बूंदों का रुकना, गुल्लक का भरना

Submitted by admin on Sun, 02/14/2010 - 15:48
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Author
क्रांति चतुर्वेदी
Source
बूँदों की मनुहार ‘पुस्तक’


झाबुआ जिले पेटलावद के हीरा निमामापाड़ा में कभी घूंघट के पीछे अपनी दुनिया को समेटे केवल मजदूरी और चौका चूल्हा सम्हालने वाली आदिवासी महिलाओं से हमारी मुलाकात हुई। वे आज पूरी तरह बदल गई हैं। और गांव के सामाजिक-आर्थिक विकास की दिशा में चिंतन और प्रयास कर रही हैं। यह स्त्री शक्ति जब एकत्रित हुई तो इन्होंने गांव के कुए गहरे कर दिए। ताकि ज्यादा से ज्यादा पानी यहां गांव का मेहमान बनकर रह सके। महानगरीय संस्कृति के लिए किटी क्लब या महिलाओं के अन्य संगठन के मुकाबले इस शक्ति का कोई ज्यादा महत्व नहीं हो, लेकिन इसी महानगर का समाज विज्ञानी और अर्थशास्त्री यह जानने के बाद चौंक सकता है कि इस महिला स्व सहायता समूह के पास 24 हजार रुपए जमा हैं। इसके अस्तित्व में आने के बाद साहूकार के यहां से कर्ज लाने में 60 फीसदी की कमी आई है। साहूकार महोदय 100 रुपए पर 15 रुपए महिना ब्याज लेते हैं जबकि बचत समूह 100 रुपए पर केवल दो रुपए के ब्याज पर कर्ज देता है। 24 हजार रुपए के अलावा इस समूह के पास बैंक का 40 हजार रुपए भी उपयोग में लाया जा रहा है......।

गांव में देवली बाई की सदारत वाले बचत समूह के सामने हम लोग एक खाट पर बैठे थे। निश्छल खिलखिलाहट व इन आदिवासी महिलाओं का आत्मविश्वास देखते ही बनता था। देवली बाई से चर्चा का सार कुछ यूं है – गांव में हम अड़जी-पड़जी के माध्यम से एक दूसरे की मदद करते हैं। हमारी बैठक प्रति हफ्ते होती है। सभी महिलाएं भी प्रति हफ्ते 10 रुपए जमा करती हैं। हमको जब जरूरत होती है- बीज, खाद, और कपड़े लेकर आते है। इन सब राशि की बकायदा लिखा पढ़ी होती है। पहले सब पैसे खर्च हो जाते थे, अब बचत की प्रवृत्ति विकसित हो रही है। पहले किसी की बीमारी पर अचानक पैसे की जरूरत पड़ने पर हमें साहूकार के सामने हाथ फैलाना पड़ते थे, तब कई बार वे और मनमाना ब्याज वसूलते थे। लेकिन अब हमारे पास ही इतनी राशि रहती है कि छोटी-मोटी मदद समिति ही कर देती है।

मेरी ओर से एक सवाल पूछा गया – आप पानी रोक रहे हैं, बचत कर रहे हैं। गांव में एक नया सत्ता केन्द्र स्थापित हुआ है। इन सबका सामाजिक सुधार पर क्या असर हो रहा है?

देवली बाई तपाक से बोली- सामाजिक सुधार रात भर का चमत्कार नहीं हैं। यह धीरे-धीरे चलने वाली प्रक्रिया है। हमने इसकी शुरुआत कर दी है। ‘संपर्क’ संगठन के सतत प्रयासों के बाद यहां शादी के दौरान लड़के वालों से लड़की पक्ष को दिए जाने वाली राशि (वधु मूल्य) में निरन्तर कमी आ रही है। जबकि अन्य गांवों में महंगाई के साथ-साथ इसकी राशि बढ़ रही है। देवली कह रही थी- मेरे सभी बच्चों की शादी हो चुकी है। लेकिन मेरी पोती की शादी में मै वधु मुल्य नही लूंगी। ऐसा मैंने फैसला कर लिया है।

 

अवधारणा


झाबुआ जिले में पानी रोककर जीवन रोकने के प्रयासों से कई सामूहिक गतिविधियों ने अपने आप को संवारा है। इनमें बयरानी कुलड़ी (यानी महिलाओं की गुल्लक) भी है। इस आदिवासी इलाके में महिलाएं पारंपरिक रूप से अपनी अल्प बचत गुल्लक (जिसे केश बॉक्स कह सकते हैं) में रखती हैं। पानी रुका, धन के आधिक्य, भले ही वह अल्पतम मात्रा में हो, की स्थिति बनी तो वह बयरानी कुलड़ी में प्रवाहित हुआ।

झाबुआ जिले में आदिवासी महिलाओं के बयरानी कुलड़ी का नाम पट्ट लिए बचत व साख समूहों ने कई मान्यताओं को झुठलाया है। अप्रासंगिक करार दिया है। विकासशील देशों के संदर्भ में अर्थशास्त्रियों मे कुछ मान्यताएँ प्रचलित हैं। वे यह कि अनौपचारिक साख सुविधा (यानी बैंकिग व सहकारी साख संगठनों को छोड़कर) शोषक होती है। दूसरा, अभावग्रस्त ग्रामीण बचत नहीं कर सकते। तीसरा, अनोपचारिक कर्ज वितरण में सुरक्षा का पुट नहीं होता बयरानी कुलड़ी जैसे अनौपचारिक उदाहरणों ने इन मान्यताओं को झुठलाया है। इन अनौपचारिक साख संस्थानों द्वारा वितरित कर्ज शोषक नहीं है। कारण लागत कम होना है। ये कुलड़ियां अभावग्रस्त ग्रामीण महिलाओं द्वारा ही गठित हैं। उदाहरणों ने सिद्ध किया है कि इस व्यवस्था में चूककर्ता (डिफाल्टर) की जोखिम अत्यंत ही कम है।

बयरानी कुलड़ी ने कुलड़ी में कुबेर को उकेरा है। यहां कुबेर को पारंपरिक अर्थ यानी धन सम्पन्नता के रूप में संदर्भित नहीं किया जाना चाहिए। कुबेर का अर्थ तो वह सामूहिक बचत से उपजा आत्मविश्वास भी है, जो इस आदिवासी क्षेत्र में इउन अभावग्रस्तों के विकास के संदेश वाहक हैं। जिनमें विकास की गहरी उत्कंठा तो है, किन्तु जरूरी संसाधन नहीं है। सहकारी अर्थव्यवस्था की संदेशवाहक बयरानी कुलड़ी ने साख की उपलब्धता के साथ महिलाओं को घर से बाहर आकर अपने आर्थिक स्वावलंबन का मूलमंत्र सीखने का संदेश दिया है। उनमें नेतृत्व की भावना जागृत की है। वे संगठित व स्वशासित होने लगी हैं। साथ ही उनमें शोषण के खिलाफ एकता की भावना भी घर करती जा रही है।

झाबुआ जिले में जहां पानी रोककर जीवन रोकने के उपाय किए गए हैं, उनमें व अन्य क्षेत्रों में लगभग पाँच हजार से अधिक महिला बचत व साख समूह यानी बयरानी कुलड़ी गठित हैं। बयरानी कुलड़ी कैसे गठित होती है। और कैसे काम करती है, यह तो संबंधित समूह पर निर्भर करता है, किन्तु इनके गठन व संचालन संबंधी मोटी-मोटी जानकारियां इस प्रकार हैं- प्रत्येक समूह में आमतौर पर 15 से अधिक महिला सदस्य नहीं होंती। प्रत्येक महिला सदस्य 10 रुपये सदस्यता शुल्क तथा 10 प्रतिमाह बचत के रूप में समूह में जमा कराती हैं। प्रत्येक सदस्य को बचत पास बुक दी जाती है। इसमें बचत, अमानत राशि, कर्ज की राशि और इसकी एवज में जमा की गई राशि की जानकारी अंकित रहती है। प्रत्येक समूह में एक सचिव तथा एक खजांची होता है। इनकी नियुक्ति समूह द्वारा की जाती है। समूह अपना बचत खाता किसी राष्ट्रीयकृत बैंक, सहकारी बैंक अथवा पोस्ट ऑफिस में खोल सकता है। इस खाते का संचालन चुनी हुई तीन महिला सदस्यों के हस्ताक्षर से होता है। संग्रहित राशि या तो उसी दिन या अगले कार्य दिवस को खाते में जमा होती है। जिन सदस्यों ने लगातार दश महीने तक प्रतिमाह 10 रुपए जमा करवाए हैं, उन्हें ही कर्ज लेने की पात्रता होती है। कर्ज के पुनर्भुगतान की समयावधि समूह द्वारा निर्धारित होती है। पहले लिए कर्ज के चुकारे के बाद दूसरा कर्ज मिलता है। चूककर्ता (डिफाल्टर) के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

बयरानी कुलड़ी के अपने कुछ उद्देश्य भी हैं। इनमें महिलाओं में बचत की आदत विकसित करना, महिलाओं में कुछ सृजन के लिए आत्मविश्वास का विकास तथा उन्हें स्वावलंबी बनाना, समूह को इस योग्य बनाना कि वह जरूरतमंद को कर्ज दे सके, गांव के अन्य समूहों की गतिविधियों में सहभागिता के लिए तैयार करना, साथ ही समूह को ऐसे अन्य वित्तीय संस्थानों से संबंध बनाने के लिए तैयार करना शामिल है।

इस प्रकरण में समूहों की सफलता के लिए कुछ सिद्धांत भी हैं। इनके समय पर बचत, कर्ज वितरण तथा कर्ज राशि का पुनर्भुगतान, प्रत्येक सदस्य के लिए कानून कायदों का चार्ट, संपन्न बैठकों की कार्रवाई की पंजी का रखरखाव साथ ही दिए कर्ज का लेखा, पुनर्भुगतान की जानकारी, जमा राशि की जानकारी एवं समूह की प्रगति पर निगरानी रखने के लिए पृथक से पंजी का रखरखाव भी शामिल है। अलावा इनके स्थानीय सदस्यता, साप्ताहिक बैठक आयोजना, प्रशिक्षण, पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन, अंतर समूह समन्वय व कामकाज की सरल दशाएं भी जरूरी हैं।

बयरानी कुलड़ी प्रणाली ने सामाजिक बैंकिग की अवधारणा को एक नया चोला पहनाया है। दरअसल हमारे देश में वर्ष 1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य अभावग्रस्तों को कर्ज की उपलब्धि सुगम कर, उन्हें उनके सामाजिक-आर्थिक विकास के जरिए राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल करना था। वर्ष 1980 में जब गांव की दहलीज पर ऋण मेले लगे, तब इसे सामाजिक बैंकिंग (सोशल बैंकिंग) की संज्ञा दी गई। गहराई से देखा जाए तो यह कदम सामाजिक बैंकिंग नहीं था। यह तो बैंकिंग प्रणाली में कुछ नया प्रयास था। ये प्रयास शाखा विस्तार, अग्रणी बैंक, पुनर्वित पैकेज एवं साख गारंटी निगम के रूप में सामने आए। यह कोई वैकल्पिक प्रणाली नहीं थी। बैंकिंग प्रणाली में कोई समानान्तर संरचना सामने नहीं आई। फलस्वरूप झाबुआ जैसे आदिवासी जिले में अत्यंत ही सतत प्रक्रिया और थोड़े से संपर्क, संबंधों के जरिए कर्ज देने वाले सूदखोरों की गतिविधि पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। इसी परिप्रेक्ष्य में बयरानी कुलड़ी ने सामाजिक बैंकिंग की अवधारणा को नए स्वरूप में प्रस्तुत किया। इस सामूहिक प्रयास में सभी का विश्वास है, साख है, जो बैंकिंग प्रणाली का मूल है। बयरानी कुलड़ी किसी वित्तीय संस्थान की तरह ही खातों का रखरखाव करती है, दिए कर्ज पर ब्याज लेती है। पूंजीगत आधार को सुदृढ़ बनाने के लिए संलग्नता (लिंकेज) जैसे प्रयास करती है। वसूली के लिए सामाजिक दबाव बनाए रखती है। आज इन कुलड़ियों में 10 करोड़ रुपए से अधिक राशि है, जो यह बताती हैं कि बूंद-बूंद रोक कर घट को कैसे भरा जा सकता है।

बयरानी कुलड़ी का मुंह केवल छोटे-मोटे फसल कर्ज वितरण के लि नहीं खुलता, उपभोक्ता कर्ज वितरण के समय भी इनकी मदद उपलब्ध रहती है। कुलड़ियां, कर्ज वितरण के समय कर्ज लेने वाले की आर्थिक स्थिति पर भी निगाह रखती हैं। वे गलत मांग के लिए कर्ज देने से परहेज रखती हैं। कुलड़ियों में राजनीति नहीं समाई रहती है। इसलिए कर्ज राशि की पुनर्प्राप्ति की लागत कम से कम हो जाती है। बयरानी कुलड़ी के उदाहरणों ने सिद्ध किया है कि क्षमता या योग्यता के बजाय बचत के प्रति ध्यान अधिक महत्व रखता है। बयरानी कुलड़ी का उदय तथा विकास सरकार की बजट नीतियों की वजह से नहीं अपितु आदिवासी महिलाओं में अपनी सामूहिक भावना के कारण हुआ है।

बयरानी कुलड़ी का विकास भी कुछ विशिष्ट तथ्यों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। देश में तीन दशकों में शहरी क्षेत्र में घरेलू बचत में बचत दर 48 प्रतिशत से बढ़कर 58 प्रतिशत पर आ गई है। किन्तु ग्रामीण इलाकों में इस बचत में गिरावट दर्ज हुई, जबकि बयरानी कुलड़ी ने विकास पथ पर कदम बढ़ाए। ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकांश अभावग्रस्त गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करते हैं। अतः वे बचत करने में समर्थ नहीं होंगे। इस कारण ग्रामीण इलाकों में बचत के जोरदार संस्थागत प्रयासों के दर्शन नहीं होते। किन्तु इस प्रचलित अवधारणा का जवाब 10 करोड़ रुपए से अधिक राशि इकट्ठी करके बयरानी कुलड़ी ने दिया है। बयरानी कुलड़ी के परिप्रेक्ष्य में हमारी औपचारिक बैंकिंग प्रणाली को भी परखना उचित होगा। औपचारिक बैंकिंग में कर्ज की वसूली तथा मुद्रा की विनिमय लागत (एक्सचेंज कॉस्ट) महत्वपूर्ण है। उऩ्हें किसी एक झटके से हटाया भी नहीं जा सकता, क्योंकि ये तो हमारी वास्तविकताएं हैं। इन परिस्थितियों में बयरानी कुलड़ी ने बचत, कर्ज वितरण, उपयोग पर निगरानी और वसूली के प्रति जो सजगता रखी है, उससे औपचारिक बैंकिंग क्षेत्र के समक्ष प्रयोग के नए उदाहरण सामने आए हैं। बयरानी कुलड़ी की सफलता को देखकर कभी-कभी ऐसा आभास होता है कि बहुत शीघ्र ही हमारा औपचारिक बैंकिंग क्षेत्र कर्ज संबंधी अपनी सामूहिक चिंता इन समूहों के हवाले कर देगा। जिस हिसाब से संसार ने विस्तार की सिकु़ड़न दर्ज कराई है, उस नजरिए से औपचारिक तथा अनौपचारिक बैंकिंग क्षेत्र में लंबे समय तक अंतर नहीं रखा जा सकता। साथ ही इनकी पृथक पहचान भी बना कर रखी नहीं जा सकती। यदि कुलड़ियों पर इसी तरह विश्वास कायम रहा और ये विश्वास को सहेजने में सफल होती रहीं तो एक दिन कुलड़ी किसी स्ट्रांग रूम में विकसित होगी। किसी ऐसी प्रणाली के रूप में स्थापित होगी, जो ग्रामीण इलाकों में लघुतम और लघु उद्योग क्षेत्र को कर्ज देगी।

बयरानी कुलड़ी को अन्य नजरिए से भी देखा जाना चाहिए। यह एक ऐसा आन्दोलन है, जो पर्यावरण का विध्वंस करने वालों की मुखालिफत करता है। इसमें अर्थ व्यवस्था और परिस्थिति की एक साथ गुत्थम-गुत्था है। यह पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त करने की चेष्टा नहीं, बल्कि महिला औऱ पुरुष दोनो की शोषकों के खिलाफ सामूहिक लड़ाई हैं। भारत में आम तौर पर ग्रामीण महिलाओं को कर्ज की उपलब्धि आसान नहीं है। इसका कारण जमीन की मिल्कियत पुरुषों के नाम होती है। इसी आधार पर वे कृषि साख सहकारी संस्थाओं की सदस्य भी नहीं बन पातीं। बयरानी कुलड़ी ने इस विसंगति का जवाब दिया है। साथ ही महिलाओं की कर्ज पुनर्भुगतान क्षमता को रेखांकित किया है। यह बताया है कि अभावग्रस्त महिला किसी संपन्न काश्तकार की तुलना में कर्ज अदायगी के प्रति अधिक संवेदनशील होती है।

 

सख्त वसूली अधिकारी का किरदार


काचरोटिया, तहसील पेटलावद....! कभी किसी जमाने में हर वक्त हाथ भर का घूंघट काढ़ने वाली महिलाएं किसी बैंक के सख्त वसूली अधिकारी का किरदार भी बखूबी निबाह रही हैं। कहीं 30 रुपए तो कहीं 100-100 रुपए महीना एकत्रित करने वाली महिलाओं का बचत समूह अत्यंत ही कम दर की ब्याज से गांव के सदस्य लोगों को जरूरत के मुताबिक इसी राशि में से लोन देता रहता है। लेकिन ऋण चुकाने में किसी की नीयत में खोट आ जाने पर यह उससे अपने हिसाब से वसूली भी कर लेता है। काचरोटिया बचत समूह से एक व्यक्ति ने 5 हजार रुपए ऋण खाते लिए। ‘सम्पर्क’ श्री हरिशंकर पंवार कहते हैं- उक्त व्यक्ति की स्थिति डांवाडोल हो गई एक साल तk वह उधार नहीं चुका पाया। बाद में महिला सदस्यों को पता चला कि उसके पास पैसा तो आ गया है, लेकिन उसकी नीयत में खोट हो गई है। एक-दो बार तकादा करने पर उसने कोई तवज्जों नहीं दी. एक दिन ये आदिवासी महिलाएं उसके घर गईं। कुछ ही देर में काचरोटिया का महिला बचत समूह इस व्यक्ति के टापरे पर सक्रिय था। वहां लगाए अंग्रेजी कवेलू इन्होंने बीने और उसे एक सदस्य के घर लाकर रख दिया। पूरे गांव में यह खबर आग की तरह फैल गई की बचत समूह ने पैसा वापस न करने पर इतना सख्त कदम उठा लिया। इस घटना के तीसरे दिन इस व्यक्ति ने ऋण लौटा दिया। पंवार कहते हैं- इस घटना ने आसपास के गांवों में भी यह संदेश दिया कि पानी की बूंदों को रोकने के लिए एकत्रित हुआ समाज, गांव में शक्ति का केंद्र बनता जा रहा है।

 

बूँदों की मनुहार

 

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

आदाब, गौतम

2

बूँदों का सरताज : भानपुरा

3

फुलजी बा की दूसरी लड़ाई

4

डेढ़ हजार में जिंदा नदी

5

बालोदा लक्खा का जिन्दा समाज

6

दसवीं पास ‘इंजीनियर’

7

हजारों आत्माओं का पुनर्जन्म

8

नेगड़िया की संत बूँदें

9

बूँद-बूँद में नर्मदे हर

10

आधी करोड़पति बूँदें

11

पानी के मन्दिर

12

घर-घर के आगे डॉक्टर

13

बूँदों की अड़जी-पड़जी

14

धन्यवाद, मवड़ी नाला

15

वह यादगार रसीद

16

पुनोबा : एक विश्वविद्यालय

17

बूँदों की रियासत

18

खुश हो गये खेत

18

लक्ष्य पूर्ति की हांडी के चावल

20

बूँदें, नर्मदा घाटी और विस्थापन

21

बूँदों का रुकना, गुल्लक का भरना

22

लिफ्ट से पहले

23

रुक जाओ, रेगिस्तान

24

जीवन दायिनी

25

सुरंगी रुत आई म्हारा देस

26

बूँदों की पूजा

 

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About the author

.पत्रकार और लेखक क्रांति चतुर्वेदी का जल पर लेखन से गहरा नाता है। पानी पर आज कई अध्ययन यात्राएँ कर चुके हैं। जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन पर पाँच पुस्तकें भी लिख चुके हैं। मध्य प्रदेश के सन्दर्भ ग्रन्थ ‘हार्ट ऑफ इण्डिया’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। पानी की पत्रकारिता के लिये भारतीय पत्रकारिता जगत की प्रतिष्ठित के.के.

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