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ज्वालामुखी (Volcano)


ज्वालामुखीः
पृथ्वी में एक विवर जिससे तप्त शैल तथा अन्य पदार्थ बाहर निकलते हैं। यदि बाहर निकलने वाले पदार्थ द्वार के चारों ओर संचित होने लगते हैं तो उससे एक शंकुवत् रचना बन जाती है जो धीरे-धीरे एक बड़े पर्वत के आकार की हो जाती है और उस दशा में उस शंकु को भी ज्वालामुखी की संज्ञा दी जाती है।

भूपृष्ठ में स्थित छिद्र (ज्वालामुखी छिद्र) जिससे होकर भूगर्भ से तप्त तरल लावा, गैस, शैलखंड,राख, जल आदि निकलते हैं। ज्वालामुखी छिद्र से निकलने वाले पदार्थ छिद्र के चारों ओर संचित होते रहते हैं जिससे ज्वालामुखी शंकु या पर्वत का निर्माण होता है। ज्वालामुखी छिद्र का संबंध एक नली द्वारा भूगर्भ में होता है जिसे ज्वालामुखी नली (volcanic pipe) कहते हैं। ज्वालामुखी एक संयुक्त प्रक्रम है जिसके अन्तर्गत भूगर्भ में लावा (मैग्मा) की उत्पत्ति से लेकर उसके धरातल पर प्रकट होने तथा निःसृत पदार्थों के ठोस होने तक की समस्त प्रक्रियाएँ सम्मिलित होती हैं। ज्वालामुखी की उत्पत्ति कई कारणों से होती है। भूपृष्ठ में दरार पड़ने अथवा किसी अन्य कारण से ऊपरी दबाव में कमी आने पर भूगर्भ में स्थित शैलें पिघल जाती हैं जिससे मैग्मा या लावा की उत्पत्ति होती है जो जगह पाकर भूपृष्ठ पर प्रकट होता है। सागर तटीय भागों में जहाँ जल रिसकर नीचे पहुंच जाता है और भूगर्भ में ताप की अधिकता के कारण वाष्प (गैस) बन जाता है। इस प्रकार भूगर्भ में निर्मित लावा तथा गैसें ऊपर निकलने के लिए भूपृष्ठ पर दबाव डालती हैं। जहाँ पर ऊपरी भूपर्पटी कमजोर होती है, तप्त तरल लावा और गैसें उसे तोड़ कर छिद्र या दरार द्वारा भूपृष्ठ पर प्रकट होते हैं। उद्गार की अवधि, अंतराल तथा प्रकृति के अनुसार ज्वालामुखी के तीन प्रकार होते हैं- 1. जाग्रत ज्वालामुखी (active volcano), 2. प्रसुप्त ज्वालामुखी (dormant volcano), और 3. शांत ज्वालामुखी (extinct volcano)। जाग्रत या सक्रिय ज्वालामुखी कुछ लावा, गैस आदि निरंतर निकलते रहते हैं। प्रसुप्त या सुसुप्त ज्वालामुखी एक उद्गार के पश्चात् कुछ समय के लिए शांत पड़ जाता है किन्तु कालांतर में उससे पुनः अचानक उद्गार प्रारंभ हो जाता है। जब ज्वालामुखी उद्गार समाप्त हो जाने के पश्चात् उसके विवर (crater) में जल भर जाता है और भविष्य में पुनः उद्गार नहीं होता है, वह शांत ज्वालामुखी कहलाता है।

ज्वालामुखी का उद्गार एक केन्द्र या छिद्र द्वारा अथवा दरार होता है। केंद्रीय उद्गार वाले ज्वालामुखी प्रायः भयंकर और तीव्र वेग वाले होते हैं जबकि दरारी उद्गार में लावा प्रायः धीरे-धीरे निकल कर भूपृष्ठ पर फैल जाता है। केंद्रीय उद्गार में निःसृत लावा तथा अन्य पदार्थ अधिक ऊँचाई तक आकाश में पहुँच जाते हैं तथा आकाश में प्रायः बादल छा जाते हैं और विखंडित पदार्थ पुनः तीव्रता से नीचे गिरते हैं। ये ज्वालामुखी अधिक भयंकर तथा विनाशकारी होते हैं। केंद्रीय उद्गार वाले ज्वालामुखी उद्गार की अवधि, अंतराल तथा प्रकृति के अनुसार कई प्रकार के होते हैं जिन्हें विशिष्ट ज्वालामुखी के आधार पर कई वर्गों में विभक्त किया जाता है। इनमें प्रमुख प्रकार हैः हवाई, स्ट्राम्बोली, वल्कैनो, पीलियन, तथा विसूवियस तुल्य ज्वालामुखी।

संसार के अधिकांश ज्वालामुखी दो प्रधान मेखलाओं में पाये जाते हैं- 1. परिप्रशांत मेखला, और 2. मध्य महाद्वीपीय मेखला। संसार के लगभग दो-तिहाई सक्रिय ज्वालामुखी प्रशांत महासागर के किनारे-किनारे मिलते हैं जिसका प्रमुख क्षेत्र पूर्वी एशिया की द्वीपीय मेखला है। मध्य महाद्वीपीय पेटी पश्चिम में आइसलैंड से लेकर पूर्व में म्यांमार (बर्मा) तक अल्पाइन पर्तों के सहारे फैली हुई है। इसके अतिरिक्त अंध महासागर के मध्यवर्ती कटक और पूर्वी अफ्रीका की दरार घाटी के सहारे भी ज्वालामुखी पाये जाते हैं।

विकिपीडिया से (Meaning from Wikipedia): 
ज्वालामुखी पृथ्वी के सतह पर उपस्थित ऐसे मुख होते है जिनसे पृथ्वी के भीतर का गर्म लावा, गैस, राख आदि बाहर आते है। अक्सर ज्वालामुखी पहाड़ के रूप मे होते है। ज्वालामुखी अकसर विस्फोट के साथ फटते है।

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ज्वालामुखीः
इंसान ने प्रकृति पर विजय पाने के सारे हथियार आजमा लिए हैं। मगर आज भी वह इसमें पूरी तरह से असफल रहा है। प्रकृति आज भी किसी न किसी रूप में इस सृष्टि में अपनी प्रचण्ड ताकत का अहसास कराती रहती है। चाहे वह किसी भयंकर तूफान के रूप में हो या भूकंप या फिर ज्वालामुखी के रूप में। इतिहास गवाह है कि इस पृथ्वी पर ज्वालामुखी पर्वतों ने कई सभ्यताओं को पूरी तरह से नष्ट कर दिया।
इटली की विसुवियस ज्वालामुखी से निकली आग, लावे और धुंए ने दो हजार साल पहले पूरी सभ्यता को ही खत्म कर दिया था। माना जाता है कि यह पर्वत हर दो हजार साल में इसी तरह का रूप दिखाता है। सिसली का माउंट ऐटना भी ज्वालामुखी पर्वत कुछ ऐसा ही है। इसके अलावा भी कई ज्वालामुखी पर्वत अपना मुंह खोले ऐसा ही कुछ करने के लिए हर वक्त तैयार रहते हैं। आज भी लाखों इंसान इन ज्वालामुखी पर्वतों के साये में रह रहे हैं। इन पर यह खतरा हर समय मंडराता रहता है। पूरी दुनिया में आज भी कई जीवित ज्वालामुखी पर्वत मौजूद हैं। आज भी वैज्ञानिकों के लिये ये गहरी दिलचस्पी के विषय हैं।
इस पृथ्वी पर जितने भी ज्वालामुखी मौजूद हैं, उनमें से ज्यादातर दस हजार से एक लाख साल पुराने हैं। वक्त के साथ-साथ इनकी ऊंचाई भी बढ जाती है। ज्वालामुखी पर्वत से निकलने वाली चीजों में मैग्मा के साथ कई तरह की विषैली गैसें होती हैं। ये गैसें आस-पास बसे लोगों के लिए काफी घातक होती हैं। इन पर्वतों से निकला मैग्मा एक बहती हुई आग के समान होता है। यह अपने सामने आई हर चीज को पूरी तरह से खत्म कर देता है।
किसी भी जवालामुखी के आग उगलने से पहले कुछ परिवर्तन सामान्य रूप से देखे जाते हैं। इनमें उस जगह के आस-पास मौजूद पानी का स्तर अचानक बढने लगता है। ज्वालामुखी फटने से पहले भूकंप के कुछ हल्के झटके भी आते हैं। इन तमाम बातों के अलावा ज्वालामुखी क्या-क्या तबाही लाने वाला है, इसका संकेत वह स्वयं भी देता है। फटने से पहले इस पर्वत में से गैसों का रिसाव शुरू हो जाता है। गैसों का यह रिसाव इसके मुहाने(मुख) या फिर क्रेटर से होता है। इसके अलावा, पर्वत में कई जगह पैदा हुई दरारों से भी इन गैसों का रिसाव होता है। यह इस बात का संकेत है कि अब इसके आग उगलने का समय आ गया है। इन गैसों में सल्फर-डाई-ऑक्साइड, हाइड्रोजन-डाई-ऑक्साइड, कॉर्बन-डाई-ऑक्साइड, हाइड्रोजन क्लोराइड आदि प्रमुख होती हैं। इनमें से हाइड्रोजन-क्लोराइड और कॉर्बन-डाई-ऑक्साइड बेहद खतरनाक होती है। ये वातावरण को काफी प्रदूषित करती हैं। ज्वालामुखी से निकले लावे में कई तरह के खनिज भी होते हैं। ज्वालामुखी पर्वत कई तरह की चट्टानों से बने होते हैं। इनमें काली, सफेद, भूरी चट्टानें आदि शामिल हैं। अमेरिका में एडिस पर्वतमाला को ज्वालामुखी पर्वत श्रृंखला के तौर पर लिया जाता है। हवाई (अमेरिका) में मौजूद कई टापू अपने काली मिट्टी से बने तटों के लिए बेहद प्रसिद्ध हैं। ये तट और कुछ नहीं, बल्कि इन पर्वतों से निकले खनिज ही हैं। ज्वालामुखी जमीन की अथाह गहराई में छिपे खनिजों को एक ही बार में बाहर फेंक देता है। एक अनुमान के मुताबिक अभी तक पूरी दुनिया में करीब 1500 जीवित ज्वालामुखी पर्वत हैं। ज्वालामुखी दो तरह के होते हैं-जीवित और मृत। हमारा हिमालय एक मृत ज्वालामुखी है, इसलिए हमें इससे कोई खतरा नहीं है। मगर दूसरी तरफ माउंट एटना समेत कई अन्य जीवित ज्वालामुखी हैं, क्योंकि इनसे समय-समय पर लावा और गैस निकलती रहती है। ये इंसानी जान के लिए हमेशा से ही खतरनाक रहे हैं। एशिया महाद्वीप पर सबसे ज्यादा ज्वालामुखी इंडोनेशिया में हैं।
ज्वालामुखी न सिर्फ हमारी धरती पर ही मौजूद हैं, बल्कि इनका अस्तित्व महासागरों में भी है। समुद्र में करीब दस हजार ज्वालामुखी मौजूद हैं। आज भी कई ज्वालामुखी वैज्ञानिकों की निगाह से बचे हुए हैं। हाल ही में इंडोनेशिया समेत कई अन्य देशों में आई सुनामी भी एक ज्वालामुखी का ही परिणाम थी। सबसे बडा ज्वालामुखी पर्वत हवाई में है। इसका नाम मोना लो है। यह करीब 13000 फीट ऊंचा है। यदि इसको समुद्र की गहराई से नापा जाए, तो यह करीब 29000 फीट ऊंचा है। इसका अर्थ है कि यह माउंट एवरेस्ट से भी ऊंचा है। इसके बाद सिसली के माउंट ऐटना का नंबर आता है। यह विश्व का एकमात्र सबसे पुराना ज्वालामुखी है। यह 3,5000 साल पुराना है। ज्वालामुखी स्ट्रोमबोली को तो लाइटहाउस ऑफ मैडिटैरियन कहा जाता है। इसकी वजह है कि यह हर वक्त सुलगता रहता है।
ज्वालामुखी से होने वाली तबाही का इतिहास काफी पुराना है। वर्ष 1994 में मरपी नामक ज्वालामुखी फटने से हजारों लोगों की जान गई थी। मरपी का अर्थ है-माउंट ऑफ फायर। अकेले अमेरिका के 48 राज्यों में करीब 40 से अधिक जीवित ज्वालामुखी मौजूद हैं। इन आग बरसाते पर्वतों में अमेरिका का रैनियर प्रमुख है। इसके फटने का अभी तक कोई इतिहास नहीं है, मगर इसके बावजूद यहां से काफी समय से जहरीला धुंआ और गैस बाहर आ रही है, इसलिए यह कभी भी खतरनाक साबित हो सकता है। 1984 में कोलंबिया में ज्वालामुखी के फटने से ही करीबन 25,000 से ज्यादा की जान गई थी। ऐसा ही हादसा 1814 में इंडोनेशिया में हुआ था। यहां पर टम्बोरा ज्वालामुखी के फटने से करीब 80,000 लोगों की जानें गई। 1883 में कारकातोआ ज्वालामुखी के फटने से इंडोनेशिया में ही करीब 50,000 लोगों ने अपनी जान गंवाई। अमेरिका में माउंट लेन के फटने से भी ऐसा ही हादसा पेश आया था। आज भी पृथ्वी पर कहीं न कहीं कोई न कोई ज्वालामुखी अपने होने का अहसास कराता रहता है।
इस पृथ्वी पर जितने भी ज्वालामुखी मौजूद हैं, उनमें से ज्यादातर दस हजार से एक लाख साल पुराने हैं। वक्त के साथ साथ इनकी ऊंचाई भी बढ़ जाती है। ज्वालामुखी पर्वत से निकलने वाली चीजों में मैग्मा के साथ कई तरह की विषैली गैसें भी होती हैं। ये गैसें आस-पास बसे लोगों के लिए घातक सिद्ध होती हैं।

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