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जल संसाधन स्रोत की दूरी और जलापूर्ति प्रणाली का आकार

परिकल्पना:
किसी गांव/शहर/महानगर की आबादी जितनी अधिक होती है, पेयजल स्रोत से उसकी दूरी उतनी ही अधिक होती है।

कारण:
बड़े शहरों और महानगरों में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर निवेश अधिक होता है। ऐसे में उम्मीद की जाती है वहां पेय जल शोधन और आपूर्ति व्यवस्था अधिक निवेश हुआ होगा। इसके अलावा पेय जल की उनकी भारी जरूरत को बड़े जल स्रोत से पूरा किया जाता है।

लैंगिक स्थिति और पेय जल की चिंताएं

परिकल्पना:
महिलाएं पानी की कमी को पुरुषों से कहीं अधिक गंभीर पर्यावरणीय समस्या के रूप में देखती हैं।

कारण:
तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों की कई तरह की बहुस्तरीय पर्यावरणीय चिंताएं होती हैं। ये चिंताएं उनसे और उनके संबंधियों के जीवन पर पड़ने वाले असर से संबंधित है। यह मान कर चला जाता है कि परिवार में पीने के पानी की जिम्मेदारी महिलाओं की है। परिवार के स्वास्थ्य की अधिक जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर होती है। ऐसे में उम्मीद की जाती है कि महिलाओं में पानी के कमी के प्रति चिंता कहीं अधिक होती है।

जल का शोधन और घर का बजट

परिकल्पना:
पेय जल के शोधन में तकनीक का बेहतर होने से पीने के पानी पर एक घर का प्रतिव्यक्ति खर्च बढ़ जाता है।

कारण:
लोगों का अपने पर्यावरण की रक्षा के प्रति जागरुक होकर उसके लिए कार्य करने का संबंध उनकी आर्थिक स्थिति से है। ऐसे में इसकी लागत के बारे में आंकड़े जुटाना उपयोगी होगा।

जल शोधन और आर्थिक स्थिति

परिकल्पना:
पेयजल के शोधन में बेहतर तकनीक का संबंध घरों में हर सदस्य को उपलब्ध स्थान से संबंध होता है।

कारण:
यह जांचना महत्वपूर्ण है कि क्या गरीबों को पीने का साफ़ पानी नहीं मिल पा रहा है। किसी परिवार की आर्थिक स्थिति मापने के लिए घर में प्रति सदस्य उपलब्ध स्थान अच्छा मापदंड हो सकता है। ऐसे में इन दोनों कारकों की तुलना की जा सकती है।

जल शुल्क का विश्लेषण

पानी के एक बिल की कहानी

ईश्वर ने हमें पानी दिया है, इसे निशुल्क होना चाहिए। वह पाइपलाइन (और पंप, फिल्टर, क्लोरीन, मीटर, डूबता धन) भूल गया कि इसकी कीमत होनी चाहिए।
लेखकः विश्वनाथ श्रीकांतैया, रेनवाटर क्लब (www.rainwaterclub.org)

भूमिगत जल/जल स्रोतों का सदुपयोग

बरसात की माप
(गांव तितवी, तालुका परोला, जिला- जलगांव, महाराष्ट्र)
उद्देश्य:
गांववालों को बारिश की वास्तविक मात्रा और एक जल वर्ष में पानी कुल उपलब्धता के बारे में जागरुक बनाना। अडगांव (यावल तालुका), तितवी (परोला तालुका) और मालशेवगा (चालीसगांव तालुका) में रेनगॉग बनाए गए और बारिश की मात्रा जानने की प्रक्रिया शुरू की गई।

भूमिगत जल/जल स्रोतों का सदुपयोग

महाराष्ट्र में पेजल भरते लोग, फोटोः विश्वनाथमहाराष्ट्र में पेयजल भरते लोग, फोटोः विश्वनाथ वर्तमान स्रोतों की रक्षा-
( गांव- पटूरदा, तालुका संग्रामपुर, जिला-बुलढ़ाना, महाराष्ट्र)
पूर्व स्थितियां:
जल के मुख्य स्रोत कुएं सूखे और उपेक्षित थे और उनमें से कुछ कूड़ेदान में तब्दील हो गए थे।
सारांश-
स्रोत कुएं कूड़ेदान बन गए थे। कुएं के आसपास गंदगी का ढ़ेर लगा हुआ था। गांववाले इन कुओं के पास गए और वहां की गंदगी देखकर चकित रह गए। गांववालों ने कुओं को साफ़ करने के लिए साथ-साथ काम किया। एक कुएं के सफ़ाई अभियान ने दो अन्य कुओं को साफ़ करने के लिए प्रेरित किया।
बदलाव की प्रकिया:

जहर बुझा पानी

चांद नहीं यह हिडंन नदी हैचांद नहीं यह हिडंन नदी हैसंजय तिवारी/ उत्तर प्रदेश के पश्चिमी हिस्से में बहनेवाली हिडंन जब दिल्ली के पास यमुना में आकर मिलती है तो कितनों को तारती है पता नहीं लेकिन बहुतों को मारती जरूर है।

अब इस बात का दस्तावेजी प्रमाण हैं कि पिछले पांच सालों में प्रदूषित हिंडन के कारण 107 लोगों को कैंसर हुआ है। कौन हैं वो लोग जिन्होंने एक नदी को मारने का हथियार बना दिया? मेरठ के पास जयभीम नगर झोपड़पट्टी में पिछले 5 सालों में ही 124 लोग काल के गाल में समाहित हो चुके हैं। इन गरीबों का कसूर यह है कि वे मिनरल वाटर नहीं पीते। वे जो पानी भूमि के गर्भ से निकालकर पीते हैं वह इतना जहरीला है कि बचना संभव नहीं।