वराहमिहिर का उदकार्गल (भाग 2)

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डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित
अतृणे सतृणा यस्मिन् सतृणे तृणवर्जिता मही यत्र।
तस्मिन शिरा प्रदष्ठि वक्तव्यं वा धनं तस्मिन्।।52।।

तृणहीन स्थान पर कोई तृणयुक्त स्थान हो या वहाँ सब दूर घास हो पर एक स्थान पर हरी घास न हो तो वहाँ साढ़े चार पुरुष नीचे शिरा होती है। या गड़ा धन होता है।(52)

कण्टक्यकण्टकानां व्यत्यासेSम्भस्त्रिभिः करैः पश्चात्।
खात्वा पुरुषत्रितयं त्रिभागयुक्तं धनं वा स्यात्।।53।।

काँटे वाले वृक्षों में एक बिना काँटे का या बिना काँटे के पेड़ों में एक काँटे वाला हो तो उसके तीन हाथ पश्चिम में एक तिहाई सहित तीन पुरुष नीचे जल या धन होता है। (53)

नदति मही गम्भीरं यसमिंश्चरणाहता जलं तस्मिन्।
सार्धेस्त्रिभिर्मनुष्यैः कौबेरी तत्र च शिरा स्यात्।।54।।

पैर से ठोकने पर भूमि में गंभीर ध्वनि हो तो वहीं साढ़े तीन पुरुष नीचे उत्तर से आता पानी होता है। (54)

वृक्षस्यैका शाखा यदि विनता भवति पाण्डुरा वा स्यात्।
विज्ञातव्यं शाखातले जलं त्रिपुरुषं खात्वा।।55।।

वृक्ष की एक शाखा भूमि की ओर झुके या पीले पड़ गयी हो तो उसके तीन पुरुष नीचे जल होता है। (55)

फलकुसुमविकारो यस्य तस्य पूर्वे शिरा त्रिभिर्हस्तैः।
भवति पुरुषैश्चतुर्भः पाषाणोSधः क्षितिः पीता।।56।।

किसी पेड़ के फल-फूल में विकार हो तो उस वृक्ष से तीन हाथ पूर्व में चार पुरुष नीचे शिरा होती है। नीचे पत्थर होता है। और मिट्टी पीले रंग की होती है। (56)

यदि कण्टकारिका कण्टकैर्विना दृश्यते सितैः कुसुमैः।
तस्यास्तलेSम्बु वाच्यंत्रिभिर्नरैरर्धपुरुषे च ।।57।।

कटेरी का पेड़ काँटों से रहित और सफेद फुलों वाला दिखाई दे तो साढ़े तीन पुरुष नीचे पानी निकलता है। (57)

खर्जूरी द्विशिरस्कायत्र भवेज्जवलविवर्जिते देशे।
तस्याः पश्चिमभागे निर्देश्यं त्रिपुरुषे वारि।।58।।

जलरहित खजूर के दो जुड़वाँ पेड़ हों तो उससे दो हाथ पश्चिम में तीन पुरुष नीचे जल होता है। (58)

यदि भवति कर्णिकारः सितकुसुमः स्यात्पलाशवृक्षो वा।
सव्येन तत्र हस्तद्वयेSम्बु पुरुषत्रये भवति।।59।।

सफेद फूल की कनेर या ढाक से दो हाथ दक्षिण में तीन पुरुष नीचे पानी होता है। (59)

ऊष्मा यस्यां धात्र्यां धूमो वा तत्र वारि नरयुग्मे।
निर्देष्टव्या च शिरा महता तोयप्रवाहेण।।60।।

किसी भूमि से भाप या धुआँ निकलता दिखे तो दो पुरुष नीचे बहुत जल वाली आव होती है। (60)

यस्मिन् क्षेत्रोद्देशे जातं सस्यं विनाशमुपयाति।
स्निग्धमतिपाण्डुरं वा महाशिरा नरयुगे तत्र।।61।।

किसी खेत में खेती पैदा होकर नष्ट हो जाए या बहुत चिकनी खेती हो या उत्पन्न होकर पीली पड़ जाए, वहाँ दो पुरुष नीचे बहुत जल होता है। (61)

मरूदेशे भवति शिरा यथा तथातः परं प्रवक्ष्यामि।
ग्रीवा करभाणामिव भूतलसंस्थाः शिरा यान्ति।।62।।

अब मरूप्रदेश (मारवाड़) में भूगर्भ जल शिरा बताते हैं। ऊँट की गर्दन के समान भूमि में ऊँची नीची आव होती है। (62)

पूर्वोत्तरेण पीलोर्यदि वल्मीको जलं भवति पश्चात्।
उत्तरगमना च शिरा विज्ञेया पञ्चभिः पुरुषैः।।63।।

पीलू वृक्ष जल के ईशान (उत्तरपूर्व) में बाँबी से साढ़े चार हाथ पश्चिम में पाँच पुरुष नीचे उत्तर वाहिनी धारा होती है। (63)

चिह्नं दुर्दुर आदो मृत्कपिलातः परं भवेद्वरित।
भवति च पुरुषेSधोSश्मा तस्य तले वारि निर्देश्यम्।।64।।

वहाँ पहले पुरुष में मेंढ़क, फिर हल्की पीली के बाद हरे रंग की मिट्टी व पत्थर निकलता है। इनके नीचे जल होता है। (64)

पीलोरेव प्राच्यां वल्मीकोSतोSर्धः पञ्चमैर्हस्तैः।
दिशि याम्यायां तोयं वक्तव्यं सप्तभिःपुरुषैः।।65।।

पीलू पेड़ के पूर्व में बाँबी हो तो उस वृक्ष के चार हाथ दक्षिण में सात पुरुष नीचे जल होता है। (65)

प्रथमे पुरुषे भुजगः सितसितो हस्तमात्रमूर्तिश्च।
दक्षिणतो वहति शिरा सक्षारं भूरि पानीयम्।।66।।

यहाँ पहले पुरुष में श्वेत-श्याम एक हाथ लम्बा साँप, फिर बहुत खारे पानी की दक्षिण धारा प्रकट होती है। (66)

उत्तर श्च करीरादहिनिलये दक्षिणे जलं स्वादु।
दशभिः पुरुषैर्ज्ञेयं पुरुषे पीतोSत्र मण्डूकः।।67।।

कटीर के पेड़ के उत्तर में बाँबी हो तो पेड़ से साढ़े चार हाथ दक्षिण में दस पुरुष नीचे मधुर जल होता है। एक पुरुष नीचे पीला मेंढक निकलता है। (67)

रोहीतकस्य पश्चादहिवासश्चेस्त्रिभिः करैर्याम्ये।
द्वादश पुरुषान् खात्वा सक्षारा पश्चिमेन शिरा।।68।।

रोहीतक (रूहीड़ा) वृक्ष के पश्चिम में बांबी हो तो वृक्ष से तीन हाथ दक्षिण में बारह पुरुष नीचे खारे जल की पश्चिम धारा निकलती है। (68)

इन्द्रतरोर्वल्मीकः प्राग्देश्यः पश्चिमे शिरा हस्ते।
खात्वा चतुर्दश नरान् कपिला गोधा नरे प्रथमे ।।69।।

अर्जुन वृक्ष के पूर्व में बाँबी होने पर वृक्ष से एक हाथ पश्चिम में चौदह पुरुष नीचे धारा होती है। यहाँ पहले पुरुष में कपिल वर्ण की गोह होती है। (69)

यदि वा सुवर्णनाम्नस्तरोर्भवेद्वामतो भुजंगगृहम्।
हस्तद्वये तु याम्ये पञ्चदशनरावसानेSम्बु।।70।।

धतुरे के बायें बाँबी हो तो उस पौधे से दो हाथ दायें पन्द्रह पुरुष नीचे पानी होता है। (70)

क्षारं पयोSत्र नकुलोSर्धमानवे ताम्रसन्निभश्चाश्मा।
रक्ता च भवति वसुधा वहति शिरा दक्षिणा तत्र।।71।।

यह पानी खारा होता है और आधा पुरुष पर न्योला व ताम्रवर्ण का पत्थर, तब लाल मिट्टी के बाद जलधारा निकलती है। (71)

बदरीरोहितवृक्षौ संपृक्तौ चेद्विना वल्मीकम्।
हस्तत्रयेSम्बु पश्चात् षोडशभिर्मानवैर्भवति।।72।।

बेर और रूहीड़ा एक साथ हों तो उनसे तीन हाथ पश्चिम में सोलह पुरुष नीचे पानी होता है। (72)

सुरसं जलमादौ दक्षिणा शिरा वहति चोत्तरेणान्या।

पिष्टनिभः पाषाणो मृच्छ्वेता वृश्चिकोSर्धनरे।।73।।

यह जल बड़ा मधुर होता है। पहले दक्षिण फिर उत्तर शिरा भी निकलती है। आटे जैसा सफेद पत्थर, श्वेत मिट्टी और आधा पुरुष नीचे बिच्छू होता है। (73)

सकरीरा चेद्वदरी त्रिभिः करैः पश्चिमेन तत्राम्भः।
अष्टादशभिः पुरुषैरैशानि बहुजला च शिरा।।74।।

करीर के पेड़ के साथ बेर का पेड़ हो तो उनसे तीन हाथ पश्चिम में अठारह पुरुष नीचे पूर्वोत्तर से बहती बहुत जल की धारा होती है। (74)

पीलुसमेता बदरी हस्तत्रयसमिते दिशि प्राच्याम्।
विशंत्या पुरुषाणामशोष्यमंभोSत्र सक्षारम्।।75।।

पीलू के साथ बेर के तीन हाथ पूर्व में बीस पुरुष नीचे अटूट खारा पानी होता है। (75)

ककुभकरीररावेकत्र संयुतौ यत्र ककुभबिल्वौ वा।
हस्तद्वयेSम्बु पश्चान्नरैर्भवेत्पञ्चविंशत्या।।76।।

अर्जुन और करीर अथवा अर्जुन और बेल का पेड़ एक साथ हो तो उनसे दो हाथ पश्चिम में पच्चीस पुरुष नीचे पानी होता है। (76)

वल्मीकमूर्धनि यदा दूर्वा च कुशाश्च पाण्डुराः सन्ति।
कूपो मध्ये देयो जलमत्र नरैकर विंशत्या।।77।।

बाँबी पर दूब और सफेद कुश हो तो उसके इक्कीस हाथ नीचे पानी होता है। (77)

भूमि कदम्बकयता वल्मीके यत्र दृश्यते दूर्वा।
हस्तत्रयेण याम्ये नरैर्जलं पञ्चविंशत्या।।78।।

कदम्ब के पेड़ हों, बाँबी पर दूब हो तो कदम्ब से दो हाथ दक्षिण में पच्चीस पुरुष नीचे पानी होता है। (78)

वल्मीकत्रयमध्ये रोहीतक पादपो यदा भवति।
नाना वृक्षैः सहितस्त्रिभिर्जलं तत्र वक्तव्यम्।।79।।

तीन बाँबियों के बीच तीन तरह के तीन पेड़ो वाला रूहीड़े का पेड़ हो तो वहाँ जल होता है। (79)

हस्तचतुष्के मध्यात् षोडशभिश्चांगुलैरुदग्वारि।
चत्वारिंशत्पुरुषान् खात्वाश्मातः शिरा भवति।।80।।

मध्य में वर्तमान रूहीड़े के पेड़ से चार हाथ और सोलह अंगुल उत्तर में चालीस पुरुष पर पत्थर निकलता है। जिसके नीचे जल धारा होती है। (80)

ग्रन्थिप्रचरा यस्मिञ्छमी भवेदुत्तरेण वल्मीकः।
पश्चात्पञ्चकरान्ते शताधसंख्यकैः सलिलम्।।81।।

बहुत गाँव वाले शमी के उत्तर में बाँबी होने पर उस पेड़ से पाँच हाथ पश्चिम में पचास पुरुष नीचे पानी होता है। (81)

एकस्थाः पञ्च यदा वल्मीका मध्यमो भवेच्छेतः।
तस्मिन् शिरा प्रदिष्टा नरषष्ट्या पञ्चवजिंतया।।82।।

एक ही स्थान पर पाँच बाँबी के बीच के सफेद बाँबी पर पचपन पुरुष गहराई पर जलधारा मिलती है। (82)

सपलाशा यत्र शमी पश्चिम भागेSम्बु मानवैः षष्ट्या।
अर्धनरेSहिः प्रथमं सवालुका पीतमृत्परतः।।83।।

वल्मीकेन परिवृत्तः श्वेतो रोहीतको भवेद्यस्मिन्।

पूर्वेण हस्तमात्रे सप्तत्या मानवैरम्बु।।84।।

पलाश के साथ शमी से पाँच हाथ पश्चिम मे आठ पुरुष नीचे पानी होता है। आधा पुरुष खोदने पर साँप, फिर बालू वाली मिट्टी निकलती है। (83) बाँबी से घिरा सफेद रूहीड़ा पेड़ से एक हाथ पूर्व में सत्तर पुरुष नीचे पानी होता है। (84)

श्वेता कण्टकबहुला यत्र शमी दक्षिणेन तत्र पयः।
नरपञ्चकसंयुतया सप्तयाहिर्नरार्धे च ।।85।।

अधिक काँटे वाले शमी से एक हाथ दक्षिण में पचहत्तर पुरुष नीचे पानी होता है। आधे परस पर साँप निकलता है। (85)

मरुदेशे यच्चिह्नं न जाङ्गले तैर्जर्ल विनिर्देश्यम्।
जम्बूवेतसपूर्वे ये पुरुषास्ते मरौ द्विगुणाः।।86।।

मरुदेश के लक्षण जांगल क्षेत्र में नहीं समझने चाहिए। जामुन, वेदमंजनूं वृक्षों से पहले जो जल संकेत दिया वह मरू में दिखे तो मरू में वे दुगने पुरुष मानने चाहिए। बहुत जल के देश को अनूप कहते हैं और जलाभाव का देश मरूस्थल कहलाता है। इन दोनों से भिन्न मध्यम देश जांगल देश होता है। (86)

जम्बूस्त्रिवृत्ता मूर्वा शिशुमारी सारिवा शिवा श्यामा।
वीरुधयो वाराही ज्योतिष्मती च गरुडवेगा।।87।।

सूकरिकमाषपर्णी व्याघ्रपदाशेचेति यद्यहेर्निलये।
वल्मीकादुत्तरत्तस्त्रिपुरुषे तोयम्।।88।।

जामुन, निसोत, मूर्वा, शिशुमार, शारिवन, शिवा, श्यामा, वाराही कंगनी, गरुडवेगा, सूकरिका, मषवन, व्याघ्रपदा (बघनखी) औषधियाँ यदि बाँबी पर हों तो वल्मीक से तीन हाथ उत्तर में तीन पुरुष नीचे पानी होता है। (87-88)

एतदनूपे वाच्यं जाङ्गलभूमौ तु पञ्चभिः पुरुषैः।
एतैरेव निमित्तैर्मरुदेशे सप्तभिः कथयेत्।।89।।

एकनिभा यत्र मही तृणतरुवल्मीकगुल्मपरिहीना।
तस्यां यत्र विकारो भवति धरियां जलं तत्र।।90।।

यह तीन पुरुष नीचे पानी की बात अनूप देश की है। ये लक्षण जांगल देश में हों तो पाँच पुरुष नीचे और मरुस्थल में साथ पुरुष नीचे समझें।(89) जिस एक रंगी भूमि में घास, पेड़, बाँबी, झाड़ी (झूँता) न हो और कुछ अलग सी विकार वाली दिखे तो वहाँ पाँच पुरुष पर पानी होता है।(90)

यत्र स्निग्धा निम्ना सवालुका सानुनादिनी वा स्यात्।
तत्रर्धपञ्चमैर्वारि मानवैः पञ्चभिर्यदि वा।।91।।

चिकनी नीची बालु रेत हो और पैर रखने से ध्वनि हो तो साढ़े चार या पाँच पुरुष नीचे पानी होता है। (91)

स्निग्धतरूणां याम्ये नरैश्चतुर्भिर्जलं प्रभूतं च।
तरुगहनेSपि ही विकृतो यस्तस्म त्तद्वदैव वदेत्।।92।।

बहुत से स्निग्ध पेड़ों से दक्षिण में चार पुरुष पर पानी होता है। इन पेड़ों में कोई एक अलग प्रकार के फल-फूल का हो तो उस पेड़ से दक्षिण में चार पुरुष नीचे पानी होता है।(92)

नमते यत्र धरित्री सार्धे पुरुषेSम्बु जाङ्गलानूपे।
कीटा वा यत्र विनालयेन वहवोSम्बु तत्रापि।।93।।

किसी जांगल या अनूप देश में पैर रखने से भूमि दबे वहाँ डेढ़ पुरुष नीचे पानी होता है। जहाँ बहुत से कीड़े दिखाई दें परन्तु उनके रहने का कोई दर न हो तो वहाँ भी डेढ़ पुरुष नीचे पानी होता है। (93)

उष्णा शीता च मही शीतोष्णांभस्त्रिभिर्नरैः सार्धेः।
इंद्रधनुर्मत्स्यो वा वल्मीको वा चतुर्हस्तात्।।94।।

सब दूर गरम जमीन हो और एक स्थान पर ठंडी हो या सब दूर ठंडी हो और एक स्थान पर गरम हो तो वहाँ साढ़े तीन पुरुष नीचे पानी होता है। इन जांगल या अनुप में इंद्र धनुष, मत्स्य बाँबी दिखे तो चार हाथ नीचे पानी होता है। (94)

वल्मीकानां पंक्त्यां यद्यकोSभ्युच्छ्रिताः शिरा तदधः।
शुष्यति न रोहते वा सस्यं यस्यां च तत्राSम्भः।।95।।

यदि इन देशों में बहुत से बाँबियों की पाँत हो तो, एक बाँबी सवेन्नित हो तो उस उँची के चार हाथ नीचे आव होती है। जहाँ खेती जमकर सूख जाय या जमे ही नहीं वहाँ भी चार हाथ नीचे पानी समझें। (95)

न्यग्रोधपलाशोदुम्बरैः समेतैस्त्रिभिर्जलं तदधः।
वटपिप्पलसमवाये तद्वद्वाच्यं शिरा चोदक्।।96।।

जहाँ बड़, पीपल व गूलर एकत्र हों तो इनके नीचे तीन हाथ नीचे पानी निकलता है। दोनों पूर्वो्क्त स्थानों पर उत्तर शिरा होती है। (96)

आग्नेये यदि कोणे ग्रामस्य पुरस्य वा भवति कूपः।

नित्यं स करोति भयं दाहं च समानुषं प्रायः।।97।।

बस्ती से ईशान (पूर्वोत्तर) में कुआँ होने पर सदा भय रहता है। और बस्ती में आग लगती रहती है। जिसमें लोग भी जल जाते हैं। (97)

नैर्ऋत्यकोणे बालक्षयं वनिताभयं च वायव्ये।
दिक्त्रयमेततक्त्वा शेषासु शुभावहाः कूपाः।।98।।

नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) में कुआं होने पर बालकों का क्षय होता है। वायव्य (उत्तर-पश्चिम) में कूप होने पर स्त्रियों को भय होता है। शेष दिशाएँ शुभ हैं। (98)

सारस्वतेन मनिना दकार्गलं यत्कृतं तदवलोक्य।
आर्याभिः कृतमेतद् वृत्तैरपि मानवं वक्ष्ये।।99।।

यहाँ तक सारस्वत मुनि का उदकार्गल कहा। अब मनु का कहते हैं।(99)

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