जल-शुद्धिकरण

Submitted by admin on Sat, 01/23/2010 - 15:57
Author
महेश कुमार मिश्र ‘मधुकर’

यदि कूप, वापी, पोखर इत्यादि का जल किसी कारण अशुद्ध या अपवित्र हो जाये ते इसके लिए निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिए-

वापी कूप तडागानां दूषितानां च शोधनम्।
अद्धरेत षट्शतं पूर्णं पंचगव्येन शुद्धयाति ।।225।।

अर्थात्- जो जलाशय, बावरी, कुआँ, तालाब, मुर्दे इत्यादि के स्पर्श से दूषित हो जाते हैं, उनकी शुद्धि छः सौ घड़े जल भर कर बाहर निकाल देने तथा उनमें पंचगव्य डाल देने से होती है।

अस्थि- चर्मावसिक्तेषु खरश्वानादि दूषिते।
उद्धरेदुदकं सर्वं शोधनं परिमार्जनम्।।226।।

अर्थात्-जिन जलाशयों में अस्थि-चर्म पड़े हैं अथवा गर्दभ और कुत्ते पड़ कर मर गये हैं, उनका सम्पूर्ण जल निकाल दें फिर पंचगव्य डाल दें तो शुद्ध हो जायेंगे।

कूपो मूत्र पुरीषेण यवनेनापि दूषितः।
श्वसृगाल खरोष्ट्रैश्च क्रठयादैश्च जुगुप्सितः।।9।।
उद्धृत्यैव च तत्तोयं सप्तपिंडान् समुद्धरेत्।
पंचगव्यं मृदा पूतं कूपे तच्छोधनं स्मृतम्।।10।।

अर्थात्- कुएँ का जल भी, मूत्र, विष्ठा पड़ने, ‘यवन’ के जल भरने, कुत्ता, गधा, गीदड़ गिरने, ऊँट गिरने तथा माँस खाने वाले जीवों से दूषित हो जाता है। उस कुएँ को शुद्ध करने के लिए पहले समस्त जल को निकाल दें, फिर कुएँ में से सात पिण्ड मिट्टी के निकालें तत्पश्चात् उसमें पवित्र मिट्टी तथा पंचगव्य डाले, तभी उस कुएँ का जल शुद्ध होगा।

-आपस्तंब स्मृति 2/10

सूर्यरश्मि निपातेन मारुतस्पर्शनेन च।
गवां मूत्र पुरीषेण तत्तोयं तेन शुद्धयति।।

अर्थात्- जल की शुद्धि सूर्य की किरणें पड़ने से, हवा के स्पर्श से तथा गौ के मूत्र-गोबर (पंचगव्य) से होती है।

-आपस्तंम्ब स्मृति2/7
 

इष्टापूर्त-कर्म


‘सनातन हिन्दू धर्म’ के अनुसार ‘इष्टापूर्त कर्म’ को धर्म का प्रधान अंग माना गया है।

‘इष्टापूर्तम’ दो शब्दों (1) इष्ट और (2) पूर्त के मेल से बना समास है।

‘अत्रि स्मृति’ इन दोनों का स्पष्टीकरण निम्न प्रकार से करती है-

अग्निहोत्रं तपः सत्यं वेदानां चैव पालनम्।
आतिथ्यं वैश्यदेवश्च, इष्टमित्यभिधीयते।।

अर्थात्-अग्निहोत्र, तप, सत्य, वेदों के आदेश का पालन, अतिथि-सत्कार और वैश्वदेव – इन्हें ‘इष्टम्’ कहा जाता है।

वापी कूप तडागादि, देवतायतनानि च।
अन्न प्रदानमारामः पूर्तमित्यभिधीयते।।

अर्थात्- बावड़ी, कुआँ, तालाब, देवमंदिर इत्यादि का निर्माण, अन्न का दान तथा बाग लगवाना- इन्हें ‘पूर्तम्’ कहते हैं।

वैसे तो ‘इष्टापूर्त’ सभी के लिए अनिवार्य है, किन्तु ब्राह्मणों के लिए विशेष रूप से कहा गया है कि वह इष्टापूर्त का पालन ‘यत्नपूर्वक’ करे।

‘इष्टापूर्तं च कर्त्तव्यं ब्राह्मणेनैवयत्नतः।
इष्टेन लभते स्वर्गं, पूर्ते मोक्षो विधीयते।।‘

अर्थात्- इष्ट से स्वर्ग और पूर्त से मोक्ष की प्राप्ति होती है। अतः ब्राह्मण का तो परम् कर्त्तव्य है कि वह इष्टापूर्त का पालन यत्नपूर्वक करे।

किसी देवता के लिए बने हुए तालाब, बावड़ी, कुआँ, पोखरा और देवमंदिर – ये यदि गिरते या नष्ट होते हैं तो जो व्यक्ति इनका उद्धार करता है, वह पूर्तकर्म का ‘फल’ भोगता है। क्योंकि ये सब ‘पूर्तकर्म’ हैं।

-नारद पुराण, पूर्व भाग- प्रथम पाद, पृ.-57

 

 

इष्टापूर्त की महिमा


(भविष्य पुराण/उत्तर पर्व/अ.-127)

विधिपूर्वक वापी, कूप, तडाग आदि का निर्माण कराने वाले तथा इन कार्यों में सहयोग देने वाले इत्यादि सभी पुण्यकर्मा पुरुष अपने ‘इष्टापूर्त’ धर्म के प्रभाव से सूर्य एवं चन्द्रमा की प्रभा के समान कान्तिमान् विमान में बैठकर दिव्यलोक को प्राप्त करते हैं।

जलाशय आदि की खुदाई के समय जो जीव मर जाते हैं, उन्हें भी उत्तम गति प्राप्त होती है। गाय के शरीर में जितने भी रोमकूप हैं, उतने दिव्य वर्ष तक तडाग आदि का निर्माण करने वाला स्वर्ग में निवास करता है। यदि उसके ‘पितर’ दुर्गति को प्राप्त हुए हों तो उनका भी वह उद्धार कर देता है।

‘पितृगण’ यह गाथा गाते हैं कि देखो! हमारे कुल में एक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसने जलाशय का निर्माण कर प्रतिष्ठा की । जिस तालाब के जल को पीकर गौएँ संतृप्त हो जाती हैं, उस तालाब को बनवाने वाले के सात कुलों का उद्धार हो जाता है। तडाग, वापी, देवालय और सघन छाया वाले वृक्ष-ये चारों इस संसार से उद्धार करते हैं।

जिस प्रकार पुत्र के देखने से माता-पिता के स्वरूप का ज्ञान होता है, उसी प्रकार जलाशय देखने और जल पीने से उसके कर्त्ता के शुभाशुभ का ज्ञान होता है। इसलिए न्याय से धन का उपार्जन कर तडाग आदि बनवाना चाहिए।

धूप और गर्मी से व्याकुल पथिक यदि तडागादि के समीप जल का पान करें और वृक्षों का सेवन करता हुआ विश्राम करे तो तडागादि की प्रतिष्ठा करने वाला व्यक्ति अपने ‘भातृकुल’ और ‘पितृकुल’ दोनों का उद्धार कर स्वयं भी सुख प्राप्त करता है।

‘इष्टापूर्त’ करने वाला पुरुष कृतकृत्य हो जाता है। इस लोक में जो तडागादि बनवाता है, उसी का जन्म सफल है। उसी की माता ‘पुत्रिणी’ कहलाती है। वही अजर है, वही अमर है। जब तक तडागादि स्थित है, तब तक वह व्यक्ति अपनी निर्मल कीर्ति का प्रचार-प्रसार देखता है और वह स्वर्ग का सुख प्राप्त करता है। जो व्यक्ति हंस आदि पक्षी को कमल और कुवलय आदि पुष्पों से युक्त अपने तडाग में जल पीता हुआ देखता है, और जिसके तालाब में घट, अंजलि, मुख तथा चंचु आदि से अनेक जीव-जन्तु जल पीते हैं, उसी व्यक्ति का जन्म सफल है, उसकी कहाँ तक प्रशंसा की जाये।

कूप आदि ऐसे स्थान पर बनवाना चाहिए जहाँ बहुत से जीव जल पी सकें। कूप का जल स्वादिष्ट हो तो कूप बनवाने वाले के सात कुलों का उद्धार हो जाता है। जिसके बनवाये कूप का जल मनुष्य पीते हैं, वह सभी प्रकार का पुण्य प्राप्त कर लेता है। ऐसा मनुष्य सभी प्राणियों का उपकार करता है। तडाग बनवाकर, उसके तट पर वृक्षों के बीच उत्तम देवालय बनवाने से उस व्यक्ति की कीर्ति सर्वत्र व्याप्त रहती है। जो व्यक्ति वापी, कूप, तडाग, धर्मशाला आदि बनवाकर अन्न का दान करता है और जिसका वचन अति मधुर है, उसका नाम यमराज भी नहीं लेते। जिसने जलाशय नहीं बनवाया हो और एक भी वृक्ष न लगाया हो, उसने संसार में जन्म लेकर कौन-सा कार्य किया?

 

 

 

 

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