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बाढ़ के समय पेयजल

मेघ पाईन अभियानमेघ पाईन अभियानबाढ़ के समय पेयजल की उपलब्धता यानी साफ पीने का पानी का उपलब्धता काफी कम हो जाती है। ऐसे में साफ पानी पाने के लिए वर्षाजल संग्रहण ही एक मात्र उपाय है। बाढ़ के समय पेयजल को पाना एक कौशल का काम हो जाता है – आइए समझें उनसे जुड़े सवाल और उनके उत्तर -

बाढ़ के समय वर्षाजल को पीने की आवश्यकता क्यों है?

एक्वाया इंस्टीट्यूट के कार्य

साफ और सुरक्षित जल के द्वारा स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए एक्वाया इंस्टीट्यूट ने नई तकनीकियाँ अपनाई हैं।

इंस्टीट्यूट द्वारा अपनाई गई रणनीतियों की एक प्रस्तुति-

पानी, साफ-सफाई और स्वास्थ्यप्रद स्थितियों के बारे में कुछ तथ्य


1- अगर स्वास्थ्यप्रद स्थितियां या बेहतर स्वस्थ माहौल की बात की जाए तो इसमें निजी साफ-सफाई से लेकर आसपास का साफ-सुथरा माहौल भी शामिल होता है। यूं भी पानी से जुड़ी बीमारियों या प्रदूषित पानी, खराब स्वास्थ्य और गरीबी का एक खास दायरा गंदे पानी और साफ-सफाई की खराब स्थितियों की वजह से सामने आता है।
2- साफ-सफाई का ध्यान न रखने से पानी प्रदूषित होता है। प्रदूषित पानी यानी जिसमें गंदगी की वजह से सूक्ष्म जीव पैदा होने लगते हैं।
3- दुनिया की 26 अरब से ज्यादा की आबादी में से 40 प्रतिशत बुनियादी सफाई सुविधाओं से महरूम है।
4- दुनिया में एक अरब से भी ज्यादा लोग प्रदूषित पानी का इस्तेमाल पीने के लिए करते हैं।
5- बीमारियों और खराब स्वास्थ्य का सीधा संबंध गंदे पानी, सफाई का अभाव और अस्वस्थकर स्थितियों से है। गंदे पानी और गंदगी से डायरिया, टाइफाइड, पाराटाइफाइड, बुखार, हेपेटाइटिस ए, हेपेटाइटिस ई और एफ, फ्लूरोसिस, आर्सेनिक जनित बीमारी जैसी बीमारियां होती हैं। कुछ दूसरी बीमारियां हैं:- लेजिनोलिसिस, मेथमोग्लोबीनेमिया, सिन्टोसोमिएसिस, आंत का संक्रमण, डेंगू, मलेरिया, जापानी इंसेफलाइटिस। वेस्टनील वायरस संक्रमण, येलो फीवर और इम्पेटिगो यानी त्वचा से संबंधित बीमारी भी हो सकती है।
5- दुनिया भर में डायरिया से 1,085,000 से लेकर 2,187,000 मौतें हो जाती हैं। यह मौतें गंदे पानी, खराब सफाई व्यवस्था और दूषित पानी के कारण हो जाती हैं। डायरिया से मरने वाले 90 फीसदी पांच साल से कम के बच्चे होते हैं।
6- साफ और गैर हानिकारक पानी की आपूर्ति, बेहतर सफाई और स्वस्थ माहौल डायरिया को 20 प्रतिशत तक घटा सकती है। बेहतर स्थिति से डायरिया से होने वाली 50 प्रतिशत मौतें कम हो सकती है।
7- शौच-गृह के इस्तेमाल या बच्चों का मल-मूत्र साफ करने के बाद हाथ धोने और भोजन से पहले हाथों की अच्छी तरह सफाई डायरिया को 33 प्रतिशत कम कर देती है।

जल-जनित बीमारियों से जूझते शहर

जल जनित बीमारियांजल जनित बीमारियांडा. सिद्धार्थ अग्रवाल/ राष्ट्रीय सहारा


देश के चार बड़े शहरों मुंबई, दिल्ली, कोलकाता तथा चेन्नई में पीने एवं अन्य उपयोग हेतु पानी की उपलब्धता प्रति व्यक्ति 135 लीटर प्रतिदिन के मानक से आधा से भी कम है। यघपि 91 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में पेयजल सुविधा उपलब्ध है परन्तु यह सभी शहरों में समान नहीं है। छोटे शहरों में, जिनमें करीब एक–तिहाई आबादी है, पानी की उपलब्धता करीब 60 प्रतिशत लोगों को ही है। स्लम एवं अन्य गरीब बस्तियों में तो यह और भी कम है। इन बस्तियों में हैण्डपम्प तथा नलों पर पानी लेने हेतु लम्बी कतारें लगानी पड़ती हैं और पानी की आपूर्ति मात्र कुछ घण्टे ही होती है।

जलसंरक्षण के आसान तरीके

स्थान- जलगांव जिले में तालुका यावल का अदगांव, परोला तालुका का तितवी गांव और चालीसगांव तालुका का मलशेवगा गांव

उद्देश्‍य :-
कम कीमत पर घरेलू इस्तेमाल योग्य पानी उपलब्ध कराने, इसे गंदा होने से बचाने और साफ रखने के तरीकों को प्रोत्साहित करना जिसका सबसे बडा और सीधा असर बच्चों का स्वास्थ्य बेहतर रखने पर हो सके।

परिस्थिति :-

प्यास बुझाने की चुनौती

जल प्रबंधनजल प्रबंधनकिसी के लिए भी अपने बच्चों को हर जगह मिलने वाले पानी को पीने से रोकना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। बच्चों को यह समझाना मुश्किल है कि कौन-सा पानी पीने के लिए अच्छा होता है और कौन सा नहीं? शुरू से ही पानी मानवीय, सामाजिक और आर्थिक विकास का घटक रहा है। तमाम मानव सभ्यताएं नदी के किनारे ही विकसित हुई हैं। ताजे और खारे पानी की पर्याप्त आपूर्ति और प्रबंधन के बिना सामाजिक और आर्थिक विकास पूरा नहीं हो सकता। नि:संदेह पानी और विकास एक-दूसरे से गहरे जुड़े हैं।

पानी की गुणवत्ता बरकरार रखने के सर्वोत्तम उपाय

पीने योग्य जल के संरक्षण के तरीके -

ग्राम अदगांव, तालुका- यावल, जिला जलगांव

उद्देश्‍य : पानी के टैंक में कैल्शियम कार्बोनेट के जमाव को रोकने और बेहतर क्लोरीन परीक्षण विधि :

भारत में परिवारों की सुरक्षित पेयजल तक पहुंच

.भारत के पास विश्व की समस्त भूमि का केवल 2.4 प्रतिशत भाग ही है जबकि विश्व की जनसंख्या का 16.7 प्रतिशत जनसंख्या भारत वर्ष में निवास करती है। जनसंख्या में वृद्धि होने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों पर और भार बढ़ रहा है। जनसंख्या दबाव के कारण कृषि के लिए व्यक्ति को भूमि कम उपलब्ध होगी जिससे खाद्यान्न, पेयजल की उपलब्धता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, लोग वांचित होते जा रहे हैं आईये देखें - भारत में परिवारों की सुरक्षित पेयजल तक पहुंच

मुद्दा : बढ़ती आबादी और पेयजल संकट

..प्रवीण प्रभाकर/ राष्ट्रीय सहारा

विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट ने भारत जैसे विकासशील राष्ट्र में पेयजल की स्थिति की कलई खोल दी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में प्रत्येक साल करीब सात लाख 83 हजार लोगों की मौत दूषित पानी और खराब साफ-सफाई की वजह से होती है। इसमें से लगभग साढे़ तीन लाख लोग हैजा, टाइफाइड और आंत्रशोथ जैसी बीमारियों से मौत की भेंट चढ़ जाते हैं। ये बीमारियां दूषित पानी और भोजन, मानव अपशष्टिटों से फैलती हैं। साथ ही हर साल 15000 से ज्यादा लोग मलेरिया, डेंगू और जापानी बुखार की चपेट में आकर दम तोड़ देते हैं। इन बीमारियों के वाहक दूषित पानी, जल जमाव यानी कि पानी के खराब प्रबंधन से फैलते हैं।