घर-घर के आगे ‘डॉक्टर’

Submitted by admin on Thu, 02/11/2010 - 11:14
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क्रांति चतुर्वेदी

बेगम साहिबा गुलारा की याद में बनाए महल और पास में ही उतावली नदी। मध्यप्रदेश के खंडवा जिले की बुरहानपुर तहसील से 25 किलोमीटर दूर बंजारों का गांव सांडस। यहां सामाजिक-आर्थिक बदलाव की नई इबारत लिखी जा रही है। तहसील के सांडस जैसे बाईस गांवों में आहिस्ता-आहिस्ता महिलाओं के चेहरे से पर्दा हट रहा है। शराब के जाम पहले जैसी महफिल नहीं जमा पा रहे हैं। लड़ाई-झगड़ों में कमी आ रही है। सांडस गांव की खास बात है कि यहां पर हर घर के सामने 24 घंटे एक ‘डाक्टर-साहब’ रहते हैं। तब भला कोई कैसे बीमार पड़ सकता है? गांव वाले किसी दार्शनिक की भांति जिंदगी, भगवान, श्रम पर चर्चा करते हैं। गांव में अमृतालय के नाम से एक मंदिर भी और जनाब, गांव के जमीर का क्या कहिए, किसी बंजारे के बच्चे के हाथ में एक-दो रुपए का नोट रखने की जुर्रत तो कीजिए....। आपको किसी एक्शन फिल्म के ‘बाल-नायक’ की तर्ज पर बच्चा-बच्चा जवाब दे देगा.... ‘हम बिना श्रम किए पैसा नहीं लेते हैं!’

बुरहानपुर के सांडस पहुंचने का रास्ता औसत ग्रामीण सड़कों जैसा ही है। गांव के ठीक पहले महलों से सटे रास्तों से गुजरना होता है। इन्हें गुलारा बेगम की याद में बादशाह खुर्रम ने तैयार करवाए थे। क्षेत्र में बंजारे बसते हैं, अपनी कुप्रथाओं से जूझते, गरीबी, जहालत के वायरस के साथ इनके हाथ ‘स्वाध्याय’ लग गया। इस विचारधारा के प्रवाह के प्रेरणा स्रोत दुनिया के महानतम व्यक्तियों में से एक टेम्पलटन अवार्ड से सम्मानित श्री पाण्डुरंग आठवले ‘दादाजी’ के साथ जुड़े स्वाध्यायियों ने क्षेत्र के 55 में से करीब 22 गांवों में स्वाध्याय शैली को जीवन का अंग बना दिया है। गांव के बुजुर्ग व पूर्व सरपंच जगराम के सामने चौबीसो घंटे ‘डॉक्टर साहब’ खड़े रहते हैं। गांव के बुजुर्ग व पूर्व सरपंच जगराम भाई और एक मथुरादास हमसे ऐसे मुखतिब होते हैं- मानो बरसों पुराना कोई रिश्ता हो। वे कहते हैं- गांव वालों ने अपने श्रम से घर-घर के सामने सोख गड्ढा तैयार किया है। घर में उपयोग हुआ पानी गांव की गलियों में फैलकर गंदगी व कीचड़ फैलाता था। इससे गांव में बीमारियां फैलाती थीं, कई बार इस पानी के किसी दूसरे के घर के सामने जाने से बड़े-बड़े लड़ाई-झगड़े की नौबत तक आ जाती थी, स्वाध्याय प्रवाह के बाद हमने इस समस्या को दूर करने की ठानी। चार-चार फीट के गड्ढे खोदकर उपयोग किए गए पानी की निकासी इसमें कर दी। गड्ढों को गोल पत्थरों से भर दिया गया, अब सारे गांव का पानी बाहर फालतू न बहते हुए इसमें जमा हो जाता है, गांव का पानी अब गांव का भू-जल स्तर बढ़ा रहा है। इस कारण नलकूपों से गर्मी में पानी नहीं आने का संकट समाप्त हो गया है। पानी रोकने के साथ-साथ स्वाध्याय प्रवाह ने सम्पूर्ण दृष्टि में ही चौंकाने वाला बदलाव ला दिया है।

जगराम व मथुरा दास बताते हैं- बंजारा समाज के अन्य गांवों में रहने वाले लोगों ने एक तरफ से शुरुआत में सांडस और आसपास के गांवों का समाज में बहिष्कार शुरू कर दिया था। इससे गांवों के बंजारे इस बात से सख्त नाराज थे कि ये लोग स्वाध्यायियों के कहने से हमारी प्रथाओं को क्यों तोड़ रहे हैं। जगराम व मथुरादास ने बताया - ‘हम लोगों ने परम्परागत रूप से चली आ रही बलि प्रथा को बंद कर दिया। पहले गांव में किसी के यहां भी कोई बीमारी का प्रकोप होता था, तो उसे माता का प्रकोप मानकर झाड़फूंक करने वालों को बताया जाता था। गांव का ओझा हर छोटी-मोटी बीत पर बली दिलवाता था। कई बार तो आस-पास के गांव वालों तक को भोजन कराना पड़ता था। परिवारजन बीमारी का इलाज कराने के साथ-साथ इन सब कामों में लगाए धन के कारण सदैव कर्ज में डूबे रहते थे, लेकिन स्वाध्याय प्रवाह के बाद सोख गड्ढे तो बने ही करीब 45 गांवों में बलि प्रथा पर लगभग रोक सी लग लग गई। इसके अलावा पहले शराब में डूबे रहना गांव के पुरुषों की प्रमुख दिनचर्या रहा करती थी। शराब के कारण गांव में सदैव तनाव बना रहता था, शराब गायब होते ही न घर में लड़ाई न पड़ोसियों से संघर्ष। चेतना के कारण आर्थिक हालत बदली, सो अलग।’ इसके अलावा गांवों में आपसी सहयोग का नया प्लेटफार्म तैयर किया गया- “योगेश्वर कृषि।” इसके माध्यम से प्रभु के लिए कृति भक्ति की जाती है। एक खेत में नित अवधि के लिए गांव के हर परिवार का सदस्य अपनी सेवा देता है। घर में महिलाओं को बराबरी का स्थान दिया जाने लगा है। इनका हाथ भर की घुंघट हटकर अब वे बंजारा पुरुषों के हमकदम हो रही हैं। बंजारों के इन गांवों में हुई इस मौन क्रांति के पीछे श्री पाण्डुरंग शास्त्री आठवले जी का दर्शन है- सिर्फ पानी के लिए मत सोचिए। पानी का कहीं संकट है और प्रेस व टीवी वालों ने हो-हल्ला मचाया तो क्या पानी मिल सकता है। लेकिन उस भगवान का विचार करिए जो सबका पिता है। और यह पानी हम सबको देता है। वह समुद्र का पानी 100 डिग्री से. पर भाप बनाकर फिर से मीठे पानी में बदलकर हमें देता है। गृहिणि दूध तपाकर सहेजकर रखती है, लेकिन वह गिर जाए या बर्बाद हो जाए तो वह परेशान होती है। क्योंकि उसमें उसकी मेहनत लगी होती है। इसी तरह जिस भगवान ने समुद्र के पानी को तपाया, भाप में बदला और मीठे पानी का रूप में हमें देने की मेहनत की, उसकी परवाह नहीं करते हुए हमने पानी को बर्बाद किया। बेकार बह जाने दिया तो भगवान भी परेशान होंगे। इसलिए जरूरी है कि “घर का पानी घर में और गांव का पानी गांव में” संचित रहे।

गांव में इस बड़े बदलाव को मार्गदर्शन दे रहे स्वाध्याय परिवार के मध्यप्रदेश क्षेत्र के “बड़े भाई” श्री जगदीश भाई शाह जो मुंबई के ख्यात चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, कहते हैं- ‘दादाजी (श्री आठवले) ने बहुत पहले ही कह दिया था कि आने वाली इक्कीसवीं सदी में पानी सारी दुनिया के सोच के लिए एक प्रमुख मुद्दा रहेगा। इसके लिए उन्होंने 11 प्रयोगों को क्रियान्वित करवाने के प्रयास शुरू कर दिए थे। सौराष्ट्र में बिना किसी सरकारी आर्थिक सहायता या अनुदान के स्थानीय समाज ने श्रमशक्ति से 99670 ट्यूबवेल पुनः पानी से लबालब कर दिये। गुजरात सरकार ने इसका उल्लेख करते हुए कहा है कि सरकार का 350 करोड़ रुपया बचा है, जो भूजल 300 से 400 फीट नीचे चला गया था, वह पुनः 100 से 50 फीट तक आ गया है।’

सांडस में ही भक्तिकार्य में लिप्त इंदौर के स्वाधायायी श्री शिवाकांत वाजपेयी व श्री महेंद्र दुबे कहते हैं- ‘सोख गड्ढे को स्वाध्याय की भाषा में “डॉक्टर” कहा जाता है। इस प्रयोग में गांव के प्रत्येक परिवार द्वारा अपने घरों के सामने श्रम शक्ति से एक 4x4x6 फीट का गहरा गड्ढा खोद दिया जाता है। इसमें दो फूट कोयला, दो फूट रेती, दो फूट पत्थर डालकर ऊपर से एक फर्शी का ढक्कन रख दिया जाता है। घरों के सभी प्रकार के पानी का निकास एक पाइप द्वारा इस गड्ढे में कर दिया जाता है। इस पानी को कच्चा बनावट के कारण यह गड्ढा अवशोषित करता रहता है। रेती, कोयला व पत्थरों की परत फिल्टर का काम करती है।’ बकौल वायपेयी-यदि यह है तो फिर बाहरी डॉक्टर के आने की संभावनाएं काफी कम हो जाती हैं। स्वाध्याय समाज ने हमें इन नए “डॉक्टर साहब” से रूबरू करा दिया। दरअसल इस समाज का मूल मंत्र है- ‘भक्ति एक सामाजिक शक्ति है और भारत के कई हिस्सों में खासकर गुजरात व महाराष्ट्र में सरकारें इस सामाजिक शक्ति को मुंह फाड़कर अवाक् हो देख रही हैं।’

सांडस के बंजारे “जय योगेश्वर!!” के उद्घोष के साथ हमें हाथ जोड़कर बिदा कर रहे थे- तब उनका एक अबोला संदेश हमें सुनाई दे रहा था- ‘सरकारों को अब खुदा हाफिज़! हम समाज मिलकर एक नई बयार लाएंगे......!!’
 

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