तटबन्धों का रेखांकन-तकनीक नहीं, जनमत संग्रह

Submitted by Hindi on Sat, 08/11/2012 - 10:27
Author
डॉ. दिनेश कुमार मिश्र
Source
डॉ. दिनेश कुमार मिश्र की पुस्तक 'दुइ पाटन के बीच में'

पृष्ठभूमि


तटबन्धों के अलाइनमेन्ट में परिवर्तन केवल ‘जनता की मांग’ पर ही नहीं हुये, इसमें नेताओं द्वारा की गई राजनैतिक दखल-अंदाजी बराबर की शरीक थी जिसमें इंजीनियरों, उनकी कार्यक्षमता तथा तकनीक का जबर्दस्त शोषण और भयादोहन तक हुआ होगा। एक बात तो तय है कि या तो तटबन्धों के बीच की दूरी इतनी लापरवाही से निर्धारित की गई थी कि उसको चाहे जैसे तोड़ा-मरोड़ा जाता, तकनीक की दृष्टि से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था

कोसी परियोजना में जब 1955 में तटबन्धों के निर्माण का काम शुरू हुआ तो जिन इलाकों को बाढ़ से सुरक्षा मिलने वाली थी उनका तो उत्साह अपने चरम पर था क्योंकि योजना का उद्देश्य उनके हक में था वहीं दूसरी तरफ वह लोग थे जो कि तटबन्धों के बीच फंसने जा रहे थे, इन्हीं तटबन्धों के कारण बहुत ज्यादा परेशानी महसूस कर रहे थे। इन परिस्थितियों के निर्माण के पीछे जो कारण थे उनके बारे में हमने पिछले अध्याय में चर्चा की है। इस अध्याय में हम इन तटबन्धों के निर्माण के समय की घटनाओं की चर्चा करेंगे।

सरकार ने आम जनता की जानकारी के लिये जनवरी 1955 में समाचार पत्रों के माध्यम से तटबन्धों के आंशिक नक्शे प्रकाशित करवाये। पूर्वी तटबन्ध के लिये यह नक्शे भीमनगर से सुपौल तक (चित्र-3.1) तथा पश्चिमी तटबन्ध के लिये यह नक्शे कुनौली से घोघरडीहा (चित्र 3.2) तक थे। तटबन्ध निर्माण की शुरुआत कुनौली-निर्मली खण्ड पर भारत में तथा कुनौली के उत्तर नेपाल में हुई। इसके कुछ ही समय बाद भीमनगर से सुपौल खण्ड में कोसी के पूर्वी तटबन्ध का निर्माण शुरू हुआ। इन प्रकाशित नक्शों पर यह सूचना दर्ज थी कि तटबन्ध का अंतिम रेखांकन स्थानीय जनता से सलाह-मशविरे के बाद किया जायेगा। जाहिर है कि तटबन्धों की डिजाइन तय करते समय या उसके पहले जनता से कोई राय-मशविरा नहीं किया गया था और तटबन्धों का अलाइनमेन्ट इतना लचीला था कि उसमें जनता की राय के अनुसार फेर बदल की गुंजाइश थी और तटबन्धों के बीच की दूरी भी इसी राय पर आधारित होनी थी। सच यह भी है कि तटबन्धों की डिजाइन टुकड़ों-टुकड़ों में और बिना किसी वैज्ञानिक आधार के की गई थी वरना तटबन्धों के पूरी लम्बाई के नक्शे प्रकाशित किये गये होते।

चित्र 3.2 पर एक सरसरी नजर डालने पर हम पाते हैं कि इस नक्शे के मुताबिक पश्चिमी तटबन्ध पहले भुतहा से सीधे घोघरडीहा तक जाने वाला था। ऐसे बहुत से गाँव जो कि इस समय भुतही बलान की बाढ़ झेलते हैं, इस नक्शे के अनुसार, उस समय पश्चिमी कोसी तटबंध और कोसी नदी के बीच में पड़ने वाले थे। इसके बाद तो किशुनी पट्टी और मधेपुर के बीच तटबन्ध के अलाइनमेन्ट (चित्र 3.3) को लेकर बवाल ही मच गया और ‘जनता की मांग’ पर इस अलाइनमेन्ट को बदल देना पड़ा। न सिर्फ इस तटबन्ध को नये सिरे से बनाना पड़ा बल्कि पौनी के दक्षिण (चित्र 3.4) से लेकर घोंघेपुर तक जनता और जनता की सरकार के बीच कई बार सैद्धान्तिक लड़ाई हुई और कई बार तो यह लड़ाई ‘सचमुच की लड़ाई’ में तबदील हो गई।

चित्र 3.4 तथा चित्र 3.5 में दिखाये गये तटबन्धों के यथा-निर्मित अलाइनमेन्ट को देख कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि तटबन्धों की डिजाइन बदलने के लिये क्या-क्या नहीं किया गया होगा। जैसे-जैसे यह तटबन्ध दक्षिण की ओर बढ़ते हैं उनके बीच का फासला कम होता जाता है जबकि सामान्य बुद्धि यह कहती है कि जब नदी आगे बढ़ती है तो उसमें बहुत से नदी-नाले मिलते हैं जिसकी वजह से उसका प्रवाह बढ़ता है और उसका पाट चैड़ा होता है और इसलिए तटबन्धों के बीच का फासला भी अधिक होना चाहिये।

तटबन्धों के अलाइनमेन्ट में परिवर्तन केवल ‘जनता की मांग’ पर ही नहीं हुये, इसमें नेताओं द्वारा की गई राजनैतिक दखल-अंदाजी बराबर की शरीक थी जिसमें इंजीनियरों, उनकी कार्यक्षमता तथा तकनीक का जबर्दस्त शोषण और भयादोहन तक हुआ होगा। एक बात तो तय है कि या तो तटबन्धों के बीच की दूरी इतनी लापरवाही से निर्धारित की गई थी कि उसको चाहे जैसे तोड़ा-मरोड़ा जाता, तकनीक की दृष्टि से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था या फिर इंजीनियरों ने जनता के सारे अनुरोधों (या नेताओं के आदेशों?) का पालन करने में ही अपनी भलाई समझी। इस अध्याय में हम इन्हीं सब छल-योजनाओं और उनके घात-प्रतिघात का जायजा लेंगे।

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