परीक्षणों के प्रकार

Submitted by admin on Wed, 06/23/2010 - 11:40
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वॉटर एड

भौतिक

रसायनिक

जीवाणुविक

तापमान

नाइट्रोजन (अमोनिया, नाइट्रेटस)

कॉलीफार्म जीवाणु

गादलापन

ग्रहित ऑक्सीजन

(इ.कोलाई की उपस्थिति एवं अनुपस्थिति)

स्वाद

कठोरता (कैल्शियम तथा मैग्निशियम)

 

रंग

अम्लीयता

 

गन्ध

पी.एच.

 

ठोस कण/पदार्थ

क्लोराइड

 

 

अवक्षेपित क्लोरीन

 

 

लौह एवं मैगनीज

 

 

सीसा, जिंक, तांबा एवं टीन

 

 

फ्लोराइड

 



भौतिक परीक्षण जैसे-गन्ध, स्वाद तथा रंग, यदि उपस्थित हों तो उन्हें आसानी से ज्ञात किया जा सकता है। रंग को सरलता से देखकर एवं गन्ध को सूंघकर ज्ञात किया जा सकता है।

• कुछ रासायनिक परीक्षण जैसे कठोरता, अम्लीयता लौह तथा मैगनीज स्वास्थ्य की दृष्टि से कम महत्वपूर्ण है।

• इस तथ्य का कोई प्रमाण नहीं है कि कठोर जल अथवा लवणयुक्त जल पीने से पथरी तथा अन्य ब्याधियॉ जन्म लेती हैं। इस प्रकार के जल को पीने से हल्के दस्त हो सकते हैं, लेकिन वे अस्थाई होते हैं।

• नाइट्रोजन युक्त पदार्थ, ग्रहित आक्सीजन, क्लोराइड्स तथा अन्य कार्बनिक पदार्थ अप्रत्यक्ष रूप से जल की गुणवत्ता को प्रभावित करतें हैं तथा स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालते हैं।

• जीवाणुओं की उपस्थिति किसी भी जलजनित बिमारियों की सम्भावनायें व्यक्त करती हैं।

सामान्यतः जल की गुणवत्ता मापन के लिए सभी परीक्षणों की जॉच आवश्यक नहीं होती है। केवल उन्हीं परीक्षणों का मापन किया जाता है जिन परीक्षणों से यथाशीघ्र पेयजल की गुणवत्ता मापी जा सके। फलस्वरूप निम्न परीक्षणों को ही चुना गया है-

(1) रंग (2) गन्ध (3) तापमान (4) स्वाद (5) पी.एच. (6) ठोस पदार्थ (7) अवक्षेपित क्लोरीन (8) फ्लोराइड (9) क्लोराइड्स (10) फिकल कोलीफार्म जीवाणु।

रंग


• यद्यपि रंग का स्वास्थ्य पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है लेकिन अन्य परीक्षणों में रंग को महत्वपूर्ण माना जाता है।

• रंग मुख्यतः कार्बनिक पदार्थ के कारण होता है जो दल-दल स्थानों तथा जंगलों से आने वाले जल में प्रायः देखा जाता है। रंग के आधार पर जल की गुणवत्ता, क्षेत्रीय स्तर पर निर्भर करती है। वे लोग जो रंगहीन जल पीने के आदी होते हैं उन्हें रंगयुक्त जल के उपयोग में आपत्ति हो सकती है।

गंध एवं स्वाद


गंध को सामान्यतः स्वास्थ्य सम्बंधी परिक्षणों में कम महत्वपूर्ण माना जाता है। यद्यपि जल गंधयुक्त हो तो उपभोक्ता की ओर से शिकायत की जा सकती है। गंध एवं स्वादहीन जल कभी-कभी बीमारी का कारण भी बन सकते हैं।

• गंधयुक्त एवं स्वादहीन जल की शिकायतें सामान्यतः क्लोरीन युक्त जल में आती है ऐसी दशा में क्लोरीन (ब्लीचींग पाउडर) की मात्रा को कम कर देते हैं।

• प्राकृतिक जल सामान्यतः गंधमुक्त होता है, लेकिन कभी-कभी घुलनशील लवणों जैसे लोहा तथा सल्फर के कारण जल में गंध आने लगती है। कार्बनिक पदार्थों तथा पौधों (विशेषतः शैवाल इत्यादि द्वारा) जल में आपत्तिजनक गंध आ सकती है, जिसे बिना उपचार के पीने योग्य नहीं माना जाता है।

तापमान


पृष्ठीय जल का तापमान, भूतल जिसमें जल गुजरता है, के तापमान के साथ बदलता रहता है। जबकि भूमिगत जल का तापमान लगभग स्थिर रहता है, जो प्रायः 40-60 फीट की गहराई पर 400F – 520F डिग्री में रहता है।

• यद्यपि पेयजल में तापमान मापन का ज्यादा महत्व नहीं है तथापि उपभोक्ता की ओर से इसे आवश्यक समझा जाता है।

• 70 सेन्टीग्रेड से 110 सेन्टीग्रेड तापमान वाला जल स्वादयुक्त एवं ताजगीदायक होता है।

• तापमान बढ़ने पर पेयजल का स्वाद कम होता जाता है, उच्च तापयुक्त पेयजल में घुलित आक्सीजन की कमी हो जाती है, जिससे जल स्वादहीन हो जाता है। इस पानी को पीने से प्यास भी नहीं बुझती है।

• जल का तापमान मापन, अन्य परिक्षणों के मापन जैसे पी.एच. गैसों की घुलित मात्रा तथा अम्लीयता इत्यादि में सहायक होता है।

• जल का तापमान, यदि आंकड़ों की तुलना करनी हो तो दिन के एक निश्चित समय में ही नोट किया जाये।

पी.एच.


• यद्यपि पी.एच. का भी सीधा प्रभाव स्वास्थ्य पर नहीं पड़ता है। 4 से कम पी.एच. का जल स्वाद खट्टा एवं कडुवा होता है, तथा 8.5 से अधिक पी.एच. का जल क्षारीय स्वाद का होता है।

• भारतीय मानक संस्थान के मानकों के अनुसार पेयजल का पी.एच. 6.5 से 8.5 के मध्य होना चाहिये। इस सीमा से बाहर पी.एच. आमाशय की श्लेष्म झिल्ली तथा जल वितरण तंत्र को प्रभावित करता है।

• पेयजल में उच्च पी.एच., क्लोरीन के जीवाणुनाशक प्रभाव को भी कम कर देता है, तथा एक हानिकारक पदार्थ ट्राईहेलोमिथेन्स को निर्माण करता है।

• 6.5 से निम्न पी.एच., पाइप., लाइनों को क्षति पहुँचाता है, जिससे हानिकारक पदार्थ जैसे जिंक, सीसा, केडमियम, तॉबा आदि निकलते है।

ठोस पदार्थ


जल में छोटे टोस पदार्थ बहकर आ जाते हैं, यद्यपि इनका सीधा प्रभाव स्वास्थ्य पर नहीं पड़ता है लेकिन कुछ आपत्तिजनक कार्बनिक पदार्थों तथा जन्तुओं के अवशिष्ट, इत्यादि का उपस्थिति से स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव हो सकता है।

अवक्षेपित क्लोरीन


जिन स्थानों पर पाईप द्वारा क्लोरिनयुक्त पेयजल आपूर्ति की जाती है उन स्थानों के लिए यह परीक्षण आवश्यक है।

• क्लोरिनीकरण, जल शुद्धिकरण की एक प्रचलित विधि है। इसलिए जल के उपचार के बाद (ब्लीचींग मिलाने के बाद) जल में उपस्थित अवक्षेपित या मुक्त क्लोरीन की मात्रा का परीक्षण किया जाता है।

• जल जिसमें कार्बनिक पदार्थ कम मात्रा में होते है उनमें अवक्षेपित क्लोरीन 0.05-0.10 मिलीग्राम/ली. लगभग 10-15 मिनट तक होनी चाहिए ताकि जल पूर्ण रूप से शुद्ध रह सके।

• जल जिसमें कार्बनिक पदार्थों की अधिकता होती है उसमें अधिक मात्रा 0.10-0.15 या 0.2 मिलीग्राम/ ली. अवक्षेपित क्लोरीन की आवश्यकता होती है।

• क्लोरिनीकरण के कारण उत्पन्न गंध को उबालकर दूर किया जा सकता है।

फ्लोराइड


मानव शरीर में कुछ मात्रा में फ्लोराइड पाया जाता है जो हड्डियों तथा दॉतों के बाहरी आवरण को एपेटाइड्ड लवण के साथ मिलकर सख्त बनाने में सहायक होता है।

• यदि पेयजल में 0.6 मिलीग्राम/ली. के कम फ्लोराइड हो तो दॉतों में लगे एनामेल में आयन (OH) फ्लोराइड आयन (F-) का स्थान लेकर दॉत के अनेक रोगों को जन्म देते हैं।

• पेयजल में 1.0 मिलीग्राम/ली. से अधिक फ्लोराइड की मात्रा दॉतों, हड्डियों के जोड़ों को प्रभावित करती है।

• पेयजल में फ्लोराइड की मात्रा भारतीय मानक संस्थान द्वारा संस्तुत दी गयी मात्रा (1.0 मिलीग्राम/ली.) से अधिक हो तो दॉतों का रोग (फ्लोरोसिस) हो सकता है।

• (दंत फ्लोरोसिस), जिसमें दॉतों पर सफेद भूरे रंग के धब्बे हो जाते है। हड्डियों के जोड़ो पर दर्द होने लगता है, स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।

क्लोराइड


• क्लोराइड भूजल तथा भूमिगत जल में अलग-अलग मात्रा में पाया जाता है, मुख्य रूप से क्लोराइड, सोडियम क्लोराइड के रूप में पाया जाता है।

• घरेलू नालों में क्लोराइड की मात्रा नियमित रूप से पायी जाती है। घरेलू नालों तथा मूत्र में 0.75 से 1.0 प्रतिशत प्रति क्लोराइड की मात्रा होती है। भोजन के साथ ग्रहण किया क्लोराइड कुछ मात्रा में अवशिष्ट पदार्थ (मल-मूत्र) एवं पसीने के साथ बाहर निकल जाता है।

• मानव अवशिष्ट (मल-मूत्र) के साथ एक दिन में लगभग 6 ग्राम क्लोराइड निकलता है।

• जल में घुलनशील होने के कारण क्लोराइड आसानी से भूमि से रिसकर भूमिगत जल में पहुँच जाता है। भूमिगत जल में क्लोराइड की सामान्य से अधिक मात्रा मानव जनित प्रदूषण को दर्शाती है।

• सामान्य मात्रा में क्लोराइड की उपस्थिति स्वच्छ पेयजल का सूचक है। तथापि भूतल में एकत्रित क्लोराइड, प्रदूषण का कारण नहीं हो सकता है। ऐसी स्थिति में हमें अन्य आंकडों एवं सर्वेक्षणों की आवश्यकता होती है।

फिकल कोलीफार्म


• मनुष्यों एवं अन्य समतापी जन्तुओं के पाचन तंत्र (ऑत) में कुछ जीवाणु पाये जाते हैं जो पाचन क्रिया में सहायक होते हैं। ये जीवाणु मल के साथ बाहर निकलते हैं तथा पानी में मिलने पर उसे दूषित कर देते है। यह जीवाणु कोलीफॉर्म जीवाणु के नाम से जाने जाते है।

• कोलीफॉर्म जीवाणुओं की उपस्थिति दूषित जल की पहचान हैं क्योंकि येजीवाणु केवल मल में ही पाये जाते हैं तथा आसानी से सरल परीक्षण द्वारा ज्ञात किये जा सकतें है।

• संक्रामक बीमारियॉ मुख्य रूप से मनुष्य एवं जानवरों के दूषित अवशिष्ट द्वारा फैलती है।

• इस प्रकार खुले स्थानों में मलत्याग से तथा गन्दे नालों के कारण जलजनित बिमारियों के फैलाने की प्रबल सम्भावना होती है।

• इस प्रकार के दूषित जल को पीने से, उसको खाना बनाने के प्रयोग में लाने से, अथवा उस पानी में नहाने से जलजनित बिमारीयॉ फैल सकती हैं।

• जो बीमारियॉ फिकल कोलीफार्म द्वारा संक्रमित होती है उनके उक्त माध्यमों द्वारा फैलने की प्रबल सम्भावनयें होती है।

• टायफायड, हैजा, पेचिस तथा पाचन तंत्र की सामान्य बीमारियॉ, सामान्यतः दूषित जल के उपयोग से ही होती है।

• इसलिए फिकल कोलीफार्म सूचक जीवाणुओं का परीक्षण, पेयजल की गुणवत्ता मापने के लिए एक आवश्यक परीक्षण है।

जहाँ जल का क्लोरीनीकरण सम्भव न हो, वहाँ जल को उबाल कर पीना एक सुविधापूर्ण उपाय है। इन स्थानों पर फिकल कोलीफार्म परीक्षण के अतिरिक्त स्वास्थ्य सभी कारणों पर ध्यान देना अतिआवश्यक हो जाता है। जहाँ तक सम्भव हो सके जल को दूषित होने से बचाना चाहिए। प्रदूषण के सम्भावित स्रोतों को जल स्रोतों से दूर रखने चाहिए तथा अवशिष्ट पदार्थों के सुरक्षित प्रबंधन की ब्यवस्था करनी चाहिए। बरतन जिसमें जल को संग्रह किया जाता है, हमेशा साफ, ढका हुआ होना चाहिए, जिस स्थान पर बरतन रखा हो वह स्था न भी साफ सुथरा होना चाहिए।

इन सभी उपायों के लिए सभी स्थानीय लोगों का सहयोग अति आवश्यक है। सामान्य स्वास्थ्य शिक्षा पर विशेष ध्यान देकर उन्हें मूलभूत जानकारियों से अवगत कराना चाहिए ताकि वे व्यक्तिगत एवं सामुदायिक स्वास्थ्य के उपायों पर ध्यान दे सके।

जीवाणुओं के परक्षण का उद्देश्य फीकल कोरीफार्म जीवाणुओं की उपस्थिति एवं अनुपस्थिति को दर्शाना है। यदि ये जीवाणुओं लगातार पाये जा रहें हों तथा स्वास्थ्य सर्वेक्षण से निश्चित हो गया हो कि प्रदूषण के स्रोत को नहीं हटाया जा सकता है तब जहॉ सम्भव हो सके अन्य स्रोत से जल की आपूर्ति की जानी चाहिए।

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