सुख देने वाली नर्मदा के किनारे बसा-मंडला

Submitted by admin on Mon, 03/08/2010 - 09:29
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राकेश दीवान
गोंडवाले के दूसरे इलाकों की तरह मंडला जिले में भी कुएँ, तालाब, बावड़ियाँ और झिरियाँ ही पानी के मुख्य स्रोत रहे हैं। स्थानों के नामों में ताल, तलाई, सागर आदि का होना वहाँ जलस्रोत होने का ही संकेत है। भौगोलिक और पैदावार के हिसाब से मंडला के आसपास तथा बम्हनी बंजर, अंजनिया और नैनपुर के बीच के त्रिकोणाकार इलाके को हवेली क्षेत्र कहा जाता है। यह मैदानी और अच्छी फसलों वाला इलाका है जहाँ ढीमर, काछी और कुर्मी जातियों के लोग खेती के अलावा सब्जियाँ और मछली भी पैदा करते हैं। यहाँ उन्हारी यानी गर्मी तथा सियारी यानी शीत दोनों की फसलें ली जाती है। धान तक की पैदावार करने वाले इस क्षेत्र में बरसात के पानी को खेतों में एक-दो फुट ऊँचे बंधान बनाकर रोका जाता है और उसकी नमी से फसलें होती हैं। कहते हैं कि छोटे और सीढ़ीनुमा खेत होने के कारण ये हवेली सरीखे दिखते हैं। सम्पन्नता के कारण बड़े मकानों या हवेली वाला होने की वजह से भी इसे ‘हवेली क्षेत्र’ कहा जाने लगा होगा। गोंडों के जमाने में दूर-दूर से फसलों और सब्जियाँ पैदा करने वाले किसानों को यहाँ जमीनें देकर बसाया गया था। मैदानी जमीनों पर दबाव बढ़ा तो यहाँ के मूल निवासी आदिवासी जंगलों, पहाड़ों की ओर हटते गए। कहते हैं कि यहां मालगुजरों के 84 गाँव थे इसलिए इस इलाके को ‘चौरासी इलाका’ भी कहा जाता है। मंडला के नैनपुर तथा उसके आसपास के पठारी इलाके और बिछिया, अमरपुर, डिंडोरी के बेतरतीब तथा ऊँचे-नीचे बसे ‘रायगढ़’ आदि क्षेत्रों के लोगों के लिए ‘हवेली’ हमेंशा ही रोजगार देने वाले धनवानों का इलाका रहा है। जलस्रोत भी इसी भौगोलिक बनावट के हिसाब से बनाए गए हैं। ‘हवेली’ में जहाँ तालाबों की विशाल श्रृंखलाएँ हैं, वहीं पठारी क्षेत्रों में नदी-नाले और उनके किनारे बनी झिरियाँ और ‘रायगढ़’ में कुएँ-बावड़ी आज भी प्रमुखता से उपयोग में लाए जाते दिखते हैं।

दूसरे क्षेत्रों की तरह इस इलाके में भी दो तरीकों से तालाब बनाए जाते थे-एक आसपास के ऊँचाई वाले पहाड़ी स्थानों से होकर आने वाले नालों को रोककर और दूसरे उपयुक्त स्थान पर कोड़कर या खोदकर। पहाड़ी और पठारी क्षेत्रों में बंधान डालकर बनाए जाने वाले तालाबों के कारण ही ऐसे क्षेत्रों को ‘बंधनी का क्षेत्र’ भी कहा जाता है। ऊँचाई पर होने के कारण इन तालाबों का पानी रिसकर नीचे के खेतों को नम करता रहता है। और नतीजे में अच्छी फसलें होती हैं। ऐसे अधिकतर तालाब मालगुजारों ने बनवाए थे इसलिए इन्हें मालगुजारी तालाब भी कहा जाता है। कोड़कर बनाए जाने वाले तालाबों का उपयोग आमतौर पर पेयजल और निस्तार के लिए ही किया जाता है। ऐसे जल भण्डारों में वर्षा जल के अलावा आसपास के खेतों से झिरकर आने वाले पानी को पार बनाकर रोका जाता है। और नतीजे में ये गंदगी, कूड़ा-करकट तथा गंदे पानी से भी बचे रहते हैं। शहरों की बड़ी आबादी के लिहाज से तालाब या बावड़ियाँ सरीखे बड़े जलस्रोत बनाए जाते थे। कोड़कर बनाए जाने वाले तालाबों, कुओं और बावड़ियों को पत्थर से पाटा जाता था और ऐसे कामों के लिए आंध्रप्रदेश तक के विशेषज्ञ कारीगरों को बुलवाया जाता था। इसी तरह छत्तीसगढ़ी और उड़िया लोग मिट्टी के काम के विशेषज्ञ होते हैं। छत्तीसगढ़ के सब्बल से मिट्टी खोदने वाले लोगों को सबलिया कहा जाता है। वे उड़ीसा के गंजाम जिले से आकर छत्तीसगढ़ में बस गए थे।

गोंड राजा हिरदेशाह को नर्मदा के किनारे का यह हरा-भरा इलाका इतना सुन्दर और सुरक्षित लगता था कि उन्होंने अपनी राजधानी नर्मदा के तट पर रामनगर में बसा ली थी। कहते हैं कि शुरू में राजा के ककैया गाँव में महल बनवाने का तय किया था लेकिन फिर इस अनुपयुक्त पाकर नर्मदा के किनारे रामनगर को चुना गया। इसका एक कारण था पानी का अभाव। ककैया गाँव के पर्राटोला में आज भी उस जमाने में खोदा गाय निषई यानि निष्ठुर नाम का एक तालाब मौजूद है। पानी को बारहों महीने न रोक पाने के कारण प्यार से इसका नाम निष्ठुर दे दिया गया होगा। हिरदेशाह ने रामनगर में तीन-चार बावड़ियों के अलावा मोतीमहल में 50-50 फुट लंबा-चौड़ा और दस फुट गहरा एक कुण्ड भी बनवाया था। यहाँ मोतीमहल में एक विशाल बावड़ी तथा मंदिर बनवाए गए थे। उसी दौर में मंडला के किले के बुर्ज के पास बनवाई गई बावड़ी आज भी मौजूद है। गोंड साम्राज्य के दौर में अंजनिया गाँव के पास के मांद गाँव में बने मलसागर तालाब में सीमेंट की टक्कर के विशेष मिश्रण से जोड़कर चारों तरफ सुन्दर सीढ़ियाँ बनाई गई थीं। चिरईडोंगरी के पास के मानेगाँव में 300 साल पुराना 14 एकड़ का एक तालाब है। कहते हैं कि इसमें कभी पानी खत्म नहीं हुआ और इलाके में कभी अकाल नहीं पड़ा। गाँव के लोग गर्व से कहते हैं कि गंगा, गोदावरी, नर्मदा सरीखी नदियों तक में गंदगी हो गई है। लेकिन इस तालाब का पानी अब भी साफ-सुथरा है। इसी तरह मेढ़ताल गाँव के पास रास्ते पर 18वीं शताब्दी में एक सुन्दर बावड़ी बनवाई गई थी। पानी के इन स्रोतों का जिक्र पुराने गजेटियर में भी मिलता है। बम्हनी-अंजनिया मार्ग पर घटिया गाँव का डेढ़ सौ साल पुराना स्तंभ वाला तालाब, भीमागाँव का रानीताल, अंजनिया के पास एहमदपुर में बनवाया गया पुल, मंडला के पास कटरा में दुर्गावती का लगवाया गया रानी बगीचा, पादरी पटपरा और डिंडोरी रोड पर काष्ठागार के समीप देवरीदादर तथा घुघरी गाँवों की बावड़ियाँ, हिरदेनगर और खैरी गाँव के तालाब उसी जमाने के निर्माण के कुछ नमूने हैं। पुरानी पिंडरई रोड पर 25-26 किलोमीटर दूर के झिरिया गाँव में एक विशाल बावड़ी है। जिसके ऊपरी हिस्से में निवास के लिए कमरे बने हैं। सिमरिया, गाड़ासरई गाँवों में भी गोंडकालीन बावड़ियाँ हैं। डिण्डौरी के पास मोहतारा गाँव तथा करंजिया के पास सड़क पर ही 15वीं शताब्दी की बावड़ियाँ मिलती है। किंकरझड़ के मंदिर के आगे एक सुन्दर कुण्ड है। इसी तरह मंडला के पास पालासुन्दर गाँव के 2-3 किलोमीटर पहले और झिरिया गाँव में बावड़ियाँ हैं।

गोंडों ने अपने राज्य का रायगढ़ का इलाका जागीर के रूप में लोधी-क्षत्रियों को दे दिया था। मोहनसिंह, गाजीसिंह आदि लोधी राजाओं की वंशज थी रानी अवंतीबाई लोधी जिसके नाम से नर्मदा पर बरगी में बाँध बनाया गया है। यह क्षेत्र ऊबड़-खाबड़ यानी राड़-बसा होने के कारण ‘रायगढ़’ कहलाता है। इस इलाके में भी कई बावड़ियाँ और तालाब हैं। जमीन समतल न होने के कारण यहाँ सिंचाई की बहुत समस्या है लेकिन पीने के लिए कुओं और 3-4 हाथ की झिरियाँ बहुत बनी हैं। समनापुर और टाढ़ी में बने तालाब लोधी राजाओं ने ही बनवाए थे। इसी टाढ़ी गाँव से 5-6 किलोमीटर दूर की गई खुदाई में चक्र, हाथी, घोड़े, सिल-लोढ़ी और सिक्के तक प्राप्त हुए थे। सकवाह, घुटास व भानपुर गाँवों में पीने का पानी के लिए कुएँ और अमोहा, सरई, सोढ़ा और हीरपानी गाँवों में झिरियाँ हैं। यहाँ इक्का-दुक्का हैण्डपम्प भी हैं जो गर्मी में सूख जाते हैं। टाढ़ी में ईसाई मिसनरियों ने 20-22 साल पहले एक तालाब खुदवाया था। अमरपुर ब्लॉक में एक बावड़ी घोड़ों को पानी पिलाने के लिए ही बनवाई गई थी। रामगढ़ में 1857 की बनी एक बावड़ी है।

मंडला जिले में पूरे प्रदेश को पानी और सुख देने वाली नर्मदा भी है। मंडला शहर को एक करधनी की तरह घेरकर बहने वाली नर्मदा और सामने से आकर उसमें मिलने वाली बंजर नदी के कारण बने त्रिशूल के आकार के तर्क पर वर्षों से यह माना जाता है कि मंडला ही पौराणिक राजा सहस्त्रबाहु की राजधानी प्राचीन माहिष्मति नगरी है। लोक इसके दूसरे दावेदार निमाड़ के महेश्वर को कई और किस्सों, तर्कों के आधार पर खारिज कर देते हैं। कहते हैं कि मंडला में पहले नर्मदा हनुमान घाट से बिना घूमे सीधी रयपुरा के चक्रतीर्थ घाट पर होकर बहती थीं। लेकिन बाद में किला बनने और उसकी सुरक्षा के कारण गोंड राजाओं ने चारों तरफ से खोदकर नदी की धारा ही बदल दी। इसका कोई साक्ष्य भले ही न हो लेकिन किले और बस्ती की सुरक्षा तथा पानी की व्यवस्था के लिए बीच शहर से नर्मदा को जोड़ने वाली दो खाइयां तो आज भी मौजूद हैं। नर्मदा की 1926 में आई बड़ी बाढ़ के बाद 1928 में एक और खाई बनाई गई थी। इसकी दूसरी कथा शंकराचार्य से शास्त्रार्थ करने वाले मंडन मिश्र की है जिन्होंने पितृ-तर्पण के लिए आए संत-महात्माओं के दक्षिण तट पर पूजा और भोजन ग्रहण करने से इनकार करने पर अपने तप के बल पर नर्मदा का बहाव ही बदल दिया था। नतीजे में नदी शहर के उत्तर की बजाए घेरा मारकर दक्षिण से बहने लगी थी।

कहावत है कि- ‘तुलसी बिरवा बाग में सींचत ही मुरझाएं, रामभरोसे जो रहे सो पर्वत पर हरियाएं।’ एक समय में मंडला में ऐसे रामभरोसे के पर्वत और घने जंगल थे। कहते हैं कि 500 वर्गमील के इलाके का 60-65 प्रतिशत जंगलों से ढँका था। पेड़ों की पानी को सोखकर रख पाने की क्षमता के चलते सभी जलस्रोतों में भी लबालब पानी थी। छोटे-मोटे बारामासी नदी-नालों का जाल बिछा था और लोग उसे जगह-जगह रोककर छोटे-छोटे बँधान बना लेते थे। बालघाट, सिवनी, राजनांदगांव और मण्डला में बँधानों की ऐसी श्रृँखलाएँ बनाने की परम्परा थी। इन नदी-नालों के किनारे झिरियां खोदकर लोग मजे में पेयजल ले लेते थे। भूगर्भीय जलस्तर 35-40 फुट पर ही था। वर्षा की 15-15 दिन की झड़ी लगती थी और 70 से 90 इंच तक पानी गिर जाता था। धीरे-धीरे होने वाली इस बरसात के मौसम के लोग हफ्तों का राशन खरीदकर रखते थे। उस दौर में फसलें भी कम पानी वाली हुआ करती थीं और लोग बाँस की टोकनी या सूप से तालाब के पानी को उछालकर नालियों के जरिए सिंचाई कर लेते थे।

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