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दिल्ली की हवा में घुलता जहर


केन्द्र व राज्य सरकारें भी पराली नष्ट करने की सस्ती व सुरक्षित तकनीक ईजाद करने में नाकाम रही हैं। ऐसी कोई तकनीक नहीं होने के कारण किसान को खेत में ही डंठल जलाने पड़ते हैं। जलाने की उसे जल्दी इसलिये भी रहती है, क्योंकि खाली हुए खेत में गेहूँ और आलू की फसल बोनी होती है। इस लिहाज से जरूरी है कि राज्य सरकारें पराली से जैविक खाद बनाने के संयंत्र जगह-जगह लगाएँ और रासायनिक खाद के उपयोग को प्रतिबन्धित करे। हालांकि कृषि वैज्ञानिक पराली को कुतरकर किसानों को जैविक खाद बनाने की सलाह देते हैं, किन्तु यह विधि बहुत महंगी है। मौसम के करवट लेते ही देश की राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण से लोगों की सेहत बिगड़ने लगती है। इस प्रदूषण के कारण तो कई हैं, लेकिन प्रमुख कारण यही बताया जा रहा है कि फसलों के अवशेष जलाए जाने से यह समस्या उत्पन्न होती है। यह समस्या कोई नई नहीं है, बावजूद सर्वोच्च न्यायालय को इस समस्या पर निगरानी व नियंत्रण के लिये सम्बन्धित राज्य सरकारों को निर्देश देना पड़ता हैै। जबकि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिये विभिन्न एजेंसियाँ व बोर्ड हैं, लेकिन वे जब तक ऊपर से सख्ती नहीं होती है, तब तक कानों में उँगली ठूँसे बैठी रहती हैं। इस बार भी यही हुआ है।

सं रा. संघ ने स्वीकारी अपनी गलती

Author: 
रोजा फ्रीडमेन एवं निकोलसलिमे हेबर्ट
Source: 
सप्रेस/थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क फीचर्स, अक्टूबर 2016

शान्ति सैनिकों को हैती भेजने के पूर्व सं.रा. संघ ने इस बात की पड़ताल नहीं की कि शान्ति सैनिकों में से किसी को हैजा तो नहीं है और उसने शान्ति सैनिक शिविरों के शौचालयों में पर्याप्त सुविधा मुहैया नहीं करवाई। इसके परिणामस्वरूप वहाँ से निकला गन्दा पानी एक सहायक नदी के माध्यम से हैती की मुख्य नदी में प्रविष्ठ हो गया। चूँकि हैती की बड़ी जनसंख्या कपड़े धोने, भोजन पकाने, साफ-सफाई और पीने के पानी के लिये इसी आर्टिबोनिट नदी पर निर्भर है अतएव देश के बड़े हिस्से में हैजा फैल गया। अन्ततः संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्वीकार किया है कि सन 2010 से हैती में फैली हैजा महामारी में उसकी भी कुछ जिम्मेदारी बनती है। गौरतलब इस घटना में अब तक वहाँ कम-से-कम 9200 व्यक्तियों की मृत्यु हो चुकी है एवं करीब 10 लाख संक्रमित हुए हैं। यह पहली बार है जबकि सं. रा. संघ ने स्वीकार किया है कि पीड़ितों के प्रति उसका कर्तव्य है। यह जवाबदेही और न्याय की राह में उठा एक महत्त्वपूर्ण कदम है। हैती दुनिया के निर्धनतम देशों में से एक है। इसे बार-बार प्राकृतिक एवं मानवनिर्मित विध्वंसों का सामना करना पड़ता रहता है।

शुद्ध हवा का संकट

Author: 
पीयूष द्विवेदी
Source: 
दैनिक जागरण, 06 अक्टूबर, 2016

वायु प्रदूषण, औद्योगिक प्रगति से अधिक इस बात पर निर्भर करता है कि आप प्रगति और प्रकृति के मध्य कितना सन्तुलन रख रहे हैं। अगर प्रगति और प्रकृति के बीच सन्तुलन स्थापित किया जाये तो न केवल वायु प्रदूषण बल्कि हर तरह के प्रदूषण से निपटा जा सकता है। मगर इसके लिये हर स्तर पर मुस्तैदी दिखानी पड़ती है। प्रदूषण को लेकर हमारे हुक्मरानों की उदासीनता को इससे समझा जा सकता है कि देश का कोई भी राजनीतिक दल अपने घोषणा पत्र में प्रदूषण नियंत्रण का वादा नहीं करता। पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन की वायु प्रदूषण को लेकर जारी रिपोर्ट में भारत की स्थिति काफी चिन्ताजनक बताई गई। रिपोर्ट बताती हैं कि दुनिया के प्रत्येक दस में से नौ व्यक्ति प्रदूषित हवा में साँस लेने के लिये मजबूर हैं। वायु प्रदूषण से होने वाली हर तीन में से दो मौतें भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में होती हैं। इससे भारत में वायु प्रदूषण की स्थिति को समझा जा सकता है।

इस साल की शुरुआत में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देश के 21 चुनिन्दा शहरों की वायु गणवत्ता पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बोर्ड की रिपोर्ट बताती है कि इन 21 शहरों में हरियाणा का पंचकुला एक ऐसा शहर है, जहाँ वायु गुणवत्ता का स्तर सन्तोषजनक है।

मुम्बई और पश्चिम बंगाल के शहर हल्दिया में वायु की गुणवत्ता कुछ ठीक है। लेकिन बाकी सभी शहरों की हवा का स्तर मध्यम और खराब से लेकर बहुत खराब तक पाया गया। इनमें मुजफ्फरपुर, लखनऊ, दिल्ली, वाराणसी, पटना, फरीदाबाद, कानपुर, आगरा आदि शहरों में प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक है। इनमें दिल्ली तीसरा सबसे अधिक प्रदूषित शहर है।

आस्था से ऊपर उठकर नदियों की सोचें

Author: 
आर.के. सिन्हा
Source: 
दैनिक जागरण, 06 अक्टूबर, 2016

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने दुर्गा पूजा की मूर्तियों के हुगली नदी में विसर्जित करने के असर पर एक अध्ययन किया था। इस अध्ययन के मुताबिक हर साल करीब 20 हजार दुर्गा की मूर्तियाँ हुगली में विसर्जित की जाती हैं। इससे नदी में करीब 17 टन वार्निश और बड़ी मात्रा में रासायनिक रंग हुगली के जल में मिलता है। इन रंगों में मैगनीज, सीसा और क्रोमियम जैसे धातु मिले होते हैं। इसका असर नदी के बदलते स्वरूप पर देख सकते हैं। कई बार लगता है कि हमारा समाज अपनी जीवनदायिनी नदियों को साफ और निर्मल रखने को लेकर गम्भीर नहीं है। लाख सरकारी कोशिशों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान के बावजूद इस बार भी देशभर में गणेश की प्रतिमाएँ नदियों में ही विसर्जित होती रहीं। इससे साफ हो गया कि नदियों की सफाई को लेकर किसी के मन में संवेदना नहीं बची है।

गणेशोत्सव के बाद अब दुर्गा पूजा है। दिवाली, चित्रगुप्त पूजा और फिर छठ। अगर गणेशोत्सव पर पर्यावरण अनुकूल गणेश की मूर्तियाँ बन और बिक सकती हैं तो फिर दुर्गा पूजा के वक्त क्यों नहीं? अगर हम अपने को बदलेंगे नहीं तो फिर हमें अपनी नदियों की गन्दगी और उनके प्रदूषित होने वाले किसी मसले पर बोलने का अधिकार नहीं होगा।

नर्मदा के पानी से बचाएँगे एशिया के डेट्रायट को


पीथमपुर में भूजल बुरी तरह प्रदूषित होता जा रहा है। यहाँ कुछ औद्योगिक इकाइयों के घातक रासायनिक पदार्थों के उपयोग करने से तथा उनके अवक्षेप और जहरीले पानी को सीधे जमीन में छोड़ दिये जाने से भूजल प्रदूषित हो गया है। हालात इतने बुरे हैं कि कुछ स्थानों पर तो भूजल के इस्तेमाल की सम्भावना ही खत्म हो चुकी है। कुछ ट्यूबवेल तो यहाँ सफेद पानी छोड़ते हैं। करीब आधा किमी त्रिज्या के क्षेत्र में सफेद पानी ही निकलता है। यह बदबू मारता है। इसकी जाँच में भी इसे प्रदूषित पाया गया है। अब नर्मदा के पानी से एशिया के डेट्रायट कहे जाने वाले पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र के उद्योगों को प्राण वायु दिये जाने की घोषणा हो चुकी है। करीब एक हजार से ज्यादा उद्योग इकाइयों वाले इस मध्य प्रदेश के सबसे बड़े औद्योगिक क्षेत्र के लिये बीते पाँच सालों से पानी के लिये तरस रहा है। अब इसके लिये राज्य सरकार ने 260 करोड़ रुपए की एक महती योजना को भी मंजूर कर दिया है, जिससे नर्मदा के पानी को उद्वहन कर पीथमपुर लाया जाएगा। इससे यहाँ बनने जा रहे एशिया के सबसे बड़े ऑटो टेस्टिंग ट्रेक नेटट्रिप को भी पानी मिल सकेगा। पर्यावरणविद इसका विरोध कर रहे हैं।

राज्य सरकार ने नर्मदा लिफ्ट योजना से अब पीथमपुर को पानी की आपूर्ति की योजना को हरी झंडी दे दी है। इस योजना को आगामी 25 साल तक की सम्भावनाओं को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है तथा इससे पीथमपुर के लिये 90 एमएलडी पानी की आपूर्ति हो सकेगी। फिलहाल जहाँ इसके लिये हर दिन 25 एमएलडी पानी की जरूरत होती है, वहाँ इसे मात्र 12 एमएलडी पानी ही मिल पा रहा है।

दिल्ली की लापरवाह सरकार, आम आदमी चिकनगुनिया से बेहाल


बरसात का महीना आने के दो महीने पहले से दिल्ली में मच्छरों को पनपने से रोकने के लिये छिड़काव रुक गया। समस्या के समाधान पर चर्चा करने की जगह दिल्ली की सरकार एमसीडी, से लेकर केन्द्र सरकार तक दिल्ली में महामारी की शक्ल ले रही बीमारी की जिम्मेवारी डालने में इतनी व्यस्त थी कि उसे ख्याल ही नहीं रहा कि यह समय एक्शन का है। आरोप लगाने का नहीं। दिल्ली सरकार ने राज्य के उपराज्यपाल पर हमला करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। यह बात सर्वविदित है कि यमुना में चौड़ी पत्ती वाली जलकुम्भी, रुके हुए पाॅलीथीन, मूर्तियों के ढाँचे भी मच्छरों के लार्वा पनपने के लिये सही जगह साबित होते हैं। दिल्ली की सरकार पिछले दिनों मीडिया कांफ्रेंस में जिस तरह मच्छरों को नियंत्रित करने के लिये मशीन खरीदने और दवा के छिड़काव की बात कर रही थी। उससे यही लग रहा था कि मीडिया कांफ्रेंस के खत्म होते ही दिल्ली में डेंगू और चिकनगुनिया पर नियंत्रण लग जाएगा। इस बीमारी के निदान के लिये सरकार गम्भीर हो चुकी है।

खबर के अखबार और टेलीविजन में आते ही दिल्ली के आम आदमी की दिल्ली की सरकार से यह शिकायत जरूर थी कि इन मशीनों को दिल्ली सरकार को ही खरीदना था फिर दिल्ली में हजारों लोगों को चिकनगुनिया और डेंगू का शिकार बनाने के बाद सरकार द्वारा यह कदम क्यों उठाया गया? कायदे से इसे बरसात का मौसम शुरू होने से दो महीने पहले से शुरू कर देना चाहिए था। जिससे चिकनगुनिया, डेंगू या फिर मलेरिया के मच्छर दिल्ली में ना पनपे। दिल्ली वालों को बीमार ना बनाए। जबकि दिल्ली में उल्टा हुआ।

खतरे की घंटी जैतापुर

Author: 
अभिषेक रंजन सिंह
Source: 
शुक्रवार, 1 से 15 सितम्बर, 2016

जैतापुर न्यूक्लियर पॉवर प्लांट का निर्माण फ्रांस की विवादास्पद कम्पनी अरेवा के सहयोग से होने वाला है। 9900 मेगावाट की यह परमाणु परियोजना विश्व के सबसे बड़े प्रोजेक्ट में शुमार है। इस प्लांट के लिये राजापुर तहसील के पाँच गाँवों में 938 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहीत की गई हैं। इनमें सर्वाधिक 690 हेक्टेयर जमीन अकेले माड़बन गाँव की है। इसके अलावा, मिठगवाणे में 102 हेक्टेयर, निवेली में 72.61, केरल में 70.68 और वरिलवाड़ा में 1.91 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहीत की गई है।

21 महादेव का अस्तित्व खतरे में

Author: 
सुधीर शर्मा

स्वर्णरेखा नदी की सफाई करते लोगस्वर्णरेखा नदी की सफाई करते लोगराँची- राँची के स्वर्णरेखा और हरमू नदी के संगम पर स्थित प्राचीन इक्कीसो महादेव आज शहरवासियों के मॉडर्न होने की अन्धी दौड़ की भेंट चढ़ने की कगार पर है। नदियों में बढ़ते प्रदूषण के स्तर के और सरकारी उदासीनता के कारण आज एक प्राचीन धरोहर अपने अस्तित्व बचाने के लिये संघर्ष कर रहा है। चट्टानों में अलग-अलग आकार के शिवलिंग की आकृति नदी के अम्लीय प्रभाव से मिटते जा रहे हैं।

बुजुर्ग और स्थानीय बताते हैं कि करीब 1930 के दशक में आये भीषण बाढ़ ने इक्कीसों महादेव को काफी नुकसान पहुँचाया, आज कई चट्टान अपने जगह से खिसक कर दूर होते चले गए। कई शिवलिंग दोनों नदियों को पाटने वाले एक बाँध की दीवार में गायब हो गए। आज केवल 13 शिवलिंगों को ही देखा जा सकता है। सभी शिवलिंगों को खोजने अथवा इसके पुनरुद्धार की दिशा में न ही आज तक किसी सरकार अथवा किसी अन्य संगठन ने कोई ध्यान दिया।

स्वर्णरेखा नदी में स्वर्णकणों के मिलने के कारण इस क्षेत्र के स्वर्णकारों के लिये यह नदी और इक्कीसों महादेव की खास महत्ता है। ऐसी किंवदन्ती है कि नागवंशी राजाओं पर जब मुगल शासकों ने आक्रमण किया तो नागवंशी रानी ने अपने स्वर्णाभूषणों को इस नदी में प्रवाहित कर दिया, जिसके तेज धार से आभूषण स्वर्ण कणों में बदल गए और आज भी प्रवाहमान है।

आज भी हर कार्तिक पूर्णिमा को सम्पूर्ण क्षेत्र के स्वर्णकार स्वर्णरेखा में डुबकी लगाते हैं और 21 शिवलिंगों का जलाभिषेक करते है। हालांकि स्वर्णकारों के द्वारा समय-समय पर इस मन्दिर की मरम्मत कार्य और चढ़ावा चढ़ाया जाता रहा, लेकिन कोई व्यापक बदलाव और संरक्षण की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका।

औद्योगिक प्रदूषण की चपेट में नदियाँ


प्रदेश के विकास के लिये औद्योगिकीकरण को बहुत जरूरी और रोजगार पैदा करने वाला माना जाता है। एक हद तक यह ठीक भी है, परन्तु यदि औद्योगिकीकरण हमारे वातावरण, नदियों और भूजल को ही प्रदूषित कर दे तो बहुत सा रोजगार छिन भी जाता है। यहाँ रहने के हालात कठिन हो जाते हैं। बीमारियों की भरमार हो जाती है। टिकाऊ विकास की व्यवस्थाएँ नष्ट हो जाती हैं। ऐसा विकास थोड़े समय का तमाशा बनकर रह जाता है। इसलिये औद्योगीकरण के विपरीत प्रभावों को कम करने के लिये प्रदूषण नियंत्रण के कई उपाय करना जरूरी हो जाता है। हिमाचल की नदियों पर देश के विभिन्न राज्यों के पर्यावरण का जिम्मा है। पड़ोसी राज्य तो सीधे तौर पर इनका पानी इस्तेमाल करते हैं, जबकि अन्य राज्यों की बिजली की जरूरत इन्हीं नदियों से पूरी होती है। कार्बन क्रेडिट की लड़ाई में भी हिमाचल की नदियाँ उत्तर भारत में प्रमुख योगदान देती हैं। लम्बे समय से ये नदियाँ प्रदूषित होती जा रही हैं। प्रदूषण का यह स्तर औद्योगिक विकास के बाद ज्यादा है।

हिमाचल प्रदेश में औद्योगिकीकरण के अपने फायदे और नुकसान हैं। हालांकि इससे कुछ रोजगार तो खड़े हुए, परन्तु नदियों और वायु प्रदूषण के रूप में हमें भारी कीमत भी चुकानी पड़ी है। जो रोजगार खड़े भी हुए, उनमें ज्यादातर अकुशल मजदूरी के अस्थायी रोजगार ही हिमाचल के हिस्से आये। ऊपर से 70 प्रतिशत रोजगार हिमाचलियों को देने का वादा भी पूरा नहीं हो सका। नदियों के प्रदूषण से न सिर्फ जल प्रदूषित हुआ, बल्कि पारम्परिक रोजगार भी छिन गए।