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वर्षा क्यों होती है

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अभिव्यक्ति हिन्दी
समुद्र, झील, तालाब और नदियों का पानी सूरज की गर्मी से वाष्प बनकर ऊपर उठता है। इस वाष्प से बादल बनते हैं।

ये बादल जब ठंडी हवा से टकराते हैं तो इनमें रहने वाले वाष्प के कण पानी की बूँद बन जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कमरे की हवा में रहने वाली वाष्प फ्रिज से निकाले गए ठंडे के कैन से टकरा कर पानी की बूँद बन जाती है।

बूँदों वाले बादल भारी होकर धरती के पास आ जाते हैं। बूँदें धरती की आकर्षण शक्ति से खिंचकर वर्षा के रूप में बरस जाती हैं। इस प्रकार धरती से बादल और बादल से धरती तक यात्रा करता हुआ पानी सदा गतिमान रहता है।
इस खबर के स्रोत का लिंक: 
http://www.abhivyakti-hindi.org

जलचक्र (The Water Cycle)

धरती पर कितना पानी उपलब्ध है?

o एक जानकारी के अनुसार धरती पर 2,94,000,000 क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध है, जिसमें से सिर्फ़ 3% पानी ही शुद्ध और पीने लायक है।
o पृथ्वी पर पानी अधिकतर तरल अवस्था में उपलब्ध होता है, क्योंकि हमारी धरती (सौर व्यवस्था) “सोलर सिस्टम” की सीध में स्थित है, अतः यहाँ तापमान न तो इतना अधिक होता है कि पानी उबलने लगे न ही तापमान इतना कम होता है कि वह बर्फ़ में बदल जाये।
o जब पानी जमता है तब वह विस्तारित होता है यानी फैलता है, जबकि ठोस बर्फ़ तरल पानी में तैरती है।

मुक्त पानी की गतिविधि

• वातावरण में भाप के रूप में
• बारिश, ओस, बर्फ़ आदि के रूप में धरती पर वापस आता है
• धरती पर बहते हुए अन्त में पुनः समुद्र में मिलता है
• कभीकभार यह पानी बहते हुए मृत सागर अथवा ग्रेट साल्ट लेक जैसी एक “बेसिन” में एकत्रित हो जाता है।
• जबकि “ड्रेनेज बेसिन” उस क्षेत्र को कहा जाता है जहाँ बारिश के पानी को नहरों, झीलों, नदियों व बाँधों आदि के रूप में सहेजा जाता है।

जल-चक्र

• पानी का वातावरण में वाष्पीकरण होता है।
• पुनः यही पानी धरती पर वर्षाजल के रूप में गिरता है।
• बहते हुए यह पानी समुद्र में जा मिलता है।

पानी के विभिन्न उपयोग

• नहाने के लिये
• कपड़े धोने के लिये
• खाना बनाने, पीने के लिये
• साफ़-सफ़ाई करने के लिये
• तैरने व अन्य आनन्द लेने के लिये

मुक्त पानी कहां मिलता है

• अधिकतर पानी ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में वाष्पीकरण के जरिये वातावरण में पहुँचता है।
• शुद्ध पानी के अधिकतर स्रोत पृथ्वी के उत्तरी गरम इलाके में मौजूद हैं।
• इस धरती के शुद्ध जल में से 20% मुक्त जल कनाडा में है,
• 20% जल रूस की बैकाल झील में है,
• बाकी का शुद्ध जल विभिन्न नदियों, झीलों, तालाबों, आदि में उपलब्ध है।
• भूमध्यरेखा के 20 डिग्री उत्तर और दक्षिण में ऊष्णकटिबंधीय वर्षा वन (रेन फ़ॉरेस्ट) फ़लते-फ़ूलते हैं।

बूँद बूँद आनंद

जयजयराम आनंद का दोहा संग्रह ,बूँद बूँद आनंद ,कथ्य जल और उसके चारों ओर घूमता है जो लगभग ५५० दोहों में सिमटा बूँद बूँद आनंद है. इन दोहों में इतिहास, भूगोल, संस्कृति, ज्ञान विज्ञान भूगर्भ एवम् जल विज्ञान, सभ्यता का विकास, सृजन आदि का समावेश है. ग्यारह खंडों में पसरा जल का वर्णन मिलेगा :जल महिमा. जल संस्कृति, औषधीय जल, जल प्रवृति, जल प्रदूषण, जल संकट, जल नीति बनाम राजनीति, जल चेतना, जल संकट समाधान एवम् आशेष।

प्रकाशक: आनंद प्रकाशन प्रेम निकेतन, ए७/७०, ईमेल;अशोका सोसाएटी, अरेरा कालोनी, भोपाल [म प्र]४६२०१६।

जल महिमा

घर आए मेहमान का, पानी से सत्कार
पानी को पूंछे बिना, सब होगा बेकार

जहां कहीं भी जाईए, पहली होगी बात
पानी को पूंछे बिना, सब होगा बेकार

जल चक्र

जल-चक्र क्या है ?


जल की एक मुख्य विशेषता यह है कि यह अपनी अवस्था आसानी से बदल सकता है । यह ग्रह पर अपनी तीन अवस्थाओं, ठोस, द्रव तथा गैस के रूप में आसानी से प्राप्त हो जाता है । पृथ्वी पर जल की मात्रा सीमित है । जल का चक्र अपनी स्थिति बदलते हुए चलता रहता है जिसे हम जल चक्र अथवा जलविज्ञानीय चक्र कहते हैं । जलीय चक्र की प्रक्रिया जल-मंडल, एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ वातावरण तथा पृथ्वी की सतह का सारा जल मौजूद होता है । इस जलमंडल में जल की गति ही जल चक्र कहलाता है । यह संपूर्ण प्रक्रिया बहुत ही सरल है जिसे चित्र में 6 भागों में विभाजित किया गया है।


क- वाष्पीकरण/वाष्पोत्सर्जन


ख - द्रवण

ग - वर्षण

घ - अंतः-स्यंदन

ड - अपवाह

च - संग्रहण

परियोजना आधारित परियोजनाओं का ब्यौरा

प्रदूषण के संदर्भ में मछली/सीप विविधता

परिकल्पना:
कम प्रदूषण स्तर वाले पानी में मछली की प्रजातियों की विविधता कहीं अधिक होती है।
कारण:
किसी खास क्षेत्र में जीवों के विशेष समुदाय मसलन पौधे, मछली या सरिसृप की विविधता का स्तर किन बातों पर निर्भर करता है इस पर कई परिकल्पनाएं हैं। विविधता के उच्च स्तर के लिए पर्यावरण अधिक उत्पादक और स्थिर होना चाहिए। इसी तरह ऐसे पर्यावरण जहां लंबे समय तक समुदायों का उद्भव हुआ हो, वहां भी विविधता का उच्च स्तर होने की उम्मीद की जाती है।

तुलनात्मक और प्रयोगशील दृष्टिकोण

किसी भी वैज्ञानिक परिकल्पना की कई स्थितियों में जांच की ज़रूरत होती है। इस तरह की विभिन्नताएं मानवीय प्रबंधन से सृजित की जा सकती हैं जो प्रयोगशील तरीका है। या प्राकृतिक विभिन्नताओं का फायदा उठाया जाए जो तुलनात्मक विधि है। सामान्य प्रणालियों पर आधारित परिकल्पनाओं की जांच कई बार प्रयोगात्मक रूप से की जा सकती है। इस तरह की सामान्य परिकल्पनाएं किसी बड़ी खोज की ओर ले जा सकती हैं। किसी भी परिकल्पना की पुष्टि कई प्रयोगों से की जाती है। प्रयोगों के दौरान पूरी प्रक्रिया को बहुत गौर से देखा जाता है। भौतिक शास्त्र, रसायन विज्ञान और शरीर विज्ञान हुईं प्रगति में इसी तरह की प्रयोगात्मक विधियों का हाथ है। धातु विज्ञान, पारिस्थितिकी या विकासवादी जीवविज्ञान जैसी कहीं अधिक विषयों में बहुत सी दिलचस्प परिकल्पनाओं के प्रयोग के आधार पर पुष्टि नहीं हो पाती है। मसलन विकासव

परिकल्पना-निष्कर्ष विधि

“परिकल्पना-निष्कर्ष” विधि सभी वैज्ञानिक गतिविधियों का मूल प्रस्थान बिंदु है। वैज्ञानिक प्रगति प्रयोग योग्य परिकल्पनाओं के निर्धारण से ही विज्ञान की प्रगति होती है। दूसरे शब्दों में हर वैज्ञानिक परिकल्पना एक बयान पर आधारित होती है जिसकी प्रयोगों के आधार पर पुष्टि या खंडन किया जाता है। अगर उसे स्वीकार किया जाता है तो वह उन स्थितियों को वैध ठहराती है जिनके आधार पर वह परिकल्पना की गई होती है। स्वीकार या निषेध किसी भी मामले में हम परीक्षण करने वाली नई परिकल्पनाओं की ओर बढ़ते हैं। एक तरह से परिकल्पनाओं की श्रृंखला बनती है। चाहे उन्हें स्वीकार किया जाए या उनका खंडन हो प्रयोगों का सिलसिला बढ़ता जाता है। यही विज्ञान का मूल है।

वेबसाइट के शैक्षिक हिस्से के लिए सुझाव

“यह कितना विचित्र है कि लोग यह नहीं समझते कि महत्व का हर पर्यवेक्षण, किसी विचार के पक्ष या विपक्ष में होता है।”
चार्ल्स डार्विन, 1861
पानी या जैव विविधता की वेबसाइटों के शैक्षिक खंड में छात्रों के लिए कुछ दिलचस्प परिकल्पनाओं को ख़ास तौर पर शामिल किया जाना चाहिए। दरअसल पर्यावरण के बारे में जागरुकता दुनिया के सीधे संपर्क में रह कर प्रकृति को समझने से आ सकती है।
विज्ञान ने प्रकृति को गहराई से समझने के कहीं अधिक सार्थक सवाल पूछने के लिए प्रभावशाली तरीका विकसित किया है। इस तरह की वैज्ञानिक गतिविधियां क्या हो सकती हैं (मूर 1993)?
1) विज्ञान बिना किसी ईश्वरीय शक्ति पर भरोसा किए, क्षेत्र, प्रयोगशाला में जुटाए गए आंकड़े के विश्लेषण या प्रयोग पर आधारित होता है।

पानी उठाने के लिए उचित स्थानो पर हाइड्रम की स्थापना

हाइड्रालिक रैम एक स्वचालित पानी उठाने का यन्त है जो कि विश्व मे कई वर्षों से प्रयोग हो रहा है भारत वर्ष के पहाड़ी इलाको मे पानी उठाने के लिए अत्यन्त उपयुक्त है। पहाड़ी इलाको मे विघुत एवं डीजल से चलने वाले पानी उठाने के यन्त्रो की मरम्मत व चलाने की लागत अधिक होने के कारण सफल नही हो सकते है। उत्तराखन्ड की पहाड़ियो मे सिचाई के लिए पानी उठाने के लिए हाइड्रम एक दूसरा विकल्प है। उत्तराखन्ड के पहाड़ी स्थानों पर प्रतिवर्ष जगह जगह सिचाई विभाग एवं लघु सिचाई विभाग द्धारा कई हाइड्रम लगवाये गये ह। पहाड़ी क्षेत्रों मे असिचिंत कृषि योग्य भूमि की सिचाई के लिए हाइड्रालिक रैम स्थापित किया जाना जारी रहना चाहिए। शुरूआत मे हाइड्रालिक रैम का उपयोग केवल पानी को उठाने के लिए किया जाता था विगत तीन दशकों से इसका उपयोग पहाड़ी इलाको मे नदियों से उचि सिचाई के लिए पानी उठाने के लिए किय