नदियाँ

Submitted by admin on Thu, 02/18/2010 - 17:12
Author
जगदीश प्रसाद रावत
वे सभी जल धाराएँ जो भूमि पर स्वाभाविक रूप से बहती हैं, नदियाँ कहलाती हैं। नदियाँ निरंतर बहती रहें यह प्रकृति का नियम है। यह जल चक्र श्रृंखला का आवश्यक अंग है। नदी समुद्र में समाहित होती है। समुद्र का जल वाष्प बनकर पुनः वर्षा का रूप धारण करता है। और यह जल फिर समुद्र में मिल जाता है। नदियाँ पृथ्वी की ऊपरी सतह का व्यापक और विशिष्ट भौतिक रूप होती हैं। भूमि, ढाल और वर्षा से यह उत्पन्न होती हैं। नदियाँ दो प्रकार की होती हैं- वर्षावाहिनी और सदावाहिनी या सदानीरा। वर्षावाहिनी नदियाँ मौसमी नदियाँ होती है। जो वर्षा ऋतु में पानी से आप्लावित हो जाती हैं और पावस के समाप्त होते ही यह सूख जाती हैं। जबकि सदावाहिनी या सदानीरा नदियों में वर्ष भर पानी रहता हैं। यह आर्थिक और अन्य दृष्टि से लाभदायक होती हैं जैसे-पर्यटन, सिंचाई, निस्तार सुविधा, मछली पालन, परिवहन, विद्युत उत्पादन आदि।

नदियाँ स्वच्छ जल प्रदात्री हैं। इन्हीं नदियों ने उपजाऊ कॉप मिट्टी निक्षेपित कर उत्तर भारत के विशाल मैदानों को निर्मित किया है। इनके किनारे अनेक प्रकार के वन तथा वन्यप्राणी विकसित तथा संरक्षित होते हैं। चारागाह, फलों के बागान पाए जाते हैं। सिंचाई एवं निस्तार की सुविधाओं के हिसाब से लाभदायक हैं। इनमें जलप्रपात बनते हैं जिनसे विद्युत उत्पन्न होती है। ये सुरम्य तथा नैसर्गिक वातावरण तथा शुद्ध पर्यावरण प्रदान करती हैं। इतना ही नही सैलानियों का मनोरंजन तथा रोजगार के साधन सुलभता से मिलते हैं। नदियों के तटों पर ही धार्मिक, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक महत्व के स्थल शरण पाते हैं। ये प्राचीन सभ्यता और संस्कृति की जन्मदात्री हैं। नहरों के संजाल से सतत् सिंचाई के साधन बारहों महीने उपलब्ध होते हैं। मंद जल गति के कारण इनके जल मार्गों का आवागमन के रूप में प्रयोग होता है। नदियाँ भूमिगत जल का प्रचुर भण्डार होती है, नदियाँ जलोढ़ मिट्टी के कारण भूमि उपजाऊ एवं कृषि योग्य बनाती हैं।

पर्वतीय ढालों में उत्तम वन एवं चारागाह पाये जाते हैं। इनमें खनिज भण्डार होते हैं। ये ढाल वर्षा में सहायक होते हैं तथा नदियों के उद्गम, स्वास्थ्यवर्धक जलवायु, मनोरम प्राकृतिक छटा और पर्यटकों के आकर्षण के केन्द्र होते हैं।

नदियों का जल प्रवाह तन्त्र या अपवाह तन्त्र


जल प्रवाह या अपवाह यह दर्शाता है कि जल का प्रवाह किस ओर है। जिस तरफ पानी बहता है। निश्चित रूप से ढाल को वह इंगित करता है। अतः अपवाह तन्त्र बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसके कारण ही भूतल की संरचना में परिवर्तन अवश्यभावी है। जल प्रवाह तन्त्र सम्बन्धित क्षेत्र के भूतल का ढाल, जल प्रवाह का आकार, संरचना तथा उसकी गति से जाना जा सकता है। भूतल की संरचना के आधार पर हमारे देश का अपवाह तन्त्र दो भागों में विभाजित किया जा सकता है-

1. प्रायद्वीपीय अपवाह तन्त्र या दक्षिणी भारत का अपवाह तन्त्र;
2. प्रायद्वीप अपवाह तन्त्र या उत्तरी भारत का अपवाह तन्त्र।

प्रायद्वीप भारत के भू-भाग के अति प्राचीन होने के कारण इसकी नदियाँ आधार जल को प्राप्त कर बूढ़ी हो चुकी हैं। उनकी लम्बवत् काटने की क्षमता क्षीण हो चुकी है। फलस्वरूप अब वे अपने ही किनारों को काटने लगी हैं। इस जल प्रवाह तन्त्र की घाटियाँ आकार में चौड़ी हैं जिससे बाढ़ आने पर इसका जल चारों ओर दूर-दूर तक बिखर जाता है।

भूगर्भविदों के मतानुसार-‘हिमालय पर्वत के जन्म के समय दक्षिणी पठार को कुछ धक्के लगे, जिसके कारण वह पूरब की ओर झुक गया।’

प्रायद्वीप भारत की नदियाँ


प्रवाह दिशा के अनुसार प्रायद्वीप की नदियों को तीन भागों में विभाजित किया जाता है-

1. पश्चिम की ओर प्रवाहित होने वाली नदियाँ- इन नदियों में नर्मदा, साबरमती तथा ताप्ती हैं।
2. पूर्व की ओर प्रवाहित होने वाली नदियाँ- इन नदियों में दामोदर, स्वर्णरेखा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी तथा बौगाई हैं।
3. उत्तर की ओर प्रवाहित होने वाली नदियाँ- इन नदियों में चम्बल, बेतवा, सोन, केन, धसान और कालीसिंध हैं।

नदी अपदरित अथवा समप्राय मैदान


नदियाँ जब पर्वतों और पठारों से निकलकर बहती हैं तो वे उस भू-क्षेत्र को समतल बनाती हैं। जब तक वे चरम पर न पहुंच जाएँ तब तक नदियाँ क्रियाशील रहती हैं। चरम पर पहुँचने पर समस्त भू-भाग समतल मैदान में परिवर्तित हो जाता है।

चूने से समृद्ध भू-भाग में जल का प्रवाह धरातल पर कम और आंतरिक भाग में अधिक होता है। इन भागों में ज्यों-ज्यों चट्टानों के घुलने की क्रिया बढ़ती जाती हैं, त्यों-त्यों भूमि के ऊपर और नीचे परिवर्तन होता जाता है। इस प्रकार चूने के समस्त क्षेत्र जल प्रवाह के कारण घुलकर समतल मैदान बन जाते हैं।

पठार प्रदेशों में नदियाँ


भौगोलिक संरचना के हिसाब से मध्यप्रदेश को प्रमुख तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। मध्य-उच्च प्रदेश, सतपुड़ा श्रेणी प्रदेश और पूर्वी पठार।

1. मध्य-उच्च प्रदेश


(अ) मध्य भारत के पठार में चम्बल, सिंध, क्वाँरी, पार्वती और कूनू नदियाँ प्रवाहित होती हैं। चम्बल इस प्रदेश की एक महत्वपूर्ण नदी है। इसकी सहायक नदियाँ काली सिंध, सिवान, पार्वती तथा बनास हैं।
(ब) बुन्देलखण्ड प्रदेश में सिंध और उसकी सहायक पहुँज, बेतवा और उसकी सहायक धसान तथा केन नदियाँ हैं
(स) रीवा-पन्ना क्षेत्र में केन एवं टोंस प्रमुख हैं।
(द) मालवा के पठार में अनेक नदियाँ बहती हैं जिनमें पश्चिम से पूर्व में माही, चम्बल, गंभीर, क्षिप्रा, छोटी काली सिंध, पार्वती, सिंध, बारना, तेंदोनी, धसान बेबास और सोनार हैं।
(इ) नर्मदा घाटी में नर्मदा की प्रमुख सहायक नदियाँ हिरन, तिनदोनी, बारना, चन्द्रकेशर, कारन, मान, ऊटी एवं हथिनी दाएँ तट से मिलने वाली नदियाँ हैं। बाएँ तट से मिलने वाली प्रमुख सहायक नदियाँ बरनाट, बंजर, शेर, शक्कर, दूधी, तवा, कुन्दी, देव और गोई आदि हैं।

2. सतपुड़ा श्रेणी प्रदेश


इस श्रेणी की प्रदेश में नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी, प्रवाह तंत्र की नदियाँ प्रवहित होती हैं। जिनमें वैनगंगा, गार, शक्कर, छोटी तवा एवं वर्धा प्रमुख हैं।

3. पूर्वी पठार प्रदेश


इस श्रेणी के प्रदेश के अन्तर्गत बघेलखण्ड प्रदेश आता है। यह प्रदेश मुख्यतः सोन नदी के अपवाह क्षेत्र में आता है। सोन तथा उसकी सहायक नदियों में छोटी महानदी, जोहिला, गोपद, बनास, रिहन्द और कन्हार हैं। सोन नदी इस भू-भाग की सबसे लम्बी नदी है।

बुन्देलखण्ड का प्राचीन नाम दशार्ण है। दशार्ण का एक अर्थ दस नदी वाला प्रदेश भी होता है। ‘दशार्णों देश नदी च दशार्णों’ की चर्चा कात्यायन ने भी की है। महाभारत के विराट पर्व (19) में इसका उल्लेख है जो नकुल की विजय के परिप्रेक्ष्य में है।

शांति रम्याः जनपदा बहन्नाः पारितः कुरुन्,
पांचालश्चेदिमत्स्याश्च शूरसेनाः पटच्चराः,
दशार्ण नवराष्ट्रं च मल्लाः शाल्वा युगंधरा।।

बुन्देलखण्ड की दस नदियाँ इस प्रकार मानी गयी हैं- धसान, पार्वती, सिन्ध, बेतवा, चम्बल, यमुना, नर्मदा, केन, टोंस और जामनेर। दस नदियाँ यथा सिन्धु, पहुँज, बेतवा, धसान मंदाकिनी, सोनार, बेरमा, उर्मिल, केन, एवं किलकिला भी बुन्देलखण्ड क्षेत्र में आती हैं। ऐसी मान्यता है कि इन नदियों के कारण भी बुन्देलखण्ड का नाम दशार्ण पड़ा है। अणवि यानि सागर, अर्ण का मतलब होता है। जल। दस+अर्ण=दशार्ण। इसके अलावा-जमडार, सुकनई, कुँआरी, श्यामरी, काठन, पाटन, सुक्कू, बराना और कूड़न आदि नदियाँ भी हैं।

इस प्रकार पंजाब का (पंज+आब) पाँच नदियों के नाम पर नामकरण हुआ। इसी तरह बुन्देलखण्ड का दशार्ण दस नदियों के नाम पड़ा होगा। तीसरी मान्यता के आधार पर यह नदियाँ यमुना, मंदाकिनी, चंबल, (चर्मण्वती), पहुँच, केन, सिन्ध, कुँआरी, वेत्रवती, धसान (दशार्ण) और तमस (टोंस) हैं। अतः दस नदियों का प्रचीन देश दशार्ण था।

बुन्देलखण्ड का अधिकांश हिस्सा नर्मदा घाटी में विस्तारित है। बुन्देलखण्ड के सरिता परिवार में लगभग 15 नदियाँ आती हैं। इन नदियों में कुछ बुन्देलखण्ड की सीमा बनाती हैं, कुछ इसकी जीवनदायिनी हैं तो कुछ स्थानीय किन्तु महत्वपूर्ण हैं। इनमें कुछ मुख्य नदियाँ हैं तो कुछ इन नदियों की सहायक नदियाँ हैं। इनके नाम हैं- बेतवा, केन, धसान, (दशार्ण), चम्बल (चर्मण्वती), जामनेर (जामनीर या जामिनी), सिन्धु, पहुँज, सुनार, टोंस (टमस या तमसा), नर्मदा, यमुना, पयस्विनी (मंदाकिनी), किलकिला, पार्वती और उर्मिल आदि।

हमारी भारतीय संस्कृति सरिताओं के तटों पर जन्मी, पली और फली-फूली है। बुन्देलखण्ड की नदियाँ हमारे देश में सबसे प्राचीन है। इस प्रदेश की नदियाँ अधिकतर उत्तर दिशा की ओर बहती हैं। क्योंकि बुन्देलखण्ड की भू-संरचना के हिसाब से इसका ढाल उत्तर दिशा की ओर है। प्रदेश की केवल दो बड़ी नदियाँ हैं जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं, ये नर्मदा और ताप्ती।

नदियों की कथाएँ/दन्त कथाएँ


नर्मदा- विन्ध्याचल आख्यान
पयश्विनी- अनुसुइया-त्रिदेव कथा, जयन्त कथा, तुलसीदास-राम दर्शन, बालाजी-औरंगजेब कथा
सिन्ध- सनत कुमार-षटरिपु कथा, सनतकुमार-नारद कथा
यमुना- कालियादह- कृष्ण कथा
किलकिला- महामति प्राणनाथ-किलकिला उद्धार कथा
बेतवा- बेत्रवती-इन्द्र कथा
क्षिप्रा- समुद्र मंथन-देवासुर संग्राम,
जमड़ार- बाणासुर औऱ उसकी बेटी उषा की कथा
पहुँज- दो ब्राह्मण बालकों के स्वप्न की कथा
धसान- दशरथ-श्रवण कुमार मृत्यु प्रसंग।


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