भोजन के समय पानी पीने के गुण

Submitted by Hindi on Sat, 01/09/2010 - 10:38
Author
डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित

भुक्तस्यादौ जलं पीतमग्नि (ति?) सारं कृशाङ्गताम्।अन्त्ये करोति स्थूलत्वं ऊर्ध्वममाशात्कफम्।।मध्ये मध्यगतं सात्म्याद्धातूनां जनकं सुखम्।।अत्यम्बुपादनापिच्यतेSन्नं अनम्बुपानाच्च स एव दोषः।तस्मान्नरो वह्निविवर्धनाय मुहुर्मुहुवीरि पिबेदभूरि।।तृष्णातो न तु भुञ्जीत क्षुधार्तो न पिबेज्जलम्।तृष्णार्तो जायते गुल्मी क्षुधार्तश्च भगन्धरी।।
भोजन के पहले पानी पीने से आँखों पर कालापन या अतिसार (दस्त) होता है और दुबलापन आता है। भोजन के अन्त में पानी पीने से मोटापा बढ़ता है, कफ होता है। बीच में जलपान से धातु-निर्माण होता है और सुख मिलता है।


अधिक पानी पीने से अन्न पचता नहीं है। पानी न पीने से भी वही दोष होता है। इसलिए मनुष्य को (जठर) अग्नि बढ़ाने के लिए बार-बार थोड़ा-थोड़ा पानी पीना चाहिए। प्यास लगे तो खाओ मत, भूख लगे तो जल मत पियो। प्यास से परेशान रहने वाले को तिल्ली हो जाती है और भूखा रहने वाले को भगन्दर (पाइल्स) हो जाते हैं।

 

रात में पानी पीने का गुण

पिबेद् घटसहस्त्राणि यावदस्तंगते रवौ।अस्तंगते दिवानाथे एक बिन्दुर्घटोपमः।।निश्यभोजनवेलायां स्वल्पमप्युदकं विषम्।गण्डूषमाचरेद्रात्रौ तृष्णावान् शीतलैर्जलैः।।रात्रौ व्यवायश्रान्तानां सम्भोगव्यवसायिनाम्।तन्तु सन्तर्पणं सद्यः धात्विन्द्रिय बलप्रदम्।।कदाचि दुष्णतोयेन शीताम्बु न निवार्यते।तृप्तितस्तु विदग्धेSन्ने यः पिबेद् वारि शीतलम्।।विदाहं प्रशमं याति शेषमन्नं च जीर्यति।अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम्।।अमृतं भोजने वारि भुक्तस्योपरि तद्विषम्।।
साँझ होने तक चाहे तो हजार घड़े पानी पी लें। परन्तु सूर्यास्त के बाद एक बूँद पानी भी एक घड़े के समान होता है। रात्रि-भोजन के समय थोड़ा पानी भी विष है। रात में प्यास लगे तो ठण्डे पानी से कुल्ले कर लेने चाहिए। रात में मैथुन से थके या सम्भोगलीन लोगों को पानी तत्काल तृप्ति देता है। वह धातु तथा इन्द्रिय को बल प्रदान करता है। कभी गर्म पानी से शीतल जल का निवारण न करें। अन्न पच जाने पर तृप्ति तक शीतल जल पियें।


पानी से जलन शान्त हो जाती है। शेष अन्न पच जाता है। अजीर्ण होने पर पानी दवाई है और पच जाने पर पानी बल प्रदान करता है। पानी भोजन में अमृत है। परन्तु भोजन के बाद वह विष है।

 

जल पकने का समय

आमं जलं जीर्यति याममात्रं तदर्धमात्रं शृतशीतवारि।तदर्धमात्रं शिशिरेताराम्बु त्रिधेति चोक्तो जलजीर्णकालः।।
जल पचने के काल तीन प्रकार के बताये गये हैं- कच्चा पानी एक प्रहर (तीन घंटे) में पचता है, गरम से ठंडा किया पानी आधे प्रहर (डेढ़ घंटे) में और गरम पानी उसके भी आधे समय (पौन घंटे) में पच जाता है।

 

जल-निषेध

न पिबेत्पङ्कशैवालतृणपर्णाविला स्मृतम्।सूर्येन्दुवदनादृष्टं अभिवृष्यं घनं गुरु।।फेनिलं जन्तुमतप्तं अभिवृष्यं घनं गुरु।।अनार्तवं च यद्दिव्यं आर्तवं प्रथमं च यत्।।लू (?) तादिजन्तुविण्मूत्रविषसंश्लेषदूषितम्।तत्कुर्यात् स्नानपानाभ्यां तृष्णाध्मानोदरज्वरान्।।खासाग्निसादाभिष्यन्दि कण्डु गण्डादिकान्वितान्।तद्वर्जयेदभावे वा तोयस्यान्यस्य शस्यते।।
कीचड़, काई, घास, पत्ते वाला पानी न पिएँ। जिसने सूर्य और चंद्र का मुख भी नहीं देखा या जिसे धूप-चाँदनी न लगी हो और जो बादल का ताजा पानी हो-ये पानी भारी होते हैं। फेन वाला, जन्तु वाला हो और बिना तपाया हो या शीतलता से दाँत से पकड़ा जाता हो (बर्फ रुप हो) अथवा शीतलता से दाँत शून्य हो जाएँ, और बिना (वर्षा) ऋतु की बरसात का अथवा (वर्षा) ऋतु का पहली वर्षा का पानी हो। मकड़ी आदि प्राणियों की मूत्रादि गंदगी, विष आदि की मिलावट से दूषित जल से स्नान या उसे पीने से प्यास बढ़ना, जलोदर या उदरज्वर होता है। खुजली की अग्नि का अतिरेक, खुजली वाले फोड़े हो जाते हैं। अतः ऐसे पानी का निषेध है। पर पानी के अभाव में अन्य पानी प्रशंसनीय है।

 

निषिद्ध जल की शुद्धि का क्रम

घनवस्त्रपरिस्त्रावे क्षुद्रजन्त्वभिरक्षणम्।व्यापन्नापस्सुतपनाग्न्यकीयः प्रपिण्डकैः।।पर्णमूल विसंग्रन्थि मुक्ताकनकशैवलेः।वस्त्रगोमेधिकाभ्यां वा कारयेत्तत्प्रशोधनम्।।पाटली करवीरादि कुसुमैर्गन्धनाशम्।।
गाढ़े कपड़े से छानने से छोटे प्राणियों से रक्षा हो जाती है। बेकार पानी को आग के ढेर पर अच्छा तपा लें। पत्ते का मूल (बींठ), विस (कमल तन्तु) की गाँठ, मोती, स्वर्ण, काई या सुनहली काई, वस्त्र, गोमेद आदि से जल की शुद्धि करनी चाहिए। पाटली (गुलाब), करवीर या करीर के फूलों से उसकी दुर्गन्ध नष्ट हो जाती है।

 

निषिद्ध जल

पानीयं न तु पानीयं पानीयेSन्यप्रवेशने।अजीर्णे क्वथितं यामे पक्वे जीर्णेपि नेष्यति।।शीते विधिरयं तप्तं अजीर्णे शिशिरं त्यजेत्।उष्णं शीतं च सलिलं विरुद्धं मिश्रितं द्वयम्।।तावकं चापि कौपं च न द्वयं मिश्रितं पिबेत्।केवलं सौषधं पक्वमामुष्णं हितं च तत्। समीक्ष्य मात्रया युक्तं पीतं विषपदं यथा।।
ग्रन्थान्तरे-
शैवालादिभिरावृतं गुरुघनं डिण्डीरपित्तोत्कटंदन्तग्राह्यत शैत्यतः क्रिमिकुलं रत्यविलं पंकिलम्।चन्द्रादित्य समीरणैर्विरहितं वर्णिस्मृते (रं) डंकितंनिष्कारं कलुषं जलं परिहरेत् पानाय संमर्दनम्।।अन्यर्तुप्रभवं सुरेन्द्रसलिलं यत्प्राक् पभूतं ऋतौतं लूतादिसमस्तजन्तु निवहैराश्मैश्चितं दूषितम्।रेतोमूत्रपुरीषमात्रमिससा निष्कूतनैर्निष्ठुरंशत्रूणां भवनान्तरस्थमथवा तृष्णातुरोपि त्यजेत्।।घर्मान्ते चातिवर्षासु सवेदजान्युद्भिदानि च। मूषकास्सर्पमण्डूकाः ये चान्ये विषसंस्थिताः।।मात्रास्ते च विमुञ्चन्ति सलिले विषमं विषम्।वर्षासु सेका वसुधा तोये वोषं विशुञ्चति ।।तस्मात्तत्सविषं तोयं अपेयं वार्षिकं स्मृतम्।स्नाने पाने च पाके च वर्जयेज्जलमीदृशम्।।अविस्तृतमसंक्षिप्तं तोयादिद्रव्यवर्जितम्।असंसृष्टमसंदिग्धं रसवीर्यविपाकततः।।जलमेकविधं सर्वं पतत्यैन्द्रं नभस्तलात्।भूमौ तत्पतितं चैव देशकालावपेक्षते।।
पानी में अन्य (तत्व) का प्रवेश हो तो पानी, वरना पानी नहीं। अजीर्ण होने पर खूब उबला पानी प्रहर (तीन घंटे) तक पकने पर भी जीर्ण नहीं होता। शीत में यह तरीका है कि तपा पानी लें। अजीकरण में ठंडा पानी त्याग दें। गरम और ठंडा दोनों मिलाने पर पानी विरोधी हो जाता है। तावक या (गुहादि में) प्रच्छन्न या छिपा और कुँए का पानी इन दोनों को मिलाकर न पिएँ। केवल औषधि सहित पका-कच्चा (थोड़ा) गरम हितकारी होता है। मात्रा अनुसार देखभाल कर मिलाकर पिया पानी भी विष स्तर का हो जाता है।

अन्य ग्रन्थ में-
काई आदि से ढँका, भारी, सघन (गाढ़ा) होता है। झाग पित्त अधिक कर देता है। शीतलता से दाँत पकड़ने वाला होता है। किचड़ वाला अत्यन्त दूषित कीड़ों से भरा जो हो। चन्द्र, सूर्य या वायु से रहित, दागदार, बिगड़ा जल पीने में न लें। अन्य ऋतु में बरसा पानी, जो ऋतु में पहले ही आ गया हो। उसे मकड़ी इत्यादि सभी जीवजन्तुओं के समूह और पत्थरों से दूषित, मल-मूत्र, आदि से प्रदूषित, शत्रुओं के भवन में न पियें, चाहे कितनी ही प्यास लगी हो। गर्मी के बाद, अति वर्षा में, स्वेदज कीड़े-मकोड़े और उद्भिज (वनस्पतियों) चहे ,सर्प, मेंढक और अन्य विषैले जन्तु पानी में विकट विष छोड़ते रहते हैं। वर्षा में गरम धरती पानी में भाप छोड़ती है। उससे वह पानी विषैला हो जाता है। अतः बरसात का पानी पीने योग्य नहीं होता। ऐसा जल स्नान, पान और पकाने में न ले। निस्संदेह अमिश्रित भी ऐसा पानी रस की शक्ति के पक जाने से- यह एक प्रकार का आकाश से बरसकर भूमि पर गिरा पानी देश और काल के अनुसार अनुपयोगी होता है।

अधिक मिलावटी जल का गुणअतियोगेन सलिलं तृष्यतोपि प्रयोजितम्।प्रयाति श्लेष्मपित्तत्वं ज्वरितस्य विशेषतः।वर्धयत्यामृतण्णिद्रा तन्द्राध्मानाङ्गगौरवम्।खासाग्निसादहृल्लास प्रसेकश्वासपीनसाः।।स्वादुपाके हिमं विन्द्यात् तदुष्णमतियोजितम्।तस्मादयोगपानेन लाघवान्न नियोजयेत्।।
अधिक मिलावटी पानी का उपयोग प्यासा भी करे तो उसे कफ और पित्त हो जाता है, विशेषकर ज्वर वाले को । ऐसा पानी अधूरी प्यास व नींद को बढ़ाता है, उनींदापन, सूजन (या जलोदर), अंगों में भारीपन लाता है। खुजली, अग्नि, थकावट बढ़ाता है। उल्लास, स्नान (या सेकना), श्वास, जुकाम बढ़ाता है। पकने पर स्वादिष्ट जब वह ठंडा हो जाए। यदि वह अत्यंत मिलावटी बनाकर गरम किया जाए। इसलिए अभिमिश्रित (जल के) पान से हल्केपन से नियोजित न करें।

 

भोजन के बाद हाथ से मसलकर आँखों पर पानी छिटकने के गुण

भुक्ते तु मथितं सम्यक् कराभ्यां सुविशेषतः।तत्तोयं नेत्रयोः क्षिप्तं नेत्ररोगं जयेन्नरः।।
भोजन के बाद हाथ से मसलकर पानी को नेत्रों पर छिटकने से आँखों का रोग पराजित हो जाता है।

 

खेजड़े के पानी के गुण

खदिरजलशृताम्भः सेवितः सर्वदोष-क्रिमिजठररुजाहृत्कुष्ठ गुल्मोदरघ्नम्।हरति दशनजातान् वक्त्रजान् रोगजालान्अरुचिमनलमान्द्यं हृद्यमेदो गदांश्च।।
खदिर (खेजडे का पानी) उबालकर सेवन करने से समस्त दोष नष्ट हो जाते हैं। चाहे वे कीड़े हों, पेट का रोग हो,कोढ़ हो या पेट में तिल्ली हो। मुख के और दाँत के सब रोग दूर करता है। अरुचि, अग्नि की मन्दता, हृदय का मोटापा (या चर्बी) के समस्त रोग दूर करता है।

 

सूर्यकिरण से तपे जल का गुण

आदित्यकिरणैस्तप्तं जीवनं श्लेष्मवातनुत्।अकण्ड्यं पित्तलं भेदि शुक्लजित् पाण्डुरोगजित्।।
धूप में तपा पानी कफ और वात दूर करता है। खुजली नहीं करता, पित्त को तोड़ता है, पाण्डु (पीलिया) दूर करता है और शुक्ल (आँखों के सफेद भाग का रोग) दूर करता है।

 

अन्य मत में जल की प्रशंसा

श्रियं त्रिलोके तिलकायमानमात्यन्तिकं ज्ञातसमस्तत्त्वम्।उपागतं संमतगुज्जवलोक्ति वन्दे नरेन्द्रमतमाह तन्त्रम्।।पानीयं प्राणिनां प्राणं विश्वमेव च तन्मयम्।अतोSत्यन्तनिषेधेSपि न क्वचिद्वारि वार्यते।।आस्यशोषाङ्गसादाद्याः मृत्युर्वा तदलाभतः।न हि तोयाद्विना वृत्तिः स्वस्थस्य व्याधितस्य वा।।तन्वव्यक्तरसं हिमं लघुतरं घर्मासुमूर्छापिहम् तृष्णोष्णाद्भयमोहदा श्रमहरं तन्द्रादिनिद्रापहम्।हृद्यं स्वादु विपाकदं स्मृतिकरं दाहार्तिविच्छेदनं पुष्ट्यैन्द्रं बलमायुषां धृतिकरं संजीवनं जीविनाम्।।
राजा के औषधि सम्बन्धी मत् को प्रणाम करता हूँ जिसकी शोभा-समृद्धि तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ है, जो समस्त तत्त्वों को ज्ञातकर चरम रुप से प्रस्तुत कर दिया गया है और जो उज्ज्वल उक्तियों के रुप में आया, प्राप्त हुआ।


प्राणियों के प्राण पानी है। पूरा विश्व जलमय है। अतः सर्वथा निषेध होने पर भी कभी पानी पीना रोका नहीं जाता। मुँह सूखना, अंगों में क्लान्ति या मृत्यु तक हो सकती है-जल न मिलने से पानी के बिना न स्वस्थ की और न बीमार की प्रवृत्ति होती है। शरीर में सुकुमारतापूर्ण रस, शीतलता, हल्कापन, गर्मी से मूर्च्छा दूर करने वाला पानी है। प्यास की गर्मी भय और बेहोशी लाती है। पानी थकान दूर करता है और उनींदापन या निद्रा नष्ट करता है। मनोहर, स्वादिष्ट, पाचक, स्मृति लाने वाला, जलन कष्ट हरने वाला होता हा। पानी पोषण तत्त्वों से इन्द्रिय शक्ति बढ़ाता, आयु वाले प्राणियों की स्मृति बढ़ाता है और प्राणियों को संजीवन है।

 

 

Disqus Comment

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा