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अमोनिया से दिल्ली परेशान


यमुना में हर साल अमोनिया की मात्रा बढ़ती जा रही है। लेकिन इस गम्भीर समस्या निपटने के लिये प्रदूषण को रोकने के लिये कोई सख्त कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। यमुना के पानी से अमोनिया की मात्रा के उपचार की एक सीमा होगी। लेकिन यदि अमोनिया उस सीमा को पार कर जाये पानी में फिर उसका उपचार कैसे किया जा सकेगा? जानकारों की माने तो यमुना के पानी में 3.5 से 4 पीपीएम तक अमोनिया पाया गया है। दिल्ली में पीने का पानी लाने के लिये इस्तेमाल कॅरियर लाइन चैनल में लीकेज होने की वजह से जिस पानी को यमुना की तरफ मोड़ दिया गया। पिछले दिनों दिल्ली के बड़े हिस्से में अमोनिया प्रभावित पानी आपूर्ति हुई। जब यह बात मीडिया में आई। अचानक दिल्ली जल बोर्ड के काम काज में तेजी आई। चंद्रावल और वजीराबाद जल शोधन संयंत्रों को बन्द किया गया, जहाँ से अमोनिया प्रभावित क्षेत्रों पानी भेजा जा रहा था।

बाद में स्थिति नियंत्रण में आने पर जल बोर्ड के ठप हुए जल शोधन संयंत्रों से पानी की आपूर्ति शुरू कर दी गई, लेकिन जो यमुना जीवनदायिनी है उसमें अभी भी अमोनिया की मात्रा बरकरार है। दिल्ली में जिन क्षेत्रों का पानी बुरी तरह से प्रभावित हुआ, उनमें करोलबाग, राजौरी गार्डन, तिलक नगर, बुराड़ी, पंजाबी बाग प्रमुख रहे।

जल बोर्ड की सिफारिश पर केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 12 जगहों से यमुना के पानी के सैम्पल उठाया। बोर्ड प्रदूषण तत्वों की जाँच कर रहा है। दिल्ली जल बोर्ड ने हरियाणा के सिंचाई विभाग और केन्द्रीय प्रदूषण बोर्ड से कार्रवाई करने की सिफारिश की है।

जम्मू की तवी नदी होगी प्रदूषण मुक्त


एक लम्बे समय से तवी नदी दूषित की जा रही है कि इसमें असंख्य गन्दे नाले गिर रहे हैं। पर प्रदूषण नियंत्रण विभाग आँखें मूँद कर सोया हुआ है। इस गन्दगी के जमाव के कारण कई बार तवी नदी में पानी का जलस्तर खतरे के निशान को पार कर गया है और तवी के किनारों पर बसे कई गाँव जलमग्न भी हुए, कई घर तबाह हुए, कई पुलों व सड़कों को नदी लील गई। तवी में हर वर्ष आने वाली बाढ़ व उसमें पड़ी गन्दगी विभाग की लापरवाही का ही परिणाम है। कई घरों के गन्दे पानी के नाले इस नदी में गिर रहे हैं और विभाग को इसकी पूरी जानकारी भी है। देश की दूसरी नदियों की तरह जम्मू की तवी नदी भी भयानक प्रदूषण की शिकार हो रही है। इसे देखते हुए सरकार अब एक्शन के मूड में आई है।

तवी नदी जम्मू शहर का एक प्रमुख आकर्षण का केन्द्र है। पिछले कई वर्षों से यह नदी प्रदूषण का शिकार होने के साथ-साथ अतिक्रमण का शिकार भी हुई है। इस नदी का महत्त्व राज्यवासियों के लिये गंगा नदी से कम नहीं हैं किन्तु इसमें गिर रही गन्दगी, अतिक्रमण व अनदेखी के चलते यह नदी अपना स्वरूप व महत्त्व खोती जा रही है।

शहर के गन्दे नाले इस नदी में आकर गिरते हैं, जो शहर की पवित्रता को दूषित करते हैं। इसके साथ ही नदी की भूमि पर अतिक्रमण किया जा रहा है, जो अब बढ़ता ही जा रहा है। एक सोची-समझी साजिश के तहत एक विशेष समुदाय के लोगों द्वारा इसके किनारों पर कब्जा किया गया है। लोगों का मानना है कि जैसे उत्तराखण्ड में गंगा नदी ने क्रोध का तांडव किया था, वैसा ही जम्मू में तवी नदी कर सकती है। प्रदूषण नियंत्रण विभाग के पास तवी नदी के लिये कोई ठोस प्लान नहीं है।

दूषित जल प्रबन्धन पर बने कानून


जल प्रदूषण से अधिक खतरा अल्पविकसित देशों में है। कच्चे मलजल का प्राकृतिक जल में प्रवाह द्वारा इसके निपटान की यह विधि भारत जैसे देशों में सबसे आम है। देश में इतने प्रचार-प्रसार के बाद भी कारखानों एवं घरों से निकलने वाले कचरे, मल, कीचड़, गन्दगी और विषाक्त प्रदूषक, सब पानी में फेंक दिये जाते हैं। मल उपचार के बावजूद समस्याएँ खड़ी होती हैं। कीचड़ के अतिरिक्त उद्योगों के रासायनों का रिसाव जल प्रदूषण का प्रमुख स्रोत हैं। मानव गतिविधियाँ पानी को प्रदूषित करने में बड़े पैमाने पर प्रभाव डाल रही हैं।केन्द्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती ने कहा है कि देश में दूषित जल प्रबन्धन एक गम्भीर मुद्दा बन गया है। नई दिल्ली में अपने मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ साप्ताहिक बैठक में केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि यह मुद्दा अब उस स्थिति में पहुँच चुका है, जहाँ मंत्रालय को इसके लिये एक नया कानून बनाना होगा।

भूजल विषाक्तता और फिल्टर (Groundwater toxicity and Filter)

Author: 
डॉ. ओम प्रभात अग्रवाल
Source: 
आविष्कार, जनवरी 2016

आर्सेनिक एक भयंकर विष है जिसकी जल में अनुमत मात्रा भारतीय मानक के अनुसार 0.05 मिलिग्राम प्रति लीटर मानी गई है यद्यपि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह और भी कम, 0.01 मिलिग्राम होनी चाहिए। सामान्यतः आर्सेनिक अपने जाने-माने यौगिक संखिया के रूप में ही उपस्थित होता है। अत्यन्त सूक्ष्म मात्रा में लगातार ग्रहण किये जाने पर यह मुख्यतः बालों और नाखूनों में एकत्र होने लगता है। बाल झड़ने लगते हैं और हाथ पैरों में पीड़ा रहने लग जाती है। वैसे इसका एकत्रीकरण हड्डियों तथा यकृत में भी होता है।

देश में पर्यावरण की स्थिति और चुनौतियाँ

Author: 
मनोज कुमार झा

हमने भारत की लगभग सभी नदियों को प्रदूषित कर चुके हैं। अब हालात धीरे-धीरे और भी गम्भीर होते जाएँगे। हमारी नदियों से ही धरती के पेट का पानी का भरण होता है। जिस दिन हानिकारक जीवाणु धरती के पेट के पानी को प्रदूषित कर दिया उस दिन मानव सभ्यता का अन्त प्रारम्भ हो जाएगा। दुनिया भर के प्रदूषित नदियों का पानी समुद्र में मिल रहा है। हमारा आकूत कचरा समुद्र में जमा हो रहा है। समुद्री जीव धीरे-धीरे नष्ट होते जा रहे हैं। प्रकृति की सबसे अनुपम कृति यानि मानव जिसके हाथ प्रकृति ने पृथ्वी को सौंप कर निश्चिंत होना चाहती थी। वह इससे अधिक कुछ कर भी नहीं सकती थी। लेकिन इसी मानव ने प्रकृति के सारी बनावट के आगे संकट पैदा कर दिया है। इस संकट से उबरने के लिये प्रकृति दिन-रात तत्परता से लगी है लेकिन कुछ भी सूत्र उसके हाथ आने से पहले मानव नए-नए संकट पैदा कर रहा है।

आज आधुनिकता के केन्द्र में मनुष्य है। मनुष्य को सिर्फ धन व प्रतिष्ठा अर्जित करना ही मुख्य चिन्ता रही है। धन व प्रतिष्ठा ने दो देशों के बीच से लेकर दो परिवारों के बीच तक अपना पाँव पसार कर प्रकृति को सर्वनाश की पराकाष्ठा तक पहुँचाने में लगी है। अब तो विकसित देश विकाशील देशों की ओर बड़े ध्यान के टकटकी लगाए देख रही है कि कहीं जो कुछ अपने विकास के लिये उसने किया है वही वह तो नहीं करने जा रहा।

थोड़े ही शब्दों में कहें तो पर्यावरण संकट पृथ्वी को भस्म कर सकती है। केवल भारत ही नहीं विश्व के सभी देश को अपनी विकास की आधुनिक परिभाषा को बदलनी होगी। सभी देशों को अपनी सोच बदलनी होगी। दुनिया भर के कार्य और व्यापार के तौर-तरीके बदलने होंगे।

स्पर्श के लायक भी नहीं रहा यमुना का पानी

Author: 
प्रमोद भार्गव

वर्तमान स्थितियों में प्रदूषण सम्बन्धी तमाम रिपोर्टों के बावजूद यमुना दिल्ली में 25 किलोमीटर और आगरा में 10 किमी लम्बे नालों में तब्दील हो चुकी है। अकेली दिल्ली में अनेक चेतावनियों के बावजूद प्रतिदिन 3296 मिलियन गैलन लीटर गन्दा पानी और औद्योगिक अवशेष विभिन्न नालों से यमुना में उड़ेले जा रहे हैं। करीब 5600 किमी लम्बी सीवर लाइनों से मल-मूत्र बहाया जा रहा है। हालांकि 17 स्थलों पर 30 सीवर ट्रीटमेंट प्लांट क्रियाशील हैं, लेकिन उनकी गन्दे मल को स्वच्छ जल में परिवर्तित करने की दक्षता सन्दिग्ध है। इसे देश और नदियों का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि हमारी जीवनदायी नदियों का पानी अछूत होता जा रहा है। यमुना नदी के पानी की जो ताजा रिपोर्ट आई है, उसके अनुसार नदी जल में अमोनिया की मात्रा इस हद तक बढ़ गई है कि उसे छूना भी स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।

यह रिपोर्ट जल संस्थान आगरा ने दी है। इस पानी में अमोनिया की मात्रा खतरे के स्तर को पार कर चुकी है। इस कारण फरवरी 2016 को दिल्ली के वजीरावाद और चंदावल जल शोधन संयंत्रों को दो दिनों के लिये बन्द भी कर दिया गया था। दरअसल दिल्ली क्षेत्र में यमुना में अमोनिया की मात्रा 1.12 पार्टिकल्स पर मिलियन (पीपीएम) तक पहुँच गई थी, जबकि पानी में अमोनिया की मात्रा शून्य होनी चाहिए।

काली नदी का काला पानी


देश की अन्य प्रदूषण युक्त नदियों के फिर से स्वच्छ होने की उम्मीद जगी थी। लेकिन साल बीत जाने के बाद भी प्रदूषण साफ करने की कोई योजना सफल नहीं हुई। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर काली नदी को कब संजीवनी मिलेगी। केन्द्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, इस नदी के पानी में अत्यधिक मात्रा में सीसा, मैगनीज और लोहा जैसे तत्व घुले हुए हैं। इसमें प्रतिबन्धित कीटनाशक भी काफी मात्रा में घुल चुका है। यही वजह है कि इस नदी के पानी में अब ऑक्सीजन पूरी तरह से खत्म हो गया है।

एसिडयुक्त पानी पीने को मजबूर

हैण्डपम्प से निकलता दूषित जलहैण्डपम्प से निकलता दूषित जलवे लोग केमिकल व एसिडयुक्त पानी पीने को मजबूर हैं। पीला या काला और बदबूदार पानी जिससे हाथ धोने की भी इच्छा न हो, ऐसा पानी उन्हें पीना पड़ रहा है। यही पानी नालों से होते हुए क्षिप्रा की सहायक नदी नागधम्मन को प्रदूषित करता है और इसका दूषित पानी क्षिप्रा में भी पहुँचता है। इतना ही नहीं यहाँ के माहौल में साँस लेना भी दूभर होता जा रहा है। आसपास की हवा में प्रदूषण से तीव्र दुर्गन्ध आती रहती है। इन लोगों ने इसकी शिकायत जिला अधिकारियों से भी की है लेकिन अब भी हालात में कोई सुधार नहीं हुआ है।

मध्य प्रदेश के देवास शहर में औद्योगिक इलाके के पास रहने वाली करीब आधा दर्जन बस्तियों में यह समस्या है। यहाँ पाँच हजार से ज्यादा लोग बीते कई महीनों से इस त्रासदी का सामना कर रहे हैं। लगातार शिकायतें करने के बाद भी अब तक इनकी परेशानियों का कोई हल नहीं निकला है। इन्दौर रोड औद्योगिक क्षेत्र के पास की बस्तियों बावड़िया, सन सिटी, बीराखेड़ी, बिंजाना, इन्दिरा नगर सहित आसपास के कुछ इलाकों के लोगों के पास पीने के पानी का अन्यत्र कोई वैकल्पिक संसाधन भी नहीं है। लिहाजा इन्हें मजबूरी में ही सही, दूषित पानी ही पीने को मजबूर होना पड़ रहा है।

नदी की जमीन पर बसा अवैध मोहल्ला


नदी जिस दिन अपनी जमीन खाली कराने को आगे आ जाएगी, वह दिन यहाँ बसे 1700 से अधिक परिवारों के लिये भारी होगा। इसलिये इस बात पर वहाँ रहने वालों को भी विचार करना चाहिए। लेकिन साथ-साथ इस सवाल का जवाब जिला प्रशासन को भी देना होगा कि जब यह जमीन टांगरी नदी की थी फिर उस समय अवैध निर्माण पर रोक क्यों नहीं लगाई गई, जब नदी के किनारे काॅलोनियों का निर्माण हो रहा था। कुछ महीने पहले की बात है। बरसात के मौसम में टांगरी नदी के आस-पास बसे डेढ़ हजार परिवारों की जान साँसत में फँसी थी। जब बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। वहाँ बसे लोग सरकार पर आरोप लगा रहे थे कि बार-बार उन्हें उजड़ना पड़ता है और सरकार उनकी तरफ ध्यान नहीं देती। टांगरी नदी हरियाणा अन्तर्गत अम्बाला छावनी से होकर गुजरती है।

यह नदी अम्बाला छावनी के दूसरे छोर पर बसे घसितपुर तक जाती है। यहाँ लोग लगभग बीस सालों से बसे है। यहाँ अवैध काॅलोनिया नदी की जमीन पर बस गई हैं। जिन घरों में पहाड़ से आने वाला पानी बरसात के दिनों में अन्दर तक चला जाता है। इन महीनों में छतों पर भी कई बार यहाँ रहने वालों को खाना बनाना पड़ता है क्योंकि पानी घर के अन्दर तक घुसा रहता है।

एक तरफ यहाँ रहने वाले अपनी गलियों की सड़क दिखा रहे हैं, जमीन के रजिस्ट्रेशन के कागज दिखा रहे हैं और बिजली का कनेक्शन भी और पूछ रहे हैं कि जब यह सब हमें मिला है फिर हमारी काॅलोनी अवैध कैसे है? दूसरी तरफ जिला प्रशासन इन घरों को अवैध मानता है और उनके पास भी सरकारी दस्तावेज हैं लेकिन अवैध काॅलोनियों में रहने वालों के सवाल के जवाब नहीं।