देश की जलकुंडली

Submitted by admin on Tue, 02/09/2010 - 12:21
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नवचेतन प्रकाशन
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हालत दिन-ब-दिन ज्यादा-से-ज्यादा बिगड़ती जा रही है, फिर भी हम अपने जल संसाधनों के उपयोग इतनी लापरवाही से कर रहे हैं मानो वे कभी खत्म ही नहीं होने वाले हैं। दामोदर घाटी प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष श्री सुधीर सेन इसे नेतृत्व का संसाधनों के बारे में ‘अज्ञान’ कहते हैं।

देश की जल संपदा का कोई ठीक चित्र पेश करना कठिन है क्योंकि प्रामाणिक आंकड़े और तथ्य प्राप्त नहीं हैं। बंबई के ‘सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के निदेशक डॉ. नरोत्तम शाह 1983 में सेंट्रल स्टेटिस्टिकल’ आर्गनाइजेशन के लिए तैयार किए गए अपने एक निबंध में लिखते हैं, “कितनी विचित्र बात है कि देश की जल संपदा के बारे में सही तथ्य इकट्ठा कर सकने का हमारा यहां कोई प्रबंध नहीं हो पाया है। नीति बनाने, कार्यक्रम तैयार करने और दुर्लभ जल संसाधन के सही उपयोग की निगरानी के लिए यह अभ्यास बहुत जरूरी है।”

राष्ट्रीय कृषि आयोग के श्री बीएस नाग और श्री जीएन कठपालिया ने देश के जल चक्र का एक खाका खींचा है। आंकड़े निर्विवाद नहीं हैं, पर काफी हद तक ठीक हैं। जैसे, 1974 में भूमिगत जल के उपयोग और भंडार की मात्रा के जो आंकड़े दिए गए हैं वे केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा प्रकाशित आंकड़ों से भिन्न हैं। लेकिन इस चार्ट से भावी जलभंडार और इसके उपयोग के स्वरूप का अंदाज मिल सकता है। इसके अनुसार 1974 में 40 करोड़ हेक्टेयर मीटर पानी बहा, लेकिन उपयोग में केवल 3.80 करोड़ हेक्टेयर मीटर (क.हे.मी.) 9.5 फीसदी ही आया। सन् 2025 क.हे.मी. (26 प्रतिशत) हो सकेगा। श्री नाग और श्री कठपालिया के अनुसार 10.5 करोड़ हेक्टेयर-मीटर हमारी अधिकतम उपयोग क्षमता का सूचक है। हमें हर साल 40 करोड़ हेक्टेयर मीटर पानी मिलता है, उसका खर्च तीन प्रकार से होता है : 7.00 क.हे.मी. भाप बनकर उड़ जाता है और बाकी 11.5 क.हे.मी. नदियों आदि से होकर बहता है और बाकी 21.5 क.हे.मी. जमीन में जज्ब हो जाता है। फिर इन तीनों के बीच परस्पर कुछ लेनदेन भी चलता है। आखिर में सारा पानी वापस वातावरण में लौट जाता है।

जमीन में जज्ब होने वाले पानी का बहुत-सा हिस्सा पेड़-पौधों के काम आता है। सतही और भूमिगत दोनों प्रकार के पानी का उपयोग घरों में, सिंचाई में, उद्योगों आदि में होता है।

सतह पर बहने वाले पानी में कुछ (11.5 क.हे.मी.) सीधे प्राप्त होता है, कुछ (2 क.हे.मी) दूसरे पड़ोसी देशों से नदियों के द्वारा आता है। कुछ भूमि के नीचे से खींचा जाता है। यह सब कुल मिलाकर 18 क.हे.मी होता है। इस कुल पानी में से 1.5 क.हे.मी पानी को उसका रास्ता मोड़कर और सीधे पंपों से काम में लाया जाता है। बाकी 15 क.हे.मी. पानी वापस समुद्र में या पड़ोसी देशों को चला जाता है। अनुमान है कि सन् 2025 तक सतही पानी की मात्रा बढ़कर 18.5 क.हे.मी. होगी, जिसमें से (3.5 क.हे.मी.) भंडारण द्वारा और सीधे पंपों से (4.5 क.हे.मी) यानी कुल 8 क.हे.मी. पानी का उपयोग किया जा सकेगा। इसके अलावा सतही सिंचाई को बढ़ाकर लगभग 50 लाख हे.मी. अतिरिक्त पानी फिर दुबारा उपयोग के लिए प्राप्त किया जा सकेगा।

जमीन में जज्ब होने वाले कुल 21.5 क.हे.मी. से 16.5 क.हे.मी. पानी मिट्टी की नमी बनाए रखता है और बाकी 5 क.हे.मी भूमिगत जल स्रोतों में जा मिलता है। बरसात के मौसम में आमतौर पर नदियों के पानी का स्तर आसपास के जल स्तर से ऊंचा होता है। कारण नदी के रिसन में लगभग 50 लाख हे.मी. पानी की बढ़ोतरी होती है। सिंचाई में से होने वाले रिसन के कारण 1.2 क.हे.मी. पानी और जुड़ जाता है और इस प्रकार कुल 6.7 क.हे.मी. पानी भूमिगत भंडार में फिर जा मिलता है।

पिछले कुछ वर्षों से भूमिगत जल का भयानक गति से उपयोग बढ़ता जा रहा है। इससे नदी से पानी का रिसाव बढ़ेगा। सिंचाई के बढ़ने से भी खेतों का पानी जमीन में ज्यादा जज्ब होने लगेगा। इस प्रकार अंतःस्राव की बढ़ती मात्रा से सालाना भूमिगत भंडार में जुड़ने वाले पानी का प्रमाण भी बढ़कर लगभग 8.5 क.हे.मी हो जाएगा। मिट्टी के संरक्षण के लिए किए जाने वाले उपायों से, जैसे फिर हरियाली बढ़ाने या मेड़बंदी आदि से जमीन में ज्यादा से ज्यादा पानी जाएगा। इस अतिरिक्त भूमिगत जल से सीधे उपयोग के लिए ज्यादा पानी मिल सकेगा और पास की नदियों में भी बहाव बढ़ेगा।

भूमिगत पानी की इस पुनर्वद्धि का कई तरह से क्षय होता है- बहुत-सा पानी भाप बनकर उड़ जाता है, खुले कुओं और नलकूपों में से पानी खींचा जाता है, या जमीन के भीतरी स्रोतों से अपने आसपास की नदियों को चला जाता है। इन रूपों में जितने पानी का उपयोग नहीं होता है, वह पानी की सतह को ऊंचा करता है और उससे वाष्पीकरण बढ़ता है। अंदाज है कि सन् 2025 तक भूमिगत पानी को ऊपर खींचने का प्रमाण आज के 1.3 क.हे.मी. से बढ़कर 3.5 क.हे.मी. होने वाला है।

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