चचाई जलप्रपात

Submitted by admin on Sun, 02/28/2010 - 12:23
Author
जगदीश प्रसाद रावत
रीवा से उत्तर की ओर 45 कि.मी. सिरमौर तहसील में बीहर नदी द्वारा निर्मित चचाई एक खूबसूरत एवं आकर्षक जलप्रपात है, जो 115 मीटर गहरा एवं 175 मीटर चौड़ा है। बीहर नदी के एक मनोरम घाटी में गिरने से यह प्रपात बनता है। यह एक प्राकृतिक एवं गोलाकार जल प्रपात है।

चचाई रीवा संभाग का सबसे सुन्दरतम प्राकृतिक एवं भौतिक जलप्रपात है। बीहर नदी का उद्गम स्थल सतना जिला की अमरपाटन तहसील का खरमखेड़ा नामक ग्राम है। चचाई ग्राम के निकट इस जल प्रपात के स्थित होने के कारण इसका नाम चचाई जलप्रपात पड़ा।

चचाई का प्रकृति पदत्त और कलात्मक सौन्दर्य बेजोड़ है। जहाँ बीहड़ नदी को अपने आगोश में लेते ही लगभग 500 फुट की ऊँचाई से गिरते ही पानी बिखर कर दूधिया हो जाता है, फलस्वरूप आसपास कोहरे की हल्की झीनी चादर फैल जाती है। सैकड़ों मीटर दूर तक नन्हीं-नन्हीं फुहारों से समूचा वातावरण आनंददायी हो जाता है। ऐसा चमत्कारिक दृश्य कि कोई भी सम्मोहित अपलक देखता ही रह जाय। कुण्ड की अतल गहराईयों से उठने वाला गंभीर-गर्जन, स्वर्णनल धुँध और जल धाराओं से निर्मित सागर मंथन-सा दृश्य उपस्थित करता है जिसकी परछाइयों से उभरता हुआ मध्याह्न का सूर्य उठते हुए अमृत कुंभ-सा दिखाई पड़ता है। बीहर नदी के प्रारंभिक स्वरूप को देखकर सहसा यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि आगे चलकर यह पतली-सी धार इतने विशालतम जलप्रपात का निर्माण करेगी। लेकिन प्रकृति के रचना-संस्कार और मानवीय कल्पनाओं से परे असंभव से संभव हुआ करता है।

चचाई प्रपात के जल तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ बनी हैं। अब इसके ऊपर एक जलाशय का निर्माण करके 315 मेगावाट जल विद्युत का उत्पादन टोन्स हाइडल प्रोजेक्ट के माध्यम से किया जा रहा है। स्वार्थवश हमने बिजली पैदा करने के मोह में प्रकृति की इस अनुपम देन के साथ अमानवीय कार्य किया है। टोन्स हाइडल प्रोजेक्टर बनने से पहले यहाँ की खासियत थी कि बारहों महीने नदी में पानी रहता था और चचाई जलप्रपात को भी कोई नुकसान नहीं पहुँचता था, उसका बिखरा सौन्दर्य बरकरार रहता था और बिजली उत्पादन भी पर्याप्त होता था। अब प्रकृति के प्रकोप एवं अतिवृष्टि के कारण बाढ़ की विभीषिका का सामना करना पड़ रहा है। सितम्बर 1997 की विकराल बाढ़ इसका ताजा एवं ज्वलंत उदाहरण है।

चचाई प्रपात के आसपास की भूमि समतल है। इस प्रपात को भारत का नियाग्रा भी कहा जाता है। यह सदियों का समय साक्षी है जो नैसर्गिक सौन्दर्य की ऊंचाईयों का स्पर्श कर रहा है।

पावस के मौसम में अगणित पर्यटक आँखों में इसकी सुन्दरता भरकर ले गये। अनेकानेक कवि और लेखकों ने इससे प्रेरणा लेकर आवाम गीत लिखे। न जाने कितने कलाकारों की तूलिका ने केनवास पर इसके चित्र उकेरे। लेकिन क्या वास्तव में चचाई का अक्षुण्ण सौंदर्य घटा। प्रकृति और निष्काम स्नेह बंधति कभी समाप्त नहीं होता है।

चचाई का प्रकृतिक सौन्दर्य मनभावन एवं सुहावन लगता है, इसलिए यह आकर्षक एवं दर्शनीय भी है। 1957 में इसे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू इसे अद्भुत एवं अद्वितीय उच्चारण के साथ अपलक किंकर्त्तव्य विमूढ़ होकर देखते रहे कि मानों ठगे से रह गए हों। इतना ही नहीं प्रख्यात समाजवादी नेता, चिंतक एवं लेखक डॉ. राम मनोहर लोहिया ने इसे समय-समय पर अपने लेख एवं अध्ययन की साधना स्थली बनाया था।

छायावादी कवियित्री महीयसी महादेवी वर्मा भी इसे देखने का मोह संचरण न कर सकीं। ईश्वर की इस मनोहारी और अनमोल कृति को देखकर ही उन्होने कहा होगा कि ‘भारतीय संस्कृति विविधरूपी है क्योंकि भारत की प्रकृति अनंतरूपा अजसव और वरदायिनी है।’

चचाई के नैसर्गिक सौंदर्य को निहारकर ही सुप्रसिद्ध कवि एवं लेखक डॉ. रामकुमार वर्मा की तूलिका गा उठी थी-
ओ देख खोल दृग यह प्रपात
य पतन दृष्टि का शुभ हास।
कवि जड़ वर्षा तक सिखलायेगा,
युग को चेतन का रम्य हम्सस।

हिन्द हायकू के जनक कवि आदित्यप्रसाद सिंह की लेखनी भी देखकर चहचहा उठी-
हरर-हरर
प्रतिश्रुत स्वर
सवल संगीत से ओतप्रोत
सबके मेरे तरुण जलश्रोत
नित जल निर्मित कुटिक चट्टानों पर
निशि दिन् गिरते कपिल चट्टानों पर
झर-झर-झर-झर-झर
तिरते, फिरते
कल कलित कुहासों से घिरते
उन्मद वीहर है नद
रजत जलद से उठते गिरते।

रीवा से चचाई तक जाने के लिए पक्की सड़क एवं ठहरने के लिए एक शासकीय विश्राम भवन भी है। चचाई मध्यप्रदेश के पर्यटन नक्शे पर महत्वपूर्ण स्थान रखता है। चचाई की महत्ता को दृष्टिगत रखते हुए अभी इसके विकास की अनेक संभावनाएँ हैं। पर्यटन विकास निगम की दृष्टि से यह एक उपेक्षित स्थान है। कदाचित इस रूप में कुछ कमियाँ रह जाने से इसका पर्यटक समुचित उपयोग नहीं कर पाते हैं।

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