जल संगठनों की गतिविधियां

मीडिया कॉन्क्लेव 2016 (Media Conclave 2016)


कान्हा मीडिया कॉन्क्लेव का विकास के मुद्दों पर औपचारिक और अनौपचारिक संवाद की प्रक्रिया को बढ़ावा देगा। कान्हा मीडिया कॉन्क्लेव में जिन प्रमुख वक्ताओं ने मुख्य वक्तव्य के लिए अपनी सहमति दी है उनमें सर्वोच्च न्यायलय के वकील प्रशांत भूषण, खेती के मामलों के जनपैरवीकार देविंदर शर्मा, सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वार्यमेंट के ​उपनिदेशक चंद्रभूषण, जैसलमेर के रामगढ़ गांव में रहने वाले किसान चतरसिंह जाम और पर्यावरणीय मुद्दों पर जमीनी काम करने वाले राजस्थान के ही लक्ष्मण सिंह हैं। इसके अलावा संवाद की इस प्रक्रिया में संपादकों और वरिष्ठ पत्रकारों का एक बड़ा समूह शामिल है, जिनकी सक्रिय भूमिका के कारण ही यह आयोजन महत्वपूर्ण हो पाता है।

 

 

( एजेंडा निम्नलिखित है, एजेंडा पर अभी काम चल रहा हैं, इसके वक्ताओं में और नाम जुड़ेंगे। आपके कुछ सुझाव हों तो आयोजक टीम को बताएं)  

 

विकास संवाद के साथियों के नंबर...

 

केन्द्र किसी भी सूरत में बनाएगा केन-बेतवा लिंक

Source: 
इण्डिया वाटर पोर्टल (हिन्दी)

अरण्या ईको, इंडियन सोशल रिस्पांसबिलिटी नेटवर्क और डिवाइन इंटरनेशनल फाउंडेशन की संयुक्त रूप से आयोजित कार्यक्रम ‘डायलॉग आन रीवर इंटर-लिंकिंग’ में कई वक्ताअों ने नदी जोड़ परियोजना और खासकर केन-बेतवा लिंक पर अपने-अपने विचार व्यक्त किये। कुछ वक्ताओं ने यह भी कहा कि नदी जोड़ परियोजना की जगह दूसरी कम खर्चीली और दीर्घावधि परिणाम वाली परियोजनाओं पर काम किया जा सकता है। केन्द्र सरकार ने फिर एक बार केन-बेतवा लिंक परियोजना को किसी भी कीमत पर पूरा करने की प्रतिबद्धता दुहराई और आश्वासन दिया कि इससे वन्यजीवों और पर्यावरण को बहुत नुकसान नहीं होगा।

06 अगस्त 2016 शनिवार को अरण्या ईको, इंडियन सोशल रिस्पांसबिलिटी नेटवर्क और डिवाइन इंटरनेशनल फाउंडेशन की संयुक्त रूप से आयोजित कार्यक्रम ‘डायलॉग आन रीवर इंटर-लिंकिंग’ में कई वक्ताअों ने नदी जोड़ परियोजना और खासकर केन-बेतवा लिंक पर अपने-अपने विचार व्यक्त किये। कुछ वक्ताओं ने यह भी कहा कि नदी जोड़ परियोजना की जगह दूसरी कम खर्चीली और दीर्घावधि परिणाम वाली परियोजनाओं पर काम किया जा सकता है।

नदी जोड़ योजना : एक संवाद


नदी जोड़ योजना
तिथिः 06 अगस्‍त 2016
सायं काल 3:00 बजे, हाईटी
सायं काल 4:00 बजे, कार्यक्रम की शुरुआत
स्थानः कान्स्टीट्यूशन क्‍लब, रफी मार्ग, नई दिल्‍ली


. भारत जल और भूमि संसाधनों से सम्पन्न देश है। विश्व में भारत की भूमि 2.5 प्रतिशत है, जल संसाधन वैश्विक उपलब्धता का 4 प्रतिशत है और जनसंख्या 17 प्रतिशत है। उपलब्ध क्षेत्र 165 मिलियन हेक्टेयर है जो दुनिया में दूसरा सबसे अधिक क्षेत्र है, उसी तरह जैसे भारत का स्थान जनसंख्या के मामले में भी दुनिया में दूसरा है। नब्बे के दशक में भारत में 65 प्रतिशत किसान और कृषि मजदूर थे जिससे स्पष्ट होता है कि हमारा देश कृषि यानि जमीन और जल पर निर्भर रहा है। इसलिए इस बात को शुरुआत से ही माना जाता रहा है कि देश के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिये जल संसाधनों का विकास अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

दुनिया में जल संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं। अगर विश्व की आबादी बढ़कर 25 अरब हो जाएगी तो भी उपलब्ध पानी पर्याप्त होगा। भारत में कुल उपलब्ध पानी 16500 लाख की आबादी के लिये पर्याप्त है (1500 घन मीटर/प्रति व्यक्ति/प्रतिवर्ष)।

इंटरनेशनल रिवर सिम्पोजियम- सब्सिडी के साथ आवेदन तिथि 31 जुलाई


इंटरनेशनल रिवर सिम्पोजियम

तिथिः 12-14 सितम्बर 2016
स्थानः नई दिल्ली


.पहले आओ पहले पाओ! जी हाँ, ​नदियों को लेकर आयोजित होने जा रही अन्तरराष्ट्रीय नदी संगोष्ठी (International Rivers Symposium) के लिये ​छूट के साथ प्रारम्भिक पंजीयन की अंतिम ​तिथि​ 31 जुलाई है। संगोष्ठी में हिस्सा लेने वाले भारतीय प्रतिनिधियों को विशेष सब्सिडी के तहत पंजीयन की फीस में 75 प्रतिशत तक की छूट के लिये आवेदन करने का मौका दिया जा रहा है। इस वर्ष यह संगोष्ठी 12-14 सितम्बर तक नई दिल्ली में आयोजित होगी।

इस बार के कार्यक्रम का थीम है-विश्व की विशाल नदियां : साझा लाभ के लिये प्रबंधन।

इस अनोखे और वृहत कार्यक्रम, प्रमुख वक्ताअों, विशेष सत्र, सोशल इवेंट्स और हिमालयी क्षेत्रों में टूर का हिस्सा बनिए।

विकास का नाकाम मॉडल

Source: 
विकास संवाद

दसवाँ राष्‍ट्रीय मीडिया विमर्श


स्थान : कान्‍हा, मध्य प्रदेश
तारीख : 13-14-15 अगस्‍त, 2016


“लोगों के बीच जाइए। उनके साथ रहिए। उनसे सीखिए। उन्‍हें स्‍नेह दीजिए।
शुरू करें वहाँ से जो वे जानते हैं। निर्माण उन चीजों से करें जो उनके पास है।
लेकिन नेतृत्‍व ऐसा हो कि जब काम पूरा हो तो लोग कहें, ‘ये हमने बनाया है।”


हमारे बीच कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो हमें सही रास्‍ता दिखा रहे हैं। जैसे जैसलमेर के रामगढ़ को पानीदार बनाने का समाज केन्द्रित मॉडल। वहाँ इस सूखे और 51 डिग्री तापमान में भी उनके गाँव में पशु-पक्षियों के लिये भी पानी है। इसी तरह उत्‍तराखण्ड में हुई पहल ने दिखा दिया है कि अगर जंगलों को सहेजने का जिम्‍मा स्‍थानीय समाज ले ले तो न जंगलों में आग लगेगी और न कहीं पानी की कमी होगी। ये लोग असल में विकास के नाम पर चल रही उस भेड़चाल को चुनौती दे रहे हैं, जिसमें एक छायादार, घना पेड़, बहती नदी और लहलहाते खेत का कोई मोल नहीं, क्‍योंकि ‘बाजारवादी विकासोन्‍मुखी सिद्धान्त’ में इनका दोहन की विकास दर तय करता है। विकास और नियोजन को लेकर पाँचवीं और छठी शताब्‍दी के चीनी दार्शनिक लाओ त्‍सू की यह परिकल्‍पना 20वीं शताब्‍दी में भारत सहित दुनिया के किसी भी देश के विकास मॉडल में नजर नहीं आती। जिन परिणामों की प्राप्‍ति के लिये विकास के ये मॉडल बनाए गए, वे फिलहाल अपेक्षित परिणाम देने में नाकाम हैं। इसके दर्जनों उदाहरण हमारे सामने हैं।

एक समय अमेरिका के चार बड़े निवेश बैंकों में शुमार रहे लेहमैन ब्रदर्स के 2008 में दिवालिया होने के बाद अब बारी भारतीय स्‍टेट बैंक और उसके अधीनस्‍थ बैंकों की है, जिन पर 5 लाख करोड़ रुपए से ज्‍यादा का डूबत खाते का ऋण है। दुनिया में भारत अकेला देश नहीं, जिसका विकास मॉडल फेल हुआ है। ग्रीस का दिवालिया हो जाना और भयंकर मंदी में उलझे यूरोपीय संघ के कुछ और देशों, चीन, ब्राजील, तुर्की और मलेशिया में भी विकास के भूमण्डलीकृत मॉडल की नाकामी साफ झलकने लगी है।