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मुनाफे का बाजार

Author: 
ज्ञानेंद्र रावत
Source: 
कादम्बिनी, मई, 2018
प्रकृति ने जो पानी हमें मुफ्त दिया था, बाजार ने उसे बिक्री की चीज बना दिया। यह समस्या पानी के निजीकरण से शुरू हुई और अब दुनिया का सबसे बड़ा मुनाफे का व्यापार बन गई है। बाजारीकरण ने पानी का संकट तो बढ़ाया ही, बोतलबन्द पानी के चलते प्लास्टिक कचरे का भी बड़ा खतरा पैदा कर दिया। बोतलबन्द पानी का कारोबार आजकल सबसे ज्यादा मुनाफे के कारोबार का रूप लेता जा रहा है। यह कारोबार हर साल सौ फीसदी की रफ्तार से बेतहाशा बढ़ता ही जा रहा है। देखा जाए तो भले ही देश की बाकी अर्थव्यवस्था में मन्दी का माहौल हो, देश में गरीबी हो, भुखमरी हो, लोग जानलेवा बीमारियों की चपेट में हों, दवाओं के अभाव में बेमौत मर रहे हों, लेकिन देश में आज बोतलबन्द पानी का कारोबार सबसे अधिक फलता-फूलता कारोबार है। मुफ्त में मिलने वाले पानी को बोतलों में बन्द करके दस-पन्द्रह रुपये में बेचने-जैसा मुनाफे वाला धन्धा आज देश में और कोई नहीं है। इस कारोबार में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने तो बाजी मार ही ली है, क्योंकि उन्हें तो इस काम में महारत हासिल है, देश की कम्पनियाँ और लघु उद्यमी भी इस कारोबार में पीछे नहीं हैं। असलियत में देखा जाए, तो यह उनके बुद्धि कौशल का परिचायक है। बोतलबन्द पानी के इस कारोबार में कोका कोला शीर्ष पर है, जबकि उसके बाद पारले और फिर पेप्सी कम्पनी का नम्बर आता है। कोका कोला और पेप्सी ये दोनों ही कम्पनियाँ अमेरिकी प्रभुत्व वाली शीतलपेय बेचने वाली कम्पनियाँ हैं। शीतलपेय बेचते-बेचते इन्हें बोतलबन्द पानी बेचने का धन्धा इतना मुफीद लगा कि ये इस कारोबार में कूद पड़ी और अंततोगत्वा इस कारोबार की श्रेष्ठ कम्पनियों में इन्होंने अपना नाम दर्ज करा लिया। कोका कोला ने इस कारोबार में उसकी देखा-देखी उतरी अन्य कम्पनियाँ जिनमें देश की प्रतिष्ठित कम्पनियाँ शामिल हैं, उनको भी बहुत पीछे छोड़ दिया। इसके लिये उसने कोई भी हथकंडा अपनाने में परहेज नहीं किया जो स्वाभाविकतः अपने उत्कर्ष और बाजार पर कब्जा जमाने के लिये कम्पनियाँ अपनाती हैं। उदाहरण के तौर पर छोटी-छोटी कम्पनियों का अधिग्रहण, लगातार जारी रहने वाले बेतहाशा विज्ञापन, आक्रामक और अनैतिक बिक्री संवर्द्धन आदि तौर-तरीकों का इस्तेमाल। ऐसी हालत में देशी और छोटी कम्पनियाँ कहाँ टिक पातीं? वह बात दीगर है कि बोतलबन्द पानी के कारोबार के आगे, पैकेटबन्द जूस, फ्रूटी आदि का भी कारोबार लाभ के लिहाज से कम नहीं है, लेकिन पानी के कारोबार से वे आज भी बहुत पीछे हैं। इस कारोबार में आज भी कोका कोला की किनले, पारले की बिसलेरी और पेप्सी की एक्वाफिना का साम्राज्य कायम है, इसमें दो राय नहीं है। अब सवाल यह है कि पानी के कारोबार में इतना उछाल कैसे और क्यों आया? और तो और इतने कम समय में इसका विस्तार इतने बड़े पैमाने पर कैसे हो गया? असलियत में यह सब विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष की सोची-समझी साजिश का योजनाबद्ध तरीके से क्रियान्वयन का नतीजा लगता है। जहाँ तक पानी के निजीकरण की मुहिम का सवाल है, मेरी दृष्टि में इसकी शुरुआत तो अंग्रेजों ने ही कर दी थी। बड़े-बड़े बाँध, नहरों के जरिये पानी को बाँधने की पूरी कोशिश उसके स्वच्छन्द बहाव को घेरने की ही कवायद थी। विडम्बना यह है कि इस प्रक्रिया को आजाद हिन्दुस्तान की अपनी सरकारों ने भी बरकरार रखा। हमारे यहाँ इस धन्धे को बढ़ाने में भारतीय रेल की अहम भूमिका है। उसने तो 2002 से ही इस संस्कृति को सरकारी स्तर पर बढ़ावा देने का काम किया। बोतलबन्द पानी की संस्कृति ने प्लास्टिक कचरे की समस्या को और बढ़ाया ही है, इसे नकारा नहीं जा सकता। पर्यावरण की दृष्टि से अगर देखें, तो यह साफ है कि इसके दुष्परिणामस्वरूप हमारे जलसंग्रह पूरी तरह समाप्ति की ओर बढ़ते चले गये। पानी जो 15-20 फीट गहराई पर मिल जाता था, वह दिन-ब-दिन गहरा होता चला गया और सैकड़ों फीट नीचे जा पहुँचा, यानी भूजल स्तर लगातार नीचे गिरता चला गया। सरकारी निजीकरण की नीति ने गरीबों और उनकी जमीनों का भरपूर शोषण किया। अगर डब्ल्यूटीओ की मानें तो उसके अनुसार पानी लोगों को मुफ्त में मिलता है, इससे लोग पानी की कीमत नहीं आंक पाते, अतः बाजार में इसकी कीमत तय की जानी चाहिए। डब्ल्यूटीओ का यह तर्क बिल्कुल गरीब विरोधी और थोथा है। इससे एक ओर गरीब पानी नहीं खरीद पाएगा, दूसरे असमानता में बढ़ोत्तरी होगी, तीसरे पानी की आपूर्ति कम होगी और माँग बेतहाशा बढ़ेगी। नतीजतन जिनके पास पैसा होगा, वे बहुतायत में पानी खरीदेंगे और बाकी जनता पानी के लिये तरसेगी।

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