैं :-

जल प्रदूषण 1. कार्बनिक प्रकृति के प्रदूषक
2. अकार्बनिक प्रकृति के प्रदूषक

1. कार्बनिक प्रकृति के प्रदूषक :-


सभी प्रकार के कृषि आधारित (एग्रोबेस्ड) उद्योग, डिस्टलरीज, राइस मिल, पोहा मिल, खाद्य प्रसंस्करण (फूड प्रोसेसिंग) उद्योग, पेपर मिल आदि में प्रक्रिया के अंतर्गत बड़ी मात्रा में जल की खपत होती है। इनसे उत्पन्न होने वाले दूषित जल की मात्रा भी काफी अधिक होती है। इस दूषित जल में बड़ी मात्रा में कार्बनिक पदार्थ होते हैं। किसी जलस्रोत में ऐसा प्रदूषित पानी मिलकर उसकी गुणवत्ता पर तत्काल विपरीत प्रभाव डालता है। जलस्रोत में प्रदूषण भार बढ़ने से उसके सामान्य पैरामीटर्स में वृद्धि होती है। इस प्रकार प्रभावित होने वाले प्रमुख पैरामीटर्स हैं :-

1. टोटल सॉलिड्स :-

खतरनाक हो सकती है चर्म-शोधन कारखानों के अपशिष्‍ट जल से सिंचाई

Author: 
उमाशंकर मिश्र
Source: 
इंडिया साइंस वायर, 19 मई, 2018

अध्‍ययनकर्ताओं के मुताबिक इस समस्‍या से निजात पाने के लिये अपशिष्‍ट जल का उपचार करने वाले संयंत्रों की नियमित निगरानी जरूरी है। यह सुनिश्चित करना होगा कि पर्यावरण में इन अपशिष्‍टों को निस्‍तारित करने से पहले नियमों का पूरी तरह से पालन किया जाए। इसके साथ-साथ लोगों को जागरूक करना भी जरूरी है, ताकि अपशिष्‍ट जल का उपयोग सिंचाई में करने से रोका जा सके। नई दिल्‍ली: पानी की कमी के चलते अ‍पशिष्‍ट जल का उपयोग दुनिया भर में सिंचाई के लिये होता है। लेकिन ऐसा करना मिट्टी और भूमिगत जल की सेहत के लिये ठीक नहीं है। कानपुर में चमड़े का शोधन करने वाली इकाइ‍यों से निकले अपशिष्‍ट जल से सिंचित कृषि क्षेत्रों की मिट्टी एवं भूजल के नमूनों का अध्‍ययन करने के बाद शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुँचे हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार चर्म-शोधन इकाइयों से निकले अपशिष्‍ट जल से लंबे समय तक सिंचाई करने से हानिकारक धात्विक तत्‍व मिट्टी और भूमिगत जल में जमा हो जाते हैं। भोपाल स्थित मृदा विज्ञान संस्‍थान के शोधकर्ताओं के अनुसार लंबे समय तक चर्म-शोधन इकाइयों से निकले अपशिष्ट जल का उपयोग सिंचाई के लिये करने से कानपुर के कई इलाकों की मिट्टी में हानिकारक धातुओं की मात्रा बढ़ गई है, जिसमें क्रोमियम की मात्रा सबसे अधिक पाई गई है।

जल प्रदूषण (Water Pollution in Hindi)

Author: 
डॉ. एके चतुर्वेदी
Source: 
जल चेतना, जनवरी 2016

ऑक्सीजन के उपरान्त जल जीवन के लिये अति आवश्यक है। मनुष्य के शरीर के भार का 70 प्रतिशत जल होता है। विश्व में पृथ्वी के चारों ओर जल है, 71 प्रतिशत भाग में जल है और 29 प्रतिशत में सतह है। सतह के कुछ भाग पर ही आबादी है। अधिकतर भाग पर पहाड़, जंगल, नदियाँ, झरने व तालाब हैं। जितना भी जल है उसका केवल 3 प्रतिशत जल पीने योग्य है। ताजा पीने योग्य जल ग्लेशियर (हिमखण्ड), पोलर आइस से प्राप्त होता है। इसी प्रकार भूजल गहरी चट्टान बनने के कारण एकत्रित होता रहता है।

जल प्रदूषण जल की उत्पत्ति के लिये विश्व में हाइड्रोलॉजिकल चक्र है। विश्व में पृथ्वी की आर्द्रता और समुद्र जल सूर्य की गर्मी से वाष्पीकृत होकर वायुमण्डल में चले जाते हैं। वहाँ धूल के कणों से मिलकर बादल का निर्माण करते हैं। जब बादलों में आर्द्रता अधिक हो जाती है, तो वह वर्षा या बर्फ के रूप में पृथ्वी पर आ जाती है। वर्षा जल, झरनों, झीलों, नदियों द्वारा पृथ्वी में आर्द्रता पुनः उत्पन्न होती है। इस प्रकार हाइड्रोलॉजिकल चक्र पूर्ण होता है और विश्व में जल की पूर्ति होती रहती है।

बड़े शहरों में घेंघा के बढ़ते खतरे

Author: 
स्वतंत्र मिश्र
Source: 
जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण (2013) पुस्तक से साभार

हिमालय की लगभग 2,400 किलोमीटर की तराई वाली पट्टी में लोगों में घेंघा की शिकायतें पाई जाती थीं। इसके अलावा कुछ जल जमाव वाले क्षेत्रों में इसकी पहचान की गई थी, परन्तु अन्य जगहों में आयोडीन की जरूरत वहाँ के प्राकृतिक स्रोतों कुओं के जल, भूजल, हरी साग-सब्जियों आदि से पूरी हो जाती है। फिर सरकार उन क्षेत्रों में भी आयोडीन नमक क्यों जबरन खिलाना चाहती है?