नेगड़िया की संत बूंदें

Submitted by admin on Tue, 02/02/2010 - 11:02
Author
क्रांति चतुर्वेदी
Source
बूँदों की मनुहार ‘पुस्तक’


झाबुआ से कोई 15 किमी दूर बसा ग्राम नेगड़िया.......! क्या-झाबुआ और क्या दाहोद, इस गांव में तो मुम्बई, गोवा, अहमदाबाद, राजकोट, जयपुर, उदयपुर और कोटा तक की पुलिस यहां के बशिंदों को ढूंढ़ने आती है....। रात के अंधेरे में तो क्या दिन के उजाले में भी अजनबी गांव में घुसने की हिम्मत नहीं कर सकता। बाहरी पुलिस पर कई बार तीर-कमान से अटैक....लेकिन कुछ अफसरों व समाज सेवकों की दिलचस्पी से पानी की बूदों के सहारे यहां के तीर-कमान पर निशाना....। गांव में बदलाव की चौकाने वाली बयार...। कई फरार अपराधियों को पानी की इन बूंदों ने आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित किया। अब सन्नाटे के सांय-सांय की बनिस्बत जन सहयोग का गुंजन....।

यह कहानी बड़ी दिलचस्प है। झाबुआ के अपराध जगत की पहचान कभी पानी रोककर बदलाव की कोशिश की पहचान बनेगी, ऐसा शुरूआत में तो संभवतः किसी ने सोचा भी नहीं होगा.....।

......तो आइए चलते हैं नेगड़िया।

झाबुआ के आसपास नागनखेड़ी, कोटड़ा, नवापाड़ा, आमली फलिया, काला पान, मलवान, उमठी, परवर, दूधी, केलकुआ, गवाली औऱ देवराम कुख्यात आपराधिक गांवों की श्रेणी में माने जाते हैं। आसपास के क्षेत्र में कोई बड़ी आपराधिक वारदात होने पर शक की सुई इन्हीं गावों के कतिपय लोगों की ओर जाती हैं। नेगड़िया भी इनमें से एक गांव है. या यूं कहें कि इन गांवों के मुकाबले यह दो कदम आगे भी रहा है। लेकिन पास ही के काकरादरा, खेड़ी व नल्दी में पानी रोकने के प्रयासों से मिली सामाजिक व आर्थिक बदलाव की सफलता ने यहां के लोगों में भी अपने गांव में पानी रोकने की शुरुआत करने की उत्सुकता जगाई। नेगड़िया की कुछ महिलाएं इन स्थानों पर मजदूरी करने जाती थीं। उन्होंने अपने गांव में वहां के बदलाव की चर्चा की। यह सुगबुगाहट नोडल एजेन्सी झाबुआ के जिला ग्रामीण विकास अभिकरण के कार्यालय तक पहुंची। शुरू में तो संशय रहा कि नेगड़िया जैसे आपराधिक गांव में क्या पानी की बूंदें रोकने का अभियान सफल हो सकता है? लेकिन बाद में कुछ आला अफसरों सहित संयुक्त मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री आरके गुप्ता व उनकी टीम ने इसे चुनौती मानकर नेगड़िया को निशाना बनाया।

कार्यक्रम की सफलता के लिए महिलाओं ने मोर्चा संभाला। जलग्रहण समिति की सभी सदस्य महिलाएं ही थीं। इसका कारण यह था कि वाटरशेड के सिलसिले में झाबुआ के सरकारी दफ्तरों में भी आना-जाना पड़ता है। गांव का अधिकांश पुरुष वर्ग चूंकि अपराध जगत से वास्ता रखता है, सो उनकी इस तरह के संपर्क में शुरुआती तौर पर रूचि नहीं हो सकती थी। वे पुलिस और सरकारी कारिंदों को देखकर सीधे भाग जाते थे। महिलाएं बैठक हो या वाटरशेड का प्रशिक्षण, सब स्थानों पर बेखौफ आती-जाती रह सकती हैं। गांव में इस तरह की दस्तक के बाद माहौल बदला। और लूट-पाट करने वाले हांथ पानी की बूंदों को बचाने में लग गये। इसके बाद सकारात्मक तौर पर स्थानीय समाज में और बदलाव आने लगे। इधर पानी रुका, मिट्टी रुकी तो उधर अपराध की गतिविधियों पर भी धीरे-धीरे रोक लगने लगी।

गांव की स्थिति से विस्तृत तौर पर हमें परियोजना सहायक श्री आरके सूर्यवंशी, जनपद सदस्य मंगलसिंह ने अवगत कराया- डाबर फालिया, तलाई फालिया और सरपंच फालिया में तालाब, स्टापडेम और मिट्टी संरक्षण के कार्यों से रूबरू कराया।

श्री सूर्यवंशी कहते हैं – पानी रोकने के कार्यों का प्रतिफल शीघ्र मिलना नितांत जरूरी था। क्योंकि हम जानते थे कि हमारा परोक्ष मकसद यहां की सामाजिक स्थिति में बदलाव लाना भी है। यहां बनाए स्टापडेम से 15 हेक्टेयर क्षेत्रफल की जमीन पर सिंचाई हो रही है। 15 आदिवासी उससे लाभान्वित हो रहे हैं, जो नेगड़िया और गोलनहाड़ा गांव के रहवासी हैं। इसके अलावा एक तालाब भी बनाया है, इससे 12 आदिवासी परिवारों की जमीन सिंचित होगी।

800 की आबादी और डेढ़ सौ घरों वाले इस गांव के लोगों ने अपनी पुरानी आदतें छोड़कर पहाड़ियों पर जंगल भी बचाया। इससे सागौन व पलाश के वृक्षों का पुनरोत्पादन भी संभव हुआ।

गांव के ही रहने वाले और झाबुआ के जनपद सदस्य मंगलसिंह भी इस बदलाव के सूत्रधारों में से एक हैं. वे कहते हैं- ‘नाले रोककर जो तलैया बनाई है, उसके बाद भू-जल स्तर बढ़ने से जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ गई है। मेड़बंदी के कारण भी हमें काफी फायदा हुआ। पहले पानी के बहाव में सारी मिट्टी बहकर चली जाती थी।’ गांव वाले बता रहे थे –पहले गांव की हालत काफी खराब थी। गांवों में ‘समझदारी’ नाम की चीज नहीं थी। लोग पहले ढलू-पलू (लूटमार व चोरी) करते थे। लेकिन अब इस पर रोक लगी है। इसका कारण वाटरशेड के दौरान गांव में पानी रोकने के प्रयास, तालाब व स्टापडेम निर्माण, इससे फसलों की स्थिति सुधरने तथा इन सब के अलावा गांव में पानी के साथ सुकून लौटना है। पहले एक मक्का की फसल ही लेते थे, मेड़बंदी, नमी व सिंचाई के कारण अब लोग चने व रबी की फसल भी ले रहे हैं। ऐसा 60 हेक्टेयर क्षेत्र में हुआ है।

पहले खरीफ की फसल के बाद गांव से पलायन हो जाता था, इसी दरमियान काम के अभाव में ये लोग लूटपाट भी करते थे। सूर्यवंशी और मंगलसिंह बताते हैं- गांव में इस बदलाव के बाद लंबे समय से विभिन्न अपराधों के फरार अपराधी आत्म समर्पण कर चुके हैं। इनकी संख्या 15 के लगभग है। कुछ और इस कोशिश में हैं। जिन लोगों ने समर्पण किया है, उनमें प्रमुख हैं- जोगड़िया, दुबलिया, मेगलिया, खेतिया आदि।

मंगलसिंह कह रहा था- ‘गांव में इन लोगों को समझाइश दी गई कि कब तक घर से बाहर भागोगे। सभी इसी तरह बाहर रहे तो हमारे गांव के विकास की चिन्ता कौन करेगा? कब तक घर की महिलाओं से पुलिस हमारा ठिकाना पूछती रहेगी? और कब तक पुलिस हमारे घरों के केवलू हमारे तलाशी अभियान में फोड़ती रहेगी? इस बात के गले उतरने और गांव की तस्वीर बदलने के बाद अब पुलिस की तलाशी बंद हो गई है।’ मंगलसिंह का कहना है- ईश्वर से प्रार्थना है कि ऐसा सब कुछ चलता रहे। गांव को विकास की सौगात फिलहाल निरन्तर मिलना जरूरी है। इससे अकेले इस गांव का फायदा नहीं है, बल्कि वे लोग भी चैन से रहेंगे, जो इन अपराधों के कारण प्रभावित होते हैं। वैसे जलग्रहण समिति की सक्रियता के बाद तो हम पंचायत को भूलने लगे हैं, क्योंकि जो इसने किया, वह पंचायत भी नहीं कर पाई। मैं इस बात को अपनी जनपद पंचायत की बैठक में अक्सर उठाया करता हूं।

सूर्यवंशी एक सरकारी कारिन्दे हैं और मंगलसिंह जनपद के नेता, लेकिन दोनों ने एक स्वर से यह कहा कि गांव में जो स्टापडेम बने हैं, उसकी लागत केवल पांच लाख रुपये है। यदि सरकारी विभाग या पंचायत इसे बनाती तो यह दस लाख में बनती। वे कहते हैं-इसके पीछे मुख्य कारण जनभागीदारी है। निर्माण कार्यों में 30 फीसदी श्रमदान कर रहे हैं, आदिवासी। इसे 40 फीसदी भी माना जा सकता है, क्योंकि इसमें से पांच फीसदी ग्रामकोष व पांच फीसदी राशि विकास निधि में शामिल हो जाती है। मसलन 50 रूपए की दैनिक मजदूरी में स्थानीय ग्रामीण को 30 रुपए दिए गए। श्री सूर्यवंशी कहते हैं, पूरी निगरानी का कार्य वाटरशेड समिति की करती थी। ये लोग इस भावना से काम करते मानो उनके घर का ही काम हो। इससे गांव और निर्माण के प्रति अपनत्व की भावना और बढ़ी। गांव का बुजुर्ग कसनो कहता है- ‘पानी क्या मिल गया, समझो हमको धन मिल गया।’ जलग्रहण समिति की अध्यक्ष रामाबाई कहती हैं - ‘पानी रोकने के बाद गांव में दो फसलें आने लगीं। हमारी पहल के बाद क्षेत्र की पूरी तस्वीर बदल गई।’

हमारा समाज नेगड़िया में आए बदलाव के संदेश को किस रूप में लेगा? पानी की उन बूंदों को क्या कहेंगे, जिनका निशाना बीज या फल के साथ-साथ इस बार तीर-कमान भी हो गया? क्या इन्हें स्वर्ण, रजत.... कहेंगे या फिर दर्शन, प्रेरक, या समाजसुधारक कहेंगे? और ‘संत’ कहें तो कैसा रहेगा.....?

 

 

 

 

 

बूँदों की मनुहार

 

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

आदाब, गौतम

2

बूँदों का सरताज : भानपुरा

3

फुलजी बा की दूसरी लड़ाई

4

डेढ़ हजार में जिंदा नदी

5

बालोदा लक्खा का जिन्दा समाज

6

दसवीं पास ‘इंजीनियर’

7

हजारों आत्माओं का पुनर्जन्म

8

नेगड़िया की संत बूँदें

9

बूँद-बूँद में नर्मदे हर

10

आधी करोड़पति बूँदें

11

पानी के मन्दिर

12

घर-घर के आगे डॉक्टर

13

बूँदों की अड़जी-पड़जी

14

धन्यवाद, मवड़ी नाला

15

वह यादगार रसीद

16

पुनोबा : एक विश्वविद्यालय

17

बूँदों की रियासत

18

खुश हो गये खेत

18

लक्ष्य पूर्ति की हांडी के चावल

20

बूँदें, नर्मदा घाटी और विस्थापन

21

बूँदों का रुकना, गुल्लक का भरना

22

लिफ्ट से पहले

23

रुक जाओ, रेगिस्तान

24

जीवन दायिनी

25

सुरंगी रुत आई म्हारा देस

26

बूँदों की पूजा

 

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About the author

.पत्रकार और लेखक क्रांति चतुर्वेदी का जल पर लेखन से गहरा नाता है। पानी पर आज कई अध्ययन यात्राएँ कर चुके हैं। जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन पर पाँच पुस्तकें भी लिख चुके हैं। मध्य प्रदेश के सन्दर्भ ग्रन्थ ‘हार्ट ऑफ इण्डिया’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। पानी की पत्रकारिता के लिये भारतीय पत्रकारिता जगत की प्रतिष्ठित के.के.

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