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बिहार - बाढ़ को बहने का रास्ता भर चाहिए

Author: 
कुशाग्र राजेंद्र और नीरज कुमार

चम्पारण के बीचोंबीच स्थित मोती झील, मनों की शृंखला का एक हिस्सा जो बाढ़ के दिनों में पानी के जलग्रहण का काम करती हैचम्पारण के बीचोंबीच स्थित मोती झील, मनों की शृंखला का एक हिस्सा जो बाढ़ के दिनों में पानी के जलग्रहण का काम करती हैहिमालय की तलहटी में बसा तराई और गंगा के बीच का मैदानी भाग सभ्यता के शुरुआत से ही अपनी कृषि उत्पादकता के लिये मशहूर रहा है। यहाँ नियमित रूप से आने वाली सालाना बाढ़ इसका आधार रही है। इन इलाकों के लिये नदियाँ और बाढ़ कोई नया नहीं है, बल्कि हरेक साल हिमालय से पानी का रेला थोड़े समय के लिये पूरे मैदानी क्षेत्रों में फैलता रहा है।

मजदूरों के पलायन में दिखता बाढ़ का प्रभाव

Author: 
अमरनाथ

सरकारी नौकरी और स्थायी किस्म के काम करने वाले लोग भी होते हैं। उनका आना-जाना दिवाली, छठ अपने गाँव में मनाने के आकर्षण में होता है। पर मजदूरों का दिल्ली-पंजाब जाना आमतौर पर छठ के बाद होता है जब पंजाब में धान की कटाई में रोजगार मिलने की पक्की सम्भावना होती है। लेकिन इस साल दिवाली के पहले दशहरा के तुरन्त बाद भीड़ उमड़ पड़ी। इसका सम्बन्ध बाढ़ में सर्वस्व गँवा देने से है। गाँव में खाने के लाले पड़े हैं और बाढ़ की वजह से कामकाज मिलने की कोई उम्मीद भी नहीं बची। ऐसे में घर रहने का कोई उपाय नहीं है सिवाय पलायन मजबूरी के। बिहार में बाढ़ के प्रभाव और फैलाव को आँकने का एक पैमाना सहरसा रेलवे स्टेशन पर बना अस्थायी यात्री शेड है जो दिल्ली-पंजाब कमाने जाने वाले यात्रियों की भीड़ को सम्भालने में छठ पूजा के अगले दिन से कार्यरत है। बाहर कमाने वाले मजदूरों की भीड़ हर साल दिवाली-छठ के बाद उमड़ती है, इस साल खास यह है कि भीड़ महीने भर पहले से ही आने लगी और इस तादाद में आने लगी कि अक्टूबर महीने के आरम्भ से ही सहरसा स्टेशन पर मजदूर यात्रियों का जमघट लग गया।

अमृतसर जाने वाली नियमित ट्रेन जनसेवा एक्सप्रेस में चढ़ने की आपाधापी में स्टेशन पर मारपीट, हंगामा और सबके बाद ट्रेनों का चक्काजाम कर दिया गया। सात अक्टूबर की इस घटना को सम्भालने में रेलवे ने अम्बाला तक स्पेशल ट्रेन चलाने की घोषणा की। भीड़ इतनी थी कि स्पेशल ट्रेन के चलने के बाद भी स्टेशन पर दसियों हजार यात्री फँसे रहे। प्लेटफार्म से लेकर वाशिंग पिट तक लोग-ही-लोग थे।

सूखे साहेल में बाढ़ के मायने

Author: 
शुभोजित गोस्वामी
Source: 
डाउन टू अर्थ, अक्टूबर 2017

2012 में चाड में आई बाढ़ का दृश्य2012 में चाड में आई बाढ़ का दृश्य2008 में साहेल में आई बाढ़ का अध्ययन करने गए यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया के पेट्रा शाकर्ट और उनके सहकर्मियों ने यह सवाल उठाया था, “क्यों इस सुखाड़ इलाके में इतने पानी का हो जाना एक सहज बात हो चुकी है जबकि हमारे लिये यह समझ से बाहर, एक अवास्तविक बात ही लगती है?” उस समय तक साहेल को एक रेतीला और पठारों से भरे हुए इलाके की तरह देखा जाता था, लेकिन अब हालात उलट हो चुके हैं (साहेल अफ्रीका के पश्चिम से पूर्व को फैली वह पट्टी है जो सहारा के रेगिस्तान को दक्षिण के घास के मैदानों से अलग करती है, देखें मानचित्र) नई सदी की शुरुआत के साथ ही चरम बारिशों का दौर और इससे होने वाली तबाहियों की घटनाओं में इजाफा हो गया। 1970-1990 के बीच औसतन वार्षिक बारिश में अतिशय (एक्सट्रीम) बारिशों की संख्या 17 प्रतिशत थी जो 1991-2000 में बढ़कर 19 प्रतिशत और 2001-2010 में 21 प्रतिशत हो गई।

पिछले कुछ सालों में सवाना का अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र (जो पश्चिम में मारिटानिया से लेकर पूर्व में इरीट्रिया तक फैला हुआ है) में बहुत खौफनाक बाढ़ आई है। अभी तक 2010 और 2012 में ही नाइजर नदी से दो विध्वंसकारी बाढ़ आई है। इस इलाके के मौसम मापक स्टेशन नियामे में है जो 1929 से काम कर रहा है। 2010 में भारी बारिश हुई। नाइजर नदी पिछले 80 सालों का रिकॉर्ड तोड़ उफनते हुए ऊपर उठती गई। अगले ही साल बुर्कीना फासो की राजधानी में दस घंटे में 263 मिमी रिकॉर्ड बारिश हुई। इस बारिश से डेढ़ लाख लोग उजड़ गए, आठ लोग मारे गए और मुख्य जनसुविधा-व्यवस्था बिखर गई।

बिहार बाढ़ - राहत देने में भेदभाव और भ्रष्टाचार (Bihar floods - discrimination and corruption in relieving)

Author: 
अमरनाथ

बाढ़ तो उतर गई लेकिन संकट नहींबाढ़ तो उतर गई लेकिन संकट नहींबिहार में बाढ़ के बाद जलजनित बीमारियों की महामारी फैलने की हालत है। हर दूसरे घर में कोई-न-कोई बीमार है। लेकिन स्वास्थ्य और स्वच्छता के इन्तजाम कहीं नजर नहीं आते। इस बार बाढ़ के दौरान बचाव और राहत के इन्तजामों में सरकार की घोर विफलता उजागर हुई। बाढ़ पूर्व तैयारी कागजों में सीमटी नजर आई तो बाढ़ के बाद सरकारी सहायता और मुआवजा देने में सहज मानवीय संवेदना के बजाय कागजी खानापूरी का जोर है।

बाढ़ चेतावनी से भी नहीं चेते

Author: 
शुभोजित गोस्वामी
Source: 
डाउन टू अर्थ, सितम्बर 2017

सीएजी ऑडिट के मुताबिक, बाढ़ की सम्भावना वाले राज्य बाढ़ प्रबन्धन योजनाओं को लागू कर पाने में विफल रहे हैं।

भारत के 4,862 बाँधों में से 93 फीसदी के पास आपातकालीन एक्शन प्लान नहीं है। आपातकालीन स्थिति में ये मानव जीवन और सम्पत्ति नुकसान को कम करने का काम नहीं हो सकता है। राजस्थान के 200 और ओड़िशा के 199 बाँध में से किसी में भी ये आपातकालीन एक्शन प्लान नहीं है। गुजरात और पश्चिम बंगाल के केवल एक बाँध में आपातकालीन एक्शन प्लान है। अगस्त 2010 में लोकसभा में पेश किये गए द डैम सेफ्टी बिल को अभी तक अधिनियमित नहीं किया गया है। भारत में अभी कम-से-कम सात राज्य बाढ़ की विभीषिका का सामना कर रहे हैं। यह लगातार तीसरा साल है जब अर्ध-शुष्क और रेगिस्तानी राज्य गुजरात और राजस्थान भी इस सूची में शामिल हैं। पारम्परिक रूप से बाढ़ से तबाह होने वाले राज्यों के मुकाबले अब यह अन्य राज्यों को भी चपेट में ले रही है। इसका पैमाना, गम्भीरता और दायरा असामान्य होता जा रहा है। इस वर्ष बाढ़ के कारण कम-से-कम 1100 लोग मारे गए हैं। पिछले साल 475 से अधिक लोग मारे गए थे। इस साल बिहार में 482, गुजरात में 224 और राजस्थान में 66 लोगों की जान गई है। इन तीन राज्यों से 700 से ज्यादा लोग मारे गए हैं।

वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट, वाशिंगटन डीसी स्थित शोध संगठन की 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सबसे ज्यादा नदी के बाढ़ के खतरे से पीड़ित होने वाला देश है। ऐसी परिस्थितियों में भारत की बाढ़ प्रबन्धन प्रणाली मजबूत होनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा है नहीं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा भारत की बाढ़ प्रबन्धन योजनाओं के ऑडिट से यह तथ्य सामने आया है।

डूबता रेगिस्तान (Drowning desert)

Author: 
अनिल अश्विनी शर्मा
Source: 
डाउन टू अर्थ, सितम्बर 2017

राजस्थान का मरुस्थली इलाका असामान्य बारिश से जूझ रहा है। बाढ़ न केवल नियमित होती जा रही है बल्कि विनाशकारी रूप भी धर रही है। कहीं राजस्थान जलवायु परिवर्तन की कीमत तो नहीं चुका रहा? अनिल अश्विनी शर्मा ने बाढ़ग्रस्त इलाकों विशेषकर पाली, सिरोही, जालौर, बाड़मेर और जैसलमेर के तीन दर्जन से अधिक गाँवों का दौरा कर प्रभावितों और विशेषज्ञों से बात की और इस सवाल का जवाब ढूँढने की कोशिश की।

बाढ़ - प्राकृतिक आपदा में आदमी


जलवायु में आ रहे बदलाव के चलते यह तो तय है कि प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। इस लिहाज से जरूरी है कि शहरों के पानी का ऐसा प्रबन्ध किया जाये कि उसका जल भराव नदियों और बाँधों में हो, जिससे आफत की बरसात के पानी का उपयोग जल की कमी से जूझ रहे क्षेत्रों में किया जा सके। साथ ही शहरों की बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिये कृषि आधारित देशज ग्रामीण विकास पर ध्यान दिया जाये। क्योंकि ये आपदाएँ स्पष्ट संकेत दे रही है कि अनियंत्रित शहरीकरण और कामचलाऊ तौर-तरीकों से समस्याएँ घटने की बजाय बढ़ेंगी ही? देश के ज्यादातर क्षेत्र में मानसून ने जोरदार दस्तक दे दी है। लेकिन ज्यादातर इलाके बाढ़ में डूबने की त्रासदी झेल रहे हैं। इस कारण ऊँचे इलाकों में तो हरियाली दिख रही है, किन्तु फसलें बौने के साथ ही चौपट हो गई हैं। असम के करीमगंज जिले में सुप्राकांधी गाँव ने जल समाधि ले ली है। कजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में 7 गैंडे समेत 90 वन्य प्राणी और 80 लोग अब तक मारे जा चुके हैं। बाढ़ का संकट झेल रहे असम का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी दौरा करना पड़ा है।

दो सुखाड़ों के बाद एक बरसात

Source: 
एन एट मिलियन ईयर ओल्ड मिस्टीरियस डेट विथ मानसून, 2016

2016 में भारत में आई बाढ़ की रूपरेखा डाउन टू अर्थ के पत्रकार के रूप में मानसून पर नजर रखना पूरे साल का काम है। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के वार्षिक पूर्वानुमान जारी करने और भारतीय उपमहादेश की सीमाओं में मानसूनी बादलों के बनने के बहुत पहले मई के आरम्भ में ही समाचार कक्ष में मानसून के आगमन की आहट आने लगती है। वैज्ञानिकों-भारतीय और विदेशी को फोन किये जाते हैं, मानसून के बारे में ताजा वैज्ञानिक अध्ययनों को खंगालने में पुस्तकालय बहुत व्यस्त हो जाता है और मौसम के बारे में लोकगाथाओं की फिर से व्याख्या की जाने लगती है ताकि हर भारतीय के प्रश्न का प्रारम्भिक उत्तर पाया जा सके कि क्या इस बार मानसून सामान्य होगा?

यह प्रश्न कई बार बेचैनी का रूप ले लेता है। जैसे 2016 में। पिछले दो वर्षों से भारत घोर अकाल से ग्रस्त रहा जिससे 40 करोड़ लोग पीड़ित हुए। जिन दो लाख गाँवों की भौगोलिक सीमा में कोई जलस्रोत नहीं है, उनके लिये 2016 में अच्छी मानसून की उम्मीद बहुत मूल्यवान वस्तु थी।

मौसम विभाग ने इसकी कामना की और घोषणा किया कि 2016 में वर्षा सामान्य से अधिक होगी। लेकिन, इसका अर्थ क्या है? मानसून साँप-सीढ़ी के खेल का मौसमविज्ञानी समतुल्य हैं। पिछले तीन वर्षों से चूँकी सामान्य मानसून से भी अधिकतम पानी एकत्र करने पर फोकस है, उत्तर-पूर्व में कुछ हो रहा था जिसने एक मुखर सन्देश दिया जिसकी सबों ने अनदेखी कर दी थी। अगस्त के आखिर तक कोई 20 राज्यों में बाढ़ आ गई थी, अधिकांश राज्यों में उसकी तीव्रता रिकॉर्ड तोड़ने वाली थी।

पानी बीच खगड़िया प्यासा

Source: 
राइजिंग टू द काल, 2014

अनुवाद - संजय तिवारी

2007 में बाढ़ के कारण खगड़िया जिले में जल संकट2007 में बाढ़ के कारण खगड़िया जिले में जल संकटखगड़िया सात नदियों की ससुराल है और ससुराल छोड़कर नदियाँ कहीं दूर न चली जाएँ इसलिये सरकारी योजनाओं ने उन्हें बाँधकर रखने की भरपूर कोशिश की है। कोसी, कमला बलान, करेश, बागमती, बूढ़ी गंडक, अधवारा समूह और गंगा। इन सात नदियों पर आठ बाँध बनाए गए हैं।

बागमती पर बना बुढ़वा बाँध और कराची बदला, कोसी पर बदला नागरपारा, गंगा पर गोगरी नारायणपुर, बूढ़ी गंडक पर बूढ़ी गंडक बाँध, कोसी पर बना कोसी बाँध और बागमती की ही एक और सहायक नदी पर बना नगर सुरक्षा बाँध।

सात नदियों पर बने आठ बाँधों के कारण खगड़िया में जल ही जीवन नहीं है, बल्कि जल में ही जीवन है। चारोंं तरफ पानी से घिरा हुआ लेकिन प्यासा। सब तरफ पानी है लेकिन पीने के लिये पानी नहीं है।