प्रदूषित पानी आज भी एक भीषण समस्या


दूषित पानी से पनप रही हैं बीमारियाँदूषित पानी से पनप रही हैं बीमारियाँआज समूची दुनिया प्रदूषित पानी की समस्या से जूझ रही है। हालात इतने विषम और भयावह हैं कि प्रदूषित पानी पीने से आज इंसान भयानक बीमारियों की चपेट में आकर अनचाहे मौत का शिकार हो रहा है। असलियत यह है कि पूरी दुनिया में जितनी मौतें सड़क दुर्घटना, एचआईवी या किसी और बीमारी से नहीं होतीं, उससे कई गुणा अधिक मौतें प्रदूषित पानी पीने से उपजी बीमारियों के कारण होती हैं।

यदि संयुक्त राष्ट्र की मानें तो समूची दुनिया में हर साल आठ लाख लोगों की मौत केवल प्रदूषित पानी पीने से होती है। संयुक्त राष्ट्र की बीते दिनों जारी एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एशिया, लैटिन अमरीका और अफ्रीका में हर साल तकरीब 35 लाख लोगों की मौतें दूषित पानी के सम्पर्क में आने से होने वाली बीमारियों के चलते होती हैं। गरीब देशों में यह समस्या और गम्भीर है।

पेयजल और ग्रामीण स्वच्छता को प्राथमिकता

Author: 
धीप्रज्ञ द्विवेदी
Source: 
कुरुक्षेत्र, मार्च 2017

आर्सेनिक की अधिकता वाले पानी को पेयजल में इस्तेमाल किये जाने से त्वचा, खून और फेफड़े के कैंसर तथा बच्चों में कार्डियो वैस्कुलर सिस्टम प्रभावित होता है। फ्लोराइड की अधिकता से दाँत और हड्डियों की बीमारी होती है। इसे ध्यान में रखते हुए सरकार की कोशिश है कि लोगों को शुद्ध पानी उपलब्ध कराया जाये ताकि वे विभिन्न बीमारियों से प्रभावित न हो। ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल उपलब्ध कराने के लिये एक रणनीतिक योजना 2011-22 तैयार की गई थी जिसके अन्तर्गत सभी ग्रामीण घरों में एक मीटर के जरिए पर्याप्त मात्रा में नल-जल की आपूर्ति करने का लक्ष्य रखा गया है। ग्रामीण भारत स्वच्छता कवरेज अक्टूबर 2014 के 42 प्रतिशत से बढ़कर वर्तमान में 60 प्रतिशत तक पहुँच चुका है। देश भर में स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत 3.47 करोड़ से अधिक घरेलू शौचालय बनाए जा चुके हैं। वित्तवर्ष 2017-18 में खुले में शौचमुक्त क्षेत्रों में पाइप युक्त शुद्ध जलापूर्ति को प्राथमिकता दी जाएगी।

स्वच्छ भारत मिशन के लिये वित्तवर्ष 2016-17 में रु. 11,300 करोड़ का प्रावधान किया गया था लेकिन इसमें लगभग 12800 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। वर्ष 2017-18 में इसमें रु. 16248 करोड़ का प्रावधान किया गया है।

राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम हेतु वित्तवर्ष 2016-17 में रु. 6000 करोड़ (संशोधित) का प्रावधान रखा गया है जिसे 2017-18 में बढ़ाकर रु. 6050 करोड़ कर दिया गया है। राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल के उपमिशन के हिस्से के रूप में अगले 4 वर्षों के लिये आर्सेनिक एवं फ्लोराइड प्रभावित 28000 से अधिक बस्तियों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने का प्रस्ताव किया गया है।

जहरीली होती हवा और अस्वीकारोक्ति के स्वर

Author: 
कुमार सिद्धार्थ
Source: 
सर्वोदय प्रेस सर्विस, मार्च 2017

वायु प्रदूषण का स्तर जानलेवा होता जा रहा है, जो सभी के स्वास्थ्य के लिये खतरनाक साबित हो रहा है। इसी वजह से दिल सम्बन्धी और साँस सम्बन्धी बीमारियों का खतरा बढ़ने से रोगग्रस्तता और मृत्युदर पर असर पड़ रहा है। प्रदूषण की वजह से दुनिया में हर बरस तकरीबन एक करोड़ छब्बीस लाख लोग मर रहे हैं। वायु प्रदूषण की भयावहता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज देश के हर शहर एक बड़े गैस चेम्बर के रूप में परिवर्तित हो रहे हैं, जिसमें बड़ी संख्या में लोग वायु प्रदूषण की वजह से काल के मुँह में समा रहे हैं। पाँच राज्यों के चुनाव-परिणामों की गहमागहमी के बीच पिछले पखवाड़े ‘स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2017’ नामक रिपोर्ट अखबारों की सुर्खियों में नहीं आ पाई। विश्व पटल पर प्रस्तुत की गई इस महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट से भारत में प्रदूषण से आम जनता की सेहत पर पड़ने वाले प्रभावों और होने वाली मौतों की भयावहता की तस्वीर सामने आई है।

इस रिपोर्ट को हेल्थ इफेक्ट इंस्टीट्यूट और यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन स्थित इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवेल्यूशन ने संयुक्त तौर पर तैयार किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आँकड़ों पर आधारित इस रिपोर्ट में 195 देशों के 1990 से 2015 तक के विस्तृत आँकड़े हैं। इनके आधार पर वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या को निकाला जाता है।

पचास हजार से अधिक क्षेत्रों का पानी पीने योग्य नहीं


योजना बनाते हुए कभी समाज से नहीं पूछा जाता कि उन्हें क्या चाहिए? क्या उनके पास उनकी अपनी समस्या का कोई सरल और स्थायी समाधान है। पानी और हवा पर इस देश का हर नागरिक का अधिकार था। पहले पानी पीने लायक नहीं छोड़ा गया। अब पानी को खरीदकर पीना महानगरीय समाज की आदत में शामिल हो गया है। अब आने वाले समय में यह हवा के साथ ना हो। हमें साँस लेने के लिये भी कीमत ना चुकानी पड़े, इसके लिये यही समय है हम सबके सावधान हो जाने का। देश इक्कीसवीं सदी में विकास की नई-नई इबारत लिख रहा है। पाँच राज्यों के चुनाव में विकास सबसे बड़ा मुद्दा बना है। यह सुनते हुए क्या हमें शर्मिन्दा नहीं होना चाहिए कि अब भी देश में पचास हजार से अधिक ऐसे क्षेत्रों को केन्द्र की सरकार पहचानती है, जहाँ का पानी पीने योग्य नहीं है। सम्भव है कि उन्हें पीने योग्य बनाने के लिये हम बड़ी-बड़ी योजना लेकर आएँ लेकिन उसका हासिल क्या होगा?

अगले पाँच साल की योजना में वह एक लाख की संख्या को नहीं छुएगा इसकी जिम्मेवारी कौन लेगा? यमुना के सन्दर्भ में हमने देखा ही है कि यमुना की सफाई के नाम पर सरकारी पैसों की बाढ़ में रकम यमुना सफाई के नाम पर बढ़ रहा है और रकम बढ़ने के बावजूद गन्दगी कम होने का नाम नहीं ले रहा।

पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने 07 फरवरी को राज्यसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए बताया कि 66663 इलाकों में पेयजल आर्सेनिक और फ्लोराइड से प्रभावित है और पीने लायक नहीं है। उन्होंने सदन में कहा कि सरकार जनता को साफ एवं स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रही है और इस सम्बन्ध में विभिन्न योजनाएँ लाई गई हैं।

जल प्रदूषण निवारण एवं जनता की भूमिका (Water pollution prevention and public role)

Author: 
डा. प्रमोद सिंह
Source: 
योजना, 16-28 फरवरी 1991

‘जल ही जीवन है।’ यह कथन आदिकाल से चला आ रहा है। सृष्टि की उत्पत्ति के जो मूलभूत पाँच तत्व कहे गए हैं, उनमें जल का महत्त्व सर्वोपरि है क्योंकि यही रस रूप होकर प्राणियों को जीवन प्रदान करता है। जीवन को निरोग एवं स्वच्छ रखने के लिये जल की शुद्धता बरकरार रखनी आवश्यक है। गंगा आदि नदियों में स्नान का जो महात्म्य हमारे धर्म-ग्रन्थों में वर्णित है, उसके मूल में तथ्य यह है कि गंगा के जल में हिमालय पर्वत की दुर्लभ जड़ी-बूटियों का रस मिला हुआ रहता है जिससे शरीर के तमाम रोग दूर हो जाते हैं। लेकिन इसी जल में यदि बीमारी उत्पन्न करने वाला कूड़ा-कचरा मिल जाए तो वही गंगा प्राणलेवा भी बन सकती है।
प्रस्तुत लेख में जल प्रदूषण की इसी समस्या की ओर ध्यान आकर्षित कराया गया है तथा इसे दूर करने के लिये आवश्यक उपायों की चर्चा की गई है।


औद्योगीकरण के कारण उत्पन्न होने वाली विषैली गैसीय पदार्थों तथा रासायनिक प्रस्तावों को सोखकर वायु शुद्ध करने की वृक्षों में अद्भूत क्षमता है। वृक्षों की जड़ें पानी के वेग को कम करके भूमि क्षरण को रोकने तथा भूमि की उर्वराशक्ति बनाए रखने के साथ-साथ नदियों एवं जल धाराओं में निरन्तर जल प्रवाह प्रदान करती है।

छत्तीसगढ़ में कोयला बना अभिशाप


फैक्टरी से निकलने वाला गन्दा पानी, धुआँ, राख और केमिकल सीधे जलस्रोत को प्रभावित करते हैं। कई जगह भूजल में लेड की मात्रा भी पाई गई है। जल में मैग्नीशियम व सल्फेट की अधिकता से आँतों में जलन पैदा होती है। नाइट्रेट की अधिकता से बच्चों में मेटाहीमोग्लाबिनेमिया नामक बीमारी हो जाती है तथा आँतों में पहुँचकर नाइट्रोसोएमीन में बदलकर पेट का कैंसर उत्पन्न कर देता है। फ्लोरीन की अधिकता से फ्लोरोसिस नामक बीमारी हो जाती है। छत्तीसगढ़ अपने खनिज सम्पदा और प्राकृतिक संसाधनों के लिये प्रसिद्ध है। राज्य में कोयला, लोहा, बाक्साइट और कई खनिज प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। छत्तीसगढ़ में कोयला की अधिकता है। जिसके कारण यहाँ पर कोयले से चलने वाले 28 बिजली संयंत्र है। जिसमें कोरबा में 15 और रायगढ़ में 13 बिजली संयंत्र हैं। बिजली घरों से हर साल दो करोड़ मीट्रिक टन राख निकलती है। 30 फीसदी भी इसका इस्तेमाल नहीं होता।

कोयला से निकलने वाले राख और धूल से राज्य के कई जिले सहित ऊर्जा नगरी कहलाने वाला शहर कोरबा में टीबी, अस्थमा, दमा जैसी गम्भीर बीमारियों के चपेट में है। सिर्फ बीमारी ही नहीं बल्कि राख के ढेर के चलते कृषि और बागवानी भी प्रभावित हो रही है। जिसके कारण रायगढ़ जिले में 31 लाख हेक्टेयर जमीन पर अब खेती नहीं होती है।

देश में फैली दूषित हवा


भारत में प्रदूषण नियंत्रण के अनेक कानून हैं, लेकिन उन पर अमल कागजी है। इसलिये इस जिम्मेवारी को न्यायपालिका ढो रही है। इस हेतु सर्वोच्च न्यायालय को राष्ट्रीय हरित अधिकरण का गठन करना पड़ा है। मगर कार्यपालिका उस पर भी ठीक से क्रियान्वयन नहीं कर पा रही है। इस नाकामी की प्रमुख वजह भ्रष्टाचार तथा लापरवाही है। नतीजतन न्यायिक आदेश और प्रदूषण नियंत्रण कानूनों का ठीक से पालन नहीं हो रहा है। उद्योग और पर्यटन स्थलों पर पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी नियमों का खुला उल्लंघन हो रहा है। भारत की आबो-हवा इस हद तक दूषित एवं जानलेवा हो गई है कि वायु प्रदूषण से दुनिया में मरने वाले लोगों में से एक चौथाई भारत के लोग मरते हैं। इस दुश्वारी पर हमारे विज्ञान, स्वास्थ्य एवं पर्यावरण से जुड़े संस्थानों का ध्यान तो नहीं गया, लेकिन इस सच्चाई से हमें रूबरू अमेरिकी संस्था की एक ताजा अध्ययन रिपोर्ट ने कराया है। बावजूद यह स्थिति न तो पाँच राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनाव में राजनैतिक दलों का चुनावी मुद्दा है और न ही इस मुद्दे को मीडिया बहुत ज्यादा महत्त्व दे रही है। इसलिये यह आशंका अपनी जगह वाजिब है कि भयावह होते वायु प्रदुषण से जुड़ी यह अहम जानकारी भी कुछ दिनों में आई-गई हो जाएगी।

कितना असाधारण अब सौ फीसदी कुदरती हो जाना


जैविक खाद की तुलना में रासायनिक उर्वरक का उपयोग करने रहने पर सिंचाई में पानी ज्यादा लगता है। पहले चना, मटर, सरसों बिना सिंचाई के हो जाती थी। इनकी फसल के दौरान आसमान से उतरी एक-आध फुहार ही इनके लिये काफी होती थी। किन्तु अब ये फसलें भी कम-से-कम एक सिंचाई चाहती हैं। रासायनिक उर्वरकों के कारण मिट्टी के बँधे ढेलों के टूट जाते हैं। लिहाजा ऊपरी मिट्टी में पानी सोखकर रखने की क्षमता कम हो जाती है। प्रकृति का एक नियम है कि हम उसे जो देंगे, वह हमें किसी-न-किसी रूप में उसे लौटा देगी। जो खाएँगे, पखाने के रूप में वही तो वापस मिट्टी में मिलेगा। सभी जानते हैं कि हमारे उपयोग की वस्तुएँ जितनी कुदरती होंगी, हमारा पर्यावरण उतनी ही कुदरती बना रहेगा; बावजूद इसके दिखावट, सजवाट और स्वाद के चक्कर में हम अपने खपत सामग्रियों में कृत्रिम रसायनों की उपस्थिति बढ़ाते जा रहे हैं।

गौर कीजिए कि कुदरती हवा को हम सिर्फ धुआँ उठाकर अथवा शरीर से बदबूदार हवा छोड़कर खराब नहीं करते; ऐसी हजारों चीजें और प्रक्रियाएँ हैं, जिनके जरिए हम कुदरती हवा में मिलावट करते हैं। जिस भी चीज में नमी है; तापमान बढ़ने पर वह वाष्पित होती ही है। वाष्पन होता है तो उस चीज की गन्ध तथा अन्य तत्व हवा में मिलते ही हैं। होठों पर लिपस्टिक, गालों में क्रीम-पाउडर, बालों में मिनरल आॅयलयुक्त तेल-शैम्पू-रंग, शरीर पर रासायनिक इत्र.. अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में कृत्रिम रसायन की ऐसी चीजों की सूची बनाइए। फिर सोचिए कि धुएँ के अलावा हम कितनी चीजों के जरिए भी हवा में मिलावट करते हैं।

कुदरती की गारंटी देना मुश्किल

बैड़िया का भूजल हो रहा प्रदूषित


शौचालय के नजदीक हैण्डपम्पशौचालय के नजदीक हैण्डपम्पदेश की दूसरी सबसे बड़ी मिर्च मंडी के रूप में अपनी पहचान कायम कर चुका बैड़िया का भूजल इन दिनों बुरी तरह प्रदूषित हो रहा है। कभी यहाँ का पर्यावरण सुखद और स्वच्छ हुआ करता था लेकिन मंडी के विस्तार के साथ ही इस छोटे से गाँव में पर्यावरण बिगड़ने लगा है। इसका सबसे बुरा असर यहाँ के पेयजल स्रोतों पर पड़ रहा है। लोगों के लिये पीने का साफ पानी मुहाल हो गया है। गाँव के पर्यावरण को सुधारने में स्थानीय पंचायत या प्रशासन की फिलहाल कोई दिलचस्पी नजर नहीं आती है।

मध्य प्रदेश के सबसे बड़े रकबे में लाल मिर्ची का उत्पादन करने वाले इलाके निमाड़ के खरगोन जिले में एक छोटा-सा गाँव है-बैड़िया। यह गाँव भले ही महज नौ हजार की आबादी वाला है लेकिन निमाड़ में इसका अपना रुतबा है। दरअसल यह छोटा-सा गाँव ही आन्ध्र प्रदेश के गुंटूर के बाद देश की दूसरी सबसे बड़ी लाल मिर्ची की मंडी है।

यहाँ सालाना करीब एक हजार करोड़ का व्यापार होता है। इन्दौर से करीब सवा सौ किमी खंडवा रोड पर सनावद से 15 किमी दूर नर्मदा नदी से थोड़ी दूरी पर यह गाँव स्थित है। यहाँ पूरे रकबे में ज्यादातर मिर्ची की खेती होती है। वैसे तो पूरे निमाड़ में ही मिर्ची की खेती होती है लेकिन बैड़िया इसका सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्र है और यहीं प्रदेश की सबसे बड़ी मिर्ची मंडी भी है।

इस मंडी में हर दिन हजारों बाहरी मजदूर काम करते हैं और ये यहाँ झोपड़ियाँ बनाकर रहते हैं। इनके पास शौचालय की व्यवस्था नहीं होने से ये गाँव के आसपास ही खुले में शौच करते हैं। भू वैज्ञानिकों के मुताबिक इससे भूजल पर बुरा असर पड़ रहा है। इससे बड़ा झूठ क्या होगा कि सरकारी रिकॉर्ड में इसे खुले में शौच से मुक्त गाँव घोषित कर दिया गया है।