जल संगठनों की गतिविधियां

जलगांव में बनेगी जल, जन और अन्न सुरक्षा की रणनीति

तारीख : 19-29 दिसंबर, 2014
स्थान : गांधी तीर्थ, गांधी रिसर्च फाउंडेशन, जैन हिल्स, जलगांव, महाराष्ट्र


जल सुरक्षा के बगैर न जन सुरक्षा की उम्मीद की जा सकती है और न ही अन्न सुरक्षा की; बावजूद इस सत्य के। क्या यह सत्य नहीं है कि पिछले कुछ दशकों से हम भारतीय इस तरह व्यवहार करने लगे हैं कि मानों पानी कभी खत्म न होने वाली संपदा हो? हमने पानी का उपभोग बढ़ा लिया है। पानी को संजोने की जहमत उठाने की बजाय, हमने ऐसी मशीनों का उपयोग उचित मान लिया है, जो कि कम-से-कम समय में अधिक-से-अधिक पानी निकाल सके। सरकारों और वैज्ञानिकों ने भी ऐसे ही विकल्प हमारे सामने रखे।खाद्य सुरक्षा और जल सुरक्षा : ये दोनों ही विषय केन्द्र की वर्तमान एवं पूर्व सरकार के एजेंडे में हिस्सा रहे हैं। संप्रग सरकार ने खाद्य सुरक्षा को लेकर कानूनी पहल के काफी चर्चा में रही। वर्तमान सरकार के जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय ने 22 नवंबर को दिल्ली में जल मंथन के दौरान जल सुरक्षा पर गैर सरकारी संगठनों की राय जानने के लिए विशेष सत्र का आयोजन किया।

जलवायु परिवर्तन की चुनौती एवं गंगा के संदर्भ में इलाहाबाद में सेमिनार

Source: 
ग्लोबल ग्रींस
तारिख : 26 जुलाई 2014
स्थान : उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, इलाहाबाद


जलवायु परिवर्तन की चुनौती एवं समाधान गंगा के विशेष संदर्भ के विषय पर एडवोकेसी वर्कशॉप एवं सेमिनार का आयोजन ऑल इंडिया वूमेंस कॉन्फ्रेंस द्वारा एवं संयोजन ग्लोबल ग्रींस द्वारा किया जा रहा है। कार्यक्रम 26 जुलाई 2014 को उ.म.क्षे.सां.के. इलाहाबाद के प्रेक्षागृह में किया जा रहा है।

सेमिनार में शोध छात्रों द्वारा जलवायु परिवर्तन एवं गंगा के संदर्भ में पेपर प्रस्तुत किया जाएगा साथ ही प्रजेंटेशन भी किया जाएगा। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता विषय विशेषज्ञ के रूप में जलवायु परिवर्तन पर बी.आर. अम्बेडकर वि.वि. लखनऊ के पर्यावरण वैज्ञानिक डाॅ. वेंकटेश दत्ता एवं गंगा पर उत्तरकाशी के पर्यावरणविद सुरेश भाई रहेंगे।

आमंत्रण : आठवाँ मीडिया सम्मेलन

source: 
विकास संवाद
साथियों
विकास और जनसरोकार के मुद्दों पर बातचीत का सिलसिला साल-दर-साल आगे बढ़ता ही जा रहा है। हालाँकि इस बार हम यह राष्ट्रीय सम्मेलन अपने तय समय से थोडा देर से करने जा रहे हैं, लेकिन कई बार मार्च में संसद और राज्य विधानसभाओं के सत्र और बजट की आपाधापी में फंसने के कारण बहुत सारे साथी आ नहीं पाते थे। और इस बार तो थे चुनाव और उसके बाद नई सरकार तो, इस बार सोचा थोडा लेट चलें, लेकिन सब मिल सकें।

आप सब जानते ही हैं कि यह सफ़र 2007 में सतपुड़ा की रानी पचमढ़ी से शुरू हुआ। चित्रकूट, बांधवगढ़, महेश्वर, छतरपुर, पचमढ़ी फिर सुखतवा (केसला) के बाद इस बार हम यह आयोजन चंदेरी में करने जा रहे हैं। इस बार कई दौर की बैठकों के बाद चंदेरी संवाद के लिए जो विषय चुना गया है, वह है।

आदिवासी – हमारी, आपकी और मीडिया की नजर में
समय, स्थान- 23,24,25 अगस्त 2014, चंदेरी, जिला- अशोकनगर, मध्यप्रदेश

कोल्हापुर में होगा चौथा भारत विकास संगम

Author: 
अजित षडंगी
Source: 
भारतीय पक्ष, जुलाई 2014
तारिख : 19-25 जनवरी 2015 तक।
स्थान : श्रीक्षेत्र सिद्धगिरि मठ, कणेरी गांव, कोल्हापुर।


सरकार देश के विकास को लेकर क्या सोचती है, इसका ढिंढोरा तो खूब पीटा जाता है, लेकिन विकास के बारे में समाज की क्या सोच है, इसे जानने के बहुत कम अवसर मिलते हैं। कोल्हापुर का सम्मेलन इस कमी को पूरा करेगा। यहां आपको उस भारत के दर्शन होंगे, जिसके सपने देश की सज्जनशक्ति देखती है। भारत विकास संगम की कोशिश है कि ये सपने कुछ गिने-चुने समाजसेवी ही नहीं, बल्कि देश की जनता भी देखे। और जब कोई सपना देश की जनता देखती है तो वह सपना-सपना नहीं रहता, वह सच्चाई बन जाता है।

उत्तर प्रदेश और कर्नाटक की यात्रा करता हुआ भारत विकास संगम का राष्ट्रीय सम्मेलन अब महाराष्ट्र के कोल्हापुर में दस्तक देने वाला है। ‘भारतीय संस्कृति उत्सव’ के नाम से आयोजित हो रहे इस बार के सम्मेलन की मेजबानी का जिम्मा श्री क्षेत्र सिद्धगिरि मठ, कणेरी के ऊपर है। 19 जनवरी से 25 जनवरी, 2015 के बीच होने वाले इस सम्मेलन की तैयारियां जोरों पर है।

भारत विकास संगम का चौथा सम्मेलन भारतीय संस्कृति उत्सव के नाम से महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में आयोजित किया जा रहा है। कोल्हापुर को मां लक्ष्मी का धाम माना जाता है। जो लोग तिरुपति में भगवान विष्णु का दर्शन करने जाते हैं, वे यहां मां लक्ष्मी के दर्शन के लिए अवश्य आते हैं।

गंगा संवर्धन हेतु काशी कुंभ का निमंत्रण

Source: 
जल जन जोड़ो अभियान
तारिख : 12-20 जुलाई 2014 तक।
स्थान : काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू)


कुम्भ तो बिना बुलाए आयोजित होते थे। इनमें शामिल होने वाले लोग गंगा को और अधिक गंदा करके जाते हैं। कुम्भ का भावार्थ ही बदल दिया है। पहले कुम्भ में राजा, प्रजा, संत ये सब मिलकर देवता और राक्षस के रूप में वैचारिक मंथन करते थे। इस मंथन में समाज की बुराइयों का जहर और समाज की अच्छाइयों के अमृत को अलग-अलग रखने की विधि पर विचार करके निर्णय होता था। निर्णयों को कुम्भ का निर्णय मानकर राजा, प्रजा और संत सब अपने जीवन में पालना करते थे।

आप जानते हैं, गंगा के विषय में सरकार बहुत चिंतित है और गंगा मंथन कर रही है। समाज को भी सरकार के इस मंथन में साथ रहना चाहिए। गंगा की पवित्रता की रक्षा करने का काम गंगा किनारे के घाटों पर रहने वाले पुजारी और संतजन ही करते थे। राजनैतिक उथल-पुथल, गुलामी और समाज के आर्थिक लोभ लालच ने गंगा सेवा का रूप बदल दिया है।