बालोदा लक्खा का जिन्दा समाज

Submitted by admin on Fri, 01/29/2010 - 08:20
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Author
क्रांति चतुर्वेदी
Source
बूँदों की मनुहार ‘पुस्तक’


प्रेम की निशानी आगरा के ताजमहल के लिए एक जुमला मशहूर हैः ‘दुनिया में दो तरह के लोग हैं- एक जिन्होंने ताज को देखा है, दूसरे जिन्होंने इसे नहीं देखा है!’

......बूंदों के साथ जिंदा और जज्बाती रिश्ते रखने वाले मध्यप्रदेश के समाज को भी दो हिस्सो में बांटा जा सकता है। एक जिन्होंने उज्जैन जिले के बालोदा लक्खा की जल संरचनाओं और पानी आंदोलन के लिए जिंदा समाज को देखा है...! दूसरा जिन्होंने इसे नहीं देखा है!!

हां, यहां के तालाब, स्टापडेम और मिट्टी के बंधान, बूंदों की दुनिया के ताजमहल से किसी मायने में कम नहीं हैं!!

आखिर ऐसा क्या है बालोदा लक्खा में, जिसके लिए म.प्र. के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी कहते हैं- ‘बूंदों की मनुहार का मेरा सपना तभी पूरा होगा, जब म.प्र. का हर गांव बालोदा लक्खा की तरह पानी रोकने के महाअभियान में पूरी ताकत के साथ जुट जाएगा।’

मध्यप्रदेश में पानी आंदोलन के नारे -‘गांव का पानी गांव में’ का व्यावहारिक अध्याय इस गांव में रचा जा रहा है। यहां के समाज ने बता दिया है कि वह गांव की तस्वीर और तकदीर बदलने की क्षमता रखते हैं। सूखे और अकाल के सामने हताश होकर बैठने की जरूरत नहीं है। समाज को इनके समाने ‘हथियार’ उठाना चाहिए। महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज और स्वावलम्बन के सिद्धांत आपको बालोदा लक्खा के बनाए तालाब, तलैया और स्टापडेम में दिख जाएंगे। गांव चलने से पहले यहां के समाज की कुछ रोचक झलक इन बिंदुओं में खोजिए-

• ये हैं अमरसिंह परमार। पद- कृषि अधिकारी। लेकिन जब आप इन्हें देखेंगे तो पाएगें कि इनके पद का ‘चोला’ तो दूर किसी ऑफिस की कुर्सी पर टंगा होता है। अमरसिंह तो इस गांव की डगर-डगर पर कदम भरते रहते हैं, मानो इसी गांव के रहने वाले हों। यहां पानी की बूंदों को रोकना- किसी जिम्मेदारी भरे पारिवारिक दायित्व को निभाना है। पानी रोकने पर अमरसिंह जब बोलते हैं तो कौन इनकी बात टाल सकता है? पानी के प्रवाह की भांति लोगों को इनकी बात समझ में आई। बालोदा लक्खा के इतिहास में इस अफसर का नाम ताल-तलैयाओं की पालों पर बिना लिखे अमिट रूप से अंकित हो गया।

• किशोरसिंह चौहान.. ! एक प्रगतिशील किसान। बूदों को सहेजने की धुन कुछ यूं चढ़ी कि तालाब के लिए अपनी जमीन दान में दे दी। पूरे गांव को इकट्ठा किया।.... और निकल पड़ते इस संकल्प के साथ कि गांव का पानी गांव में ही रहेगा। कोई बता तो दे कि पानी फलां जगह से बाहर जा सकता है। बालोदा लक्खा में किशोरसिंह चौहान के मायने एक व्यक्ति नहीं एक काफिला है, जो अकाल से दो-दो हाथ कर रहा है। • भाई साहब, कुंवरजी की कहानी आपको भी चकित कर देगी। यह शख्स गांव में इसलिए मशहूर था कि किसी भी धार्मिक कार्यक्रम तक में चंदा नहीं देता था। गांव में तालाब की बात चली। लोग तो सोच रहे थे कि कुंवरजी से क्या उम्मीद करें। लेकिन गांव वाले उस समय सुखद आश्चर्य में डूब गए, जब वे बैठक से उठकर गए और लौटकर उन्होंने तालाब के लिए अपनी तरफ से पांच हजार रुपये दे दिए।

• ओमप्रकाश दुबे ने ‘इंडिया टुडे’ में पढ़ा था ‘अनजाना भारत’ इसमें विभन्न क्षेत्रों के समाज सेवकों की कहानियां थी। दुबे ने ठान लिया कि वह भी कुछ करके दिखाएगा। पानी आंदोलन के लिए सहयोग राशि एकत्रित करने का बीड़ा उसने खुद उठा लिया।....बालोदा का शायद ही कोई ऐसा बचा हो जिसने तालाबों के लिए सहयोग न दिया हो। • जल समिति के अध्यक्ष अर्जुनसिंह राठौर पानी रोकने की बात इस संदेश के साथ शुरू करते हैं-हमें मंदिर-मस्जिद के लिए नहीं बरसात की बूंदों को रोकने के लिए पैसा देना है। तालाब ही हमारे तीर्थ स्थल हैं और बूंदों को रोकना यानी ईश्वर की पूजा करना!

देश और दुनिया में उज्जैन भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षास्थली के रूप में जाना जाता है। भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर मंदिर के कारण यह बड़े तीर्थ स्थल के रूप में ख्यात है। उज्जैन से एक रास्ता जाता है बड़नगर की ओर बड़नगर अनुविभागीय मुख्यालय भी है। बालोदा लक्खा बड़नगर तहसील का ही एक गांव है। आबादी होगी चार हजार के आसपास बड़नगर से रूनिजा मार्ग पर नौ किलोमीटर दूर सुंदराबाद फाटे के भीतर प्रवेश कर हम देश के आधुनिक तीर्थ स्थल बालोदा लक्खा की डगर-डगर, खेत-खेत आपको ले चल रहे हैं.......... !

यह गांव प्रगतिशील किसानों से भरा है। कृषि योग्य कुल 965 हेक्टेयर जमीन के 90 फीसदी हिस्से में सिंचाई होती है। खेती के साथ-साथ पानी की जरूरत महसूस होती गई। ट्यूबवेल खनन का सिलसिला जारी रहा। जैसा कि भारत के आम गांवो में होता है, यहां की मानसिकता भी जल संसाधनों के दोहन की ही रही। इनके संरक्षण की और कभी किसी ने ध्यान नहीं दिया। एक किसान सवाईसिंह झाला ने तो अपने विशाल क्षेत्र में एक के बाद एक 250 ट्यूबवेल खोद लिए। नतीजा भी कुछ ऐसा निकला कि जमीन के भीतर का पानी पूरी तरह सूख गया। लोग चिंता से घिर गए कि गांव के समाज का क्या होगा?

इसी दरमियान गांव का चयन राष्ट्रीय जल ग्रहण विकास कार्यक्रम के लिए हो गया। पानी समिति का अध्यक्ष बनकर अर्जुनसिंह राठौर ने आंदोलन की कमान संभाली। बालोदा का समाज काफिले के साथ हमें अपने द्वारा तैयार जल संरचनाओं को दिखा रहा था। अनेक बार ठहाकों के बीच रोचक किस्से भी सुना रहा था। सबसे पहले हम बांकिया खाल नाले के एक हिस्से के किनारे पहुंचे। गांव वाले इसी के बीच बता रहे थे- इस नाले का नाम बांकिया इसलिए पड़ा क्योंकि यह ‘सीधा’ नहीं है। गांव में जो लोग टेढ़े-मेड़े (चालक) रहते हैं, हम उन्हें ‘बांकिया’ कहते हैं। यह 10 फीट भी सीधा नहीं है। कभी इधर तो कभी उधर लेकिन इसे सीधा करने की ठान ली गई।

कृषि अधिकारी अमरसिंह परमार, किशोरसिंह, अर्जुनसिंह राठौर, भौमसिंह कारा, ओमप्रकाश दुबे, नाहरसिंह चौधरी, सबलसिंह और गांव के अन्य लोगों ने मिलकर ऐसी कार्ययोजना बनाई कि गांव का पानी किसी भी कीमत पर गांव से बाहर नहीं जाने पाए। सबसे पहले इसी बांकिया खाल पर सीमेंट कांक्रीट के दो रोक बांध बनाए गए। इससे बचे पानी को भेरूसिंह माली के ट्यूबवेल के पास बनी एक छोटी तलाई में रोका गया। बांकिया की चाक-चौबंद व्यवस्था कर दी गई। लेकिन, 2000 में औसत से भी आधी वर्षा हुई। यह पहला प्रयोग था। जितना भी पानी इस नाले में आया, पूरी तरह से उसे गांव मे ही रोक लिया गया। पूरे पानी को जमीन में समाने का मौका दिया। यह कार्य जो राष्ट्रीय जलग्रहण कार्यक्रम के तहत किया गया। बांकिया खाल के अंतिम छोर पर स्थित किसान भेरूलाल चुन्नीलाल माली का ट्यूबवेल जो हर साल नवंबर-दिसंबर बाद ही सूख जाया करता था, इस बार सूखे के बावजूद गर्मी में पानी देता रहा है।

पानी रोकने से होने वाले शुरूआती फायदे यद्यपि बहुत कम थे, लेकिन इनकी भी खबरे गांव में आग की तरह फैलती रहीं। इस गांव में सुविचारित जल प्रबंधन के लिए बड़नगर के सिसौदिया परिवार की भूमिका भी सराहनीय रही। भारत के पूर्व वित्त राज्यमंत्री, राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष और देश के वरिष्ठ सहकारी नेता श्री सवाईसिंह सिसौदिया पानी आदोलन पर अपना मार्गदर्शन देते रहे हैं। उनके बेटे पूर्व विधायक सुरेंद्रसिंह सिसौदिया के नेतृत्व में गांव का समाज रालेगांव सिद्दी की जल क्रांति को नजदीक से देखकर आया। इन लोगों ने श्री अण्णा साहेब हजारे के साथ गहन विचार मंथन भी किया। वर्तमान विधायक श्री वीरेंद्रसिंह सिसौदिया भी पानी आंदोलन की रचनाओं के लिए श्रमदान करते रहे है।

किशोर सिंह चौहान कह रहे थे : गांव में जलग्रहण क्षेत्र कार्यक्रम से बनी संरचनाओं के बाद आई जाग्रति को हमने कायम रखा। बाद में जल सहयोग से तालाब बनाने की आंधी चल पड़ी। समाज ने यह फैसला किया- हम गांव के पानी को गांव से बाहर नहीं जाने देंगे। इस कार्य के लिए सरकार का मुंह नहीं ताकेंगे। इसके बाद किसी ने अपना श्रम, किसी ने सहयोग राशि, किसी ने जमीन, किसी ने ट्रेक्टर तो किसी ने जो भी बन पड़ा, उससे सहयोग किया।

गांव में जनसहयोग से एक तालाब बना। उसकी कहानी भी कम रोचक नहीं है। हुआ यूं कि 15 साल पहले सिंचाई विभाग ने एक तालाब बनाने का काम शुरू किया। लेकिन थोड़ी-सी खुदाई कर इसे जो छोड़ कर गए तो बाद में इस तरफ मुंह ही नहीं किया। एक शाम जब गांव का यह ‘पानी काफिला’ तालाब के लिए जमीन खोज रहा था तो किसी ने कहा- यहां तालाब बनाने के लिए वापस सरकार से गुहार की जाए। समाज ने निर्णय लिया कि 15 साल से तो यह जमीन ऐसे ही पड़ी है। अब सरकार से फिर लिखा-पढ़ी में और वक्त चला जाएगा। बेहतर है कि समाज खुद इस तालाब को अपने बलबूते पर तैयार करे।

किशोरसिंह चौहान ने सबसे पहले पांच हजार रुपये देकर इस यज्ञ की शुरूआत की। फिर क्या था.... किसी ने पांच तो किसी ने दस हजार रूपये दिए। देखते ही देखते तीन लाख रुपये इकट्ठे हो गए।

.......हमें गर्व हो रहा है कि समाज की इस ‘रचना’ की पाल पर हम यह किस्सा सुन रहे हैं।....गर्व इस बात का भी है कि सहयोग राशि देने वाले समाज से हम घिरे हुए हैं...!!

अब एक अन्य स्थान पर चलते हैं। मालगावड़ी क्षेत्र से आने वाली बरसात की बूंदों को रोकने के लिए एक तालाब बनाया गया। फिर एक तलैया झगड़ात वाले स्थान पर किशोरसिंह चौहान ने अपनी आधा बीघा जमीन तालाब बनाने के लिए दान में दे दी। सहयोग लतीफ और रमनू ने भी दिया। तालाब से ओवर फ्लो होने वाले पानी को एक तलैया में एकत्रित किया जाएगा। यह भी चौहान ने अपने निजी व्यय से बनाया है। इस पानी से कुएं को रिचार्ज किया जा रहा है। ओमप्रकाश दुबे ने अपनी 25 हजार रूपये की फसल इसलिए छोड़ दी कि अपने कुएं का पानी चौहान के खेत में बन रहे तालाब की पाल के लिए देना था। इसी प्रवाह को आगे नाले पर बोल्डर चेक लगाकर बचे पानी को सवाईसिंह झाला ने अपने कुएं में रिचार्ज हेतु डाल रखा है। इस कुएं की विशेषता है- जितना पानी इसमें डालो, सब जमीन में रिस जाता है।

गांव के एक और प्रगतिशील किसान भौमसिंह कारा के प्रयासों से समाज ने अपने स्तर पर एक और बड़ा तालाब बनाया। गांव में ‘तालाब-लहर’ चली तो भौमसिंह ने क्षेत्र के लोगों को एकत्रित कर स्वयं सबसे पहले तालाब के लिए 25 हजार रुपये देने की घोषणा की। यहां भी 5 से 20-20 हजार रु. तक लोगों ने सहयोग राशि दी। चंद दिनों में तीन लाख रूपये की लागत वाला एक और बड़ा तालाब तैयार हो गया। यह खेड़वदा की ओर से आ रहे नाले को रोक कर बनाया गया। इसी तरह कुंडवाला नाले पर भी एक रोक बांध बनाया गया। गांव वालों ने इसके लिए आम रास्ता भी पलट दिया।

इसी तरह मालगावड़ी की ओर से आ रहे एक और रास्ते पर जालमसिंह कारा, नाहर चौधरी और सबल सिंह ने मिलकर एक छोटा तालाब अपने व्यय से बनाया। इसका बचा हुआ पानी ट्यूबवेल को रिचार्ज करेगा। खरसोद कला रोड पर लगभग 100 बीघा क्षेत्र के पानी को एक किसान घेवरलाल मिश्रीलाल ने 100 फीट दूर अपने कुएं तक पाइप लाइन बिछाकर कुएं को रिचार्ज कर लिया।

बालोदा लक्खा में बरसात की नन्हीं बूंदें भी कभी सोचती तो होंगी, ऐसी मेहमान-नवाजी तो हमारी कहीं नहीं हुई। .....कितने प्यार दुलार से हमारे रुकने की मनुहार की जा रहीं है। कभी गांव से बाहर जाने का मन भी करें तो कैसे जाएं....! नालों से तालाब और तालाब से कुएं और ट्यूबवेल .....अब तो बालोदा की जमीन में ही रिसना है.....!! क्योंकि सभी नालों से इसके बाद भी यदि पानी ओव्हर फ्लो होकर आता है तो सवा दो लाख की लागत से डेढ़ हेक्टेयर के क्षेत्र में जनसहयोग से एक और बड़ा तालाब बनाया है।

बूंदों के साथ जिंदगी के दर्शन का तो चोली-दामन का साथ है। हमारे जीवन में जितने भी संस्कार होते हैं या तो नदी किनारे होते हैं या फिर पानी की मौजूदगी अनिवार्य होती है। फिर चाहे वह ‘आचमन’ में ही क्यों न हो? बालोदा में अंतिम संस्कार स्थल के पास लगे स्थान पर भी जनसहयोग से एक तालाब बनाया गया। गांव के बुजुर्गों ने मुक्तिदाम के पास तालाब बनाने का सुझाव दिया। किशोरसिंह चौहान, अर्जुनसिंह राठौर, साधुसिंह डाबी, रामचंद्र पटवारी, कन्हैयालाल पाटीदार, कन्हैयालाल पांचाल आदि ने मिलकर तालाब निर्माण की एक कमेटी बनाई। विधायक वीरेंद्रसिंह सिसौदिया ने भी माहौल तैयार किया। यह समिति घर-घर गई, जिससे जो बना दिया। इस तालाब की लागत भी दो लाख रुपये आई। यह भी पूरी तरह समाज का ही बनाया हुआ है।

......गांव के रमेश नामक किसान ने बालोदा के इस यज्ञ में अपनी तरह से आहूति दी।.....उसने अपनी निजी तीन बीघा जमीन पर निजी व्यय से ही एक तालाब बना दिया।

जैसा कि आप भी समझ गए होंगे, बालोदा लक्खा में इस सामाजिक जाग्रति के पीछे कृषि विभाग की पहल ही है। लेकिन यह महकमा केवले भाषण ही नहीं देता रहा। जब उसने अपने कहने से समाज को करवट लेते देखा तो यह भी दो कदम आगे बढ़ा। अमरसिंह परमार और उनकी टीम ने इस गांव को एक नायाब तोहफा दिय़ा। इन कर्मचारियों ने अपने वेतन से पैसा बचाया औऱ तालाब बना दिया। इसे नाम दिया गया ‘कर्मचारी तालाब।’

इस छोटे से गांव में राष्ट्रीय जल ग्रहण क्षेत्र कार्यक्रम के तहत 40 तथा समाज की और से 60 जल संरचनाएं तैयार की गईं। इसमें 55 स्थानों पर दोनों को मिलाकर कुंआ औऱ ट्यूबवेल रिचार्ज भी शामिल हैं। किशोरसिंह चौहान कहते हैं- इस छोटे से गांव के लोगों ने लगभग 14 लाख का जनसहयोग इन संरचनाओं के लिए दिया है। कामों को देखते आ रहे सरकारी अफसरों का मानना है कि यदि यह कार्य सरकारी स्तर पर कराया जाता तो 40-50 लाख रुपये की लागत आती। वे कहते हैं- बालोदा में तैयार जल संरचनाओं से गांव का पानी गांव में ही पूरी तरह से रोका गया है। अतः यदि 20 इंच ही पानी गिरता है तो इस गांव के लिए इसकी गणना 40 इंच तक की जानी चाहिए।

कृषि अधिकारी परमार कहते हैं : बालोदा में पानी रोको आंदोलन का इतिहास रचा जा रहा है। सिंचाई की सुविधा का व्यापक फैलाव होगा। फसल उत्पादन बढ़ेगा। लगभग एक हजार किसान लाभान्वित होंगे। गांवों में तीन घुमावदार बड़े नाले हैं। यहां इनकी कुल लम्बाई 18 किलोमीटर है। इनके 115 सब ड्रेन हैं। पानी रोकने का पहला परिणाम तो यह है कि पिछले साल सामान्य वर्षा में ट्यूबवेल और कुएं नवम्बर तक जिंदा रहे। इस साल सामान्य से आधी बरसात होने के बावजूद अधिकांश कुएं और ट्यूबवेल अक्टूबर-नवम्बर तक जिंदा रहे, जबकि शेष तो भीषण गर्मी में भी पानी देते रहे। इन संरचनाओं के निर्माण में समाज का आर्थिक सहयोग ही नहीं बल्कि परम्परागत ज्ञान का भी इस्तेमाल किया गया।

मध्यप्रदेश के तत्कालीन कृषि सचिव श्री परशुराम ने भी एक तरह से बालोदा लक्खा को अपना प्रमाण पत्र दिया। उन्होंने बालाघाट, छिन्दवाड़ा, सिवनी, मण्डला, डिंडोरी जिले के किसानों को बालोदा लक्खा के पानी आंदोलन को दिखाने के लिए कृषि अफसरों को कहा है। अब तक अनेक लोग यहां का मुआयना कर चुके हैं। और जब भी बाहर से किसानों या जल विशेषज्ञों का समूह यहां का जायजा लेने आता है- बालोदा का समाज बड़ी शिद्दत के साथ काफिले के रूप में खेतों के पास बने तालाबों औऱ तलैयाओं को दिखाता है।

बूंदों का सफर भी बड़ा निराला होता है। पहले बूंदें, फिर रेला, फिर छापरा। छापरा यानी खेतों से निकलकर आने वाला पानी। छापरों के बाद नाला, नदी और समुद्र कितना रोमांचक होता है यह सफर, लेकिन सवाल है, क्या नालों और नदी के पानी की धाराओं को यह कहकर बांटा जा सकता है कि फलां धारा फलां के खेत से बहकर आ रही है। नहीं! बूंदों का मिलना तो बस मिलना ही होता है। एक-दूसरे में पूरी तरह आत्मसात् हो जाना। हम आपको यह बताना भूल ही गये थे कि बालोदा लक्खा राजनीतिक रूप से बहुत ही संवेदनशील है। दोनों दलों के कट्टर और सक्रिय समर्थक यहां मौजूद हैं। लेकिन जनाब, पानी आंदोलने में यह सब एक हो गये। बूंदों की खातिर गांव की राजनीति बूंदों के माफिक धाराओं में एक-दूसरे में समा गई।

बालोदा लक्खा के समाज ने उस पुरानी परम्पराओं को जीवित कर दिया जब गांव की सत्ता किसी भोपाल या दिल्ली के सहारे ‘जिंदा’ नहीं रहती थी। उन्हें अपने बलबूते पर अपनी तरह से जिंदा रहना आता था। तालाब, कुएं, बावड़ियां और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण – समाज का पहला दायित्व था। इसके लिए उन्हें किसी इंजीनियर से भी सलाह नहीं लेना पड़ती थी। समाज का यह इतिहास बालोदा लक्खा ने दोहराया है। एक ‘जिंदा समाज’ बनकर।

मौका मिले तो एक बार ही सही बालोदा लक्खा जरूर जाइए। वहां के जिंदा समाज की गर्मजोशी के एहसास को महसूस तो किजिए!

कौन जाने, बूंदों के खातिर वहां से लौटकर हम भी इसी तरह के ‘जिंदा समाज’ में बदल जायें.......!!

 

 

 

 

 

बूँदों की मनुहार

 

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

आदाब, गौतम

2

बूँदों का सरताज : भानपुरा

3

फुलजी बा की दूसरी लड़ाई

4

डेढ़ हजार में जिंदा नदी

5

बालोदा लक्खा का जिन्दा समाज

6

दसवीं पास ‘इंजीनियर’

7

हजारों आत्माओं का पुनर्जन्म

8

नेगड़िया की संत बूँदें

9

बूँद-बूँद में नर्मदे हर

10

आधी करोड़पति बूँदें

11

पानी के मन्दिर

12

घर-घर के आगे डॉक्टर

13

बूँदों की अड़जी-पड़जी

14

धन्यवाद, मवड़ी नाला

15

वह यादगार रसीद

16

पुनोबा : एक विश्वविद्यालय

17

बूँदों की रियासत

18

खुश हो गये खेत

18

लक्ष्य पूर्ति की हांडी के चावल

20

बूँदें, नर्मदा घाटी और विस्थापन

21

बूँदों का रुकना, गुल्लक का भरना

22

लिफ्ट से पहले

23

रुक जाओ, रेगिस्तान

24

जीवन दायिनी

25

सुरंगी रुत आई म्हारा देस

26

बूँदों की पूजा

 

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About the author

.पत्रकार और लेखक क्रांति चतुर्वेदी का जल पर लेखन से गहरा नाता है। पानी पर आज कई अध्ययन यात्राएँ कर चुके हैं। जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन पर पाँच पुस्तकें भी लिख चुके हैं। मध्य प्रदेश के सन्दर्भ ग्रन्थ ‘हार्ट ऑफ इण्डिया’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। पानी की पत्रकारिता के लिये भारतीय पत्रकारिता जगत की प्रतिष्ठित के.के.

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