जनजातियों की जल की मिथकीय अवधारणाएं

Submitted by admin on Mon, 01/25/2010 - 13:47
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वसन्त निरगुणे

बस्तर के मुरियाजन लिंगो के साथ भूमि और जल के भी पूजक हैं। एक पुरा कथा में कहा गया है- ‘सृष्टि के प्रारम्भ की बात है, लिंगो देवता और उनके भाइयों ने पृथ्वी पर जंगल, पहाड़, नदियों इत्यादि की रचना कर ली थी। तब पृथ्वी की सेवा के लिए पुजारी की जरूरत पड़ी और उस पुजारी की खोज नदी यानी जल के तट पर ही हुई। पृथ्वी का पुजारी और कोई नहीं। ‘मनुष्य’ ही है। देवता तो नदी पार कर सकते थे लेकिन ‘मनुष्य’ नहीं। फिर लिंगोने मदद की। यह राहु-केतु की तरह ईर्ष्यावश किसी देवता ने घास की बनाई रस्सी के सहारे को नदी के अधबीच में ही काट दिया था जिससे मनुष्य राजा डूबने लगे थे, तब मछली ने कछुए को सहारे के लिए आदेश दिया। कछुए ने दोनों को पीठ कर बैठाकर रक्षा की। तब से पानी में रहने वाली मछली और कछुए की पूजा की जाने लगी और तभी से इनके नाम से गोत्र चिन्ह भी बने। बस्तर की ऐसी ही एक दूसरी कथा भाई-बहन को कछुए के द्वारा नदी में बहते हुए बचाने की है।’

आका जनजाति की कथा है- ‘पहले पानी नहीं था। सभी प्राणी प्यास से तड़पते थे। एक दिन सबने विचार किया कि पानी की खोज करनी चाहिए। सवाल हुआ उसे कौन खोजे? सबने अपनी लाचारी बताई। इतने में एक नन्ही-सी चिड़िया ने कहा- ‘मुझे मालूम है, पानी कहाँ है?’ सबके चेहरों पर खुशी छा गई और पूछा- वह कहाँ है?

जहाँ से सूरज उगता है, वहाँ पानी का एक सरोवर है। इस सरोवर के चारों ओर एक बहुत बड़ा साँप कुण्डली मारकर बैठा है। अगर उसकी कुण्डली खुलवा दी जाये तो पानी बह निकले।’ सब चौंके, यह काम कठिन तो है. उसने कहा- ‘अगर आप मुझे आज्ञा दें तो मैं यह कार्य कर सकती हूँ।’ सबने खुशी से स्वीकृति दे दी। वह उड़ती सरोवर के पास पहुँची। वहाँ साँप को कुण्डली मारे देखकर पहले तो वह डरी। फिर एक वृक्ष पर बैठकर रात होने की प्रतिक्षा करने लगी। जब रात हुई तो साँप सो गया। उसने झपट कर उसकी आँखे नोंच लीं। साँप दर्द से तड़फ उठा और उसकी कुण्डली खुल गई। कहते हैं तभी से सरोवर का पानी नदी बनकर बह रहा है।’ (संकलन- रामनारायण उपाध्याय)

एक पहाड़ी जनजाति मिरो में बरसात होने की एक अलग ही कथा प्रचलित है- स्त्री-पुरुष का एक जोड़ा आसमान में रहता है। उनके घर में एक बड़ी टंकी है और एक नदी है जो जमीन से आसमान तक चली गई है। उसी से यह टंकी भरती है, जब कभी यही टंकी बह निकलती है, तभी धरती पर बरसात होती है।

कभी-कभी टंकी में पानी कम हो जाता है तो पति-पत्नि झगड़ने लगते हैं। पति अपनी पत्नी से कहता है कि- ‘तुम इतना पानी क्यों खर्च करती हो कि टंकी खाली हो जाय। पत्नी कहती है- तुम्हीं तो चावल की शराब पीते हो और उसी को बनाने में सारा पानी खर्च हो जाता है।’ इस बात में झगड़ा बढ़ जाता है और पत्नी गुस्से में अपने कपड़े उतार फेंककर घर से भाग जाती है। उसका पति मारने के लिए उसका पीछा करता है। दोनों में युद्ध ठन जाता है जिसे हम बिजली कहते हैं। वह बरसात में उस सुन्दर स्त्री की देह की चमक है और जिसे हम बादलों की गरज कहते हैं, वह उसके पति की हुंकार है। पानी के लिए दोनों का युद्ध आज भी चल रहा है।’

इस कथा का परिष्कृत रूप हमें ऋग्वेद में मिलता है। वहाँ कथा इन्द्रदेव के नाम से है, जो वर्षा का देवता है। इन्द्र ने क्रुद्ध सांड की तरह अपने विद्युत रुपी वज्र को रगड़कर वायु को साथ लेकर भयंकर गर्जन करते बैठे अंधकार रुपी वत्रासुर नामक मेघ पर आक्रमण किया। बादलों की तह रूपी सात पुरियों को नष्ट करने के कारण ही उसका नाम पुरन्दर भी है। उन्होंने समुद्र के पास जाने के लिए रथ की तरह नदियों का निर्माण किया। बाद में यही रूपक इन्द्र वत्रासुर की कहानी बनकर पुराण कथाओं और लोकाख्यानों तक पहुँचा।

एक और आका कथा में घाटियाँ और नदियों बनने का जिक्र है। पहले न धरती थी न आकाश। तब भगवान के दो बेटे थे। एक दिन खेल-खेल में दोनों बेटों ने धरती और आकाश बना डाले। जब दोनों बन गये तो एक ने धरती पर आकाश का ढक्कन लगाना चाहा, लेकिन उसने देखा कि धरती इतनी बड़ी थी कि उस पर आकाश का ढक्कन लगता ही नहीं था। अतएव उसने दूसरे से कहा कि जरा अपनी धरती छोटी कर दो ना। दूसरे ने मिट्टी को दबाकर धरती को इतना छोटा कर दिया कि उस पर आकाश का ढक्कन लग गया। कहते हैं उसने जहाँ-जहाँ से मिट्टी को दबाया था उसका उभरा हुआ हिस्सा पहाड़ कहलाया और दबा हुआ हिस्सा घाटियाँ एवं नदियाँ बनीं।

पानी और आग दोनों, एक दूसरे के विरोधी तत्व हैं। पर जीवन के लिए ‘क्षिति जल पावक गगन समीरा’, पाँचों तत्व अनिवार्य माने गये हैं। इन्हीं से पृथ्वी, पृथ्वी है। पानी की वजह से अग्नि पत्थर में छिपकर बैठ गई, जहाँ तक पानी नहीं पहुँच पाता है। तब से पत्थरों के रगड़ने से उनमें अग्नि पैदा होती है। आदि मानव ने पत्थर की रगड़ से अग्नि पैदा की थी। इस सम्बन्ध में डाफला जनजाति की एक मजेदार कथा है-

‘एक बार आग और पानी में लड़ाई छिड़ गई। चूँकि पानी की सबको जरूरत पड़ती थी, अतएव सबने पानी का साथ दिया। लाचार आग अपनी जान बचाकर भागी। पानी ने उसका पीछा किया। वह पहाड़ की सबसे ऊँची-चोटी पर पहुँची। पानी वहाँ भी बादल बनकर जा पहुँचा। अब जाये तो जाये कहाँ? अतएव वह कुदकर पत्थरों में समा गई। पत्थरों में जाने की शक्ति पानी में नहीं थी तब से आग छिपकर वहाँ बैठी है। जब भी आदमी को उसकी जरूरत पड़ती है, वह दो पत्थरों को रगड़कर उसे बुला लेता है। बाद में वह पुनः उसी में छिप जाती है।’

एक गोंड मिथकथा में पानी, नदी, नाव, कछुए की कहानी के बहाने कच्छप अवतार की झलक देखी जा सकती है। ‘सृष्टि के आरम्भ में गोंड जब पृथ्वी पर आये, तब एक स्थान पर नदी के किनारे उन्हें भोजन बनाना पड़ा। मरकाम कुर वालों का चूल्हा बिगड़ गया, क्योंकि वह गुड़ का बना था। शेष गोंड कुर वाले खाना खा पीकर आगे एक नाव से नदी पार चले गये। मरकाम पीछे छूट गये, तब उन्होंने जल देवता से नदी पार उतार देने की प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना पर द्रवीभूत होकर ‘बड़का-देव’ ने कच्छप का रूप धारणकर पीठ पर बैठाकर उन्हें दूसरी पार पहुँचाया। तब से इनमें कच्छप पू्ज्य देवता माना जाने लगा और इन लोगों का ‘कचिम’ गोत्र कहलाया। ये लोग इसका मांस नहीं खाते हैं।’
 

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