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जल संस्कृति को बचाना होगा

Author: 
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद
Source: 
कादम्बिनी, मई, 2018
एक तरफ हम जल को देवता मानकर उसकी पूजा करते हैं, तो दूसरी तरफ इस देवता का निरादर करने में किसी भी तरह पीछे नहीं रहते हैं। कारण व्यक्ति हो या बाजार, हर कोई अपनी-अपनी तरह से इस कुकृत्य में शामिल है। आज जरूरत है कि हम जल के प्रति अपने संस्कार और संस्कृति को पुनर्जीवित करें पानी के बिना मनुष्य जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जन्म से लेकर मृत्यु तक पानी का हमारे जीवन में बहुत बड़ा स्थान है, बल्कि कह सकते हैं कि पानी ही उसकी धुरी है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि पानी में ही सारे देवता रहते हैं। इसीलिये जब कोई धार्मिक अनुष्ठान होता है, तो सबसे पहले कलश यात्रा निकलती है। हम किसी पवित्र सरोवर या जलाशय में जाते हैं और वहाँ से अपने कलश में जल भरकर ले आते हैं। चूँकि जल में हमारे सभी देवता बसते हैं इसलिये हम उसकी पूजा करते हैं और फिर उसी जलाशय में उसका विसर्जन कर देते हैं। इस तरह व्यष्टि को समष्टि में मिला देते हैं। अमरकोश में पानी के कई नाम गिनाये गये हैं। उसमें पानी के लिये एक नाम जीवन भी है। जीवन जलम। अब सवाल यह है कि पानी जो हमारी संस्कृति में इतना अहम स्थान रखता रहा है, उसकी इतनी दुर्दशा क्यों हो रही है? कारण दैवीय और आसुरी शक्तियों के संघर्ष में छिपा है। यह संघर्ष सनातन है। कभी एक पक्ष की शक्ति बढ़ती है, कभी दूसरे की। जो जल संरक्षण के लोग हैं वे दैवीय शक्ति के लोग हैं। दूसरी तरफ आसुरी शक्तियाँ हैं जो जल को नष्ट करने का स्वाभाविक रूप से प्रयास करती रहती हैं। जब हम पूजा में बैठते हैं, तो सबसे पहले कलश में जल की उपासना करते हैं कि वे कलश में आकर विराजमान हों। इस समय हम एक मंत्र पढ़ते हैं जिसमें सभी नदियों, जलाशय और समुद्र का आह्वान करते हैं कि वे इस कलश में विराजें और देवी पूजा में सहायक हों। जब हम ऐसा करते हैं तो हमें इस बात का भी एहसास होता है कि देवी पूजा के लिये जिस जल का हम आह्वान कर रहे हैं, उसे प्रदूषणमुक्त बनाना भी हमारा कर्तव्य है। अन्यथा प्रदूषित पानी कलश में आएगा और हमें उसी से देवी की पूजा करनी पड़ेगी। हम मानते हैं कि पानी में दो प्रकार की शक्ति है। एक तो वह भौतिक मैल को धोता है। दूसरा उसमें अभौतिक मैल धोने की भी शक्ति है। वह मन का मैल भी धोता है, लेकिन यह दुर्भाग्य है कि अब पानी का भविष्य बहुत खराब नजर आ रहा है। चूँकि पानी सबसे जरूरी चीज है और उसकी कमी हो रही है। ऐसे में व्यापारी इसमें अपना लाभ देख रहे हैं। हमारे गुरुजी बताते थे कि एक बार वे राजस्थान में रेलगाड़ी से यात्रा कर रहे थे तो, एक पानी बेचने वाला लड़का ट्रेन में चढ़ा था। वह ‘पानी ले लो, पानी ले लो’, कह रहा था। वहीं एक सेठ बैठा था। उसने पूछा कि- ‘कितने का पानी है?’ लड़के ने कहा, ‘एक रुपये का।’ सेठ बोला, ‘एक गिलास पानी एक रुपये क, भाग यहाँ से।’ लड़का मुस्कुराकर आगे बढ़ गया। गुरुजी ने सोचा कि इसका पानी तो बिका नहीं, फिर भी वह मुस्कुराकर आगे क्यों बढ़ा? गुरुजी ने इस बारे में जब लड़के से पूछा तो लड़के ने कहा कि- “मैं इसलिये मुस्कुराया, क्योंकि सेठ को प्यास नहीं थी। अगर प्यास होती तो एक रुपये का पानी वह दस रुपये में भी खरीदता।”

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