बीहड़

Submitted by admin on Sat, 02/06/2010 - 17:20
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नवचेतन प्रकाशन
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भूक्षरण और बीहड़


मुरैना से 20 किलोमीटर उत्तर एक गांव है लहार। एक जमाने में वहां की हवा सोंधी मिट्टी की खुशबू से महकती थी, शाम के वक्त आल्हा गूंजा करता था। पर अब पत्थरों के ढेर, जर्जर दीवारें, उखड़े किवाड़ और सूखे कुएं भर रह गए हैं। बढ़ते बीहड़ का एक और शिकार है लहार। मुरैना के सबडिविजनल अधिकारी श्री वीके शर्मा कहते हैं, “इस इलाके में एक नहीं सैकड़ों लहार हैं।” थोड़ी दूर के एक अन्य गांव की ओर इशारा करके वे कहते हैं, “कुछ सालों में वह भी उजड़ने वाला है।”

भूक्षरण के दो प्रकार साफ दिखाई देते हैं- बीहड़ और पहाड़ी दर्रों का क्षरण। इनके कारण देश की लगभग 40 लाख हेक्टेयर जमीन उजड़ चुकी है। इस समस्या का प्रभाव उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान और गुजरात पर ज्यादा पड़ा है जहां चंबल, यमुना, माही, साबरमती और उनकी सहायक नदियों के आसपास लगभग 33 लाख हेक्टेयर जमीन हाथ से जा चुकी है। ये बीहड़ अपने पास की उपजाऊ ऊंची जमीन के कोई 60 लाख हेक्टेयर भाग को भी अपनी चपेट में लेने की तैयारी में हैं।

प्रसिद्ध चंबल घाटी के जिलों में लगभग 10 प्रतिशत गांव पूरी तरह सूने हो चुके हैं। चंबल, उसकी उपनदियों के सिरों पर बीहड़, धीरे-धीरे पर बेरोक-टोक फैलता जा रहा है। वहां के लोग अक्सर कहते हैं कि बारिश से पहले ही धरती ‘बहने’ लगती है। बारिश शुरू होते ही दरार चौड़ी होती जाती है और गांव की ओर फैलती आती है। लोग अप्रभावित इलाकों की ओर भागने लगते हैं और पहले से ही भीड़ भरे उन इलाकों पर भार बढ़ाते हैं। बीहड़ से प्रभावित गांवों को एकदम नहीं छोड़ा जाता है। वहां से लोग धीरे-धीरे ही खिसकते हैं। इस स्थानांतरण का नतीजा यह होता है कि जोत की जमीन के ज्यादा-से-ज्यादा टुकड़े होते जाते हैं, खेती करना मुश्किल होता जाता है और फिर खेती पुसाती नहीं।

निरंतर प्रक्रिया


बीहड़ कैसे बनते हैं? धरती पर वनस्पति की परत जब मजबूत नहीं रह पाती तब बारिश का पानी वहां की मिट्टी को अपने साथ बहा ले जाता है। धरती की ऊपरी सतह बह जाती है, जमीन समतल न होने के कारण, जहां भी जगह मिली वहां पानी तेजी से बहने लगता है। नाली-सी बन जाती है, उसी से दर्रे बनते हैं जो आगे चलकर बड़े-बड़े बीहड़ो में बदल जाते हैं।

बीहड़ उन गहरी घाटियों के कारण बनते हैं जहां के दर्रों में से होकर पानी समानांतर दिशा में गहरे कछार की ओर बहता है और आसपास की ऊंची जमीन से काफी नीचे गहराई में बह रही नदी में जा मिलता है। कछार की मिट्टी के कारण ऊंची जमीन की मिट्टी के भी खिसकने की समस्या खड़ी होती है। नदी अपने कछार में गहरी-गहरी नालियां बना देती हैं। पानी के इस बहाव के कारण नदी के किनारों में जगह-जगह दर्रे बनते हैं फिर वे बीहड़ का रूप धारण कर लेते हैं।

एक बार बीहड़ बन गया तो हर बारिश उसे और ज्यादा गहरा बनाती है, क्योंकि वह मिट्टी को तेजी से बहा ले जाती है। इससे किनारों में और सामने की ओर खोह बनते हैं। भारी बाढ़ के समय पानी उन बीहड़ों में भरता है जिससे किनारे टूटने लगते हैं।

बीहड़ों का निर्माण जमीन पर लोगों का दवाब ज्यादा पड़ने से हुआ होगा। कमजोर जमीन में भी उसके हरे आवरण को हटाकर खेती धीरे-धीरे बढ़ती गई। जुताई और पानी के बहाव पर ठीक ध्यान नहीं दिया, मिट्टी को बहा ले जाने वाले पानी को रोका नहीं गया और सिलसिला सालों तक जारी रहा। बीहड़ वाले इलाके में जो भी कुछ पेड़-पौधे या हरियाली बची थी, वह भी ईंधन और चारा जुटाने वालों की मजबूरी का शिकार बनी।

इन सब कारणों से दूर-दूर तक जमीन उजड़ी। भिंड और मुरैना जिलों में पिछले 30 सालों में बीहड़ के इलाके 36 प्रतिशत बढ़े हैं। 1943 और 1950 के बीच इन दो जिलों में सालाना 800 हेक्टेयर बीहड़ों की वृद्धि हुई थी। 1950 और 1975 के बीच वह मात्रा 5000 हेक्टेयर सालाना हो गई। इसका मुख्य कारण था बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई। इन जिलों में केवल 20.58 प्रतिशत जमीन पर जंगल हैं।

आज के विकास कार्यक्रमों ने समस्या को और बढ़ा दिया है। चंबल विकास प्राधिकरण द्वारा शुरू की गई सिंचाई योजना में ज्यादा से ज्यादा जमीन पर खेती शुरू हुई। कुछ किसानों को जरूर फायदा हुआ है, पर साथ ही उसके दुष्परिणाम भी भुगतने पड़े हैं। इन कार्यक्रमों के कारण नहरों के लिए निर्धारित जमीन पर से जंगल काट दिए गए, इसलिए लकड़ी, ईंधन, चारा आदि की मांग बढ़ी और उनकी पूर्ति के लिए बचे जंगलों पर भार बढ़ा। इससे एक तरफ बीहड़ बढ़े तो दूसरी तरफ उपजाऊ क्षेत्र में पानी ठहरने लगा है।

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