वृक्षारोपण के विचार

Submitted by admin on Sat, 02/13/2010 - 08:34
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नवचेतन प्रकाशन
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पश्चिम बंगाल की साम्यवादी सरकार सामाजिक वानिकी योजना को भी लुगदी वाले पेड़ लगाने की ही योजना बनाना चाहती है। टीटागर पेपर मिल्स और पश्चिम बंगाल लुगदी-काष्ठ विकास निगम दोनों कमजोर जमीन में व्यापारिक लुगदी वाले पेंड़ और बांस के जंगल लगाने वाले हैं। निगम के अध्यक्ष श्री एके बनर्जी पहले टीटागर पेपर मिल्स के कच्चा माल विभाग के मैनेजर थे। निगम ‘भीतरी’ तथा ‘छीदा’ वृक्षारोपण वाली नीति अपनाने वाला है। भीतर क्षेत्र में व्यापारिक पेड़ लगेंगे जहां के पेड़ों और उनकी देखभाल पर निगम का सीधा नियंत्रण रहेगा। लेकिन चारों ओर के छीदे इलाके में बसे लोगों को, भीतरी जंगल से ईंधन और चारा ले जाने से रोकने के लिए सघन सामाजिक वानिकी कार्यक्रम चलाए जाएंगे।

श्री बनर्जी कहते हैं कि इससे भीतरी जंगलों की रखवाली का काम हल्का होगा। वरना पहरा और रखवाली की पूरी व्यवस्था करना बड़ा महंगा पडेगा। भीतरी जंगलों में गांव वाले अपनी खराब जमीन को भी लेने देंगे, जिसके बदले में उन्हें सालाना भाड़ा और उत्पादन का चौथा हिस्सा दिया जाएगा। इसके अलावा पेड़ लगाने, निराई, मेंड़बंदी आदि कामों से उनको रोजगार भी मिलेगा।

पश्चिम बंगाल वन विकास निगम का कहना है कि इस योजना से न केवल बंजर जमीन का उत्पादक कामों में इस्तेमाल होगा बल्कि लोगों का सहयोग और सहभाग भी मिलने लगेगा। उन्हें सामाजिक वानिकी का शिक्षण-प्रशिक्षण दिया जाएगा। युवक मंडलों और स्वयंसेवी संस्थाओं को तेजी से बढ़ने वाले पेड़ों के पौधे दिए जाएंगे। श्री बनर्जी कहते हैं, “पश्चिम बंगाल के वन विभाग के साथ हमारा समझौता हुआ है कि छीदे क्षेत्र में वे हमारी मदद से सामाजिक वानिकी शुरू करेंगे, जिसमें स्वयंसेवी संस्थाएं भी जुड़ेंगी। वन अधिकारियों के प्रशिक्षण में इस वक्त विस्तार सेवा की कुशलता और जनाभिमुख मनोवृत्ति को खास महत्व नहीं दिया गया है। लेकिन हमें विश्वास है कि स्वयंसेवी संस्थाओं और टीटागर पेपर मिल्स के सहयोग से इस कमी की पूर्ति हो जाएगी।” पिछले पांच सालों में टीटागर पेपर मिल्स ने अपने कच्चे माल की आंशिक जरूरत पूरी करने के लिए घर-आंगनों में पेड़ लगाने के लिए लोगों को काफी पौधे बांटे हैं। यह योजना अगले पांच सालों में 24,000 हेक्टेयर जमीन को लुगदी वाले पेड़ों और बांस के जंगल में परिवर्तित करेगी। इससे 14 सालों में 13 लाख टन कच्चा माल पैदा होगा। निगम को आशा है कि वह काफी मुनाफा कमा सकेगा और सब्सिडी से मुक्ति पा लेगा।

वनभूमि के बड़े-बड़े इलाकों पर निजी कंपनियों का कब्जा होने पर ग्रामीण जरूर भड़केंगे। उनकी जरूरत की चीजों की भारी किल्लत होगी। देश की आज की आबादी की सघनता को देखते हुए, देश में ऐसे बड़े भूभाग कहीं नहीं हैं, जिनका इस्तेमाल गांव के लोग ईंधन और चारे तथा दूसरी कई रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने में नहीं कर रहे हों। उद्योग वाले निश्चित ही यह सब होने नहीं देंगे। इससे जबरदस्त संघर्ष की सी हालत पैदा हो सकती है। कर्नाटक में वेस्ट पेपर मिल्स ने बांस की खेती की रक्षा के लिए अपने रियायती क्षेत्र के एक बड़े हिस्से को तार की बाड़ से घेरने की कोशिश की। तब काफी संघर्ष हुआ और आखिर में उसे बाड़ हटानी पड़ी।

इसके अलावा उद्योग वाले निश्चित ही पेड़ों का बाग लगाने में पूंजी-प्रधान तरीके ही काम में लेंगे, जिससे रोजगार के अवसर कम होंगे। जरूरत भर के मजदूरों को वे बाहर से ले आएंगे, जिससे स्थानीय मजदूरी की दरें नीची ही रहती हैं। बाहर से आए लोगों के साथ यहां लोगों के संबंधों में तनाव भी बढ़ेगा।

सरकार के सामने एक और विकल्प है- उजड़े जंगल की जमीन पेड़ लगाने के लिए बेजमीन परिवारों को, लकड़हारों को या ऐसे ही दुर्बल वर्ग के लोगों को या उनकी सहकारी समितियों को दे। पेड़ ही लगाने की शर्त पर अलग-अलग परिवारों को भी जमीन पट्टे पर दी जा सकती है। अगर दो करोड़ हेक्टेयर जंगलाती जमीन, प्रति परिवार 2 से 4 हेक्टेयर के लगभग बांटते हैं तो भी 50 लाख से एक करोड़ तक बेजमीन परिवारों को जमीन मिलेगी या कहिए 2.50 करोड़ से 5 करोड़ लोगों को उसका लाभ मिलेगा और साथ ही दूसरे अनेक लोगों को रोजगार मिलेगा। दूसरा कोई कार्यक्रम नहीं है जो इस तरह भूमिहीनता, बेरोजगारी और पर्यावरण सुधार- तीनों प्रमुख समस्याओं का एक साथ हल कर सके।

बेजमीनों को पेड़


वन लगाने के इच्छुक उद्योगपतियों को आशंका है कि इस हल में अनेक कानूनी, प्रशासकीय, आर्थिक और राजनैतिक बाधाएं खड़ी हो सकती हैं। बंबई के उद्योगपति श्री शंकर रंगनाथन कहते हैं कि भूमिहीनों में वन भूमि बांटने में किसी भी कार्यक्रम की सफलता इस बात पर निर्भर है कि उन गरीब किसानों के ‘दादाओं’ से कितनी सुरक्षा दे पाते हैं।

ज्योति लिमिटेड के श्री नानुभाई अमीन कहते हैं, “पिछला अनुभव साफ बताता है कि वनवासियों को जमीन दे भी दें, तो वे पेड़ लगाने से रहे। साधनों की कमी पहला कारण है। फिर वृक्षारोपण से आय तो पांच-सात साल के बाद ही होगी। एक-दो साल जैसे-तैसे कुछ काम हो भी जाए तो उसके बाद जमीन पड़ी रह जाएगी।”

इसमें कोई शक नहीं कि वनभूमि के वितरण कार्यक्रम में अनेक समस्याएं आएंगी। पहली, बेजमीन लोग लंबी अवधि के पेड़ो के बजाय कम अवधि की खाद्यन्न की पैदावार करना ही पसंद करेंगे। लेकिन हजारों बड़े किसान लकड़ी की महंगी दर को देखते हुए वैसे पेड़ लगा चुके हैं। मुख्य सवाल यह कि इन नए कमजोर किसानों को लाभदायक कीमत मिलेगी या नहीं। इसलिए ऐसा कुछ प्रबंध रहना चाहिए कि उत्पादन अति हो जाए तो भी समर्थन मूल्य जरूर मिल जाए। दरअसल योजना आयोग की जलावन अध्ययन समिति ने सिफारिश की है कि लकड़ी की कीमत को भी कृषि मूल्य आयोग के कार्यक्षेत्र का हिस्सा बना देना चाहिए। इससे भी ज्यादा महत्व की बात यह है कि पेड़ लगाने वाले किसानों को छह-सात साल तक रुके रहने को कहने के बजाय सालाना किस्तों के आधार पर मुआवजा देने की व्यवस्था होनी चाहिए। पश्चिम बंगाल और कर्नाटक में कई निजी कंपनियों ने किसानों को सालाना अदायगी की सुविधा देकर उन्हें आंगन में पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित किया है।

ऐसी भी योजनाएं सोची जा सकती हैं कि कच्चेमाल की प्राप्ति के लिए कंपनियों को भूमिहीनों के साथ मिल-जुलकर काम करने के लिए प्रेरित किया जाए। पर्यावरण विभाग ने सुझाया भी है कि पेड़ लगाने के लिए जंगलाती खराब जमीन पाने वाले उद्योगों को रोजगार देकर संतोष नहीं मानना चाहिए, बल्कि लोगों के साथ साझेदार की हैसियत से उस काम में हाथ भी बटाना चाहिए। विभाग कहता है, “उन वृक्षारोपणों के प्रबंध के लिए वन विभाग, स्थानीय लोग और संबद्ध उद्योग तीनों का मिला जुला संगठन खड़ा किया जाना चाहिए।” लेकिन अपने ही सुझाव को आगे बढ़ाने में वह पूरा उत्साह नहीं दिखा रहा है।

इसमें कोई शक नहीं कि इसमें कई राजनैतिक मसले खड़े होंगे। जब पता चल जाएगा कि भूमिहीनों को बहुत सारी परती जमीन दी जाने वाली है तो स्थानीय राजनीतिक और निहित स्वार्थ बेजमीनों के नाम पर बहुत सारी जमीन अपने कब्जे में ले लेने की कोशिश करेंगे। लेकिन तकनीकी, प्रशासकीय, आर्थिक और कानूनी समस्याओं की ही तरह राजनीतिक समस्याएं भी हल हो सकती हैं, बशर्तें वैसा करने का दृढ़ संकल्प हो। वरना बेजमीनों के हित की कोई योजना स्वीकृत कराना और उस पर अमल करते समय आने वाली अड़चनों को पार करना एकदम मुश्किल हो जाएगा।

किसी भी सामाजिक सवाल की तरह यह समस्या भी एक राजनैतिक समस्या ही है। इसमें भूमिहीन को जमीन देने के थोथे नारे से भी बचाना होगा और सब कुछ उद्योग के चरणों में भेंट चढ़ा देने की नीति से भी।

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