काले केले के जल का गुण

Submitted by Hindi on Fri, 01/08/2010 - 17:07
Author
डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित

कृष्णरम्भाजलं हृद्यं त्रिदोषघ्नं तृषापहम्।मूत्रकृच्छहरं स्वादु वृष्यं प्रदरनाशनम्।।
काले केले (के पौधे) का जल मनोरम, त्रिदोषनाशक, प्यास दूर कर तृप्ति देने वाला, मूत्र की कमी या रोक हटाने वाला, स्वादिष्ट, शक्तिवर्धक या पोषक एवं प्रदर रोग नष्ट करने वाला होता है।

 

केले के पानी का गुण

रम्भासारं शीतलं ग्राहि हृद्यं तृड्दाहघ्नं मूत्रकृच्छिसारम्।मेहीन्हन्ति स्फोटकं रक्तपित्तं चास्थि स्त्रावं सोमरोगं निहन्ति।
मतान्तरे-
जलं कदल्या गुरुशीतवीर्यं तृष्णापहं दाहविनाशनं च।सांग्रहिकं पित्तकफापहं तत् मेहापदं शोणित पित्त नाशनम्।।
अन्यत्र च
रम्भासारं शीतलं ग्राहि तृष्णा-कृच्छौहा सोमरोगातिसारान्।अस्थिस्त्रावं स्फोटकं रक्तपित्तं दाहं हन्यास्त्रयोनिं विशेषात्।।
केले का जल शीतल, पकड़ने वाला, मनोरम, प्यास और जलन विनाशक, मूत्र की कमी और अतिसार, मूत्ररोग नष्ट करता है। यह फोड़ा, रक्त पित्त, हड्डी बहना और पीलिया नष्ट करता है।

अन्य मत में-
केले का जल भारी, शीत और शक्ति बढ़ाता है, प्यास बुझाता है, जलन नष्ट करता है, पेचिस करता है, पित्त और कफ नष्ट करता है। मूत्र (रोग) नष्ट करता है, रक्त-पित्त नष्ट करता है।

और अन्यत्र-
केले का जल शीतल (ता) पकड़ने वाला, प्यास और पीड़ा का विनाशक, पांडुरोग या पीलिया, अतिसार (पेचिश), हड्डी गलना, फोड़ा, रक्तपित्त, जलन, अस्त्रयोनि (सिर के बालों की जड़ों का रोग) आदि को विशेषकर नष्ट करता है।

 

गूलर के पानी के गुण

औदुम्बरभवं तोयं अतिसार प्रमेहिनाम्।तृष्णादाहर्दितानां च तथा सृग्वारिणां हितम्।।
गूलर से निकला पानी पेचिश, मधुमेह, प्यास, जल और रक्त-जल के लिए हितकारी है।

 

तालवृक्ष का जलगुण

तालजं तरुणं तोयं पित्तानिलहरं गुरु।।
ताल का ताजा पानी पित्त और वात दूर करता है और भारी होता है।

 

सुपारी के पानी के गुण

पूगोदकं पुष्टिकरं कषायं कफनाशनम्।पित्तहृद्भेदि चक्षुष्यं पाण्डुप्रदरनाशनम्।।
सुपारी का पानी पोषक, कसैला, कफ विनाशक,पित्त का मर्म नष्ट करने वाला, आँखों का हितकर तथा पीलिया और प्रदर को नष्ट करता है।

 

भरे खेत के पानी का गुण

केदारं मधुरं प्रोक्तं विपाके गुरुशोषहृत।
भोजन बनाने में केदार (भरे खेत का पानी) मधुर होता है और भारी सूखापन (कृशता या क्षयरोग) लाता है।

 

समुद्र के पानी के गुण

सामुद्रमुदकं विस्नं लवणं सर्वदोषकृत।
मतान्तरे-
सामुद्रं लवणं त्रिदोषजननं क्षारं सतित्वं भृशम्तीक्ष्णोष्णक्रिमिहृद्बहि पिचिमां कुर्याद्विदाहं दृशि।।
समुद्र का जल कच्चे मांस जैसा, नमकीन और समस्त दोष करने वाला होता है।


अन्य मत में-

समुद्र का पानी तीनों दोष करने वाला, नमक, खारा अत्यन्त हानिकर (या विनायक), तीखा, गरम, कीट-विनाशक, अपाचक और आँखों में जलन करता है।

 

दलदल या कीचड़ वाले पानी का गुण

अनेकदोषैरानूपं वार्यभष्यंगदी हितम्।
अनूप का या दलदल का पानी अनेक दोष वाला, आँख आती है (तो) हितकारी होता है।

 

जंगल के पानी के गुण

एभिर्दोषैरसंयुक्तं अनवद्यं च जांगलम्।
इन विभिन्न दोषों से रहित, निर्दोष यामनोहर होता है जंगल का पानी।

 

साधारण जल के गुण

पाके विदाहतृष्णाघ्नं प्रशस्यं प्रीतिवर्धनम्।दीपनं स्वादु शीतं च तोयं साधारणं लघु।।
साधारण पानी पकाने में जलन और प्यास नष्ट करता है। वह श्रेष्ठ, प्रीतिवर्धक, उद्दीपक, स्वदिष्ट और शीतल होता है।

 

ठंडे पानी के गुण

मूर्छापित्तोष्णदाहेषु विषरक्ते मदात्यये।श्रमक्लमपरीतेषु तमके वमथौ तथा।।ऊर्घ्वगे रक्तपीत्ते च शीतमम्भः प्रशस्यते।
मतान्तरे-
मन्दं च मूर्छां च विषाणि हन्ति शीतोदकं शैलहरं श्रमघ्नम्।दाहं च मोहं च निहन्ति तृष्णामसृग्वरं वृष्यमरोचकघ्नम्।।वान्ति स्थावर जङ्गमादिविष जित्कृच्छा भ्रमालस्यजिद्-दन्तर्दाहविदाहपित्तशमनं मूर्छा विनिर्वासनम्।ऊर्ध्वासृक् पैत्यदोषे भ्रममदक्लमिते नामसेव त्रिदोषेदिध्मा व्यायामशान्ते सकलमदहरे शीतलं वारि शस्तम्।।
मूर्छा, पित्त, गर्म, जलन, विष वाले रक्त में, मद या नशा उतरने पर, श्रम और थकान होने पर, उल्टी या वमन में रक्त (चाप और) पित्त बढ़ जाने पर शीतल जल उत्तम माना जाताहै।

अन्य मत में-
सुस्ती, मूर्च्छा, विष आदि को शीतल जल ठंडापन दूर करता है, श्रम नष्ट करता है, जलन और मूढ़ता दूर करता है। प्यास, रक्त (स्त्राव) दोष तथा अरुचि समाप्त करता है, स्फूर्ति लाता है। वमन दूर करता है, जड़-चेतन के विष को जीतता है। पीड़ा, चक्कर, आलस्य को जीत लेता है। भीतर की जलन, बाहरी जलन और पित्त को शाँत करता है। मूर्च्छा दूर करता है। रक्तचाप का बढ़ना और पित्तदोष में, चक्कर-मद (नशा) आदि की थकान में त्रिदोष होने पर, हाँफने पर, व्यायाम पूरा होने पर, पूरा नशा उतर जाने पर शीतल जल उत्तम होता है।

 

शीतल जल का निषेध समय

पार्श्वशूले प्रतिश्याये वातरोगे गलग्रहे।आध्यामनस्तिमिते कोष्ठे सद्यश्शुद्धिर्नवज्वरे।।वातेSतिलंघने चैव विरेकौषधकर्मणि।हिक्कायां श्लेष (ष्म) पित्ते च शीताम्बु परिवर्जयेत्।।तप्तशीतपुनस्तप्तयुत कषायादिगुणः।घृतं तैलं च पानीयं कषायं व्यञ्जनादिकम्।तप्तशीतं पुनस्तप्तं विषद्दहन्ति मानवम्।।
बगल में दर्द हो, जुकाम हो, वात रोग हो, गलग्रह रोग हो, जलोदर या पेट फूलता है, पेट जाम हो गया है या ताजा बुखार हो तो तत्काल शुद्धि होनी चाहिए। वात रोग में, अधिक उपवास, विरेचन या जुलाब की औषधि लेने पर, हिचकी आने पर, कफ या पित्त में ठंडा पानी नहीं पीना चाहिए। तपाकर ठंडा करके फिर तपया हुआ कसैला, घी, तेल, पानी, कसैला सिझाया हुआ- तपाकर ठंडा करके फिर तपया जल मानव को विष के समान जलाता है।

 

 

 

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