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जीवन में जहर घोलता पानी

Author: 
केसर सिंह

फ्लोरोसिस से पीड़ित कालीबाईफ्लोरोसिस से पीड़ित कालीबाई हाल में जल-गुणवत्ता के मुद्दे पर हुई एक कॉन्फ्रेंस में हैदराबाद जाना हुआ। जहाँ नलगौंडा से कुछ बच्चे और बुजुर्ग भी आए थे। उनमें से कई दिव्यांग थे, वजह फ्लोरोसिस नामक बीमारी। पानी में फ्लोराइड की अधिक मौजूदगी से फ्लोरोसिस बीमारी होती है। तेलंगाना के पूरे नालगौंडा जिले के भूजल में फ्लोराइड है।

भारत की सुजला धरती कुछ आधुनिक पढ़े-लिखों की वजह से कालापानी में बदलती जा रही है। दूध-दही जैसी पानी वाली नदियां जहर का परनाला बन गई हैं। हम नारा लगाते हैं, जल ही जीवन है। हाँ, जरूर! पर अच्छा और साफ पानी ही जीवन है। इसके उलट, प्रदूषित और जहरीला पानी जानलेवा है। आज तो जहां जाइये, ज्यादातर जगहें ‘केपटाउन’ हो गई हैं। पानी मौजूद नहीं है। और कहीं है भी तो, पीने लायक नहीं। देश के दस करोड़ से ज्यादा लोग पानी से होने वाली बीमारियों के शिकार हैं। देश में जगह-जगह बन रहे ‘कालियादह’ में से कुछ का जिक्र यहाँ जरूरी है, जहां स्थिति बहुत बुरी और बेकाबू हो चुकी है।

मालवा ‘देश’ की कैंसर राजधानी

पंजाब का मालवा यानी पंजाब का दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र ‘देश’ की कैंसर राजधानी बन चला है। बठिंडा, फरीदकोट, फिरोज़पुर, लुधियाना और मोगा इलाके में कैंसर की भयावहता का अंदाज़ा इस बात से होता है कि बठिंडा से बीकानेर जाने वाली एक ट्रेन को लोग कैंसर-ट्रेन बोलने लगे हैं।

रोज़ाना रात को बठिंडा से छूटने वाली बीकानेर पैंसेजर ट्रेन में सैकड़ों की संख्या में कैंसर मरीज़ होते हैं। ये जा रहे होते हैं ‘आचार्य तुलसी रीज़नल कैंसर ट्रीटमेंट और रिसर्च सेंटर’। बीकानेर का यह अस्पताल उन चुनिंदा अस्पतालों में से है जहां हर कैंसर का इलाज बेहद किफायती है। जैन-समाज के एक ट्रस्ट द्वारा धर्मार्थ चलाए जा रहे इस अस्पताल में इलाज के साथ ही जांचें और रुकना-खाना भी बेहद सस्ता है।

पंजाब का मालवा कैंसर-राजधानी कैसे बन चला है, ये जानना ज़रूरी है। पेस्टीसाइड, इनसेक्टीसाइड और रासायनिक उर्वरकों का मनमाना उपयोग ने खेती को जहरीला कर दिया है। एक रिसर्च बताती है कि मालवा के इलाके में इंसानी खून में पेस्टीसाइड हैं। इस इलाके के पानी में पेस्टीसाइड के साथ ही यूरेनियम और आर्सेनिक भी मौजूद है। गिनती के गांवों में साफ़ पानी पीने को मिल पा रहा है। सरकारों की लापरवाही के कारण हानिकारक पानी पीने को लोग मजबूर हैं, जिससे कैंसर बढ़ता जा रहा है।

दिल्ली एनसीआरः कैंसर की नई राजधानी बनने को तैयार

दिल्ली एनसीआर के औद्योगिक शहर फरीदाबाद, गुरुग्राम, मेरठ, नोएडा और गाजियाबाद के भूजल के बारे में खतरनाक रिपोर्टें आती रहती हैं। हालिया एक रिपोर्ट के मुताबिक गाजियाबाद के भूमिगत जल में सीसा, कैडमियम, ज़िंक, क्रोमियम, आयरन और निकल जैसी भारी धातुएं हैं। इनकी मात्रा भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई है।

जुडावनपुर बरारी गाँव के ब्रजकिशोर सिंह की तलहथी में फफोला अब दोनों हाथों में हो गया हैजुडावनपुर बरारी गाँव के ब्रजकिशोर सिंह की तलहथी में फफोला अब दोनों हाथों में हो गया हैअसम की कॉटन कॉलेज स्टेट यूनिवर्सिटी और आईआईटी-दिल्ली के शोधकर्ताओं ने क्षेत्र में जलगुणवत्ता और स्वास्थ्य संबंधी खतरों का मूल्यांकन किया और निष्कर्ष निकाला कि भारी धातुओं के भूमि में रिसाव के कारण भूमिगत जल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और स्वास्थ्य संबंधी खतरे बढ़ रहे हैं। भूजल में पाए गए सीसा एवं कैडमियम की मात्रा बच्चों के लिए हानिकारक साबित हो सकती है।

प्रदूषित जल पीने से डायरिया और पेट के कैंसर जैसे खतरनाक रोग होने का खतरा हो सकता है। एक अनुमान के अनुसार प्रदूषित भूमिगत जल से हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग 15 लाख बच्चे मर जाते हैं। भूमिगत जल के एक बार प्रदूषित हो जाने के बाद उसको वापस साफ करने में कई दशक लग सकते हैं।

झाबुआ, मध्य प्रदेश

लगभग डेढ़ दशक पहले झाबुआ जिले के मियाटी गांव के तोलसिंह का ब्याह जुलवानियां की कालीबाई से हुआ। मियाटी की आबोहवा में जाने क्या घुला हुआ था कि काली दिन-ब-दिन कमजोर होती चली गईं। 38 की उम्र आते-आते वह निशक्त हो गईं। हड्डियां ऐसी हो गईं जैसे वह कभी भी झर से झड़कर बिखर जाएंगी। उसके पैर टेढ़े-मेढ़े हो गए और उसके लिए दो कदम चलना भी पहाड़ जैसा हो गया था।

बेटा, भूरसिंह पैदा हुआ। काली खुश थी कि बेटा बुढ़ापे का सहारा बनेगा लेकिन वह तो जवान होने से पहले ही बूढ़ा हो गया। भूर के हाथ-पैर बचपन से बेकार होने लगे। कालीबाई ने अपनी तबियत दुरुस्त करने के लिए डॉक्टर, वैद्य, नीम, हकीम सबके चक्कर लगाए, लेकिन सब बेकार। गांव में कालीबाई कोई इकलौती नहीं जिसको यह रोग लगा हो। यह तो रेेंगते, लुढ़कते और लड़खड़ाते हुए लोगों का गांव है।

कई अध्ययनों से बाद में पता चला कि गांव के भूजल में फ्लोराइड है, जो शरीर की हड्डियों को सीधा नुकसान पहुंचा रहा है। यह समस्या झाबुआ सहित आसपास के जिलों में हजार के करीब गांवों में फैली हुई है।

बक्सर, बिहारः पसरा कैंसर

धर्मेन्द्र की उम्र 21 साल भी नहीं हुई थी। उसके कई अंगों में कैंसर फैल गया था। कैंसर का पता चलने के करीब चार महीने बाद कोलकाता के पीजीआई अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई। उसकी माँ मीना देवी के सिर पर बालों के बीच करीब दो साल से एक फोड़ा हो गया है। जिसमें खून झलक रहा है। हाथ और पैर के नाखून पीले पड़ कर गिर रहे हैं। पिता रामकुमार यादव स्वयं लगातार सरदर्द, शरीरदर्द से परेशान हैं।

बक्सर जिले का ‘तिलक राय का हाता’ धर्मेन्द्र का गांव है। आर्सेनिक प्रभावित गांव के रूप में सर्वेक्षण हुआ है। इसकी रिपोर्ट 2015 में प्रकाशित हुई है। यहाँ के अधिकांश निवासियों में आर्सेनिकोसिस के लक्षण दिखते हैं। आर्सेनिकोसिस के लक्षण त्वचा, हथेली और पैर के तलवे पर पहले दिखते हैं। चमड़ी का रंग बदल जाता है। सफेद छींटे जैसे दाग हो जाते हैं। तलवों में काँटे जैसे निकल जाते हैं। हथेली में चमड़े के नीचे काँटेदार स्थल बनने से तली खुरदुरी हो जाती है। अान्तरिक अंगों पर असर बाद में दिखता है। यह असर कैंसर की शक्ल में होता है। आँत, लीवर, फेफड़े व दूसरे अंगों में कैंसर के मरीज मिले हैं। पेयजल में आर्सेनिक होने की वजह से बिहार के काफी गाँवों में कैंसर पसरा हुआ है।

यही हाल देश के बड़े हिस्से में है। इस गर्मी तो यह संकट और भी गहराने वाला है। भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक इस साल भी रिकॉर्ड तोड़ गर्मी होने वाली है। बढ़ती गर्मी जल उपलब्धता के साथ ही गुणवत्ता की समस्या भी बढ़ाता है। डिजिटल इंडिया जैसे नारों में क्या इतना दम है कि प्रदूषित जल से होने वाली बीमारियों और मौतों को रोक पाएंगे?

समस्या का धंधा और खेल

लापरवाही और बदमाशी का हाल रहा तो भारत के किसी हिस्से का पानी पीने लायक नहीं रह जाएगा। गिरती जलगुणवत्ता की समस्या से कुछेक करोड़ों बनाने में लगे हुए हैं। बीमारियों का भय हर घर में वाटर-फिल्टर की अनिवार्यता सुनिश्चित कर चुका है। हजारों करोड़ों के वाटर-फिल्टर के व्यवसाय का फरेब भी दिलचस्प है। ज्यादातर वाटर-फिल्टर लाभदायक तत्वों को भी निकाल देते है जो शरीर के लिए जरूरी हैं, जैसे आइरन, मैग्नीशियम, कैल्शियम और सोडियम।

खुदाबख्शपल्ली गाँव की 22 वर्षीय रजिता के दोनों पैर इस बीमारी की चपेट में हैंहकीकत में ऐसा है कि यदि पानी में कोई खतरनाक रसायन नहीं है और टीडीएस की मात्रा सही है तो आरओ या वाटर-फिल्टर लगाने की जरूरत नहीं है। ऐसे में आरओ का पानी पी रहे हैं तो सेहत को फायदे की बजाय नुकसान होगा क्योंकि वह जल में मौजूद लाभदायक तत्व भी निकाल देगा।

आरओ या वाटर-फिल्टर लगाने के पहले हमें पता होना चाहिए कि हम जिस से स्रोत पानी पी रहे हैं, क्या उस पानी में कोई गड़बड़ी है। गड़बड़ी है तो कौन सा रसायन पानी में है, उसको कौन से तरीके से ठीक किया जा सकता है।आरओ या वाटर-फिल्टर बेचने वालेे एजेंट इन किसी भी पहलू पर बात नहीं करना चाहते। सिर्फ टीडीएस को दिखा-दिखा कर फिल्टर बेचे जा रहे हैं। दरअसल आरओ या वाटर-फिल्टर को बेचे जाने के पीछे वैज्ञानिक पहलू के बजाय विज्ञापन ज्यादा हावी है।

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टिप्पणी

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन <a href="http://bulletinofblog.blogspot.in/2018/04/dada-saheb-phalke.html">दादा साहब फाल्के और ब्लॉग बुलेटिन</a> में शामिल किया गया है। <b>कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।</b>

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