धन्यवाद, मवड़ी नाला

Submitted by admin on Thu, 02/11/2010 - 11:28
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Author
क्रांति चतुर्वेदी
Source
बूँदों की मनुहार ‘पुस्तक’


रामा विकासखण्ड का झकेलागांव, झाबुआ विकासखंड के पीथनपुर और माकनकुई में बरसात की बूंदों की शक्ति के रोचक सामाजिक सरोकार देखने को मिले। पीथनपुर में तो सामाजिक पुनर्निर्माण के नजारे नेगड़िया की भांति सामने आए।

.........झकेलागांव की कहानी बड़ी रोचक है। यहां पानी और चराई रोकने के अभियान में गांव वालों ने नियमों के उल्लंघन पर अर्थदण्ड की व्यवस्था की। डमण नामक एक व्यक्ति घास काटते हुए पकड़ा गया। सरपंच साहब बानसिंह मौड़ा सख्त स्वभाव के हैं। उन्होंने जलग्रहण समिति के नियमानुसार 500 रुपये अर्थदंड लगाया। यह सुन कर डमण अपने घर में सो गया- यह कहकर कि मैंने तो ‘दवाई’ खा ली है। पानी व मिट्टी आन्दोलन से जुड़े स्थानीय समाज के लोग समझ गए की यह बहाना बना रहा है। बूंदों की जद्दोजहद में जुटा समाज उसे उठाकर अस्पताल की ओर चल पड़ा। रास्ते में वह उठ खड़ा हुआ और स्वीकार किया कि घर चलकर जल समिति के निर्णयों का पालन करते हुए वह दंड भर देगा। उसने यह राशि ग्राम कोष में जमा भी करा दी। इस किस्से को झकेलगांव तो ठीक आसपास के गांव वाले भी रोचक अंदाज के साथ सुना रहे हैं।

स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय मानव बसाहट व पर्यावरण केन्द्र के सहायक परियोजना अधिकारी रमेशसिंह तोमर के साथ हम एक ऐसे गांव गए जो झाबुआ और आसपास के क्षेत्र में राहजनी और लूटपाट की वारदातों के लिए कुख्यात रहा है। झाबुआ से 14 किमी दूर पारा रोड पर बसे इस गांव का नाम है ‘पीथनपुर’। यहां एक खाट पर बैठकर गांव वालों से हमने बदलाव की दास्तान सुनी। अपराध और शराब की दुनिया से बिदा लेने के पीछे मूल रूप से एकदम पास ही सटे गांव माकनकुई में बरसात की रोकी गई बूंदों का असर ही है.......। रमेशसिंह तोमर कहते हैं- कासा प्रोजेक्ट के तहत माकनकुई के लोगों के जीवन में पानी की बूंदें रोकने के बाद बदलाव दिखा। उस गांव के हर वक्त सूखे रहने वाले नाले में पानी दिखने लगा। आदिवासी महिलाओं के सिर का घूंघट थोड़ा पीछे खसका......। तब पीथनपुर के कुछ लोगों के मन में विचार आया कि हम भी बदलेंगे.... लेकिन किस दिशा में.....?

पहले हम पीथनपुर की पहचान जान लें।

सड़क किनारे बसे इस गांव में साठ-सत्तर टापरे होंगे। सड़क झाबुआ और पारा को जोड़ती है, सो आवागमन की कोई दिक्कत नहीं है। पिछले लंबे समय से गांव के कतिपय लोग अवैध शराब बनाने और राहजनी की वारदात में लिप्त रहते थे। गांव के जमा लोगों ने हमें अपने किस्से सुनाए – अभी तो आप गांव में हमारे साथ बैठकर बतिया रहे हैं। दो साल पहले इस मार्ग से ठीक-ठाक निकल जाने पर लोग शुक्रिया अदा करते थे। आसपास के गांव वाले भी डरते थे। धनसिंह और खिमा का तो जैसे बोलबाला था। थाने में अनेक प्रकरण दर्ज थे। हम लोगों की ‘चौकड़ियां’ भर गई थीं (इनका आशय है, जमानत दे-देकर भू-अधिकार पुस्तिका पूरी हो गई थी) इसे बाहर के लोगों से बुलवाना पड़ता था। नहीं मिलता तो पुलिस हमें परेशान करती।

तोमर बताते हैं- स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय मानव बसाहट व पर्यावरण केन्द्र की टीम यह जानने के बाद कि पड़ोस में बरसात की बूंदें रोकने के बाद की स्थिति से इन लोगों में भी बदलाव की आस जाग सकती है, सक्रिय हो गई। इसमें मुझ सहित जया पटेल धर्मेन्द्र, नीलेश और रीना बिलवाल शामिल थीं।

वे कहते हैं- जब हमने गांव की बैठक बुलाई तो इसमें कई लोग शराब पीकर आए थे। इसमें पास के गांव माकनकुई के भी कुछ लोगों को बुलाया। भगत नाहरसिंह ने बताया कि किस तरह पानी की बूंदें रोकने से हमारे क्षेत्र में बदलाव की बयार बह रही है। विस्तृत बातचीत के बाद पीथनपुर के लोंगों ने शर्त लगाई-हम दारू और लूटपाट छोड़ सकते हैं, पहले हमें रोजगार दीजिए। धनसिंह ने इस बात में अगुवाई की......।

.......इतने लोगों को एक साथ कहां से रोजगार दिया जा सकता है। महिलाएं ज्यादा परेशान थीं। इसलिए बिना हारे उनसे सम्पर्क का सिलसिला जारी रहा।

इसके बाद देवस्थान सावन माता में भी बैठक बुलाई.......। गांव के कुछ लोगों ने कहा-हम यहां दारू नहीं छोड़ेंगे। हमें बढ़ताल ले चलो।

बढताल गुजरात का धार्मिक स्थल है। ऐसी मान्यता है कि यहां भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ है। इस इलाके के आदिवासी यहां पर काफी श्रद्धा रखते हैं।

पहले दिन 25 लोग दर्शन के लिए जाने को तैयार हुए। दूसरे दिन सूचना आई- गांव के 60 लोग साथ में चल रहे हैं।

तोमर और उनकी टीम इन्हें डाकोरजी, पावागढ़ और बढ़ताल ले गई। बढ़ताल में गांव वालों ने सबके सामने शपथ ली- ‘आज के बाद हम शराब नहीं पीयेंगे। जो शराब पीता हुआ मिल जाएगा, उसे हजार रुपये दंड देना पड़ेगा।’

.........लौटने के बाद गांव में बदलाव नजर आने लगा। केगला सहित अनेक लोग जो शराब बेचते थे, उन्होंने बनाना भी बंद कर दिया।

गांववाले सुना रहे थे : 15 दिन बाद पता चला कि धन्ना और एक अन्य दूसरे गांव में जाकर शराब पीने लगे। आदिवासी समाज ने इन्हे बहिष्कृत करने का फैसला लिया। अलबत्ता गांव में चर्चा के दौरान हमें यह जरूर बताया गया कि गांव के कुछ बुजुर्ग रात को सोने के पहले कुछ शराब का सेवन अभी भी करते हैं। तबियत के कारणों के चलते आदिवासी समाज की बैठक में इन्हें छूट दी गई है।

तोमर और गांव वाले बताते हैं कि अब गांव के लोग राहजनी से दूर हो रहे हैं। गांव में हम लोगों ने एक मंदिर भी बनाया है। वहां पूजा-अर्चना करते हैं। पहले दीपावली के दिन गायें दुड़वाते थे, उसमें शराब पीने के बाद मूंछ चढ़ाने भर से झगड़ा हो जाया करता था। हिंसक संघर्ष के बाद थाने के कमरे भर जाया करते थे। लेकिन पिछले दो सालों से ऐसा नहीं हो रहा है।

........एक बदलाव और आया है। आदिवासी समाज की परम्परा के अनुसार शादी के दौरान लड़की के पिता द्वारा लिया जाने वाला वधु मू्ल्य यहां 50 हजार से घटकर 2200 रुपए तक आ गया है। हमारी जिज्ञासा बढ़ रही थी कि पीथनपुर के पड़ोसी गांव माकनकुई में ऐसा क्या हुआ जो यह गांव बदल गया.....।

आइए, आप भी हमारे साथ चलिए माकनकुई........।

पीथनपुर से एकदम नजदीक ही है यह गांव। झाबुआ जिला मुख्यालय से इसकी दूरी है। केवल 10 किमी। कासा परियोजना के तहत गांव में आदिवासी समाज ने पानी और मिट्टी रोकने का बड़ा काम किया है। गांव की आबादी 60 परिवारों की है।

आदिवासी समाज ने यहां तीस फीसदी श्रमदान करके एक स्टापडेम बनाया है। इस नाले का नाम मवड़ी नाला है। इसके किनारे महुए का एक विशाल वृक्ष है। आदिवासी स्थानीय बोली में महुए को मावड़ा कहते हैं। स्थान चयन का काम भी गांव वालों ने ही किया। इंजीनियर साहब तो राजी नहीं थे। लेकिन समाज ने इस नाले को थोड़ा मोड़ देकर यहां डेम बनाया। इस स्थान से गांव को ज्यादा लाभ हुआ।

गांव के मोरिया डूंगर (पहाड़ी) पर पानी की बूंदों को रोकने की मनुहार आदिवासी समाज ने की। करीब 50 हेक्टेयर के क्षेत्रफल में नालियां खोदीं। छोटे-छोटे पत्थर जमाए। गांव में अलग से फलिया बन गया है –भगत फलिया। वे लोग एक माला पहने रहते हैं और समाज सुधार की दिशा में प्रयासरत रहते हैं। आपराधिक गतिविधियों से दूर रहते हुए मांस और मदिरा का भी सेवन नहीं करते हैं। अनेक गांवों में ये ‘ओपीनियन लीडर’ की भूमिका में भी रहते हैं।

कासा प्रोजेक्ट की स्वयं सेविका और गांव में पानी रोको आन्दोलन की प्रमुख आदिवासी महिला गजरी बाई हमें पूरा गांव और पहा़ड़ी घुमाने के बाद स्टापडेम के ऊपर जाकर खड़ी हो गईं। वह बोली – इसे तैयार करवाने वालों में मैं भी प्रमुख हूं। पहाड़ी पर पानी रोकने के पहले बरसात के कुछ दिनों बाद ही मवड़ी नाला सूख जाया करता था। अब यहां पानी बहता रहता है। गांव के मवेशियों को पीने का पानी का संकट समाप्त हो गया है। गांव के तीन कुएं जीवित हो रहे हैं। स्टापडेम में लोहे के बजाय सीमेन्ट के गेट लगाए गए हैं, ताकि अकेला व्यक्ति भी इन्हें निकाल औऱ लगा सके। इस नाले में झिरी खोदकर गांव वाले पीने का पानी भी ले जाते हैं। इस पानी का मूल स्रोत पहाड़ी पर वाटरशेड विकास ही है।

गजरी बाई बताती हैं- अब घूंघट पीछे खिसक रहा है। बोलने-चालने में दबंगता आ गई है। मेरी बयरानी कुलड़ी में 50 हजार रुपये जमा हैं। अभी विविध कामों के लिए छह महिलाओं को दो फीसदी ब्याज की दर पर लोन दे रखा है, जबकि साहूकार का कर्ज इस क्षेत्र में 12 फीसदी प्रतिमाह है। महिलाओं में पानी रोकने के बाद नया आत्मविश्वास जगा है। वे मुखर हो गई हैं। बयरानी कुलड़ी के सिलसिले में बैंकों में भी आना-जाना शुरू हो गया।

........इस गांव में गजरीबाई के साथ लंबा समय बिताने के बाद हम गांव में हल्के से बहते मवड़ी नाले को देख रहे थे। इसे बरसात की बूंदों का प्रताप ही कहेंगे कि उनकी जरा सी मनुहार की तो मवड़ी नाला जीवित हो उठा.......।

.........जीवित हो गया माकनकुई और पीथनपुर भी।
मवड़ी नाला, तुम्हारी जिंदादिली के क्या कहने......!
तुम्हें.......माकनकुई से ज्यादा पीथनपुर को बदलने के लिए धन्यवाद......!

 

बूँदों की मनुहार

 

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

आदाब, गौतम

2

बूँदों का सरताज : भानपुरा

3

फुलजी बा की दूसरी लड़ाई

4

डेढ़ हजार में जिंदा नदी

5

बालोदा लक्खा का जिन्दा समाज

6

दसवीं पास ‘इंजीनियर’

7

हजारों आत्माओं का पुनर्जन्म

8

नेगड़िया की संत बूँदें

9

बूँद-बूँद में नर्मदे हर

10

आधी करोड़पति बूँदें

11

पानी के मन्दिर

12

घर-घर के आगे डॉक्टर

13

बूँदों की अड़जी-पड़जी

14

धन्यवाद, मवड़ी नाला

15

वह यादगार रसीद

16

पुनोबा : एक विश्वविद्यालय

17

बूँदों की रियासत

18

खुश हो गये खेत

18

लक्ष्य पूर्ति की हांडी के चावल

20

बूँदें, नर्मदा घाटी और विस्थापन

21

बूँदों का रुकना, गुल्लक का भरना

22

लिफ्ट से पहले

23

रुक जाओ, रेगिस्तान

24

जीवन दायिनी

25

सुरंगी रुत आई म्हारा देस

26

बूँदों की पूजा

 

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About the author

.पत्रकार और लेखक क्रांति चतुर्वेदी का जल पर लेखन से गहरा नाता है। पानी पर आज कई अध्ययन यात्राएँ कर चुके हैं। जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन पर पाँच पुस्तकें भी लिख चुके हैं। मध्य प्रदेश के सन्दर्भ ग्रन्थ ‘हार्ट ऑफ इण्डिया’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। पानी की पत्रकारिता के लिये भारतीय पत्रकारिता जगत की प्रतिष्ठित के.के.

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