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पर्यावरण सुरक्षा

सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों में संभवत: यह सबसे मुश्किल लक्ष्य है क्योंकि यह मुद्दा इतना सरल नहीं है, जितना दिखता है। टिकाऊ पर्यावरण के बारे में जिस अवधारणा के साथ लक्ष्य सुनिश्चित किया गया है, सिर्फ उस अवधारणा के अनुकूल परिस्थितियां ही तय सीमा में तैयार हो जाए, तो उपलब्धि ही मानी जाएगी।

यद्यपि यह माना जाए कि विकास की राष्ट्रीय नीतियों एवं कार्यक्रमों के बीच समन्वय एवं उनमें व्यवस्थित रूप से एकीकरण किया जाए, पर यह संभव नहीं दिखता।

जलसंरक्षण ने बदली गांव की तस्वीर

तालाबतालाबजयपुर-अजमेर राजमार्ग पर दूदू से 25 किलोमीटर की दूरी पर राजस्थान के सूखाग्रस्त इलाके का एक गांव है - लापोड़िया। यह गांव ग्रामवासियों के सामूहिक प्रयास की बदौलत आशा की किरणें बिखेर रहा है। इसने अपने वर्षों से बंजर पड़े भू-भाग को तीन तालाबों (देव सागर, फूल सागर और अन्न सागर) के निर्माण से जल-संरक्षण, भूमि-संरक्षण और गौ-संरक्षण का अनूठा प्रयोग किया है। इतना ही नहीं, ग्रामवासियों ने अपनी सामूहिक बौध्दिक और शारीरिक शक्ति को पहचाना और उसका उपयोग गांव की समस्याओं का समाधान निकालने में किया। आज गोचर का प्रसाद बांटता यह गांव दूसरे गांवों को प्रेरणा देने एवं आदर्श प्रस्तुत करने की स्थिति में आ गया है।

सिंचाई योजना विकास

स्वतंत्रता के बाद योजना अवधि के दौरान जल संसाधन विकास के प्रारम्भिक चरण में जल संसाधनों को तेजी से काम में लगाना मुख्य प्रयोजन था। तदनुसार राज्य सरकारों को सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, जल विद्युत उत्पादन, पेयजल आपूर्ति, औद्योगिक तथा विभिन्न विविध प्रयोगों जैसे विशिष्टि प्रयोजनों के लिए जल संसाधन परियोजनाएं तैयार और विकसित करने को प्रोत्साहित किया गया। इसका फल यह हुआ कि क्रमिक पंचवर्षीय योजनाओं के साथ सारे देश के भीतर बांधों, बराजों, जल विद्युत संरचनाओं, नहर नेटवर्क आदि से युक्त परियोजनाएं काफी संख्या में उभर कर आईं। भारत में विशाल भण्डारण क्षमता जल संसाधन विकास के क्षेत्र में एक अनन्य उपलब्धि मानी जा सकती है। तैयार किए गए इन भण्डारण कार्यों के कारण कमान क्षेत्र में सुनिश्चित सिंचाई उपलब्ध कराना, जल विद्युत तथा विभन्नि स्थानों पर स्थित तापीय विद्युत संयंत्

जल प्रदूषण (Water Pollution in Hindi)

जल प्रदूषण : कारण, प्रभाव एवं निदान (Water Pollution: Causes, Effects and Solution)


‘जल प्रदूषण’ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 2011
वर्तमान में वर्षा की अनियमित स्थिति, कम वर्षा आदि को देखते हुए उद्योगों को अपनी जल खपत पर नियंत्रण कर उत्पन्न दूषित जल का समुचित उपचार कर इसके सम्पूर्ण पुनर्चक्रण हेतु प्रक्रिया विकसित करनी चाहिए। ताकि जलस्रोतों के अत्यधिक दोहन की स्थिति से बचा जा सके। हम पिछले अध्याय में पढ़ आये हैं कि पानी में हानिकारक पदार्थों जैसे सूक्ष्म जीव, रसायन, औद्योगिक, घरेलू या व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से उत्पन्न दूषित जल आदि के मिलने से जल प्रदूषित हो जाता है। वास्तव में इसे ही जल प्रदूषण कहते हैं। इस प्रकार के हानिकारक पदार्थों के मिलने से जल के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणधर्म प्रभावित होते हैं। जल की गुणवत्ता पर प्रदूषकों के हानिकारक दुष्प्रभावों के कारण प्रदूषित जल घरेलू, व्यावसायिक, औद्योगिक कृषि अथवा अन्य किसी भी सामान्य उपयोग के योग्य नहीं रह जाता।

जहरीला हुआ पंजाब का पानी

पंजाब का पानीपंजाब का पानीजी क्राइम/जालंधर/पंजाब। कहते हैं 'जल ही जीवन है', लेकिन पंजाब में अब यही बात हम दावे के साथ नहीं कह सकते, क्योंकि पंज दरियाओं की इस धरती का पानी अब इतना जहरीला हो चुका है कि अगर अब भी हम न चेते तो यह जीवन देने की बजाय, जीवन ले लेगा। इसका कारण है पानी में बढ़ता केमिकल। मालवा के पानी में तो केमिकल पहले ही काफी मात्रा में मिल चुका है और अब दोआबा व माझा में भी पानी प्रदूषित हो चुका है।

भारत की अधिकतर नदियाँ प्रदूषण की शिकार

बढ़ता प्रदूषणबढ़ता प्रदूषणबीबीसी/ बनारस/ भारत की सबसे पवित्र माने जाने वाली नदियों में से एक गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए स्वच्छ गंगा अभियान नाम के ग़ैर सरकारी संगठन ने लंदन स्थित एक संगठन से समझौता करने की योजना बनाई है.क़रीब ढाई हज़ार किलोमीटर लंबी गंगा नदी भारत के कई राज्यों से होकर बहती है.

बनारस में गंगा की हालत बहुत खराब है. वहाँ लोगों को ये बताए जाने की आवश्यकता है कि वे नदी के आसपास कैसे रहें,
मार्क लॉयड, टेम्स 21

प्लास्टिक की बोतल का पानी दिमाग के लिए खतरनाक

पानी और स्वास्थ्यपानी और स्वास्थ्यतरकश ब्यूरो/ कनाडा की एक रिसर्च टीम के अनुसार प्लास्टिक की बोतल में उपलब्ध पानी दिमाग के लिए खतरनाक होता है. प्लास्टिक के कंटेनर बनाने के उपयोग मे लिया जाने वाला बाइसफेनोल ए दिमाग के कार्यकलापों को प्रभावित कर सकता है और इंसान की समझने और याद रखने की शक्ति को छीण करता है.

वर्षा ऋतु की बीमारियाँ और उनसे बचाव

Author: 
राकेश सिंह
Source: 
योजना, अगस्त 2008
वर्षा ऋतु हमारे लिए हजार नेमते लेकर आती है, लेकिन मुश्किलें भी कम नहीं। इस मौसम में शरीर का मेटाबालिज़्म कम जाता है जो हमारी पाचन क्षमता को प्रभावित करता है। गन्दे पानी से पैदा होने वाली बीमारियाँ भी कम नहीं होतीं। मच्छरों और अन्य कीटों का प्रकोप बढ़ जाता है और वे बीमारियों का दूसरा बड़ा जरिया बनते हैं। वरिष्ठ चिकित्सक ने प्रस्तुत लेख में ऐसी ही कुछ बीमारियों के कारण और निदान की चर्चा की है हैजा एक संक्रामक रोग है, जो विविरियो कोल्री नामक जीवाणु द्वारा उत्पन्न होता है। ये जीवाणु साधारण दूषित जल के माध्यम से रोगी से स्वस्थ मनुष्य के शरीर में पहुँचते हैं। कई बार सीधे रोगी के सम्पर्क में आने से स्वस्थ मनुष्य को हैजे का संक्रमण हो सकता है। हैजा को कॉलरा भी कहा जाता है। एक स्वस्थ मनुष्य के शरीर में मुँह के माध्यम से पहुँच कर विवरियो-कोल्री जीवाणु छोटी आँत का संक्रमण करते हैं। यह संक्रमण इन जीवाणुओं द्वारा स्रावित एक जहरीले पदार्थ के कारण होता है जिसे ‘इण्टीरोटॉक्सिन’ कहा जाता है। यह केवल मानव शरीर में स्थित छोटी आँत की दीवारों पर ही अपना दुष्प्रभाव डालता है जिसके फलस्वरूप रोगी को दस्त की शिकायत हो जाती है। आमतौर पर लगभग नब्बे प्रतिशत रोगियों में यह सामान्य अतिसार की तरह उत्पन्न होती है परन्तु कुछ लोगों में यह जानलेवा भी सिद्ध हो सकती है। यह रोग सभी आयु वर्गों में पाया जाता है, परन्तु छोटे बच्चे इसके कुप्रभाव से ज्यादा ग्रसित होते हैं।

कीटनाशक से कैंसर

Author: 
डॉ. श्रीगोपाल काबरा
Source: 
पाञ्चजन्य, 31 अगस्त 2014
समस्त कीटनाशक जैविक विष हैं। विभिन्न प्रकार के विष अलग-अलग तरह से प्रभावी होते हैं। सभी विष जीव कोशिकाओंं में सतत् चल रही रासायनिक जीवन प्रक्रिया को बाधित कर देते हैं। ऐसे कीटनाशकों के प्रयोग से रक्त कैंसर, ब्रेन कैंसर और सॉफ्ट टिश्यू सरकोमा नामक कैंसर होने की दर अधिक होती है। प्रतिरोधात्मक शक्ति के क्षीण होने से भी कैंसर की संभावना बढ़ जाती है। कीटनाशक जैविक विष होते हैं। विभिन्न प्रकार के रासायनिक विष, मानव शरीर पर उनके कुप्रभाव की संभावना तार्किक है। यहां तक इनसे कैंसर भी हो सकता है। यह साक्षय कीटनाशकों के व्यापक प्रयोग पर धीरे-धीरे सामने आए हैं। कीटनाशकों के व्यापक प्रयोग से अमेरिका में पक्षी विलुप्त हो गए। पक्षियों का कलरव बंद हो गया, वादियां शांत हो गईं। इसी को आधारित कर रेसेल कारसन ने 1962 में ‘साईलेन्ट स्प्रिंग’ पुस्तक लिखी, जो क्रांतिकारी सिद्ध हुई। पहली बार कीटनाशकों के घातक प्रभाव उजागर हुए और मीडिया ने भी इसे प्रमुखता से उठाया जिसके कारण जनसाधारण भी उद्वेलित हुआ और सरकार जागी। विश्व भर में प्रतिक्रिया हुई। वातावरण में इस विष के प्रतिवर्ष हजारों टन घुलने के प्रति लोग सजग हुए।