पानी से जुड़ा है आदमी का धरम-करम

Submitted by admin on Mon, 01/25/2010 - 17:03
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डॉ. श्रीराम परिहार

पानी से जुड़ा आदमी का धरम-करम है। पानी से जुड़ा ईमान है। पानी से जुड़ा मन है। तन है। पानी से जुड़ा संस्कार है। पानी से जुड़ा मान-सम्मान है. जीवन की आभ है। तरलता है। सरसता है। आँखों में ओज है। प्राणों में शक्ति है। उम्मीदों में हरापन है। धूप-छाँह के बीच कहीं प्यास के बुझने की अनसुलगती आस है। पास में पानी है तो बीहड़ों को पार कर जाने की हिम्मत है। जीवन में पानी है तो संघर्षों का परास्त करने का विश्वास है। यह विश्वास, यह आस, यह शक्ति, यह हरापन, यह ओज, यह आभ सब कुछ पानी से मिला है। वह पानी किसी की कृपा से नहीं, बल्कि प्रकृति से मिला है। मुफ्त और पर्याप्त। इसलिए कि यह सृष्टि चलती रहे। सृष्टि में संतुलन बना रहे। पंच तत्व रचित सृष्टि हँसती रहे। बूँद-बूँद से जलाशय भरें, नदियाँ बहें और समुद्र लहरायें। बदरा बरसे और जीवन सरसे। पाप तरसे और पुण्य हरसे। धरती की प्यास गहाराये और आकाश में घटा मंडराये। कोटि-कोटि कण्ठ पुकारें औऱ आकाश से नर्तिन जल बूँदें उनकी आरती उतारें। पत्र-पत्र से आवाज उठे-

ओ। मेरे भैया पानी दो। पानी दो
पानी दो गुड़धानी दो, जलती है धरती पानी दो,
मरती है धरती पानी दो, मेरे भैया पानी, दो।

अंकुर फूटे रेत मां, सोना बरसे खेत मां,
बेल पियासा, भूखी गैया, फुदके न अँगना सोनचिरैया,
फसल बुवैया की उठे मड़ैया, मिट्टी को चूनर धानी दो।
ओ मेरे भैया। ओ मेरे भैया ........(नीरज)


इस मनुहार पर किन्तु सरलता से उतरे पानी से मनुष्य ने आपसदारी जोड़ ली। उसे अपने समाज दर्शन औऱ विकास का आधार बना लिया। इसलिए सारी सभ्यताएँ नदी घाटियों में बसीं, पनपीं। उन सभ्यताओं की खुदाई में भी जलाशय, कुण्ड, कुएँ, बावड़ी, प्याऊ, नहर आदि के अवशेष मिले हैं। इससे पता चलता है कि पानी की समुचित और सुव्यवस्थित वितरण प्रणाली थी तथा पानी, पानी ही था, उद्योग नहीं पानी पाँच तत्वों में से एक था (है), वस्तु नहीं। वह प्राकृतिक उपहार था (है), रुपया पैसा नहीं। वह सहज था, दुष्कर नहीं। वह स्वच्छन्द था, बोतलबन्द नहीं। वह जीवन की प्यास था, त्रास नहीं। वह आम था, खास नहीं। वह बहता हुआ था, स्थिर नहीं। वह अँजुरियों और ओकों में तो समाया, पर कारखानों के तलघरों में नहीं। वह यात्री और राहगीर के साथ छागल और सुराही में विपदा में साथ देने वाले साथी की तरह भरा-भरा रहा, पर पाउच में सड़ा नहीं। वह झारी में, कमण्डल में जल बनकर आस्था और श्रद्धा का केन्द्र बना, पर बोतल में भरकर दुकानो-दुकानों कभी नहीं सजा। इन सभ्यताओं के मनुष्य जानते थे कि प्रकृति के पाँच तत्वों में से किसी एक की भी बिक्री शुरू हो जाएगी, उसी दिन से संस्कृति की भी खरीद-फरोख्त होने लगेगी। इसीलिए उन्होंने पानी को पानी ही रहने दिया। उससे अपने दाग धोए लेकिन पानी के सहज भाव पर कोई दाम नहीं लगाया। पानी का कोई दाम नहीं लगाया।

सन् 1974 में लखनऊ गया। देखा कि वहाँ के व्यस्ततम बाजार में पानी दस पैसे का एक गिलास बिक रहा है। मेरे लिए तो यह सातवें आसमान का एक झूठ भरा आश्चर्य था। फिर 1975 में मुम्बई जाना हुआ। वहाँ देखा-चौपाटी पर पच्चीस पैसे में एक गिलास पानी बिक रहा है और दस मीटर दूर ही अथाह समुद्र भरा है। मुझ गँवई के भीतर तो जैसे उथल-पुथल मच गयी। लोग खाते-पीते, हँसते-गाते रहे, मैं इसी पीड़ा में दूबरा होता रहा कि बताओ- पानी बिक रहा है। उधर राम-कृष्ण की धरती पर पानी बिक रहा है। इधर संत ज्ञानेश्वर और नामदेव की भूमि पर पानी का मोल-तौल किया जा रहा है। मेरा मन किच्ची खा गया। सोचा ऐसी जगह क्या आना, क्या जाना, क्या घूमना जहाँ पानी बिक रहा है। ये लोग मनुज हैं या कुछ और? भाड़ में जाय ऐसा विकास। ऐसी सभ्यता। तुरंत लौट आया। औऱ जब सन् 2000 में नासिक के पास त्र्यंबकेश्वर दर्शन कर गोदावरी के उद्गम पर गया तो पहाड़ी चढ़ाई दोनों किनारों पर पानी के सौदागर बैठे मिले। एक करुणा, नदी के रूप में जल बनकर बह रही है, वहीं एक कठोरता जल संस्कृति को धंधा बनाकर ठौर-ठौर बेच रही है। अब तो पूरे देश में यहाँ-वहाँ सब जगह जल-संस्कृति को पाउचों औऱ बोतलों में बंद करके प्यासे की प्यास की कीमत वसूली जा रही है। भारत भूषण की पंक्तियाँ याद आती हैं-

इस मनुष्य को धन की ये अंधी दौड़ कहाँ ले जाएगी,

शायद सोने की ईंटों में, ज़िंदा ज़िंदा चिनवाएगी।


पिताजी कभी-कभी परिस्थितियों के अनुसार कहते हैं ‘बाजार में फलाँ अनाज इस बार तो ‘पानी के मोल’ बिक गया। किसान की वस्तु की कोई कीमत नहीं और जो कारखानों से बनकर चीजें आती हैं, उनके ऊँचे दाम हैं।’ तात्पर्य यह कि उस वस्तु का कोई मूल्य नहीं मिला, या मिला भी तो नगण्य। लगता है आज यह कहावत भी अपनी अर्थवत्ता खो चुकी है। आज पानी का छोटा-सा पाउच एक-दो रुपये में और कंपनी उत्पाद बोतल बंद पानी सात से दस रुपये में बेचा जा रहा है। आज पानी पिलाकर पुण्य नहीं कमाया जा रहा है। पानी बेचकर पैसा कमाया जा रहा है। यह सीधा-सीधा प्राकृतिक सम्पदा पर डाका डालना है। पानी को बेचना याने मनुष्य के जीवन (प्राणों) का मोल करना है। आदमी! तू कितना नीचे गिर गया है।

हमारे पास पानी के कितने रंग हैं। कितने संदर्भ हैं। कितने संबंध हैं। कितने संवाद हैं। कितने पनघट हैं। कितने घाट हैं। कितनी यात्राएं हैं। कितनी स्मृतियां हैं। कितने अनुष्ठान हैं। कितने पर्व हैं। कितने प्रसंग हैं। कितने उत्सव हैं। कितने अर्घ हैं। कितने आचमन हैं। कितने तीर्थ हैं। कितने विसर्जन हैं। कितने चिंतन हैं। कितने सन्यास हैं। कितने योग हैं। कितने संयोग हैं। कितने राग हैं। कितने कलकल हैं। कितने कलरव हैं। कितने स्नान हैं। कितने दीपदान हैं। कितने फूलों से भरी झबरिया है। कितने मंत्रों से भरी डगरिया है। कितनी धाराएँ हैं। कितनी सहस्त्रधाराएँ हैं। कितनी पद-यात्राएँ हैं। कितनी परिक्रमाएँ हैं। कितनी मानताएँ हैं। कितनी मान्यताएँ हैं। कितनी कथाएँ हैं। कितनी गाथाएँ हैं। कितनी कन्हुक-क्रीड़ाएँ हैं। कितने वांशीरव हैं। कितने मिलनातुर ज्ञेता हैं। कितने प्रतीक्षारत द्वापर हैं। कितने वरुण, जलधार बनकर बहते रहे। कितने इन्द्रधनुष सपनों में रंग भरते हुए आकाश होते रहे।

हमने पानी के प्राचीर नहीं बनाए। पानी को प्राचीरों से निकालकर प्यास के खेत सींचे हैं। हमने घर का छत या आँगन में रस्सी से जलपात्र लटकाकर पंछियों को पानी पिलाने का कर्म किया है। चाहे कोई पथिक हो या अमीर खुसरो, वह जब भी पनघट पर आया है, पानी पीकर तृप्त हुआ है। इससे भी कहीं अधिक मन को तृप्ति मिली है और नयनों की प्यास बुझी है। गागर में से पानी राही के ओक में गिरा साथ ही एक अनकहा संवाद भी तरलायित हुआ और नयनों से नयनों के गोपन संभाषण में खट्टा-मिट्ठा रिश्ता जुड़ गया। उस जलधार के साथ खुसरों की कविता भी फूटी। प्रश्नों के उत्तर मिले और काव्य सरिता भी बही। प्यासे को पानी पिलाकर और राही को घर थोड़ा रोक उससे संवाद करने में सामाजिकता का विस्तार और पुण्य की तलाश की जाती है। जो पानी पीकर जाता है, वह याद रखता था कि उसे भी इसी तरह जल से प्यासे की प्यास बुझानी है। इस तरह एक संस्कार अपनी संस्कृति में विस्तार पाता था। मनुजता मुस्कुराती थी। और रहीम की कलम गा उठती है-

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।

पानी गये न ऊबरै, मोती मानस चून।


सोचता हूँ पानी को प्राचीरों में कैद करके क्या मनुष्य उबर पाएगा? मोती के संदर्भ तो दिवास्वप्न हो गये। चूना कुछ कुछ बचा है। पर मनुष्य बिना पानी के कैसे जिएगा? खरीदा हुआ पानी औऱ खरीदी हुई संस्कृति से जीवन न तो चलता है औऱ न ही सँवरता है। हमने धरती का मोल-भाव किया। हमने आकाश को इन्सेट्स और उल्का पिण्डों से भर दिया। हमने वायुमण्डल को जहरीली गैस से भर दिया। हमने आग को बिजली के रूप में भारी दामों पर बेचना शुरू कर दिया। रोशनी की कीमत वसूली। और अब पानी पर डाका डालना शुरु कर दिया है। मनुष्य! तू कितना सत्यानाशी है कि तूने पंच तत्वों को भी धन से तौलना आरंभ कर दिया है। तू अमित प्रतिभा सम्पन्न है, लेकिन तेरे बौद्धिक अपच और अकूत धनलिप्सा ने तुझे बावरा बना दिया है। सोच। पानी को बेचकर क्या तू अपने जीवन में पानी बचा सकेगा? यह कार्य होगा वर्षा जल के अधिकाधिक संग्रहण औऱ उसके रचित उपयोग से। वो देख! उधर काली घटा घिरने लगी है।
 

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