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क्लिनिक, जो सुधारेगा धरती की सेहत

एनबीटीः ऐसे दौर में जबकि प्रदूषण, ग्लोबल वॉर्मिन्ग और दूसरी समस्याएं हमारे लिए परेशानी का सबब बनती जा रही हैं, न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में एक इन्वाइरन्मंट हेल्थ क्लिनिक खोला गया है। इस क्लिनिक में आप अपने आसपास और पर्यावरण से जुड़ी किसी भी समस्या पर बात कर सकते हैं और उसके लिए समाधान भी मांग सकते हैं। और तो और आपको मिलने वाले सुझाव भी उसी तर्ज और उतने ही अहम होंगे, जितने कि डॉक्टर से मिली दवा।

जल में बसा देवता

बाढ़अनुपम मिश्रवे पुरोगामी पुरुष हैं। कार्यकर्ता तो आपको बहुत मिलेंगे, परंतु कर्म व ज्ञान का सम्मिश्रण आपको अनुपम मिश्र में ही मिलेगा। ज्ञान, कोरी सूचना भर नहीं, अनुभव की आंच में तपा हुआ अर्जित ज्ञान। उनका समूचा जीवन जल के प्रति एक सच्ची प्रार्थना रहा है। तीन दशकों से भी अधिक समय से वे भारत के लुप्त होते जल संसाधनों को बचा रहे हैं। इसलिये उनका प्रत्येक शब्द एक दस्तावेज बनता है, जहाँ वे जल संकट के विभिन्न पहलुओं को अपनी पैनी दृष्टि से उघाड़ते हैं। नगर जल प्रबंधन, शुद्ध पेयजल, भूजल व सार्वजनिक जल, हरेक मसले पर उनके तर्क बड़े पुष्ट हैं। उनकी दोनों किताबें – ‘आज भी खरे हैं त

जल जनित रोग और सावधानियाँ

मानव शरीर में उपस्थित जलमानव शरीर में उपस्थित जलजल या पानी अनेक अर्थों में जीवनदाता है। इसीलिए कहा भी गया है। जल ही जीवन है। मनुष्य ही नहीं जल का उपयोग सभी सजीव प्राणियों के लिए अनिवार्य होता है। पेड़ पौधों एवं वनस्पति जगत के साथ कृषि फसलों की सिंचाई के लिए भी यह आवश्यक होता है। यह उन पांच तत्वों में से एक है जिससे हमारे शरीर की रचना हुई है और हमारे मन, वाणी, चक्षु, श्रोत तथा आत्मा को तृप्त करती है। इसके बिना हम जीवित नहीं रह सकते। शरीर में इसकी कमी से हमें प्यास महसूस होती है और इससे पानी शरीर का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। अत: यह हमारे जीवन का आधार है। अब तक प्राप्त जानकारियो के अनुसार यह स्पष्ट हो गया है कि जल अस्तित्व के लि

क्या मैदानी क्या रेतीली- सभी जगह पानी की कमी

गोमती नदीगोमती नदी तलहटी में भी पेयजल की समस्या / भरावन (हरदोई)। ऐसा नहीं है कि पेयजल की समस्या केवल मैदानी क्षेत्र भरावन में ही बनी हुई है। तपती धूप और निरंतर नीचे गिरता सतर गोमती नदी तलहटी में बसें गांवों भटपुर, कटका, महीठा के डालखेड़ा, लालपुर खाले, जाजपुर, बेहड़ा, नई गढ़ी इत्यादि गांवों में भी पेयजल की समस्या से लोग जुझ रहे है। गोमती नदी के किनारे बसे भटपुर गांव व सड़क के चौराहे पर भी पेयजल की गम्भीर समस्या बनी हुई है। चौराहे पर इण्डिया मार्का नल की कमी हैं दूर-दूर से लोग यहां आते हैं परन्तु पीने के पानी की किल्लत से लोग परेशान होते हैं। रामप्रकाश तिवारी, केशव दीक्षित, अनूप, जयकेश, शैलेन्द्र आदि लोग पानी की समस्या के बारे में कहते हैं कि यहां

यमुना तो फिर भी मैली

यमुना में बढ़ता प्रदूषणयमुना में बढ़ता प्रदूषणपांच दिन के सफाई अभियान में नदी से करीब 600 टन कचरा निकाला गया मगर यमुना जल को वाकई स्वच्छ बनाने के लिए बहुत कुछ करना जरूरी है

अगर यमुना नदी रो सकती तो जरूर रो पड़ती। लोगों ने उसके सीने पर जिस बेदर्दी से कूड़े और गंदगी का ढ़ेर लगा दिया है, उससे उसकी आत्मा कराह उठी है। इसके तटों पर इतनी तबाही मचाई गई है कि यह ऐतिहासिक नदी मरणासन्न अवस्था में पहुंच गई है। अब दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार ने इस नदी को साफ करने का बीड़ा उठा लिया है- नदी में हुए भारी प्रदूषण को देखते हुए भले ही ये प्रयास पिछले प्रयासों की तरह नगण्य साबित हों।

पर्यावरण सुरक्षा

सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों में संभवत: यह सबसे मुश्किल लक्ष्य है क्योंकि यह मुद्दा इतना सरल नहीं है, जितना दिखता है। टिकाऊ पर्यावरण के बारे में जिस अवधारणा के साथ लक्ष्य सुनिश्चित किया गया है, सिर्फ उस अवधारणा के अनुकूल परिस्थितियां ही तय सीमा में तैयार हो जाए, तो उपलब्धि ही मानी जाएगी।

यद्यपि यह माना जाए कि विकास की राष्ट्रीय नीतियों एवं कार्यक्रमों के बीच समन्वय एवं उनमें व्यवस्थित रूप से एकीकरण किया जाए, पर यह संभव नहीं दिखता।

जलसंरक्षण ने बदली गांव की तस्वीर

तालाबतालाबजयपुर-अजमेर राजमार्ग पर दूदू से 25 किलोमीटर की दूरी पर राजस्थान के सूखाग्रस्त इलाके का एक गांव है - लापोड़िया। यह गांव ग्रामवासियों के सामूहिक प्रयास की बदौलत आशा की किरणें बिखेर रहा है। इसने अपने वर्षों से बंजर पड़े भू-भाग को तीन तालाबों (देव सागर, फूल सागर और अन्न सागर) के निर्माण से जल-संरक्षण, भूमि-संरक्षण और गौ-संरक्षण का अनूठा प्रयोग किया है। इतना ही नहीं, ग्रामवासियों ने अपनी सामूहिक बौध्दिक और शारीरिक शक्ति को पहचाना और उसका उपयोग गांव की समस्याओं का समाधान निकालने में किया। आज गोचर का प्रसाद बांटता यह गांव दूसरे गांवों को प्रेरणा देने एवं आदर्श प्रस्तुत करने की स्थिति में आ गया है।

सिंचाई योजना विकास

स्वतंत्रता के बाद योजना अवधि के दौरान जल संसाधन विकास के प्रारम्भिक चरण में जल संसाधनों को तेजी से काम में लगाना मुख्य प्रयोजन था। तदनुसार राज्य सरकारों को सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, जल विद्युत उत्पादन, पेयजल आपूर्ति, औद्योगिक तथा विभिन्न विविध प्रयोगों जैसे विशिष्टि प्रयोजनों के लिए जल संसाधन परियोजनाएं तैयार और विकसित करने को प्रोत्साहित किया गया। इसका फल यह हुआ कि क्रमिक पंचवर्षीय योजनाओं के साथ सारे देश के भीतर बांधों, बराजों, जल विद्युत संरचनाओं, नहर नेटवर्क आदि से युक्त परियोजनाएं काफी संख्या में उभर कर आईं। भारत में विशाल भण्डारण क्षमता जल संसाधन विकास के क्षेत्र में एक अनन्य उपलब्धि मानी जा सकती है। तैयार किए गए इन भण्डारण कार्यों के कारण कमान क्षेत्र में सुनिश्चित सिंचाई उपलब्ध कराना, जल विद्युत तथा विभन्नि स्थानों पर स्थित तापीय विद्युत संयंत्

जल प्रदूषण (Water Pollution in Hindi)

जल प्रदूषण : कारण, प्रभाव एवं निदान (Water Pollution: Causes, Effects and Solution)


‘जल प्रदूषण’ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 2011
वर्तमान में वर्षा की अनियमित स्थिति, कम वर्षा आदि को देखते हुए उद्योगों को अपनी जल खपत पर नियंत्रण कर उत्पन्न दूषित जल का समुचित उपचार कर इसके सम्पूर्ण पुनर्चक्रण हेतु प्रक्रिया विकसित करनी चाहिए। ताकि जलस्रोतों के अत्यधिक दोहन की स्थिति से बचा जा सके। हम पिछले अध्याय में पढ़ आये हैं कि पानी में हानिकारक पदार्थों जैसे सूक्ष्म जीव, रसायन, औद्योगिक, घरेलू या व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से उत्पन्न दूषित जल आदि के मिलने से जल प्रदूषित हो जाता है। वास्तव में इसे ही जल प्रदूषण कहते हैं। इस प्रकार के हानिकारक पदार्थों के मिलने से जल के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणधर्म प्रभावित होते हैं। जल की गुणवत्ता पर प्रदूषकों के हानिकारक दुष्प्रभावों के कारण प्रदूषित जल घरेलू, व्यावसायिक, औद्योगिक कृषि अथवा अन्य किसी भी सामान्य उपयोग के योग्य नहीं रह जाता।