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मिट्टी के गणेश की मुहिम तेज

Author: 
मनीष वैद्य

पीओपी की परत जलस्रोतों की तली में जाकर इसे उथला करती हैं, वहीं पानी को धरती में रजने से भी रोकता है। यह तली में सीमेंट की तरह जम जाता है और पानी को रिसने से रोक देता है। पीओपी की प्रतिमा पर हानिकारक रासायनिक रंग लगाए जाते हैं, ये जब पानी में घुलते हैं तो इनके विषाक्त प्रभाव से पानी में रहने वाले जलीय जन्तुओं और मछलियों के लिये घातक असर छोड़ते हैं। इससे हमारी नदियाँ, तालाब और अन्य जलस्रोत भी प्रदूषित होते हैं और उनका पानी उपयोग के काबिल नहीं रह जाता है। स्वस्थ पर्यावरण के लिये जरूरी है कि हमारे जलस्रोत निर्मल बने रहें। लेकिन हर साल गणेशोत्सव और दुर्गा पूजा के अवसर पर देश भर में लाखों प्रतिमाएँ और निर्माल्य (पूजा सामग्री) नदियों, तालाबों या अन्य जलस्रोतों में विसर्जित की जाती है। इससे बड़े पैमाने पर प्रदूषण बढ़ता है और इनका पानी उपयोग के लायक नहीं बचता। बीते साल मध्य प्रदेश में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने इसके खिलाफ कड़े कदम उठाने और पीओपी (प्लास्टर ऑफ पेरिस) से बनी प्रतिमाओं की बिक्री पर पाबन्दी लगा दी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में भी देश को इस चिन्ता से अवगत कराते हुए अपील की थी कि देश के लोग ज्यादा-से-ज्यादा मिट्टी की प्रतिमाओं की ही स्थापना करें ताकि पर्यावरण को किसी तरह से नुकसान नहीं हो।

प्रधानमंत्री ने की नदियों को प्रदूषण से बचाने की अपील


नरेंद्र मोदीनरेंद्र मोदी इस बार मन की बात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात कार्यक्रम में एक बहुत अच्छा और सामयिक महत्त्व का मुद्दा देश के लोगों के सामने रखा है, वह है हमारी नदियों और जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाने के लिये त्योहारों पर बनने वाली गणेश और दुर्गा प्रतिमाओं को पीओपी से बनाने की जगह उन्हें मिट्टी से बनाए जाने पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि ऐसा करने से हम पानी को प्रदूषित होने से बचा सकते हैं।

गौरतलब है कि हर साल इन त्योहारों पर पीओपी की बनी मूर्तियों के नदी और अन्य जलस्रोतों में प्रवाहित कर देने से बड़ी तादाद में प्रदूषण तो बढ़ता ही है। गाद भी जम जाती है, जो उथला करने के साथ ही पानी को जमीन की नसों में भेजने से रोकती है।

सागर की बदकिस्मती

Author: 
उमेश कुमार राय

.ईंधन से भरा एक जहाज समुद्र के रास्ते इंडोनेशिया से गुजरात के लिये रवाना हुआ था। 4 अगस्त, 2011 को यह जहाज मुम्बई तट से लगभग 37 किलोमीटर दूर अरब सागर (भारतीय सीमा) में डूब गया था।

जहाज के डूबने से इसमें मौजूद ईंधन व तेल का धीरे-धीरे रिसाव होने लगा जिससे समुद्र की पारिस्थितिकी और मुम्बई तट के आसपास की जैवविविधता को नुकसान हुआ था।

इस नुकसान की भरपाई के लिये राष्ट्रीय हरित पंचाट (नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल) ने पनामा स्थित डेल्टा शिपिंग मरीन सर्विसेज और उसकी कतर स्थित दो सहयोगी कम्पनी डेल्टा नेविगेशन डब्ल्यूएलएल और डेल्टा ग्रुप इंटरनेशनल पर 100 करोड़ रुपए का पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाया है।

बिहार के ग्रामीण क्षेत्र में हजारों टोलों में दूषित पानी, जल्द मिलेगा शुद्ध पानी

Author: 
संदीप कुमार

हर घर पानी की योजना अब लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग पीएचइडी के हाथ से निकल गया है। पीएचइडी का काम अब सिर्फ राज्य के आर्सेनिक और फ्लोराइड युक्त पानी वाले 21 हजार टोलों में पीएचइडी शुद्ध पानी पहुँचाना है। पाइप से घर-घर पानी की सप्लाई होगी। इसके लिये ट्रीटमेंट प्लांट लगाकर पानी को शुद्ध कर घरों तक ले जाने की योजना है। इसके लिये पीएचइडी विभाग दूषित पानी प्रभावित इलाके को अब फोकस कर पानी पहुँचाने का डीपीआर तैयार करने में लगा है। बिहार के ग्रामीण क्षेत्र में लगभग 21 हजार टोलों में दूषित पानी की समस्या है। जहाँ आर्सेनिक, फ्लोराइड व आयरन युक्त पानी पीने के लिये लोग मजबूर हैं। ऐसे टोले में घर-घर शुद्ध पानी पहुँचाने की व्यवस्था ट्रीटमेंट प्लांट लगाकर होगा। राज्य में 33 जिले के लगभग 250 ब्लॉकों में दूषित पानी की समस्या है। जहाँ पानी में आर्सेनिक, फ्लोराइड व आयरन की अधिकांश मात्रा पाई जाती है।

पाँच जिले में बेगूसराय, खगड़िया, मुंगेर, भागलपुर व कटिहार के कुछ ब्लॉक में अलग-अलग टोले के पानी में आर्सेनिक, फ्लोराइड व आयरन की मात्रा मिलती है।

13 जिले में आर्सेनिक, 11 जिले में फ्लोराइड व नौ जिले में आयरन की मात्रा अधिक पाई जाती है।

आर्सेनिक युक्त पानी की समस्या वाले जिले


आर्सेनिक युक्त पानी की समस्या वाले जिलों में सारण, वैशाली, समस्तीपुर, दरभंगा, बक्सर, भोजपुर, पटना, बेगूसराय, खगड़िया, लखीसराय, मुंगेर, भागलपुर, कटिहार शामिल हैं।

कैमूर, रोहतास, औरंगाबाद, गया, नालंदा, शेखपुरा, जमुई, बाँका, मुंगेर, भागलपुर व नवादा आदि जिलों में फ्लोराइड युक्त पानी मिलता है।

सुसवा नदी के पानी से कैंसर होने की प्रबल सम्भावना


.मसूरी की पहाड़ियों से निकलनी वाली सभी छोटी-बड़ी नदियाँ देहरादून से होकर गुजरती हैं। यही वजह थी कि देहरादून का मौसम वर्ष भर सुहावना ही रहता था। हालांकि यह अब बीते जमाने की बात हो चुकी है। इसलिये कि देहरादून की सभी छोटी-बड़ी नदियाँ अतिक्रमण और प्रदूषण की भेंट चढ़ गई हैं।

देहरादून के क्लेमॉनटाउन से एक छोटी नदी निकलती है सुसवा, अर्थात सुर-सुर सरिता गाकर और अपने आबाद के बहाव क्षेत्र में सुसवा घास की पैदावार करके मथुरावाला में रिस्पना और बिन्दाल नदी से संगम बनाती हुई वह 20 किमी बहकर सौंग नदी में मिल जाती है। इस अन्तराल में सुसवा नदी के पानी की महत्ता ही बेजोड़ थी।

कुओं में पानी की जगह शराब


.यहाँ के कुओं से पानी उलीचेंगे तो शराब की तरह का लाल पानी ही निकलेगा। इस पानी से शराब की तरह की दुर्गन्ध आती है। इससे पानी दूषित हो चुका है। यह पीने के लिये तो दूर उपयोग करने लायक भी नहीं रह गया है। इसमें मछलियों और अन्य जीव भी जिन्दा नहीं रह पा रहे हैं। पानी का उपयोग करने वाले बीमार हो रहे हैं।

ग्रामीणों के मुताबिक यह पानी जहरीला हो चुका है। यह किसी एक कुँए की बात नहीं है, बल्कि इलाके के करीब आधा दर्जन से ज्यादा गाँवों में करीब पचास से ज्यादा कुओं की कहानी है। जमीनी पानी का दरअसल यहाँ पास ही में एक शराब कारखाना है, जिसके जहरीले अपशिष्ट सीधे जमीन में उतार दिये जाने से ऐसा हो रहा है।

मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में बडवाह के पास उमरिया और आसपास के करीब आधा दर्जन गाँवों के लोग तरह–तरह की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। यहाँ एक शराब कारखाने से निकलने वाले दूषित पानी और अपशिष्ट की वजह से समूचा पर्यावरण ही प्रदूषित हो रहा है। यहाँ के कुओं में बदबूदार लाल पानी आ रहा है तो जमीनी पानी भी खराब हो रहा है। किसानों का दावा है कि खेतों पर बने उनके सिंचाई कुओं में पानी तो दूषित है ही, इससे अब जमीन भी बंजर होने की कगार तक पहुँच रही है।

हालत यह है कि अब तो मिट्टी में भी इसका असर होने लगा है। बीते साल कुछ किसानों ने सब्जियाँ बोई थीं लेकिन प्रदूषण के असर से वे भी नष्ट हो गई। जमीन की उपजाऊ क्षमता खत्म हो रही है और फसलें लगातार चौपट हो रही है। किसानों को आशंका है कि यही हाल रहा तो कुछ सालों में उनकी जमीन ही बंजर बन जाएगी। इलाके के कई किसान कई बार प्रशासन को इसकी लिखित शिकायत कर चुके हैं पर कभी कोई मुकम्मिल कार्रवाई नहीं हो सकी है।

जीर्णोंद्धार की बाट जोह रही आदिगंगा

Author: 
उमेश कुमार राय

.पश्चिम बंगाल के इतिहास और संस्कृति से जुड़ी आदिगंगा तिल-तिल अपना अस्तित्व खो रही है लेकिन इसे बचाने के लिए न तो केंद्र और न ही पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से कोई कारगर कदम उठाया जा रहा है।

आदिगंगा का इतिहास उतना ही पुराना है जितना गंगा का। गोमुखी से निकलने वाली गंगा जब पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती है तो उसे हुगली कहा जाता है। इसी हुगली नदी की एक शाखा को आदिगंगा कहा जाता है। हेस्टिंग्स के निकट से यह शाखा निकली है जो दक्षिण कोलकाता के कालीघाट, टालीगंज, कूदघाट, बांसद्रोणी, नाकतल्ला, न्यू गरिया से होते हुए विद्याधरी नदी में मिल जाती है।

थर्मल प्लांट की राख से नौ गाँवों के 15 हजार लोग परेशान


.यहाँ के लोग खाँसते भी हैं तो उनके मुँह से राख निकलती है। नौ गाँवों के करीब 15 हजार से ज्यादा ग्रामीण ताप विद्युत परियोजना से उड़ने वाली राख (फ्लाई एश) से खासे परेशान हैं। प्रदूषण मण्डल की रिपोर्ट में यहाँ की हवा में आठ गुना तक ज्यादा घातक प्रदूषण बताया गया है। उड़ती हुई राख ने उनके घरों, कच्चे–पक्के मकानों और खेतों को मटमैले सफेद रंग की परत से ढँक दिया है। हवा–पानी सब दूषित हो चुका है।

यहाँ के हजारों जलस्रोतों में इसके मिलने से लोग यही दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। कई लोगों को गम्भीर बीमारियों का शिकार होना पड़ रहा है। अब तक इलाके के दो हजार से ज्यादा लोग तरह–तरह की बीमारियों से परेशान हैं। खेत, पेड़–पौधों, मवेशियों–पक्षियों सहित पूरे पर्यावरण के लिये इससे परेशानी बढ़ गई है। रहवासियों ने अधिकारियों से लेकर मुख्यमंत्री तक से बात की है लेकिन अब तक कोई हल नहीं निकला है।

मध्य प्रदेश के खण्डवा जिले में बीड के पास सन्त सिंगाजी ताप विद्युत परियोजना से निकल रही व्यर्थ राख अब उड़कर आसपास के भगवानपुरा, जलकुआँ, डाबरी और भुरलाय सहित नौ गाँवों तक पहुँच रही है। इससे दो हजार हेक्टेयर में फैले इन गाँवों के 15 हजार से ज्यादा लोग परेशान हैं। प्रभावित गाँवों में बीड के 3500, भुरलाय के 2700, भगवानपुरा के 2200, शिवरिया के 1600, मोहद के 1400, डाबरी के 1000, मिर्जापुर के 550, दोंगलिया के 400 और कावड़िया के 300 की जनसंख्या शामिल है।

मध्य प्रदेश प्रदूषण मण्डल ने मौके पर जाकर स्थिति का जायजा लिया तो परीक्षण में चौंकाने वाली हकीकत सामने आई। इन्दौर मण्डल के क्षेत्रीय प्रबन्धक आरके गुप्ता ने स्वीकार किया है कि यहाँ की हवा में आठ गुना तक ज्यादा घातक प्रदूषण है।

ब्रायोफाइट्स-प्रदूषण के जीव सूचक के रूप में (Bryophytes-as bioindicators of pollution)

Author: 
उदय शंकर अवस्थी
Source: 
अनुसंधान विज्ञान शोध पत्रिका, अक्टूबर, 2013

सारांश

ब्रायोफाइट्स में वातावरण में व्याप्त प्रदूषण के प्रति अधिक संवेदनशीलता होती है जिस कारण उन्हें प्रदूषण के जीव सूचक के रूप में देखा जाता है और इसी कारण से वातवरण में उपस्थित प्रदूषण के अध्ययन में सहायक होते हैं।

Abstract
Bryophytes are very sensitive to environmental pollution and therefore known as bioindicator of pollution and due to this quality, they are helpful in the study of environmental pollution.

पर्यावरण प्रदूषण-पर्यावरण की अशुद्धि या पर्यावरण की शुद्धता में गिरावट को ही पर्यावरण प्रदूषण कहते हैं। पोल्यूटेन्टस या प्रदूषण फैलाने वाले कण-जो एक निश्चित मात्रा में उपस्थित हो कर अनचाहा प्रभाव पैदा करते हैं। उदाहरण के लिये - कार्बन मोनो आक्साइड, सल्फर डाइ आक्साइड, धूल, सीमेन्ट, स्मोक, धातुओं के अॉक्साइड इत्यादि। शहरीकरण तथा औद्यौगीकरण मुख्य रूप से प्रदूषण के कारण है।

प्रदूषकों द्वारा ब्रायोफाइट्स पर होने वाले कुप्रभाव -
क. पोल्यूटेन्टस, ब्रायोफाइट्स के लैंगिक प्रजनन को घटाते हैं (डे स्लूवर और ले ब्लैंक, 1970)।

ख. पौधों की वृद्धि तथा उनमें होने वाली प्रकाश संश्लेषण की क्रिया को घटाते या कम करते हैं, परिणामत: उनकी मृत्यु हो जाती है।

घटक, जो क्षति की तीव्रता को प्रभावित करते हैं -
- प्रदूषण के उद्गम स्थल से दूरी,
- ‘‘एक्सपोजर फैक्टर’’ (सघनता X समय),
- जीव सतह की प्रकृति,
- आवास,
- पी एच,
- प्रेसीपिटेशन,
- विकास की अवस्था
- जाति या स्पीसीज की लाइफ फार्म।

ब्रायोफाइट्स और शैक में यह विशेषता है कि यह अन्य पौधों की अपेक्षा प्रदूषण के कणों को अधिक जल्दी और ज्यादा मात्रा में अवशोषित कर लेते हैं परिणामत: वह एक अच्छे जीव सूचक का कार्य करते हैं। जब प्रदूषण का स्तर बहुत कम होता है और अन्य पौधे उसे मापने में असमर्थ होते हैं तब यह उसकी उपस्थिति बता देते हैं।