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स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा

उद्देश्‍य-

विशेषकर स्‍कूली बच्‍चों के लिए सुनिश्चित करना कि गांव में पैदल चलते समय वे हमेशा चप्‍पल पहनें। और महिलाओं को पेयजल निथारने की अच्‍छी तकनीकें सिखाना।

स्थिति-

सुरक्षित जल भंडारण

उद्देश्‍य:
सुनिश्चित करना कि घरेलू स्‍तर पर संग्रहित किए गए पेय जल का रख-रखाव सुरक्षित तरीके से किया जा रहा है भले ही यह पानी गर्मियों में पारंपरिक स्रोत अथवा देखने में प्रदूषित लगता हो।
स्थिति:
यह सुनिश्चित करना कि घर में संग्रहित किए गए पेयजल का भण्डारण सुरक्षित रूप से किया गया है या नहीं। संग्रहण के बर्तन गंदे होने, संग्रहण के समय अनुचित विधि का उपयोग, बर्तनों को ढककर नहीं रखना, बर्तनों का फर्श पर टिकना तथा बर्तन में गिलास डुबोकर पेयजल निकालना आदि से दूषित होने की प्रबल आशंका बनी रहती है। जागरूकता लाने और स्‍व-भंडारण की विधियों में सुधार लाने के लिए प्रोन्‍नत संदेश के कारण आज इस स्थिति में बदलाव आया है।

सर्वोत्तम पद्धतियों का अपनाया जाना

नर्मदा-ताप्ती को प्रदूषण से खतरा

सचिन शर्मा/ मध्यप्रदेश की औद्योगिक पट्टी इंदौर क्षेत्र में बहने वाली नर्मदा और ताप्ती नदियों को औद्योगिक प्रदूषण से बेहद खतरा है। यह खतरा मुख्यतः क्षेत्र के पाँच जिलों इंदौर, खण्डवा, खरगौन, बुरहानपुर और बड़वानी में स्थित लगभग १२०० छोटी औद्योगिक इकाइयों से है जो कंजूसी में प्रदूषण नियंत्रण के मानकों की परवाह नहीं करतीं और क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड उन्हें यह काम करने से रोक भी नहीं पाता। इस प्रदूषण से उक्त दोनों अमूल्य नदियों में धीरे-धीरे जहर घुल रहा है।

द डार्क ज़ोन अर्थात अंधकार क्षेत्र

हैंडपंप से पेयजल निकालने वाला दैनिक कार्यहैंडपंप से पेयजल निकालने का दैनिक कार्यजब डाउन टू अर्थ संवाददाता निधि अग्रवाल और डीबी मनीषा ने भूमिगत जल में फ्लोराइड और विषाक्‍त पदार्थों पर अपनी रिपोर्ट लिखी तब हम इस समस्‍या के विस्‍तार और घातक प्रभावों की कल्‍पना मात्र से ही सिहर उठे। वास्‍तव में निराशा में लिखी गई एक कहानी है, जिसका नाम - द डार्क ज़ोन है/ यह भूमिगत जल के बारे में उस समय की कहानी है जब पानी (रस) विष में बदल जाता है और जब किसी एक कष्‍टदायी रोग और मौत का कारण बन जाता है। यह 'प्राकृतिक आपदा' नहीं है -जहां गहराई तक जाने वाला प्राकृतिक विष और फ्लोराइड पेयजल में अपना मार्ग बना लेते हैं। ऐसा लगता है जैसे

क्लिनिक, जो सुधारेगा धरती की सेहत

एनबीटीः ऐसे दौर में जबकि प्रदूषण, ग्लोबल वॉर्मिन्ग और दूसरी समस्याएं हमारे लिए परेशानी का सबब बनती जा रही हैं, न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में एक इन्वाइरन्मंट हेल्थ क्लिनिक खोला गया है। इस क्लिनिक में आप अपने आसपास और पर्यावरण से जुड़ी किसी भी समस्या पर बात कर सकते हैं और उसके लिए समाधान भी मांग सकते हैं। और तो और आपको मिलने वाले सुझाव भी उसी तर्ज और उतने ही अहम होंगे, जितने कि डॉक्टर से मिली दवा।

जल में बसा देवता

बाढ़अनुपम मिश्रवे पुरोगामी पुरुष हैं। कार्यकर्ता तो आपको बहुत मिलेंगे, परंतु कर्म व ज्ञान का सम्मिश्रण आपको अनुपम मिश्र में ही मिलेगा। ज्ञान, कोरी सूचना भर नहीं, अनुभव की आंच में तपा हुआ अर्जित ज्ञान। उनका समूचा जीवन जल के प्रति एक सच्ची प्रार्थना रहा है। तीन दशकों से भी अधिक समय से वे भारत के लुप्त होते जल संसाधनों को बचा रहे हैं। इसलिये उनका प्रत्येक शब्द एक दस्तावेज बनता है, जहाँ वे जल संकट के विभिन्न पहलुओं को अपनी पैनी दृष्टि से उघाड़ते हैं। नगर जल प्रबंधन, शुद्ध पेयजल, भूजल व सार्वजनिक जल, हरेक मसले पर उनके तर्क बड़े पुष्ट हैं। उनकी दोनों किताबें – ‘आज भी खरे हैं त

जल जनित रोग और सावधानियाँ

मानव शरीर में उपस्थित जलमानव शरीर में उपस्थित जलजल या पानी अनेक अर्थों में जीवनदाता है। इसीलिए कहा भी गया है। जल ही जीवन है। मनुष्य ही नहीं जल का उपयोग सभी सजीव प्राणियों के लिए अनिवार्य होता है। पेड़ पौधों एवं वनस्पति जगत के साथ कृषि फसलों की सिंचाई के लिए भी यह आवश्यक होता है। यह उन पांच तत्वों में से एक है जिससे हमारे शरीर की रचना हुई है और हमारे मन, वाणी, चक्षु, श्रोत तथा आत्मा को तृप्त करती है। इसके बिना हम जीवित नहीं रह सकते। शरीर में इसकी कमी से हमें प्यास महसूस होती है और इससे पानी शरीर का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। अत: यह हमारे जीवन का आधार है। अब तक प्राप्त जानकारियो के अनुसार यह स्पष्ट हो गया है कि जल अस्तित्व के लि

क्या मैदानी क्या रेतीली- सभी जगह पानी की कमी

गोमती नदीगोमती नदी तलहटी में भी पेयजल की समस्या / भरावन (हरदोई)। ऐसा नहीं है कि पेयजल की समस्या केवल मैदानी क्षेत्र भरावन में ही बनी हुई है। तपती धूप और निरंतर नीचे गिरता सतर गोमती नदी तलहटी में बसें गांवों भटपुर, कटका, महीठा के डालखेड़ा, लालपुर खाले, जाजपुर, बेहड़ा, नई गढ़ी इत्यादि गांवों में भी पेयजल की समस्या से लोग जुझ रहे है। गोमती नदी के किनारे बसे भटपुर गांव व सड़क के चौराहे पर भी पेयजल की गम्भीर समस्या बनी हुई है। चौराहे पर इण्डिया मार्का नल की कमी हैं दूर-दूर से लोग यहां आते हैं परन्तु पीने के पानी की किल्लत से लोग परेशान होते हैं। रामप्रकाश तिवारी, केशव दीक्षित, अनूप, जयकेश, शैलेन्द्र आदि लोग पानी की समस्या के बारे में कहते हैं कि यहां

यमुना तो फिर भी मैली

यमुना में बढ़ता प्रदूषणयमुना में बढ़ता प्रदूषणपांच दिन के सफाई अभियान में नदी से करीब 600 टन कचरा निकाला गया मगर यमुना जल को वाकई स्वच्छ बनाने के लिए बहुत कुछ करना जरूरी है

अगर यमुना नदी रो सकती तो जरूर रो पड़ती। लोगों ने उसके सीने पर जिस बेदर्दी से कूड़े और गंदगी का ढ़ेर लगा दिया है, उससे उसकी आत्मा कराह उठी है। इसके तटों पर इतनी तबाही मचाई गई है कि यह ऐतिहासिक नदी मरणासन्न अवस्था में पहुंच गई है। अब दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार ने इस नदी को साफ करने का बीड़ा उठा लिया है- नदी में हुए भारी प्रदूषण को देखते हुए भले ही ये प्रयास पिछले प्रयासों की तरह नगण्य साबित हों।