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तन जहाज मन सागर

Author: 
पंडित मधुप मुद्गल
Source: 
कादम्बिनी, मई, 2018
पानी का सिर्फ हमारे जीवन में ही नहीं, बल्कि संगीत में भी बहुत महत्त्व है। बावजूद इसके हम इसे नष्ट करने पर तुले हुए हैं। पानी को बचाने का सबसे सीधा तरीका है, इसे दूषित न किया जाए, बल्कि संरक्षित किया जाए। खासतौर पर वर्षा के जल को। हमारे शास्त्रीय संगीत, लोग संगीत सभी में पानी, बारिश, प्रकृति का वर्णन मिलता है। एक तरफ महाकवि कालिदास ‘मेघदूत’ महाकाव्य रचते हैं, तो दूसरी तरफ मेघ, मियां मल्हार, मेघ मल्हार जैसे रागों को मियां तानसेन गाते हैं। यह सब कहीं-न-कहीं पानी से ही तो जुड़ा है, क्योंकि धरती पर पानी का मुख्य स्रोत मेघ हैं। बारिश का मौसम है। किसान से लेकर आम लोग तक जून-जुलाई के महीने में स्वाभाविक रूप से आसमान की तरफ देखने लगते हैं। दिन गिनने लगते हैं कि आज पानी नहीं बरसा। पुरवैया हवा का जोर रहा, पानी से भरे बादल सिर के ऊपर से उड़ते रहे। दिनभर उड़ते थे, लगता था कि बादल बरसेंगे, पर नहीं बरसे। यह भाव पानी से जुड़े हमारे मनोभाव को ही दर्शाता है। भले ही, महानगर में रहने वालों को ज्यादा बारिश होने से कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। फिर भी, उमड़ते-घुमड़ते मेघ से तो यही आशा है कि वे हम पर पानी बरसाकर ही जाएँगे। मुझे याद आता है कि उन दिनों मैं पंडित बसंतराव देशपांडे से संगीत सीख रहा था। उन्होंने एक बन्दिश दिखाई थी- ‘तन जहाज मन सागर’। इस बन्दिश को राग जयजयवंती और छायानट दोनों में गाया जाता है। पंडित कुमार गंधर्वजी ने तो पानी से जुड़ी कई निर्गुण रचनाओं को गाया। उनकी गाई रचनाएँ- ‘कैसे भरूँ पानी’ और ‘चाँद सूरज ना जहाँ, पवन ना पानी’ अद्भुत हैं। आमतौर पर शहरों में पानी हमें सप्लाई से आसानी से मिल जाता है, इसलिये हम उसकी कीमत नहीं समझ पाते। एक समय था जब राजधानी दिल्ली में भी पानी की सप्लाई का समय निश्चित था। उस समय हम लोग भी सुबह पाँच बजे उठकर पानी भर लिया करते थे और उस समय बहुत सोच-समझकर पानी खर्च करते थे। लेकिन, जैसे-जैसे सुविधाएँ बढ़ने लगीं, लोगों के पास आर्थिक सम्पन्नता बढ़ने लगी, हम प्रकृति के इस संसाधन पर अपना एकाधिकार समझने लगे हैं। हमें लगने लगा है कि सिर्फ और सिर्फ हमारा ही इस पर आधिपत्य है। तभी तो घर से लेकर होटल तक में जगह-जगह नल हैं। जहाँ हम एक बाल्टी पानी का इस्तेमाल कर सकते हैं, वहाँ दस बाल्टी का प्रयोग करते हैं, क्योंकि हमें लगता है कि हम पानी का बिल तो भर रहे हैं। हम भूल जाते हैं कि पानी एक प्रकृति प्रदत्त बेशकीमती उपहार है। इसे हम फैक्ट्री में नहीं बना सकते और अगर बनाने भी लगें, तो उसकी लागत जितनी आएगी, उसकी कीमत को क्या हर कोईचुका पाएगा? ऐसे ही न जाने कितने सवाल मन में घुमड़ते रहते हैं।

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