जल के वैदिक और पौराणिक लोकाख्यान

Submitted by admin on Mon, 01/25/2010 - 11:54
Author
वसन्त निरगुणे

अभी तक हमने जल की आदिम मिथकीय अवधारणाओं को देखा, अब हम हमारे वैदिक और पौराणिक लोकाख्यानों की भी जाँच पड़ताल कर लें। सारे संसार में जल की मिथकीय अवधारणएँ अपने मूल मौलिक रूप में प्रचलित रही हैं। भारत में जल के बारे में बहुत गहरे में सोचा गया है। जल क्या है? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? इस बारे में जनजातीय मिथक बहुत ज्यादा कुछ नहीं कहते।

ज्यादातर आदिम मिथकथाएँ चारों ओर जल ही जल से शुरू होती हैं। पानी कहाँ से आया, पानी कैसे बना? इसका उत्तर आदिवासी कथाएँ बहुत कम देती हैं। एक गढ़वाली कथा कहती है- न तो कहीं पृथ्वी है और न पानी। मैं तुम्हारे लिए घोंसला कहाँ बनाऊँ? गरुड़ी जब गरुड़ के पंख पर अंडा दे देती है तो उस पर अण्डा टिकता नहीं और वह नीचे गिर जाता है दो टुकड़े हो जाते हैं। नीचे का आधा हिस्सा पृथ्वी बन जाती है औऱ आधा हिस्सा आकाश बन जाता है। अण्डे को भीतर का द्रव्य समुद्र बन जाता है। मुण्डा अवधारणा में काल के शुरु में पृथ्वी का चेहरा पानी से ढँका था। सूरज देवता सिंग बोंगा पानी के ऊपर चिंतन कर रहे थे। संथालों में भी बहुत कुछ यही धारणा मिलती है- शुरू में ठाकुर जिऊ था। कहीं जमीन नहीं दिखती थी, सब कुछ पानी से ढँका था। हो, मुण्डा, संथाल, एक ही परिवार के होने से उनमें जल से संबंधित कथाओं के अन्तःसूत्र एक ही मिलते हैं। जलमग्न पृथ्वी का कोई अता-पता नहीं होने के कारण पहले उसका पता लगाया जाता है। इसमें कौए, केकड़े, मकड़े, मछली और केंचुंए की महत्वपुर्ण भूमिका होती है। केकड़ा उसे गिचना राजा से पृथ्वी को उगलवाने के लिए महासागर के तल में ले जाता है। एक संथाल कथा में पानी में सोल हाओ (सोल मछली), काटकोम (केकड़ा लेंटेड कुँवर राजकुमार केंचुआ) और लेंडम कुँवर रहते थे। ठाकुर जिऊ ने उन्हें बुलाकर आदेश दिया कि वे पानी में पृथ्वी को ऊपर उठायें। सोल हाओ ने कहा- मैं पृथ्वी को पानी के ऊपर ले आऊँगी। इसमें मत्स्य और कच्छप अवतार की दोनों कथाएँ छिपी हैं। मिट्टी अथवा पृथ्वी मिल जाने के बाद सृष्टिकर्ता उसे जल के ऊपर फैला देता है। समुद्र, झील, पहाड़ बनने की अनेक कथाएँ आदिम समूहों में प्रचलित हैं, पर जल बनने की कथाएं प्रायः नहीं ही हैं। छिपी हैं। मिट्टी अथवा पृथ्वी मिल जाने के बाद सृष्टिकर्ता उसे जल के ऊपर फैला देता है। समुद्र, झील आदि तो बन जाते हैं, लेकिन उसमें पानी कहाँ से और किस तरह आया, इसका खुलासा नहीं होता। एक बैगा मिथकथा में महादेव की दी गई अँगूठी के धरती पर फेंकने से सात समुद्र बने। महासागर के ऊपर सिंग माली चिड़िया अण्डे देती है, उसी अण्डे से एक लड़की और लड़का पैदा होता है। ये दोनों पानी पर ही बड़े होते हैं। पानी पर पूरा शासन महादेव का था। इसका मतलब पानी कभी राज्य की तरह व्यवहृत था। एक कथा में आता है- महादेव भगवान ऊपरी समुद्र से नीचे के समुद्र तक शासन कर रहे थे। नारायण भी जल में रहते हैं।

पानी में पुरानी दुनिया डूब जाती है और फिर उसका नया सृजन होता है। अथवा एकदम सृष्टि के नवसृजन की कहानियाँ सुनने को मिलती हैं। पुरानी दुनिया के साथ आदमी की स्मृतियाँ जुड़ी होती हैं, जबकि नवसृजन में कल्पना का पुट अधिक मिल सकता है। पर यहाँ भी पानी की उत्पत्ति का अता-पता नहीं है। एक गारो मिथक में पानी के जन्म के बारे में कहा गया है कि- ‘पानी का जन्म मनुष्य जाति की माँ के गर्भ से निकले पानी के फव्वारे से हुआ और वह सभी नदियों का उद्गम हो गया’ इस कथा में जिस पानी से मनुष्य के शरीर का निर्माण हुआ है, उसे व्याख्यायित किया गया है। मनुष्य के शरीर में तीन चौथाई पानी है. बाकी सब माँस-मज्जा और हड्डियाँ हैं, पर वे भी पूरी तरह से पानी में डूबी हुई हैं। टो़ड़ा लोगों में ‘थूक के छींटे बरसात बन गई’ धारणा है।

आदिम जतियों में जल की मिथकीय कहानियाँ कुछ टूटे और छूटे संदर्भों के साथ बुनी हुई मिलती हैं। सहसा उस पर विश्वास नहीं होता है। कथा में अचानक कोई ऐसा शब्द आ जाता है, जिसका संदर्भ अर्थ कुछ पल्ले नहीं पड़ता। वैसे आदिवासियों के सारे मिथक शब्द का संसार ही रचते हैं। उन शब्दों से आदिवासी अपने मंतव्य निकालते हैं। जो कथा या कहानी बन जाते हैं। एक बैगा कथा का कथ्य एकदम शास्त्र के समान लगता है-

‘प्रारम्भ में पानी, पानी और पानी के सिवाय कुछ नहीं था। देवता के आवाज नहीं थी, प्रेत की आवाज नहीं थी, हवा नहीं थी, चट्टान नहीं थे, रास्ते नहीं थे, जंगल नहीं था। अभी जैसा आकाश है वैसा तब पानी था। पानी में यहाँ-वहाँ तैरते कमल के एक विशाल पत्ते पर भगवान बैठे थे। उसके जीवन में कोई फल या फूल नहीं था, वह अकेला था।’

बिरहोर मानते हैं- ‘शुरु मे सभी कुछ पानी था। पानी के ऊपर कमल का एक पौधा खड़ा था। तब सिंगबोंगा या परमात्मा पाताल लोक में था। वह कमल के पौधे के तने के खोखले से होकर पानी की सतह के ऊपर आया। वह कमल के फूल के ऊपर बैठ गया।’ ब्रह्मा की उत्पत्ति कथा के बीज इस कथा में देखे जा सकते हैं।

‘शुरु में जब सब जगह पानी था औऱ उसके ऊपर कमल का फूल खिला था। एक दिन भगवान, जो पाताल में रहता था, कछुए की पीठ पर बैठकर सतह के ऊपर आया।’ (डॉ. वेरियर एलविन के संग्रह से) इस कथा में कच्छप अवतार के बीज हैं।

जनजातियों के सम्पूर्ण मिथक वाचिक हैं, लेकिन उनके लिए यही पुराण हैं. जिनमें उनके आद्य विचार और दर्शन दिग्दर्शित हैं। इन कथाओं में सभ्य समाज के पौराणिक आख्यानों की नींव पड़ती नजर आती है। सारे विश्व में जल को लेकर अनेक मिथकीय कहानियाँ गढ़ी गई हैं, जिनकी निर्मिति आदिम जल मिथकों से मिलती-जुलती है। यह कहना अत्युक्ति नहीं होगी कि पौराणिक और लोकाख्यानों का मूल आधार आद्य मिथक ही हैं। ये ही आगे चलकर शास्त्र का रूप बने। अब भारतीय और विश्व के जल मिथकों पर दृष्टिपात करते हैं-

पौराणिक आख्यानों में जल के जन्म के बारे में पहला ही जवाब मिला कि ‘ब्रह्मा की तरलता से जल बना।’ निश्चित रूप से पौराणिक आख्यान अथवा पुराण कथाएँ आदिम कथाओं से बहुत आगे की चीज हैं। पौराणिक मानव ने कार्य-कारण विधि से विचार कर जल और अन्य मिथकों को बहुत अधिक व्यवस्थित रूप दिया। इस काल में सारे निकष तर्कपूर्ण तरीके से खोजे गये। आदिम मिथकों के संकेत मात्र इन कथाओं में और अधिक विस्तारित हुए। यही कारण है कि इन मिथकों पर लोगों का अधिक विश्वास देखा जाता है। लोग इन्हें सच की तरह लेते हैं और उस सच की पूजा करते हैं। प्रलय की कथा मूल रूप से जल की ही कथा है। अन्त में जल ही बचता है और फिर शुरु होती है सृष्टि बनने की नई कहानी। सृजन की नई संभावनाओं के बीज प्रलय के बाद जल में बचे होते हैं। ब्रह्मा की इच्छा से जल (नर) में विष्णु का जन्म हुआ। जल यानी नार ही जलायन हो गया, जो ‘नारायण’ कहलाया। नार यानी जल ही जिनका घर हो, वह ‘नारायण’ है।

‘क्षीरसागर के आदि जल में भगवान विष्णु शेषनाग की शैय्या पर आनन्दपूर्वक सोये थे। एक दिन उनके मन में यह भावना उत्पन्न हुई कि मैं ‘एक हूँ – अनेक हो जाऊँ।’ तभी उनकी नाभि से एक कमलनाल उत्पन्न हुआ, जिसके फूल में से ब्रह्मा का जन्म हुआ, जिसे प्रजापति कहा गया। इन प्रजापति ने समूची सृष्टि का निर्माण किया। ब्रह्मा ने देवताओं की सृष्टि करने के बाद जल के जीव उत्पन्न किये परन्तु उनके पास खाने के लिए कुछ न था, अतः वे ब्रह्मा के पास गये औऱ उन्होंने उनसे भोजन जुटाने की प्रार्थना की। आवश्यक प्रबन्ध करने के बाद ब्रह्मा ने अपनी संतान से कहा कि उन्हें जल की रक्षा करनी चाहिए। यह सुनकर जल के जीवों में से कुछ ने कहा कि वे जल की उपासना करेंगे औऱ दूसरों ने प्रजापति को जल की रक्षा का वचन दिया। इस पर प्रजापति ब्रह्मा ने जल के जीवों को दो जातियों में विभाजित कर दिया। जल की उपासना करने वालों को उन्होंने यक्ष कहा और जल की रक्षा करने वालों को राक्षस। (विश्व प्रसिद्ध मिथक एवं पुराण कथाएँ से) भारतीय मिथकों में त्रिदेव-ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों की सर्वाधिक महत्ता है। शिव सबसे अधिक लोकप्रिय और प्रमुख मिथक पात्र हैं। ऋग्वेद में शिव को रूद्र कहा गया है। प्रलय की कथा का लय अन्ततः जलराशि में होता है। हिमालय की सबसे ऊँची चोटी का केवल शिखर बचता है। जहाँ सृष्टि बीजों से भरी मात्र एक नाव मनु के साथ बचती है। धीरे-धीरे जल की बाढ़ उतरती जाती है। और पृथ्वी का भाग खुलता जाता है। अन्त में समुद्र और झीलों में पृथ्वी का तीन-चौथाई पानी रह जाता है। यही औसत जीवन के लिए सार्थक होता है और प्रलय के बाद दुनिया की फिर शुरुआत होती है। मनु-शतरुपा सर्वत्र बीज डालते हैं औऱ मनु से मनुष्य की उत्पत्ति होती है। यही कथा आदम और हव्वा के साथ दोहराई जाती है। आदम से आदमी बना। बाइबिल में सात दिन में सृष्टि बनने की कथा कही गई है। प्रथम दिन स्वर्ग और पृथ्वी का निर्माण हुआ। आश्चर्यजनक यह है कि बाइबिल में पृथ्वी से पहले स्वर्ग के निर्माण का नाम गिनाया गया है अथवा दोनों एक साथ बने होंगे। पहले स्वर्ग की कल्पना अद्भुत है। अंधकार को विदा करके प्रकाश की स्थापना हुई। प्रकाश को दिन औऱ अंधकार को रात कहा गया। दूसरे दिन जमीन के नीचे और आकाश के ऊपर का जल बना। यहाँ भी बाइबिल की यह बहुत सुन्दर कथा बुनी गई है कि जमीन का पानी और पृथ्वी का पानी अलग-अलग हैं। हालाकि सच यह है कि पृथ्वी का ही पानी आसमान में पहुँचता है, लेकिन इससे बारिश की जबर्दस्त कल्पना बनती है। तीसरे दिन अंतरिक्ष, सूर्य, चन्द्र, तारे आदि बनाये। इस प्रकार पेड़-पौधे, जीव और मनुष्य से सात दिन में पृथ्वी भर गई। बेबीलोनिया कथा में लगातार सात दिन और सात रात प्रलय मचने की बात कही गई है। उत्तानपिश्तिम (मनु) की विशाल नौका उमड़ते हुए बाढ़ के जल पर तूफानी हवाओं से भटकती और हिचकोले खाती रही।

जल में ‘नारायण’ का पहली बार जब प्रवेश हुआ तब नारायण की शक्ति से एक विराट स्वर्ण अण्ड का प्रादुर्भाव हुआ। नारायण जल में शेषनाग की शैय्या पर एक वर्ष रहे। उस समय के वर्ष में कितने दिन हो सकते हैं, इस बात से ही पता लग सकता है कि उस समय ब्रह्मा का एक दिन एक हजार वर्ष के बराबर होता था, इसे अधिक विस्तारित करने के लिए ब्रह्मा के एक पल तक में एक हजार वर्ष की मिथकों में कल्पना की गई है। भारतीय माइथालॉजी में समय को लेकर बहुत गंभीरता से हजारों वर्षों तक विचार-मंथन किया गया है। यहाँ तक कि भारतीय समय के यथार्थ को वैज्ञानिकता के दर्जे तक पहुँचा दिया गया है। ज्योतिष समय का सबसे विश्वसनीय वैज्ञानिकता के दर्जे तक पहुँचा दिया गया है। ज्योतिष समय का सबसे विश्वसनीय वैज्ञानिक सच है। जल, समय और ज्योतिष का बहुत गहरा सम्बन्ध है। जल के ज्वार भाटे का सम्बंध चन्द्रमा से है। सूर्य-चन्द्र ब्रह्मा की आँखें हैं। विराट स्वर्ण अण्ड को स्वयं ब्रह्मा ने दो टुकड़े कर दिये थे. ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा का जन्म भी इसी स्वर्ण अण्ड से हुआ है। इसलिए उन्हें हिरण्यगर्भ भी कहा जाता है। स्वर्ण अण्ड के उन दो टुकड़ों में से एक से आकाश बनाया और दूसरे टुकड़े से पृथ्वी का निर्माण किया। पृथ्वी को जल पर स्थापित किया गया।
 

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