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नर्मदा कछार के बाँध - बढ़ता जल संकट


नर्मदा नदीनर्मदा नदीनर्मदा के जल के अति-दोहन और उसके कछार प्रदेश में अबाध रूप से जारी खनन ने पूरे इलाके के बाँधों में जल भण्डारण व जल-चक्र पर नकारात्मक प्रभाव डाला है। इसकी झलक आपको मध्य प्रदेश के जल संसाधन विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी से मिल जाएगी। विभाग की वेबसाइट पर 164 मुख्य बाँधों की सूची उपलब्ध है। यह इन बाँधों में उपलब्ध पानी की मॉनीटरिंग करता है। एसएमएस आधारित इस व्यवस्था की मॉनीटरिंग प्रतिदिन की जाती है और इससे सम्बन्धित जानकारी, सर्वसाधारण के लिये भी उपलब्ध है।

विभाग की वेबसाइट के अनुसार 9 अप्रैल 2018 की स्थिति है कि 65 बाँधों में दस प्रतिशत से भी कम पानी बचा है। 38 बाँधों में दस से पच्चीस प्रतिशत, 26 बाँधों में पच्चीस से पचास प्रतिशत, 3 बाँधों में पचास से पचहत्तर प्रतिशत, नौ बाँधों में पचहत्तर से नब्बे प्रतिशत और तेरह बाँधों में नब्बे प्रतिशत से अधिक पानी शेष है। मानसून के आने तक कितने बाँध सूखेंगे, कहा नहीं जा सकता पर संकट की गम्भीरता का अनुमान लगाया जा सकता है।

नर्मदा नदी, मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी नदी है। उस पर बने प्रमुख बाँध हैं बरगी, नर्मदासागर, ओंकारेश्वर और महेश्वर। नौ अप्रैल 2018 की स्थिति में बरगी में 87 प्रतिशत और इन्दिरा सागर बाँध में 39 प्रतिशत पानी बचा है। ओंकारेश्वर बाँध में पानी एलएसएल (न्यूनतम स्तर) के नीचे उतर चुका है वहीं, महेश्वर बाँध के आँकड़े अनुपलब्ध हैं। मध्य प्रदेश द्वारा गुजरात को निर्धारित कोटे के अनुसार पूरा पानी दिये जाने के बावजूद सरदार सरोवर बाँध की हालत पतली है।

नर्मदा की सहायक नदियों पर बने बाँधों में भी पानी की उपलब्धता बहुत अच्छी नहीं है। मंडला जिले के मटयारी और मझगाँव बाँध में क्रमशः छब्बीस और बारह प्रतिशत पानी बचा है। रायसेन जिले के बारना बाँध में नौ प्रतिशत और होशंगाबाद जिले के तवा और डोकरीखेड़ा बाँध में क्रमशः तीन और दो प्रतिशत, खंडवा जिले के सुक्ता बाँध में सत्रह प्रतिशत, झाबुआ जिले के माही बाँध में तेरह प्रतिशत, पानी बचा है। अन्य नदी कछारों के प्रमुख बाँधों की भी हालत अच्छी नहीं है। गुना जिले का संजय सागर और बन्धिया नाला बाँध, राजगढ़ जिले का कुँअर चैन सागर बाँध, छतरपुर का बैनीगंज टैंक, सागर जिले का बीला टैंक, देवास जिले का चन्द्रशेखर टैंक, इन्दौर का देपालपुर टैंक, शाजापुर का लखुन्दर और पीलियाखाल बाँध, धार का मंदावती टैंक, रतलाम का रूपनियाखाल बाँध, शिवपुरी का परोच बाँध और ग्वालियर का तिघरा बाँध सूख चुके हैं। गाँधी सागर में केवल 18 प्रतिशत और बाणसागर में मात्र 47 प्रतिशत पानी बचा है। यह स्थिति केवल बरसात की कमी के कारण नहीं है। इसके और भी कारण हो सकते हैं। उन्हें समझा जाना चाहिए।

सबसे पहले बात सन 1972 के नर्मदा ट्रिब्यूनल के आवंटन की। दिनांक 8 अक्टूबर 1974 को नर्मदा ट्रिब्यूनल ने सरदार सरोवर बाँध साइट पर 75 प्रतिशत निर्भरता पर उपलब्ध एवं उपयोग में आने लायक 28 मिलियन एकड़ फीट पानी का मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के बीच बँटवारा किया था। इस बँटवारे में मध्य प्रदेश को 18.25 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ), गुजरात को नौ एमएएफ राजस्थान को 0.5 एमएएफ और महाराष्ट्र को 0.25 एमएएफ पानी दिया था। उस बँटवारे पर पानी का हर साल आवंटन होता है। उक्त आवंटन की अगली समीक्षा 2024 में होगी।

बाँधों में पानी की कमी और नदियों का सूखना/प्रवाह में कमी आना परस्पर सम्बद्ध घटना है। नदियों के सूखने या उनके प्रवाह में कमी का बाँधों में जमा होने वाले पानी पर असर पड़ता है। विदित है कि बाँधों में केवल बाढ़ का ही पानी नहीं जमा होता। उनमें बरसात के बाद का गैर-मानसूनी प्रवाह भी जमा होते हैं। यदि उसमें कमी आती है या नदी सूखती हैं तो बाँधों का भरना सन्दिग्ध हो जाता है।

बाँधों का बरसात में भरना केवल बरसात की मात्रा पर निर्भर नहीं होता। वह पानी बरसने की गति और अवधि पर बहुत अधिक निर्भर होता है। इस कारण बाँधों के कम भरने के लिये केवल बरसात की मात्रा को जिम्मेदार मानना सही नहीं है। इस सोच पर पुनर्विचार करना चाहिए।

गौरतलब है कि यदि पानी के बरसने की गति कम रहती है और पानी की औसत मात्रा बरस जाती है तो भूजल रीचार्ज अच्छा होना चाहिए। बेहतर भूजल रीचार्ज के कारण नदियों के प्रवाह में वृद्धि दिखना चाहिए। गैर-मानसूनी प्रवाह बढ़ना चाहिए। बाँधों का भरना जारी रहना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हो रहा है तो उन कारणों को खोजा जाना चाहिए, जो समस्या की जड़ है। अर्थात, भूजल दोहन के असर को समझना जाना चाहिए।

नर्मदा और उसकी सहायक नदियों पर अनेक बाँध बने हैं और कई बनने की प्रक्रिया में हैं। बरगी बाँध का निर्माण नर्मदा की मुख्य धारा पर है। जिसके कारण, नर्मदा द्वारा उद्गम से लेकर अमरकंटक बरगी बाँध की साइट तक का प्रवाह बरगी जलाशय के एरिया में आ गया है। बरगी बाँध के बाद नर्मदा नदी के प्रवाह का पुनर्जन्म होता है। प्रवाह का एक बार पुनः बनना प्रारम्भ होता है।

बरगी और नर्मदा सागर बाँध के बीच के 417 किलोमीटर लम्बे मार्ग में एक बार फिर प्रवाह बढ़ता है। नर्मदा अपनी सहायक नदियों से योगदान लेती है पर तवा और बारना नदी पर बाँध के बनने के बाद योगदान में कमी आई है। छोटी नदियों पर बने स्टॉपडैमों ने भी योगदान को कम किया है। इसका सीधा असर बाँधों में जमा होने वाले पानी की मात्रा पर पड़ा है। बाँध घाटे में रहे हैं।

पिछले कुछ सालों से नर्मदा के पानी का उपयोग इन्दौर, देवास, पीथमपुर, भोपाल, जबलपुर जैसे महानगरों और घाटी के अनेक कस्बों के लिये होने लगा है। गौरतलब है कि नर्मदा नदी, अपनी यात्रा के दौरान कछार से जितना पानी जुटाती है, उसका अच्छा-खासा हिस्सा उपरोक्त योजनाओं द्वारा उठा लिया जाता है। इस कारण नर्मदा नदी के प्रवाह में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाती। बाँधों तक पानी नहीं पहुँच पाता।

नर्मदा नदी के कछार में बड़े पैमाने पर रेत का खनन होता है। कहीं-कहीं यह खनन पोकलेन मशीनों द्वारा भी किया जाता है। इन मशीनों द्वारा होने वाला गहरा खनन रेत के कुदरती जमाव को नष्ट कर देता है। रेत के गहरे खनन के कारण प्रवाह की लय बिगड़ती है। वह अनियमित होती है। यही अनियमितता अन्ततः गैर-मानसूनी प्रवाह को कम करती है। इस कारण बाँधों तक पानी नहीं पहुँच पाता।

नर्मदा की मुख्य धारा पर दूसरा बाँध (नर्मदा सागर) बनाया गया। इस बाँध ने बरगी से नर्मदा सागर के बीच के मार्ग में उपजे प्रवाह को अपने जलाशय में कैद कर लिया। नर्मदा सागर के बाद ओंकारेश्वर, महेश्वर और सरदार सरोवर बाँध बने। उन बाँधों में पानी तभी पहुँच सकता है जब पिछला बाँध पानी छोड़े। यदि वही पानी की कमी से जूझ रहा हो तो कौन किसे जिलाए। लगता है, इसी कारण इन्दिरा सागर बाँध में 39 प्रतिशत पानी बचा है। ओंकारेश्वर बाँध में पानी न्यूनतम स्तर के नीचे उतर चुका है। सरदार सरोवर बाँध की हालत पतली है।

नर्मदा ट्रिब्यूनल के फैसले को 44 साल बीत गए हैं। पिछले 44 सालों में नर्मदा कछार में अनेक बदलाव हुए है। कछार के जंगल कम हुए हैं। भूमि उपयोग में बदलाव हुए हैं। आबादी बढ़ी है। पानी का उपयोग बढ़ा है। बरसात का पैटर्न बदला है। भूजल दोहन में अकल्पनीय बढ़ोत्तरी हुई है। कछार का भूजल स्तर गिरा है। जलवायु बदलाव का असर दिखने लगा है। निश्चय ही उपरोक्त बदलावों के कारण नर्मदा का सालाना प्रवाह प्रभावित हुआ है।

सम्भव है इसी कारण मध्य प्रदेश के बाँधों की झोली खाली हुई है। सम्भव है खाली झोली के बावजूद अन्य राज्यों को उनके हिस्से का पानी देने के कारण उसके बाँधों को पानी के लिये तरसना पड़ रहा है। यह असामान्य स्थिति है। इससे निपटने के लिये नवाचारी एवं समग्र अध्ययन की आवश्यकता प्रतीत होती है। पुरानी जल सन्धियों पर विचार की भी जरूरत है।


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