कोप 13 : बाली में बवाल का हस्र

Submitted by admin on Sun, 07/31/2011 - 10:10
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केसर सिंह

इंडोनेशिया के शहर बाली में पिछले 3-14 दिसम्बर को 'जलवायु परिवर्तन' पर संपन्न सम्मेलन फिर विफलता को प्राप्त हुआ। बाली के सम्मेलन से आश लगाए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से चिंतित लोगों के हाथ फिर खाली रह गये। विकसित देशों के अंधाधुध औद्योगीकरण से दुनिया का एक बड़ हिस्सा संकट में है। प्रदूषण के मुख्य अपराधी देश बाली जैसे सम्मेलनों में आते तो जरूर हैं, पर कह वही जाते हैं-' हम तुम्हारी बात नहीं सुनेगें'। क्या इन सक्षम देशों के रवैये से विकासशील देशों में हताशा नही आएगी, पर्यावरणविद अनुपम मिश्र ठीक ही कहते हैं कि ''मेरा मानना है कि इस ढांचे को उपयोग में लाना सीखना पड़ेगा। ढांचे को समर्थ्यवान बनाना होगा। यह चोरी और सीनाजोरी का दौर है।'' प्राकृतिक आपदाओं से सर्वाधिक त्रस्त शहरों में एक बाली में हुआ 'संयुक्तराष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज' पूरी तरह से धनी देशों के सीनाजोरी का शिकार हो गया।

संयुक्तराष्ट्र का ढांचा खड़ा किया गया था कि दुनिया में युध्द, आपदा, जलवायु परिवर्तन आदि तरह के जो बड़े खतरे हैं, उसका मिल-जुलकर मुकाबला किया जा सके। पर इन सबमें प्राय: यह ढांचा असफल ही रहा है। एक ओर चीज जो निकलती है कि दुनिया अपने शानो-शौकत के आगे जलवायु परिवर्तन जैसी सम्स्याओं को गम्भीरता से नहीं लेती। 2-3 प्रतिशत की दर से बढ़ रही गर्मी से आने वाले तुफान की आहट सुनने के बाद भी - जलवायु परिवर्तन की इस आपदा ने पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादंश की लाखों एकड़ जमीन लील ली है। गंगा जैसी दुनिया भर की हजारों हिमनद की नदियां सूखने की कगार पर हैं।

'संयुक्तराष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज' क्योटो के सबसे प्रमुख मुद्दे पर आगे का 'रोडमैप' बनाने की दिशा में एक महत्व का मोड़ था, पर चूक गये। असफलता का कारण यह झगड़ा था कि जलवायु परिवर्तन में क्या विकासशील देशों की कोई भूमिका नहीं है। अमेरिका का कहना है कि क्योटो प्रोटोकाल के अनुसार जो हम विकसित देशों को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का स्तर 2020 तक 1990 के ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के स्तर तक ले जाना है, उसमें विकासशील देशों की भी भूमिका भी तय की जानी चाहिए। बाली सम्मेलन में अमेरिका ने एक नया मसला उठाया कि इस लक्ष्य को कम करने की जरूरत है, लक्ष्य को कम करके 1990 के ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के स्तर का 40 फीसदी सिर्फ किया जाना चाहिए। अमेरिका काफी हद तक सफल रहा कि नये सिरे से 'रोडमैप' बनाया जाना चाहिए और लक्ष्य का निर्धारण फिर से किया जाना चाहिए।

पर 1990 के ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के स्तर का 40 फीसदी का लक्ष्य भी बहुत दूर की कौड़ी नजर आ रही है। एक अध्ययन के अनुसार '' ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की दर आज जो है उससे तो मात्र 8-10 प्रतिशत ही लक्ष्य 2020 तक हासिल कर पाएंगे। लक्ष्य के हासिल करने के लिए तुरंत विकसित देशों को 90 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करना होगा और विकासशील देशों को 30 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करना होगा। पर दुखद तो यह है कि सबके सब जलवायु परिवर्तन के मसले पर नाटक ज्यादा कर रहे हैं, गम्भीरता कम ही नजर आती है। जैसे कि योरोपियन संघ काफी बढ़-चढ़कर कह रहा था कि विकसित देशों के जिम्मेदारी ज्यादा महत्व की है- पर फाइनल दस्तावेज में 2050 तक 1990 के ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के स्तर का आधा किया जाना चाहिए, यह जोड़ने की बात करने लगा, पर जो आखिरी दस्तावेज बना उसमें से यह बात भी निकाल दी गयी।

अमेरिका चाहता है कि भारत और चीन जैसे देशों को भी 90 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य की परिधि में रखा जाए जो अब तक क्योटो संधि से बाहर रहे हैं। हालांकि अमेरिकी मंशा तो अपने स्वार्थों और औद्योगिक हितों की पूर्ति के लिए ही है। पर आज समय आ गया है कि विकासशील देश भी अपनी ओर भी देखें। 'टाटा' की लखटकिया गाड़ी के लिए क्या हमारी लोलुपता नहीं है। सार्वजनिक परिवहन को दरकिनार करके कारों को बढ़ावा देकर क्या हम ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बदस्तूर बढ़ाने के दोषी नहीं हैं। विष्णुनागर के अनुसार ''चीन ने तो अराजक विकास की तकनीक अपना रखी है। वहां नब्बे फीसद बिजली का उत्पादन कोयले से होता है। इसके अलावा उसने हिमालय क्षेत्र में कई ऐसी खतरनाक योजनाएं चला रखी हैं, जिनसे हिमालय की पारिस्थितिकी को बचाने की कोई नीति दुनिया में दिखाई नहीं देती। चीन अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर स्वीकार कर चुका है कि उसके सामने पर्यावरण की गंभीर समस्याएं हैं, इसके बावजूद वह हिमालय क्षेत्र में पर्यावरण की गंभीर समस्याएं हैं, इसके बावजूद वह हिमालय क्षेत्र में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली योजनाओं को गति देने में पीछे नहीं है।'' तिब्बत में रेलगाड़ी चलाने का काम कितना घातक है, शायद चीन इस पर बात करना भी नहीं चाहेगा। अमेरिका ने अपने स्वार्थ में ही, पर सवाल ठीक ही उठाया है, समय आ गया है कि सबकी जिम्मेदारी तंय हो।

फिलहाल तो हम यही आशा करते हैं कि जो 'रोडमैप' ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन के कम करने के लिए बना है, उसे सभी ईमानदारी से पालन करेंगे। अमेरिका जो ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन के एक चौथाई से ज्यादा समस्या के कारण है, वह कोई किन्तु-परन्तु किए बिना, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के 2020 के लक्ष्य के लिए बना 'रोडमैप' के लक्ष्य के दिशा में आगे बढ़ेगा।
 

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केसर सिंहकेसर सिंहपानी और पर्यावरण से जुड़े जन सरोकार के मुद्दों पर उल्लेखनीय कार्य करने वाले वरिष्ठ पत्रकारों में शुमार केसर सिंह एक चर्चित शख्सियत हैं। इस क्षेत्र में काम करने वाली कई नामचीन संस्थाओं से जुड़े होने के साथ ही ये बहुचर्चित ‘इण्डिया वाटर पोर्टल हिन्दी’ के प्रमुख सम्पादक हैं।

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