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जनजातीय लोगों के लिए स्‍वच्‍छता संसाधन केंद्र

पूर्व शर्तें: :
जनजातीय लोग अत्‍यंत जटिल भौतिक और सामाजिक दशाओं में रहते हैं। उनकी मानसिकता और विवेकशीलता ऐसी दशाओं से अभिभूत होती है जिसमें वे रहते हैं। यदि उनके बीच काम करने वाला उनके परिवेश और परंपराओं से भलीभांति परिचित नहीं है तब जनजातीय ग्रामीणों को प्रेरित करना अत्‍यंत कठिन होता है।

परिवर्तन की प्रकिया: :

स्‍वच्‍छ सोमवार

पूर्व शर्तें गांव के प्रत्‍येक कोने में कूड़े का ढेर लगा रहता है और इसे नियमित रूप से उठाया नहीं जाता है। गटर खुले हुए हैं और अक्‍सर रूक जाते हैं। गांव के कई स्‍थानों पर बेकार पानी सड़को पर आ जाता है।

नदी मुख अथवा लघु खाडि़यों की खोज

नदीमुख वे स्‍थान होते हैं जहां ताजे पानी की नदियां और धाराएं समुद्र के पानी से मिलती हुई महासागरों में गिरती हैं। विभिन्‍न प्रकार के पक्षी, मछली तथा अन्‍य वन्‍य जातियां इन नदी मुखों को अपना आवास बनाती हैं। इन नदी मुखों तथा इसके आसपास की भूमि पर जनता निवास करती है, मछलियां पकड़ती हैं, तैरती है और प्रकृति का आनंद उठाती है।

पूर्वी कलकता रामसर

संसार के कस्‍बों और शहरों के सामने प्रतिदिन उत्‍पन्‍न होने वाले बेकार पानी से निपटने की समस्‍या एक प्रमुख समस्‍या है। इस बेकार पानी का या तो अत्‍यधिक लागत वाली पारंपरिक जल उपचार प्रक्रियाओं से उपचार किया जाता है या फिर इसे उपचारित किए बिना नदियों अथवा दूसरी जलीय इकाईयों में बहने दिया जाता है। ताजे पानी की सीमित उपलब्‍धता और चिरस्‍थायी बढती हुई मांग के कारण वेकार पानी का उपचार किया जाना अब अनिवार्य हो गया है। हमारे पास बेकार पानी की कम लागत वाली कुशल पारिस्थितिकीय उपचार योजनाओं के ऐसे बहुत कम विकल्‍प हैं जो अन्‍य उत्‍पादकीय उपयोगों के लिए जल को पुन:चक्रित कर सकें। पूर्वी कोलकता नम भूमि प्रणाली इनमें से एक ऐसी ही योजना है।

नेग में मिली हरियाली

आप मानें या न मानें, उत्तराखंड की लड़कियों ने शादी के लिए आए दूल्हों के जूते चुरा कर उनसे नेग लेने के रिवाज को तिलांजलि दे दी हैं। वे अब दूल्हों के जूतें चुराकर रूढ़ि को आगे नहीं बढ़ातीं। बलकि उनसे अपने मैत (मायके) में पौधे लगवाती हैं। इस नई रस्म ने वन संरक्षण के साथ-साथ सामाजिक समरसता और एकता की एक ऐसी परंपरा को गति दी है जिसकी चर्चा अब उत्तराखंड तक सीमित नहीं रह गई है।

पर्यावरण सुरक्षा

सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों में संभवत: यह सबसे मुश्किल लक्ष्य है क्योंकि यह मुद्दा इतना सरल नहीं है, जितना दिखता है। टिकाऊ पर्यावरण के बारे में जिस अवधारणा के साथ लक्ष्य सुनिश्चित किया गया है, सिर्फ उस अवधारणा के अनुकूल परिस्थितियां ही तय सीमा में तैयार हो जाए, तो उपलब्धि ही मानी जाएगी।

यद्यपि यह माना जाए कि विकास की राष्ट्रीय नीतियों एवं कार्यक्रमों के बीच समन्वय एवं उनमें व्यवस्थित रूप से एकीकरण किया जाए, पर यह संभव नहीं दिखता।

संकट में पानी

समुद तटीय इलाकों और सागरों पर पर्यावरण को विनाश करने वाली क्रियाओं के कारण महासागर भारी खतरे में है।

- महासागर एक गतिशील और जटिल व्यवस्था है जो जीवन के लिए अत्यन्त महत्तवपूर्ण है। महासागरों में मौजूद असीम सम्पदा समान रूप से वितरित नहीं है। उदाहरण के लिए, सर्वाधिक समुद्री जैव विविधता समुद्र तल पर पाई जाती है। महासागरों की उत्पादकता को निर्धारित करने वाली पर्यावरणीय परिस्थितियां समय और स्थान के अनुसार भिन्न-भिन्न हैं।

- सर्वाधिक महत्तवपूर्ण फिशिंग ग्राउंड समुद्र तट से 200 से भी कम मील क्षेत्र के भीतर महाद्वीपीय समतलों पर पाए जाते हैं। ये फिशिंग ग्राउंड भी असमान रूप से देखे गए हैं और अधिकांशत: स्थानीय हैं।

हवा-पानी की आजादी

हवा-पानी की आजादीहवा-पानी की आजादीआजादी की 62वीं वर्षगांठ, हर्षोल्लास के माहौल में भी मन पूरी तरह खुशी का आनन्द क्यों महसूस नहीं कर रहा है, एक खिन्नता है, लगता है जैसे कुछ अधूरा है। कहने को हम आजाद हो गए हैं, जरा खुद से पूछिए क्या आपका मन इस बात की गवाही देता है नहीं, क्यों? आजाद देश उसे कहते हैं जहां आप खुली साफ हवा में अपनी मर्जी से सांस ले सकते हैं, कुदरत के दिए हुए हर तोहफे का अपनी हद में रहकर इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन यहां तो कहानी ही उलट है। आम आदमी के लिए न पीने का पानी है न खुली साफ हवा, फिर भी हम आजाद हैं?

आज हर ओर पानी का संकट गहराया है, कहीं बाढ़ की समस्या है तो कहीं सुखाड़ की, कहीं पानी में आर्सेनिक है तो कहीं पानी खारा हो रहा है, बड़े-बांध बन रहे हैं तो कहीं नदियां मर रही हैं। ऐसे माहौल में आजादी का जश्न कोई मायने नहीं रखता। जल ही जीवन है, पूरा पारिस्थिकी तंत्र इसी पर टिका है। जल संसाधनों की कमी को लेकर न केवल आम आदमी बल्कि राज्यों और देशों में भी तनाव बढ़ रहा है। पानी की कमी से विश्व की कुल जनसंख्या की एक-तिहाई प्रभावित है। पृथ्वी के सभी जीवों में पानी अनिवार्य रूप से विद्यमान है। आदमी में 60 फीसदी, मछली में लगभग 80 फीसदी, पौधों में 80-90 फीसदी पानी ही है। जीवित सेल्स में रासायनिक प्रतिक्रियाओं के लिए पानी ही जरूरी तत्व हैं।

सिंचाई की संस्थानगत व्यवस्थाएं

केन्द्रीय सरकार पर एक राष्ट्रीय संसाधन के रूप में जल के विकास, संरक्षण और प्रबन्ध के लिए अर्थात जल संसाधन विकास और सिंचाई, बहुद्देश्यीय परियोजनाओं, भूजल अन्वेषण तथा दोहन, कमान क्षेत्र विकास, जल निकास, बाढ़ नियंत्रण, जलग्रस्तता, समुद्र कटाव समस्याओं, बांध सुरक्षा तथा नौसंचालन और जल विद्युत के लिए जल वैज्ञानिक संरचनाओं के सम्बन्ध में राज्यों को तकनीकी सहायता प्रदान करने के निमित्त सामान्य नीति के लिए केन्द्रीय स्तर पर जल संसाधन मंत्रालय जिम्मेदार है। यह मंत्रालय अन्तर्राज्यीय नदियों के विनियमन और विकास पर भी निगाह रखता है। ये कार्य विभिन्न केन्द्रीय संगठनों द्वारा किए जाते हैं। शहरी जल आपूर्ति तथा जलमल निपटान की देखभाल शहरी विकास मंत्रालय करता है जबकि ग्रामीण जल आपूर्ति ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन पेयजल विभाग के अधिकार क्षेत्र में आती है। जल-विद्य