प्राचीन सभ्यताओं की जल की मिथकीय अवधारणाएं

Submitted by admin on Mon, 01/25/2010 - 13:29
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वसन्त निरगुणे

चीन के मिथक चांग ताओ लिंग को जब यह महसूस हुआ कि दुष्ट प्रेत्मात्माओं के पास कहीं खारा पानी है। उसने उन प्रेतात्माओं से खारे जल के स्रोत का पता पूछा। उन्होंने चांग ताओ लिंग के सामने की ओर एक तालाब की ओर इशारा किया और बताया कि उसमें एक विषैला अजगर दैत्य निवास करता है। चांग ने अजगर को तालाब से निकालने की भरसक कोशिश की, परन्तु पहले प्रयास में वह विफल हो गया। तत्पश्चात् उसने जादू द्वारा सुनहरे पंखो वाले अमर पक्षी की आव्हान करके उसे तालाब के ऊपर वायु में उछाला। अजगर दैत्य यह देखकर डर गया और तालाब क्षणभर में सूख गया। चांग ताओ लिंग ने अजगर की हत्या नहीं की वरन् उसे भूमि में गाड़ दिया। जिस स्थान पर भूमि में तलवार गाड़ी गई थी, उस स्थान पर खारे पानी का एक गहरा कुआँ बन गया। इसी कुएँ में अंगुठी ढूँढ़ने और विवाह करने के बहाने सभी दुष्ट स्त्री आत्माएँ समा गईं, उसे चांग ने ‘कुएँ की आत्माओं’ के नाम से संबोधित किया। आज भी कुएँ-बावड़ी जैसी जल की जगहों में दुष्ट आत्माओं का डेरा रहता है। आगे चलकर पहली बार इसी कुएँ के जल से नमक बनाने का काम चांग ने एक शिकारी को सौंपा था।

जापान में जल के मिथक कुछ अलग तरह से मिलते हैं- ‘प्रारम्भ में यह विश्व एक अनगढ़ तैलीय महासागर था। सृष्टि के उदय के पहले उसमें से एक नरकुल (सरकंडे) जैसा पदार्थ उदय हुआ। यह प्रथम देवता था। उस समय न आकाश का निर्माण हुआ था, न पृथ्वी का। धीरे-धीरे तैलीय महासागर का हल्का तत्व आकाश बनता चला गया और अधिक सघन तथा भारी अंग पृथ्वी बन गया। प्रारम्भ में पृथ्वी कीचड़ का ढेर मात्र थी और उसमें गुरुत्वाकर्षण शक्ति नहीं थी, अतः पृथ्वी आकाश तैलीय समुद्र के बीच शून्य में तैरती रहती है।’ समुद्र तल पर द्वीप की रचना के बाद आईजानागी और आईजानामी इन्द्रधनुष पर से ओनोकोरो द्वीप पर उतर आये।

भूमि का निर्माण हो जाने के बाद आईजानागी और आईजानामी ने पवन, पर्वत, घाटी, वन जलधारा, हरे मैदानों औऱ वृक्षों के देवताओं को जन्म दिया। बेनटेन समुद्र की देवी हैं।

माया सभ्यता संसार की बहुत पुरानी संस्कृतियों में से है। हालांकि वर्तमान में माया संस्कृति कहीं नहीं है, फिर भी मैक्सिको की माया संस्कृति के मिथक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। सूर्य उपासक माया सभ्यता के लोग वर्षा के देवता ‘चाक’ को सर्वाधिक मानते थे। कुएँ के भीतर कुँवारी कन्याओं की बलि चढ़ाते थे। पृथ्वी के उदय की कहानी में वे भी पानी को अत्यधिक महत्व देते थे।

‘सृष्टि के प्रारम्भ में न हवा थी, न आग, चारों ओर शान्ति और खामोशी थी। समूची पृथ्वी पानी की एक विशाल परत से ढँकी हुई थी और उसके ऊपर आकाश फैला था। तीसरा कुछ नहीं था। हरे और नीले पंखों से ढँके हुए देवता पानी की परत के नीचे रहते थे। वे बहुत बुद्धिमान थे। एक बार उन्होंने आपस में मिलकर दो प्रश्नों पर चर्चा की। पहला प्रश्न तो यह था कि पृथ्वी को पानी के तल से कैसे निकाला जाये और दूसरा यह कि चारों ओर व्याप्त अंधकार को किस प्रकार दूर किया जाये?

लम्बी चर्चा के बाद एक दिन देवताओं ने सृष्टि के निर्माण का संकल्प कर लिया। उन्होंने अपने सामने कुछ तात्कालिक लक्ष्य रखे- शून्य को भरना, समुद्र को इस प्रकार बाँधना कि पृथ्वी का उदय और प्रकाश का निर्माण हो सके। देवताओं ने मिलकर पृथ्वी से प्रार्थना की कि वह ऊपर उठकर उनकी आकाँक्षाओं की पूर्ति करे। पृथ्वी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। वह ऊपर उठने लगी और समुद्र पीछे हटने लगा। पृथ्वी पर पर्वत का उदय हुआ और पत्तों की समृद्ध मिट्टी में सुन्दर वन उग आये।’

अफ्रीका के मिथकों में सृष्टि की निर्माता महान देवी ‘मावू’ है। वे सारे विश्व को कुम्हड़े (काशीफल) के भीतर विद्यमान मानते हैं। कुम्हड़े के ऊपर के भाग में स्वर्ग और नीचे के भाग में पृथ्वी है और वे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। माता ने स्वर्ग का राज सोगबो और पृथ्वी का राज सागमाता को बाँट दिया। पर सोगबो ने वर्षा यानी जल को स्वर्ग में ही रोक लिया। तीन वर्ष तक एक बूँद जल न बरसने के कारण पृथ्वी का गला सूख गया। दोनों भाइयों में सुलह करवाने में ‘वूटूटू’ (निलकंठ) पक्षी की बड़ी भूमिका रही, क्योंकि वह पृथ्वी और स्वर्ग दोनों लोक में बिना रोक-टोक के आ-जा सकता था। अन्त में जीवनदायी जल बरसा। पृथ्वी का गला तर हुआ। पानी बहुत तेजी से बरसा। मूसलाधार वर्षा हुई। पृथ्वी पानी से भर गई। फिर भरपूर काले बादल आकाश में छाते औऱ हर साल वर्षा करने लगे।

रोम और यूनान की मिथकथाएँ प्रायः एक ही हैं, लेकिन रोम में देवताओं के नाम बदल गये हैं। दोनों के देवता ओलिम्पस पर्वत पर ही रहते हैं। उनकी सौन्दर्य और प्रेम की देवी एक ही ‘वीनस’ है। मार्स रोम का देवता है- ‘उसने यह देख लिया कि राजा के कर्मचारी उसके बच्चों की पेटी बाढ़ के पानी पर छोड़ गये हैं। अब उसने टाइबर नदी को उसकी मुख्यधारा में लौटने का आदेश दिया। वह बच्चों वाली पेटी को भूमि पर छोड़कर अपनी मुख्यधारा में सिमट गई।’ यूनान और रोम की मिथकथाएँ आपसी युद्ध और शासन की लड़ाई की कहानियाँ अधिक हैं।

संसार की मिथकथाओं को देखने के पश्चात् पता लगता है कि पृथ्वी की उत्पत्ति में जल की भूमिका अहम है। इन मिथकथाओं में जो जल की कल्पनाएँ बुनी गई हैं, वे यथार्थ के बहुत नजदीक लगती हैं, क्योंकि जल ही जीवन है, जल एक यथार्थ है, पृथ्वी पर जब तक जल हैं, कहते हैं तब तक जीवन है। पद्मश्री रामनारायण उपाध्याय ने एक स्थान पर लिखा है- “आदि मानव ने जब आकाश से पानी बरसते देखा, आग को लकड़ी में से पैदा होते और उसी में छिप जाते देखा, तो उसके मन में एक प्रश्न पैदा हुआ –ऐसा क्यों होता है? यह क्यों ही मिथक का जनक रहा है और तब उसने तर्कों के रंगीन जाल से ऐसी मनोरम कल्पनाएँ सँजोयी जो मिथक के नाम से पहचानी गईं। यह निश्चित है कि सबसे पहले अमृत तुल्य जीवन प्रदायक जल की कहानियाँ ही बुनी गई होंगी।
 

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