कंकाल-फ्लोरोसिस सम्बन्धी विवरण

Submitted by admin on Thu, 02/13/2014 - 16:48
Author
प्रेमविजय पाटिल


कंकाल संबंधी फ्लोरोसिस तब होता है जब अस्थियों और प्रमुख जोड़ों पर इसका प्रभाव पड़े। प्रारंभिक अवस्थाओं में हो सकता है कि व्यक्ति को पता न चले कि फ्लोराइड अस्थियों और जोड़ों में जमा हो रहा है और इसके परिणामस्वरूप कंकाल-फ्लोरोसिस होने वाला है। अस्थियों में फ्लोराइड के जमा होने के बारे में कुछ आधारभूत तथ्यों को स्पष्ट करना आवश्यक है। फ्लोराइड, कॉम्पेक्ट (कॉर्टीकल) अस्थियों की तुलना में केन्सेलस (स्पंजी अस्थियां) अस्थियों में अधिक जमा होता है। प्रमुख कारण यह है कि केन्सेलस अस्थियों में रक्त आपूर्ति बहुत अच्छी तरह होती है, जबकि कॉर्टीकल अस्थियों में तुलनात्मक रूप से रक्त-वाहिकाएं कम होती हैं। अच्छी रक्त आपूर्ति के कारण, कॉर्टीकल अस्थियों की कंकाल-फ्लोरोसिस की स्थिति में रोगी शरीर में उन हिस्सों में दर्द और कड़ापन होने की शिकायत से प्रारंभ करेगा, जिनमें केन्सेलस अस्थियां अधिक मात्रा में होती हैं, यानी जोड़ों और नितम्ब वाले भागों में।
 

स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव क्या हैं:


कंकाल फ्लोरोसिस के रोगी शरीर के प्रमुख जोड़ों में दर्द एवं अवरोधक गति-संचलन की शिकायत करेगा: एक या उससे अधिक जोड़ों पर इसका प्रभाव हो सकता है, जैसे: गर्दन, कंधे, पीठ, घुटने और नितम्ब वाले हिस्से।

1. जैसा अस्थिशोथ में होता है वैसा न होकर, कंकाल फ्लोरोसिस श्लेषक-द्रवों का संचयन/ईडेमा जोड़ों में नहीं दिखेगा।
2. यदि रोग आगे की प्रावस्था में पहुंच गया है, तो रोगी को खड़े होने और/अथवा यहां-वहां चलने के लिए ब्राह्य सहारे की आवश्यकता होगी।

इस प्रकार की शिकायतों को साधारण रूप में लेकर और दर्द-निवारक दवाएं लिखकर अनदेखा न करें। ऐसे रोगी के रोग के निदान की पुष्टि के लिए तथा कंकाल संबंधी फ्लोरोसिस की इन समस्याओं से विभेदकारी निदान के लिए जाँच की जाना आवश्यक है- 1. संधिशोथ (आर्थ्राइटिस) 2. बद्ध कशेरुकासंधिशोथ (एंकीलोजिंग स्पोण्डीलाइटिस) 3. अस्थिसुशिरता (ओस्टियोपोरोसिस) 4. अस्थिमृदुता (ओस्टियोमेलेसिया) एवं यदि कोई अन्य समस्या है।

 

कंकाल-फ्लोरोसिस के निदान की पुष्टि के लिए किए जाने वाले परीक्षण:


इनमें फ्लोराइड, सीरम, मूत्र, पेयजल जो अतिरिक्त परीक्षण किए जाना है:
1. इंटेरोसेसिअस मेम्ब्रेन की कैल्शियम संचयन का आकलन करने के लिये बाँह का रेडियो।
2. अस्थि संहति एवं सघनता में वृद्धि का आकलन करने के लिए उस हिस्से/जोड़ का रेडियोग्राफ, जहां दर्द है।

 

परिणाम:


यदि रोगी को कंकाल संबंधी फ्लोरोसिस हो रहा है तो, रेडियोग्राफ में अस्थियों में सघनता दिखाई देगी (सफेद संगमरमर जैसी) तथा, अस्थि संहति यानी हड्डियों के वजन में वृद्धि। रेडियोग्राफ में कैल्सीफाइड अंतरास्थि कला (इंटरोसेसिअस मेम्ब्रेन) के वहिप्रकोष्ठिका एवं अंतःप्रकोष्ठिका (रेडियस और उल्ना) के बीच की जगह को धुंधला करके बाहर आती दिखाई देना भी संभव है। अथवा बहुत प्रारंभिक अवस्थाओं में सुस्पष्ट केल्सीफाइड लिगामेंट की जगह, अस्थि का बाहरी हिस्सा तरंगायित हो सकता है। बाँह का एक्स-रे महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे बहुत प्रारंभिक अवस्था में ही कंकाल-फ्लोरोसिस का पता चल जाएगा। कंकाल-फ्लोरोसिस के निदान की पुष्टि के लिए बाँह का एक्स-रे ‘‘अनिवार्य’’ है।

कोई रोगी जिसे कंकाल-फ्लोरोसिस के साथ अस्थिमृदुता है, हो सकता है उसके संबंध में अस्थि-सघनता अथवा अस्थि-संहति में वृद्धि देखने को न मिले। तथापि, बाँह का एक्स-रे अंतरास्थि कला सेल्सीकरण (इंटेरोसेसिअस मेम्ब्रेन केल्सीफिकेशन) को दिखा सकता है। यह भी संभव है कि कशेरुका (वर्टिब्रल) कॉलम के रेडियोग्राफ में कशेरुका की माध्यिका स्पाइन की एक्स-रे अपारदर्शिता (रेडियो-ओपेसिटी) में वृद्धि प्रदर्शित हो, क्योंकि यह केन्सेलस अस्थि से बनता है। ये प्रेक्षण इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस व्यक्ति को कंकाल-फ्लोरोसिस के साथ अस्थिमृदुता है।

 

कशेरुका कॉलम की एक्स-रे अपारदर्शिता में कमी


कशेरूका की माध्यिका स्पाइन की अपारदर्शिता में वृद्धि (तीर) प्रायः कंकाल-फ्लोरोसिस में दिखते हैं। माध्यिका स्पाइप केन्सेलस अस्थि है।

{} (Osteomalacia)
= Osteosclerosis

1. जैसा भाग 3 में कहा गया है, यह भी संभव है कि कंकाल-फ्लोरोसिस में, पीने का पानी में फ्लोराइड की मात्रा सुरक्षित स्तर की अर्थात 1.0 mg/l हो; किंतु मूत्र एवं सीरम में फ्लोराइड की मात्रा इनकी सामान्य उच्चतर सीमाओं की तुलना में अधिक हो (मूत्र = 0.1 mg/l : सीरम = 0.1 mg/L)

2. इसका मतलब होगा कि इन बातों पर ध्यान केंद्रित करते हुए रोगी से और दूसरी बातों के बारे में स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा जाए (1) व्यवसाय, उपभोग किए जाने वाले भोजन एवं खाद्य- पदार्थों का प्रकार, कोई चीज खाने-पीने की लत हो, जैसे कोई ऐसा ‘चूरन’ चबाना जिसमें काला नमक डलता हो, फ्लोरीनयुक्त दवाएँ (एलोपैथी या होम्योपैथी) जो डॉक्टर ने बताई हों और किसी बीमारी के लिए सेवन की जा रही हों। ऐसा प्रयास करने से फ्लोराइड के सही-सही स्रोत की पहचान हो जाएगी।

3. फ्लोराइड के स्रोत को तुरंत ही प्रयोग में लाना बंद कर देना चाहिए। मूत्र एवं सीमर फ्लोराइड के परीक्षण 7, 10 या 15 दिनों के बाद पुनः कराए जाने चाहिए। इसके परिणाम फ्लोराइड के स्तरों में गिरावट दर्शाएंगे ; यह 6-8 सप्ताहों के बाद गिरकर सामान्य सीमा तक आ जाएंगे। कुछ रोगियों के मामले में कुछ अधिक समय लग सकता है। यदि रोगी के बारे में पुष्टि हो जाए कि उसे कंकाल-फ्लोरोसिस है, तो उसमें अ-कंकालीय लक्षण भी प्रदर्शित हो सकते हैं, जिनके बारे में भाग 3 में विवरण दिया गया है।

यदि बहुत प्रारंभिक अवस्था में यह पता लग जाता है अथवा उसका निदान कर लिया जाता है तो संभव है कि 1. बीमारी और आगे बढ़ने से रोकी जा सकती है 2. इण्टरवेंशन प्रयोग में लाकर क्षतिग्रस्त कोशिकाओं, ऊतकों और शारीरिक प्रणालियों का सुधार एवं संधारण किया जा सकता है। इण्टरवेंशन का प्रकार एवं उन्हें किस प्रकार प्रयोग में लाया जाए, इसके बारे में अगले भाग में चर्चा की गई है।

 

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